क्या खेत में हर साल एक जैसा उर्वरक डालना सही है? जानिए वैज्ञानिकों की राय

यदि किसी खेत में पहले से फॉस्फोरस पर्याप्त मात्रा में मौजूद है और किसान हर साल DAP डालते रहते हैं, तो अतिरिक्त फॉस्फोरस का लाभ फसल को नहीं मिलेगा। इसके विपरीत, कुछ अन्य आवश्यक पोषक तत्वों की कमी बढ़ सकती है।

भारत में अधिकांश किसान हर साल अपनी फसल के लिए लगभग एक जैसी उर्वरक योजना अपनाते हैं। कई क्षेत्रों में यह सामान्य धारणा बन गई है कि यदि पिछले साल किसी खेत में 2 बोरी DAP और 4 बोरी यूरिया डालने से अच्छी उपज मिली थी, तो अगले साल भी उतनी ही मात्रा में वही उर्वरक डाल देने चाहिए। लेकिन क्या यह तरीका वास्तव में सही है? क्या हर साल एक ही खेत में एक जैसा उर्वरक डालना फसल और मिट्टी दोनों के लिए लाभदायक है?

कृषि वैज्ञानिकों का स्पष्ट मत है कि हर साल बिना मिट्टी की जांच और फसल की आवश्यकता को समझे एक जैसा उर्वरक डालना वैज्ञानिक दृष्टि से उचित नहीं है। इससे शुरुआत में भले ही उत्पादन पर अधिक असर न दिखे, लेकिन लंबे समय में मिट्टी की उर्वरता घट सकती है, पोषक तत्वों का संतुलन बिगड़ सकता है और किसानों की लागत भी बढ़ सकती है।

आइए विस्तार से समझते हैं कि ऐसा क्यों होता है और किसानों को सही उर्वरक प्रबंधन कैसे अपनाना चाहिए।

हर खेत की मिट्टी अलग होती है

कोई भी दो खेत पूरी तरह समान नहीं होते। एक ही गांव में स्थित दो खेतों की मिट्टी में भी पोषक तत्वों की मात्रा अलग-अलग हो सकती है। इसका कारण मिट्टी का प्रकार, सिंचाई व्यवस्था, पहले उगाई गई फसलें, जैविक पदार्थ की मात्रा और वर्षों से किए गए उर्वरक उपयोग का इतिहास होता है।

यदि किसी खेत में पहले से फॉस्फोरस पर्याप्त मात्रा में मौजूद है और किसान हर साल DAP डालते रहते हैं, तो अतिरिक्त फॉस्फोरस का लाभ फसल को नहीं मिलेगा। इसके विपरीत, कुछ अन्य आवश्यक पोषक तत्वों की कमी बढ़ सकती है।

हर फसल की पोषक तत्वों की जरूरत अलग होती है

धान, गेहूं, मक्का, गन्ना, आलू, दलहन, तिलहन और सब्जियां—सभी फसलें मिट्टी से अलग-अलग मात्रा में पोषक तत्व लेती हैं।

उदाहरण के लिए—

यदि हर फसल में समान मात्रा और समान प्रकार के उर्वरक डाले जाएं, तो पोषण संतुलित नहीं रहेगा और उत्पादन प्रभावित हो सकता है।

लगातार एक ही उर्वरक डालने से क्या होता है?

जब किसान वर्षों तक केवल DAP और यूरिया पर निर्भर रहते हैं, तो मिट्टी में पोषक तत्वों का संतुलन बिगड़ने लगता है।

  1. फॉस्फोरस की अधिकता

DAP में फॉस्फोरस की मात्रा अधिक होती है। यदि खेत में पहले से पर्याप्त फॉस्फोरस मौजूद है और फिर भी हर साल DAP डाला जाता है, तो मिट्टी में इसकी अधिकता हो सकती है।

अधिक फॉस्फोरस होने से जिंक, आयरन और अन्य सूक्ष्म पोषक तत्व पौधों के लिए कम उपलब्ध हो जाते हैं।

  1. नाइट्रोजन पर अत्यधिक निर्भरता

कई किसान फसल की हर जरूरत का समाधान केवल यूरिया को मानते हैं। लेकिन यूरिया केवल नाइट्रोजन देता है। इससे पौधों को अन्य आवश्यक पोषक तत्व पर्याप्त मात्रा में नहीं मिल पाते।

  1. पोटाश की कमी

भारत के कई राज्यों में किसान पोटाश का उपयोग अपेक्षाकृत कम करते हैं। परिणामस्वरूप मिट्टी में पोटाश का स्तर धीरे-धीरे घटता जाता है, जिससे पौधों की रोग प्रतिरोधक क्षमता और गुणवत्ता प्रभावित होती है।

सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी बढ़ सकती है

संतुलित उर्वरक प्रबंधन नहीं अपनाने से मिट्टी में जिंक, बोरॉन, आयरन, सल्फर और मैग्नीशियम जैसे सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी होने लगती है।

इनकी कमी से—

मिट्टी की उर्वरता पर पड़ता है असर

मिट्टी केवल पौधों को सहारा देने वाला माध्यम नहीं है, बल्कि यह एक जीवित प्रणाली है जिसमें करोड़ों सूक्ष्मजीव मौजूद रहते हैं।

यदि लंबे समय तक केवल रासायनिक उर्वरकों का असंतुलित उपयोग किया जाए और जैविक खाद का प्रयोग न किया जाए, तो—

मिट्टी जांच क्यों जरूरी है?

मिट्टी परीक्षण किसानों के लिए एक प्रकार की स्वास्थ्य जांच है।

जिस प्रकार डॉक्टर जांच के बाद दवा लिखता है, उसी प्रकार मिट्टी की जांच रिपोर्ट बताती है कि खेत में कौन-सा पोषक तत्व कम है, कौन-सा पर्याप्त है और किसकी अधिकता है।

मिट्टी जांच से किसान—

विशेषज्ञों की सलाह है कि हर 2 से 3 वर्ष में कम से कम एक बार मिट्टी की जांच अवश्य करानी चाहिए।

संतुलित उर्वरक प्रबंधन क्या है?

संतुलित उर्वरक प्रबंधन का अर्थ केवल NPK देना नहीं है, बल्कि पौधों को उनकी आवश्यकता के अनुसार सभी आवश्यक पोषक तत्व उपलब्ध कराना है।

इसमें शामिल हैं—

इसके साथ-साथ जैविक खाद और जैव उर्वरकों का उपयोग भी महत्वपूर्ण है।

जैविक खाद का महत्व

यदि किसान हर साल गोबर की सड़ी खाद, कम्पोस्ट, वर्मी कम्पोस्ट या हरी खाद का उपयोग करें, तो मिट्टी की गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार होता है।

जैविक खाद—

फसल चक्र भी है जरूरी

एक ही खेत में लगातार एक जैसी फसल उगाने से भी पोषक तत्वों का असंतुलन बढ़ सकता है।

यदि किसान धान के बाद गेहूं और फिर दलहनी फसल जैसे चना, मसूर या मूंग उगाएं, तो मिट्टी की उर्वरता बेहतर बनी रहती है।

फसल चक्र अपनाने से—

आधुनिक तकनीक से उर्वरक प्रबंधन

आज कई नई तकनीकें किसानों की मदद कर रही हैं।

इन तकनीकों से किसान जरूरत के अनुसार सही मात्रा में उर्वरक देकर लागत कम कर सकते हैं और उत्पादन बढ़ा सकते हैं।

किसानों के लिए कुछ महत्वपूर्ण सुझाव

निष्कर्ष

एक ही खेत में हर साल एक जैसा उर्वरक डालना सुविधाजनक जरूर लग सकता है, लेकिन यह लंबे समय में मिट्टी और फसल दोनों के लिए नुकसानदायक साबित हो सकता है। हर फसल की पोषक तत्वों की आवश्यकता अलग होती है और मिट्टी की स्थिति भी समय के साथ बदलती रहती है। इसलिए बिना मिट्टी परीक्षण के हर वर्ष एक जैसी उर्वरक योजना अपनाना वैज्ञानिक दृष्टि से उचित नहीं है।

बेहतर उत्पादन, कम लागत और स्वस्थ मिट्टी के लिए किसानों को मिट्टी जांच के आधार पर संतुलित उर्वरक प्रबंधन अपनाना चाहिए। इसके साथ जैविक खाद, सूक्ष्म पोषक तत्व, फसल चक्र और आधुनिक कृषि तकनीकों का उपयोग करके न केवल उपज बढ़ाई जा सकती है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए मिट्टी की उर्वरता भी सुरक्षित रखी जा सकती है। यही टिकाऊ और लाभदायक खेती की सबसे महत्वपूर्ण कुंजी है।

 

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