नई तकनीक अपनाई, तरबूज की खेती से आर्थिक तंगी दूर भगाई

प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के तहत ड्रिप सिंचाई अपनाने के बाद उनकी खेती ही नहीं, पूरी जिंदगी बदल गई

मध्य प्रदेश आदिवासी बहुल अलीराजपुर जिले के कट्ठीवाड़ा विकासखंड के छोटे से गांव मोरधी के किसान निहालसिंह बाथु आज उन किसानों के लिए मिसाल बन चुके हैं, जो सीमित संसाधनों और पानी की कमी के कारण खेती में लगातार नुकसान झेल रहे हैं। कभी पारंपरिक खेती पर निर्भर रहने वाले निहालसिंह की आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर थी, लेकिन प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के तहत ड्रिप सिंचाई अपनाने के बाद उनकी खेती ही नहीं, पूरी जिंदगी बदल गई। आज वही किसान मक्का की कम आमदनी वाली खेती छोड़कर तरबूज की उन्नत खेती से लाखों रुपए की कमाई कर रहे हैं।

निहालसिंह बताते हैं कि कुछ साल पहले तक उनकी खेती पूरी तरह बारिश पर निर्भर थी। उनके पास करीब 0.80 हेक्टेयर जमीन है, जिसमें वे पारंपरिक तरीके से मक्का की खेती करते थे। हर साल मौसम की मार, पानी की कमी और आधुनिक तकनीकों के अभाव के कारण उत्पादन बहुत कम होता था। कई बार फसल अच्छी दिखती थी, लेकिन बारिश समय पर न होने से उत्पादन घट जाता था। मेहनत और लागत अधिक लगती थी, लेकिन आमदनी बेहद कम होती थी।

उन्होंने बताया कि पूरे सीजन की मेहनत के बाद लगभग 20 क्विंटल मक्का का उत्पादन ही मिल पाता था। इससे कुल आय करीब 32 हजार रुपए होती थी, जबकि खेती में बीज, खाद, मजदूरी और अन्य खर्च निकालने के बाद मुश्किल से 7 हजार रुपए की बचत हो पाती थी। इतनी कम आमदनी में परिवार का खर्च चलाना आसान नहीं था। कई बार उन्हें खेती छोड़ने तक का विचार आया, लेकिन परिवार और बच्चों की जिम्मेदारियों ने उन्हें संघर्ष जारी रखने के लिए प्रेरित किया।

इसी दौरान उद्यानिकी विभाग के अधिकारियों की गांव में बैठक हुई, जिसमें किसानों को प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के बारे में जानकारी दी गई। अधिकारियों ने “पर ड्रॉप मोर क्रॉप” अभियान के तहत ड्रिप सिंचाई प्रणाली की विशेषताएं समझाईं। शुरुआत में निहालसिंह को विश्वास नहीं हुआ कि कम पानी में भी अच्छी खेती संभव है। उन्हें लगा कि यह तकनीक बड़े किसानों के लिए होगी और इसे अपनाना महंगा पड़ेगा।

हालांकि विभागीय अधिकारियों ने उन्हें योजना के लाभ, अनुदान और आधुनिक खेती के फायदे विस्तार से बताए। इसके बाद उन्होंने हिम्मत जुटाकर योजना में आवेदन किया। उनके खेत में ड्रिप सिंचाई सिस्टम लगाया गया, जिसकी कुल लागत 1 लाख 14 हजार 277 रुपए आई। इसमें से सरकार की ओर से उन्हें 56 हजार 60 रुपए का अनुदान मिला। इससे उनकी आर्थिक चिंता काफी कम हो गई और वे नई तकनीक अपनाने के लिए तैयार हुए।

ड्रिप सिंचाई लगने के बाद उन्होंने खेती को नए तरीके से समझना शुरू किया। उन्हें एहसास हुआ कि पानी की हर बूंद का सही उपयोग करके उत्पादन बढ़ाया जा सकता है। इसके बाद उन्होंने पारंपरिक मक्का की खेती छोड़कर नकदी फसल के रूप में तरबूज की खेती करने का फैसला लिया। शुरुआत में यह फैसला जोखिम भरा लग रहा था, लेकिन उन्होंने विभाग के अधिकारियों से लगातार मार्गदर्शन लिया और आधुनिक तकनीकों को अपनाया।

तरबूज की खेती में ड्रिप सिंचाई ने बड़ा बदलाव किया। पहले जहां खेतों में पानी की भारी बर्बादी होती थी, वहीं अब पौधों की जड़ों तक सीधे जरूरत के अनुसार पानी पहुंचने लगा। इससे पानी की बचत हुई, फसल की गुणवत्ता सुधरी और उत्पादन में जबरदस्त बढ़ोतरी हुई।

आज निहालसिंह अपनी 0.80 हेक्टेयर जमीन से करीब 200 क्विंटल तरबूज का उत्पादन कर रहे हैं। बाजार में अच्छी कीमत मिलने से उनकी कुल आय लगभग 2 लाख 40 हजार रुपए तक पहुंच गई है। सबसे बड़ी बात यह है कि खर्च निकालने के बाद उन्हें करीब 1 लाख 65 हजार रुपए का शुद्ध लाभ हो रहा है। यह आमदनी पहले की तुलना में कई गुना अधिक है।

खेती में हुए इस बदलाव का असर उनके परिवार की जिंदगी पर भी साफ दिखाई दे रहा है। पहले जहां घर चलाना मुश्किल था, वहीं अब बच्चों की पढ़ाई बेहतर तरीके से हो रही है। परिवार की जरूरतें आसानी से पूरी हो रही हैं और आर्थिक स्थिति मजबूत हुई है। निहालसिंह अब दूसरे किसानों को भी आधुनिक तकनीक अपनाने के लिए प्रेरित कर रहे हैं।

वे कहते हैं कि यदि किसान सही जानकारी और सरकारी योजनाओं का लाभ लें, तो खेती को फायदे का व्यवसाय बनाया जा सकता है। उनके अनुसार पहले वे सिर्फ मेहनत करते थे, लेकिन अब तकनीक और सही योजना के साथ खेती कर रहे हैं। इससे कम पानी में ज्यादा उत्पादन मिल रहा है और आय भी बढ़ रही है।

उद्यानिकी विभाग के अधिकारियों का कहना है कि प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना किसानों के लिए बेहद लाभकारी साबित हो रही है। खासकर उन इलाकों में, जहां पानी की कमी बड़ी समस्या है, वहां ड्रिप सिंचाई किसानों की आय बढ़ाने में मदद कर रही है। विभाग लगातार किसानों को जागरूक करने और आधुनिक खेती से जोड़ने का काम कर रहा है।

निहालसिंह बाथु की सफलता यह साबित करती है कि यदि किसान पारंपरिक खेती के साथ आधुनिक तकनीकों को अपनाएं और सरकारी योजनाओं का सही लाभ लें, तो कम जमीन और सीमित संसाधनों में भी बेहतर आय हासिल की जा सकती है। उनकी कहानी आज क्षेत्र के कई किसानों के लिए प्रेरणा बन चुकी है।

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