ईरान संकट से बढ़ा उर्वरक संकट! दुनिया की खाद्य सुरक्षा पर मंडराया नया खतरा

पश्चिम एशिया में बढ़ते ईरान संकट का वैश्विक उर्वरक बाजार, प्राकृतिक गैस, खाद्य सुरक्षा और भारत की कृषि पर क्या असर पड़ सकता है? जानिए उर्वरक आपूर्ति, कीमतों और किसानों पर पड़ने वाले संभावित प्रभाव का विस्तृत विश्लेषण।

Thumbnail Text ईरान संकट का बड़ा असर! उर्वरक महंगा, खाद्य सुरक्षा पर खतरा

पश्चिम एशिया लंबे समय से वैश्विक ऊर्जा, उर्वरक और खाद्य आपूर्ति का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। हाल के वर्षों में ईरान से जुड़े भू-राजनीतिक तनाव, आर्थिक प्रतिबंध, समुद्री मार्गों पर सुरक्षा संबंधी चुनौतियां और क्षेत्रीय संघर्षों ने दुनिया भर के कृषि बाजारों को प्रभावित किया है। विशेष रूप से ईरान संकट ने उर्वरक उद्योग, प्राकृतिक गैस की उपलब्धता, समुद्री परिवहन और खाद्य सुरक्षा पर व्यापक प्रभाव डाला है। इसका असर केवल मध्य पूर्व तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत सहित एशिया, अफ्रीका और यूरोप के अनेक देशों में कृषि लागत और खाद्य महंगाई के रूप में देखने को मिल रहा है।

प्राकृतिक गैस की आपूर्ति पर बढ़ा दबाव

यूरिया और अन्य नाइट्रोजन आधारित उर्वरकों के उत्पादन में प्राकृतिक गैस सबसे महत्वपूर्ण कच्चा माल है। पश्चिम एशिया दुनिया के सबसे बड़े प्राकृतिक गैस उत्पादक क्षेत्रों में शामिल है। यदि ईरान से जुड़े तनाव के कारण गैस उत्पादन या निर्यात प्रभावित होता है, तो अंतरराष्ट्रीय गैस बाजार में कीमतें तेजी से बढ़ जाती हैं।

गैस महंगी होने पर यूरिया, अमोनिया और अन्य नाइट्रोजन उर्वरकों के उत्पादन की लागत बढ़ जाती है। परिणामस्वरूप कई उर्वरक संयंत्र उत्पादन घटाने या अस्थायी रूप से बंद करने के लिए मजबूर हो सकते हैं। इससे वैश्विक बाजार में उर्वरकों की उपलब्धता कम होती है और कीमतों में तेजी आती है।

होर्मुज जलडमरूमध्य की रणनीतिक भूमिका

विश्व के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में होर्मुज जलडमरूमध्य का विशेष स्थान है। खाड़ी देशों से निकलने वाला बड़ी मात्रा में कच्चा तेल, एलएनजी, सल्फर, अमोनिया और उर्वरकों का कच्चा माल इसी मार्ग से दुनिया के विभिन्न देशों तक पहुंचता है।

यदि इस समुद्री मार्ग पर तनाव बढ़ता है या जहाजों की आवाजाही प्रभावित होती है, तो माल ढुलाई में देरी और परिवहन लागत दोनों बढ़ जाती हैं। जहाजों का बीमा महंगा हो जाता है, जिससे उर्वरक कंपनियों की लागत में और वृद्धि होती है। अंततः इसका बोझ किसानों और उपभोक्ताओं तक पहुंचता है।

भारत पर संभावित प्रभाव

भारत विश्व के सबसे बड़े उर्वरक उपभोक्ता देशों में से एक है। देश अपनी आवश्यकता का बड़ा हिस्सा घरेलू उत्पादन से पूरा करता है, लेकिन यूरिया, डीएपी, एमओपी, अमोनिया, फॉस्फोरिक एसिड और सल्फर जैसे कई कच्चे माल तथा उर्वरकों के लिए आयात पर भी निर्भर है।

यदि पश्चिम एशिया में तनाव लंबे समय तक बना रहता है, तो भारत को निम्नलिखित चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है—

हालांकि भारत सरकार पिछले कुछ वर्षों से विभिन्न देशों के साथ दीर्घकालिक आपूर्ति समझौते कर रही है तथा घरेलू उत्पादन क्षमता भी बढ़ा रही है, जिससे जोखिम को कुछ हद तक कम किया जा सके।

फॉस्फेट और सल्फर बाजार पर असर

डीएपी और एनपीके उर्वरकों के निर्माण में फॉस्फोरिक एसिड और सल्फर की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। सल्फर की वैश्विक आपूर्ति का बड़ा हिस्सा तेल एवं गैस उद्योग से जुड़ा हुआ है।

यदि पश्चिम एशिया में तेल और गैस उद्योग प्रभावित होता है, तो सल्फर की उपलब्धता भी कम हो सकती है। इसका सीधा असर फॉस्फेट आधारित उर्वरकों के उत्पादन पर पड़ता है और डीएपी सहित कई उर्वरकों की कीमतों में तेजी देखी जा सकती है।

खाद्य सुरक्षा के लिए बढ़ती चुनौती

उर्वरकों की कमी या कीमतों में वृद्धि का सीधा असर कृषि उत्पादन पर पड़ता है। यदि किसान पर्याप्त मात्रा में उर्वरकों का उपयोग नहीं कर पाते, तो फसलों की उत्पादकता घट सकती है।

कम उत्पादन के कारण—

संयुक्त राष्ट्र और विभिन्न अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं पहले भी चेतावनी दे चुकी हैं कि भू-राजनीतिक संघर्षों का सबसे बड़ा असर कृषि और खाद्य आपूर्ति श्रृंखला पर पड़ता है।

किसानों की लागत में बढ़ोतरी

उर्वरकों की कीमत बढ़ने से किसानों की प्रति एकड़ लागत बढ़ जाती है। इसके साथ यदि डीजल, परिवहन और सिंचाई की लागत भी बढ़े तो खेती और महंगी हो जाती है।

छोटे और सीमांत किसानों के लिए यह स्थिति अधिक चुनौतीपूर्ण होती है क्योंकि उनके पास लागत बढ़ने की भरपाई करने के सीमित साधन होते हैं। कई बार किसान उर्वरकों की मात्रा कम कर देते हैं, जिससे फसल उत्पादन प्रभावित होता है।

वैश्विक बाजार में अस्थिरता

ईरान संकट केवल उर्वरकों तक सीमित नहीं है। इसका प्रभाव कच्चे तेल, प्राकृतिक गैस, समुद्री परिवहन, बीमा, कृषि जिंसों और विदेशी मुद्रा बाजार पर भी दिखाई देता है।

जब वैश्विक बाजार में अनिश्चितता बढ़ती है, तब निवेशक जोखिम कम करने का प्रयास करते हैं और कई देशों में आयात-निर्यात की लागत बढ़ जाती है। इससे कृषि व्यापार भी प्रभावित होता है।

भारत की रणनीति

भारत ने पिछले कुछ वर्षों में उर्वरक सुरक्षा को मजबूत बनाने के लिए कई कदम उठाए हैं—

इन प्रयासों का उद्देश्य वैश्विक संकट के बावजूद किसानों तक समय पर उर्वरकों की उपलब्धता सुनिश्चित करना है।

भविष्य की राह

विशेषज्ञों का मानना है कि केवल आयात पर निर्भर रहना दीर्घकालिक समाधान नहीं है। भविष्य में देशों को घरेलू उत्पादन, वैकल्पिक पोषक स्रोतों, हरित अमोनिया, हरित हाइड्रोजन आधारित उर्वरकों तथा आपूर्ति श्रृंखला के विविधीकरण पर अधिक ध्यान देना होगा।

साथ ही किसानों को भी संतुलित उर्वरक उपयोग, जैव उर्वरकों, माइक्रोन्यूट्रिएंट्स और मृदा परीक्षण आधारित पोषण प्रबंधन अपनाने की आवश्यकता है। इससे लागत कम होगी और वैश्विक संकट का प्रभाव भी सीमित रहेगा।

निष्कर्ष

ईरान संकट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वैश्विक कृषि केवल खेतों तक सीमित नहीं है, बल्कि ऊर्जा, समुद्री व्यापार, अंतरराष्ट्रीय राजनीति और आपूर्ति श्रृंखला से गहराई से जुड़ी हुई है। यदि पश्चिम एशिया में तनाव लंबे समय तक जारी रहता है, तो उर्वरकों की कीमत, खाद्य उत्पादन और खाद्य सुरक्षा पर व्यापक प्रभाव पड़ सकता है। भारत जैसे बड़े कृषि देश के लिए यह आवश्यक है कि वह घरेलू उत्पादन बढ़ाने, आयात स्रोतों में विविधता लाने, आधुनिक उर्वरक तकनीकों को अपनाने और किसानों तक समय पर उर्वरकों की उपलब्धता सुनिश्चित करने की दिशा में निरंतर कार्य करता रहे। यही रणनीति भविष्य में खाद्य सुरक्षा और कृषि स्थिरता को मजबूत बनाए रखने में सबसे प्रभावी सिद्ध होगी।

 

Exit mobile version