कमजोर मानसून से बढ़ सकती है वाटर सॉल्युबल उर्वरकों की मांग

कमजोर मानसून के बीच सिंचाई आधारित खेती में बढ़ेगा वाटर सॉल्युबल उर्वरकों का महत्व

कमजोर मानसून से Water Soluble Fertilizers की मांग बढ़ेगी

देश में इस वर्ष यदि मानसून सामान्य से कमजोर रहता है, तो कमजोर मानसून से बढ़ सकती है वाटर सॉल्युबल उर्वरकों की मांग, कृषि क्षेत्र में पानी में घुलनशील उर्वरकों (Water Soluble Fertilizers – WSF) की मांग में उल्लेखनीय वृद्धि देखने को मिल सकती है। Soluble Fertilizer Association of India (SFAI) का मानना है कि विशेष रूप से ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई अपनाने वाले किसान अधिक मात्रा में वाटर सॉल्युबल उर्वरकों का उपयोग करेंगे, क्योंकि सीमित पानी में भी ये उर्वरक पौधों तक पोषक तत्वों को प्रभावी ढंग से पहुंचाने में सक्षम होते हैं।

हालांकि, उद्योग के सामने एक बड़ी चुनौती भी मौजूद है। इन उर्वरकों के निर्माण में उपयोग होने वाले कई प्रमुख कच्चे माल की कीमतों में पिछले कुछ समय में 60 से 100 प्रतिशत तक वृद्धि दर्ज की गई है, जिससे उत्पादन लागत और बाजार मूल्य दोनों प्रभावित हो रहे हैं।

क्या हैं वाटर सॉल्युबल उर्वरक?

वाटर सॉल्युबल उर्वरक ऐसे विशेष उर्वरक होते हैं जो पानी में पूरी तरह घुल जाते हैं और इन्हें ड्रिप, स्प्रिंकलर या फर्टिगेशन सिस्टम के माध्यम से सीधे पौधों की जड़ों तक पहुंचाया जाता है। इसके अलावा इनका उपयोग फोलियर स्प्रे (पत्तियों पर छिड़काव) के रूप में भी किया जाता है।

इन उर्वरकों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इनमें मौजूद पोषक तत्व पौधों द्वारा तेजी से अवशोषित किए जाते हैं, जिससे फसल की वृद्धि, फूल, फल और उत्पादन पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

कमजोर मानसून में क्यों बढ़ती है इनकी मांग?

जब वर्षा सामान्य से कम होती है, तब किसानों के सामने सबसे बड़ी चुनौती पानी का कुशल उपयोग करना होता है। ऐसे समय में पारंपरिक उर्वरकों की तुलना में वाटर सॉल्युबल उर्वरक अधिक प्रभावी साबित होते हैं।

इसके पीछे कई कारण हैं—

फलस्वरूप, बागवानी, सब्जियों, फूलों, गन्ना, फलदार पौधों और उच्च मूल्य वाली फसलों में इनकी मांग तेजी से बढ़ जाती है।

ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई वाले क्षेत्रों को होगा अधिक लाभ

भारत में सूक्ष्म सिंचाई (Micro Irrigation) का दायरा लगातार बढ़ रहा है। महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु, राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के कई क्षेत्रों में किसान ड्रिप एवं स्प्रिंकलर सिंचाई अपना रहे हैं।

इन क्षेत्रों में वाटर सॉल्युबल उर्वरकों का उपयोग पहले से ही बढ़ रहा है। यदि मानसून कमजोर रहता है, तो किसान पानी बचाने के साथ-साथ उर्वरक की दक्षता बढ़ाने के लिए फर्टिगेशन पर अधिक निर्भर हो सकते हैं।

फर्टिगेशन तकनीक का बढ़ता महत्व

फर्टिगेशन ऐसी तकनीक है जिसमें सिंचाई के पानी के साथ घुलनशील उर्वरकों को खेत तक पहुंचाया जाता है।

इस तकनीक के प्रमुख लाभ हैं—

यही कारण है कि विशेषज्ञ भविष्य की टिकाऊ खेती में फर्टिगेशन को महत्वपूर्ण तकनीक मानते हैं।

उद्योग के सामने सबसे बड़ी चुनौती: महंगा कच्चा माल

जहां मांग बढ़ने की संभावना उद्योग के लिए सकारात्मक संकेत है, वहीं कच्चे माल की बढ़ती कीमतें चिंता का विषय बनी हुई हैं।

SFAI के अनुसार कई प्रमुख रॉ मैटेरियल जैसे—

की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में 60 से 100 प्रतिशत तक वृद्धि दर्ज की गई है।

भारत इन कच्चे माल का बड़ा हिस्सा आयात करता है। ऐसे में वैश्विक बाजार में कीमत बढ़ने का सीधा असर घरेलू उद्योग पर पड़ता है।

आयात पर निर्भरता बढ़ा रही लागत

भारत में वाटर सॉल्युबल उर्वरकों के उत्पादन के लिए कई महत्वपूर्ण रसायन विदेशों से आयात किए जाते हैं।

इनकी कीमतों को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारण हैं—

इन सभी कारणों से भारतीय निर्माताओं की लागत बढ़ रही है।

किसानों पर क्या होगा असर?

यदि कच्चे माल की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं, तो इसका असर किसानों तक भी पहुंच सकता है।

संभावित प्रभाव—

हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इन उर्वरकों का वैज्ञानिक तरीके से उपयोग किया जाए तो कम मात्रा में भी बेहतर परिणाम मिलने के कारण कुल लाभ लागत से अधिक हो सकता है।

बागवानी क्षेत्र में सबसे अधिक उपयोग

भारत में वाटर सॉल्युबल उर्वरकों का उपयोग मुख्य रूप से निम्न फसलों में किया जाता है—

इन फसलों में पोषक तत्वों की सटीक मात्रा और समय पर उपलब्धता उत्पादन बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

सूक्ष्म सिंचाई योजनाओं से बढ़ सकती है मांग

केंद्र और राज्य सरकारें लगातार ड्रिप एवं स्प्रिंकलर सिंचाई को बढ़ावा दे रही हैं। प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY) सहित कई योजनाओं के तहत किसानों को सूक्ष्म सिंचाई उपकरणों पर सहायता प्रदान की जा रही है।

जैसे-जैसे माइक्रो इरिगेशन का दायरा बढ़ेगा, वैसे-वैसे वाटर सॉल्युबल उर्वरकों का बाजार भी विस्तार करेगा।

घरेलू उत्पादन बढ़ाने की जरूरत

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को केवल आयात पर निर्भर रहने के बजाय घरेलू स्तर पर वाटर सॉल्युबल उर्वरकों और उनके कच्चे माल के उत्पादन को बढ़ावा देना चाहिए।

इसके लिए—

जैसे कदम भविष्य में उद्योग को अधिक प्रतिस्पर्धी बना सकते हैं।

भविष्य की दिशा

जलवायु परिवर्तन के कारण वर्षा का स्वरूप लगातार बदल रहा है। ऐसे में जल दक्षता और पोषक तत्वों के कुशल उपयोग पर आधारित कृषि तकनीकों का महत्व तेजी से बढ़ रहा है। वाटर सॉल्युबल उर्वरक इस परिवर्तन के अनुरूप आधुनिक खेती का महत्वपूर्ण हिस्सा बनते जा रहे हैं।

यदि कमजोर मानसून की स्थिति बनती है, तो ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई वाले क्षेत्रों में इनकी मांग निश्चित रूप से बढ़ सकती है। हालांकि, उद्योग के लिए सबसे बड़ी चुनौती कच्चे माल की बढ़ती कीमतों को नियंत्रित करना और किसानों को उचित मूल्य पर गुणवत्तापूर्ण उत्पाद उपलब्ध कराना होगी। आने वाले समय में सरकार, उद्योग और अनुसंधान संस्थानों के संयुक्त प्रयास ही इस क्षेत्र की दीर्घकालिक वृद्धि सुनिश्चित कर सकते हैं।

 

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