जानें कैसा रहेगा एल नीनो और उर्वरक आपूर्ति की चुनौतियों के बीच खरीफ 2026 की शुरुआत

हालांकि वर्तमान भंडार संतोषजनक माना जा रहा है, लेकिन मई से अगस्त के बीच यूरिया की मांग 120 से 125 लाख मीट्रिक टन और डीएपी की मांग 30 से 35 लाख मीट्रिक टन रहने का अनुमान है। ऐसे में मांग और उपलब्धता के बीच अंतर उभर सकता है।

खरीफ 2026 सीजन की शुरुआत ऐसे समय में हो रही है जब भारतीय कृषि क्षेत्र एक साथ कई चुनौतियों और संभावनाओं का सामना कर रहा है। एक ओर देश के जलाशयों में पर्याप्त जल भंडारण और बेहतर सिंचाई व्यवस्था किसानों को शुरुआती राहत दे रही है, वहीं दूसरी ओर एल नीनो की स्थिति, सामान्य से कम मॉनसून का अनुमान और उर्वरकों की वैश्विक आपूर्ति को लेकर बनी अनिश्चितता कृषि क्षेत्र के लिए चिंता का विषय बनी हुई है।

रेटिंग एजेंसी क्रिसिल की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, खरीफ सीजन की शुरुआती परिस्थितियां अनुकूल दिखाई दे रही हैं, लेकिन पूरे सीजन का प्रदर्शन मॉनसून की वास्तविक प्रगति और कृषि आदानों की समय पर उपलब्धता पर निर्भर करेगा।

सामान्य से कम बारिश का अनुमान

भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने दक्षिण-पश्चिम मॉनसून 2026 के दौरान वर्षा का अनुमान दीर्घकालिक औसत (LPA) का 90 प्रतिशत लगाया है। यह संकेत देता है कि देश को इस वर्ष सामान्य से कम बारिश मिल सकती है।

भारत की कृषि व्यवस्था काफी हद तक मॉनसून पर आधारित है। देश की कुल वार्षिक वर्षा का लगभग 70 से 80 प्रतिशत हिस्सा जून से सितंबर के बीच प्राप्त होता है। ऐसे में मॉनसून का प्रदर्शन सीधे तौर पर बुवाई, फसल उत्पादन, ग्रामीण आय और खाद्य सुरक्षा को प्रभावित करता है।

क्रिसिल का मानना है कि इस वर्ष एल नीनो की स्थिति मॉनसून के वितरण को प्रभावित कर सकती है। ऐतिहासिक आंकड़े बताते हैं कि एल नीनो वाले वर्षों में भारत को अक्सर कम बारिश का सामना करना पड़ा है। वर्ष 1950 के बाद दर्ज 16 एल नीनो वर्षों में से सात वर्षों में देश में सामान्य से कम वर्षा और सूखे जैसी परिस्थितियां देखने को मिली थीं।

एल नीनो बढ़ा सकता है अनिश्चितता

सामान्य परिस्थितियों में प्रशांत महासागर की हवाएं भारत और ऑस्ट्रेलिया की ओर नमी लेकर आती हैं, जिससे मॉनसून को मजबूती मिलती है। लेकिन एल नीनो की स्थिति में समुद्र की सतह का तापमान बढ़ जाता है और हवाओं का पैटर्न बदल जाता है। इसका असर भारत में बारिश की मात्रा और वितरण दोनों पर पड़ता है।

मौसम विशेषज्ञों के अनुसार मई 2026 तक मिले संकेत एल नीनो के विकसित होने की संभावना को मजबूत करते हैं। इससे कई कृषि क्षेत्रों में सामान्य से कम बारिश हो सकती है। हालांकि पश्चिमी हिमालयी क्षेत्र, कुछ पूर्वोत्तर राज्य तथा आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और ओडिशा के कुछ हिस्सों में सामान्य से अधिक वर्षा की संभावना जताई गई है।

जलाशयों में पर्याप्त पानी से राहत

कम बारिश की आशंका के बावजूद जलाशयों में उपलब्ध पानी किसानों के लिए राहत की खबर है। 29 मई 2026 तक देश के प्रमुख जलाशयों में जल भंडारण सामान्य स्तर से लगभग 19 प्रतिशत अधिक दर्ज किया गया।

पश्चिमी क्षेत्र में जल स्तर सामान्य से 44 प्रतिशत, उत्तरी क्षेत्र में 34 प्रतिशत, मध्य क्षेत्र में 20 प्रतिशत और दक्षिणी क्षेत्र में 6 प्रतिशत अधिक रहा। इससे खरीफ फसलों की शुरुआती बुवाई और सिंचाई जरूरतों को पूरा करने में मदद मिलने की उम्मीद है।

मध्य भारत की लगभग 76 प्रतिशत कृषि भूमि, उत्तर भारत की 65 प्रतिशत, दक्षिण भारत की 52 प्रतिशत और पश्चिम भारत की 48 प्रतिशत भूमि सिंचाई सुविधाओं से जुड़ी हुई है। इससे शुरुआती मॉनसून की कमजोरी का असर काफी हद तक कम किया जा सकता है।

फसल पैटर्न में बदलाव की संभावना

इस वर्ष किसान मौसम, बाजार कीमतों और सरकारी खरीद नीतियों को ध्यान में रखते हुए फसल चयन में बदलाव कर सकते हैं।

धान की खेती का रकबा पंजाब, हरियाणा और बिहार में बढ़ने की संभावना है। न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP), सुनिश्चित सरकारी खरीद और बेहतर सिंचाई सुविधाएं इसके प्रमुख कारण हैं।

दूसरी ओर कई राज्यों में मक्का का रकबा घट सकता है क्योंकि किसान अधिक लाभ देने वाली फसलों जैसे सोयाबीन, दलहन, कपास और मिर्च की ओर रुख कर सकते हैं।

दलहनी फसलों का क्षेत्रफल बढ़ने की उम्मीद है क्योंकि इनकी उत्पादन लागत अपेक्षाकृत कम है और पानी की जरूरत भी कम पड़ती है। मसाला फसलों, विशेषकर मिर्च में भी बेहतर बाजार कीमतों के कारण रकबा बढ़ सकता है।

बढ़ सकता है कीट और रोगों का दबाव

विशेषज्ञों का मानना है कि बढ़ता तापमान और बारिश के अनियमित पैटर्न के कारण कई फसलों में कीट एवं रोगों का प्रकोप बढ़ सकता है।

कपास, मिर्च, सोयाबीन, दलहन और सब्जियों जैसी फसलें विशेष रूप से प्रभावित हो सकती हैं। इससे किसानों को फसल सुरक्षा उत्पादों और कीटनाशकों का अधिक उपयोग करना पड़ सकता है।

हालांकि यदि सूखे जैसी स्थिति बनती है तो कुछ किसान लागत बचाने के लिए कीटनाशकों और अन्य कृषि आदानों का उपयोग कम भी कर सकते हैं। इससे कृषि इनपुट बाजार में मांग का स्वरूप बदल सकता है।

उर्वरक आपूर्ति बनी बड़ी चिंता

खरीफ सीजन के लिए उर्वरकों की उपलब्धता भी इस वर्ष महत्वपूर्ण मुद्दा बनी हुई है। पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान के कारण उर्वरक बाजार में अनिश्चितता बनी हुई है।

27 अप्रैल 2026 तक देश में यूरिया का स्टॉक 71.58 लाख मीट्रिक टन, डीएपी का 22.35 लाख मीट्रिक टन, एमओपी का 12.46 लाख मीट्रिक टन और कॉम्प्लेक्स उर्वरकों का 57.56 लाख मीट्रिक टन दर्ज किया गया।

हालांकि वर्तमान भंडार संतोषजनक माना जा रहा है, लेकिन मई से अगस्त के बीच यूरिया की मांग 120 से 125 लाख मीट्रिक टन और डीएपी की मांग 30 से 35 लाख मीट्रिक टन रहने का अनुमान है। ऐसे में मांग और उपलब्धता के बीच अंतर उभर सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि जुलाई के मध्य से अगस्त की शुरुआत के दौरान उर्वरकों की आपूर्ति पर दबाव बढ़ सकता है। इसका सबसे अधिक असर धान, मक्का, गन्ना और कपास जैसी अधिक पोषक तत्व मांगने वाली फसलों पर पड़ सकता है।

वैश्विक कीमतों में तेज़ी

उर्वरक उद्योग को कच्चे माल की बढ़ती कीमतों का भी सामना करना पड़ रहा है। अमोनिया, फॉस्फोरिक एसिड और सल्फर जैसे प्रमुख कच्चे माल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में तेज़ वृद्धि दर्ज की गई है।

हाल के वैश्विक टेंडरों में यूरिया की कीमतें 935 से 959 डॉलर प्रति टन और डीएपी की कीमतें 930 से 935 डॉलर प्रति टन तक पहुंच गई हैं। यह युद्ध पूर्व स्तरों की तुलना में उल्लेखनीय वृद्धि को दर्शाता है।

यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है तो सरकार पर सब्सिडी का बोझ बढ़ सकता है और उर्वरक कंपनियों की लागत संरचना भी प्रभावित हो सकती है।

आगे की राह

क्रिसिल का मानना है कि खरीफ 2026 की शुरुआत मजबूत आधार के साथ हो रही है। पर्याप्त जलाशय भंडारण, सिंचाई सुविधाओं की उपलब्धता और शुरुआती बुवाई की अनुकूल परिस्थितियां कृषि क्षेत्र के लिए सकारात्मक संकेत हैं।

फिर भी एल नीनो, वर्षा का असमान वितरण, कीट एवं रोगों का बढ़ता खतरा और उर्वरकों की संभावित कमी ऐसे कारक हैं जिन पर लगातार नजर रखने की आवश्यकता होगी।

आखिरकार खरीफ 2026 का प्रदर्शन इस बात पर निर्भर करेगा कि मॉनसून देशभर में कितना संतुलित रहता है और किसानों को उर्वरक सहित सभी आवश्यक कृषि आदान समय पर उपलब्ध हो पाते हैं या नहीं। यही कारक आने वाले महीनों में कृषि उत्पादन, किसानों की आय और देश की खाद्य सुरक्षा की दिशा तय करेंगे।

 

Exit mobile version