फर्टिलाइज़र सब्सिडी का पूरा गणित: सरकार, किसान और कंपनियों के बीच कैसे चलता है यह सिस्टम?

केंद्र सरकार लाखों करोड़ रुपये उर्वरक सब्सिडी पर खर्च करती है। लेकिन यह सब्सिडी वास्तव में कैसे काम करती है? किसान को इसका लाभ कैसे मिलता है? और सरकार पर इसका कितना बोझ पड़ता है?

भारत दुनिया के सबसे बड़े कृषि देशों में से एक है और यहां करोड़ों किसान अपनी फसलों की पैदावार बढ़ाने के लिए उर्वरकों पर निर्भर हैं। लेकिन यदि किसानों को उर्वरक अंतरराष्ट्रीय बाजार कीमतों पर खरीदने पड़ें, तो खेती की लागत कई गुना बढ़ सकती है। यही कारण है कि भारत सरकार दशकों से फर्टिलाइज़र सब्सिडी (उर्वरक अनुदान) प्रदान करती आ रही है।

हर साल केंद्र सरकार लाखों करोड़ रुपये उर्वरक सब्सिडी पर खर्च करती है। लेकिन यह सब्सिडी वास्तव में कैसे काम करती है? किसान को इसका लाभ कैसे मिलता है? और सरकार पर इसका कितना बोझ पड़ता है? आइए पूरे गणित को आसान भाषा में समझते हैं।

फर्टिलाइज़र सब्सिडी क्या है?

फर्टिलाइज़र सब्सिडी वह वित्तीय सहायता है जो सरकार उर्वरक कंपनियों को देती है ताकि किसानों को खाद कम कीमत पर उपलब्ध कराई जा सके।

उदाहरण के लिए, यदि किसी बोरी यूरिया की वास्तविक लागत 2,500 रुपये है और किसान उसे केवल 266 रुपये में खरीदता है, तो बाकी राशि सरकार सब्सिडी के रूप में वहन करती है।

इस व्यवस्था का उद्देश्य किसानों की लागत कम रखना और देश में खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना है।

भारत में सब्सिडी की शुरुआत क्यों हुई?

हरित क्रांति के दौर में सरकार ने महसूस किया कि यदि किसानों को सस्ती दर पर उर्वरक उपलब्ध कराए जाएं तो कृषि उत्पादन तेजी से बढ़ सकता है।

इसी सोच के तहत उर्वरकों पर सब्सिडी व्यवस्था लागू की गई। इसका परिणाम यह हुआ कि देश में खादों का उपयोग बढ़ा और गेहूं, धान जैसी फसलों का उत्पादन कई गुना बढ़ गया।

यूरिया पर सबसे ज्यादा सब्सिडी क्यों?

भारत में कुल उर्वरक खपत का सबसे बड़ा हिस्सा यूरिया का है। यूरिया किसानों के लिए नाइट्रोजन का प्रमुख स्रोत है।

यूरिया की अधिकतम खुदरा कीमत (MRP) सरकार द्वारा तय की जाती है। वर्तमान व्यवस्था में 45 किलोग्राम की एक बोरी यूरिया किसानों को लगभग 266.50 रुपये में उपलब्ध होती है।

जबकि इसे बनाने या आयात करने की वास्तविक लागत इससे कई गुना अधिक हो सकती है।

इस अंतर की भरपाई सरकार सब्सिडी के रूप में करती है।

यूरिया सब्सिडी का गणित

मान लीजिए:

तो,

सरकारी सब्सिडी = ₹2,400 – ₹266.50

= ₹2,133.50 प्रति बोरी

यानी किसान जितनी कीमत देता है, उससे कई गुना अधिक राशि सरकार वहन करती है।

यही कारण है कि यूरिया सब्सिडी का कुल बिल बहुत बड़ा होता है।

NBS योजना क्या है?

यूरिया के अलावा DAP, NPK, MOP और अन्य फॉस्फेट तथा पोटाश उर्वरकों पर Nutrient Based Subsidy (NBS) योजना लागू होती है।

इस प्रणाली में सरकार सीधे उत्पाद की कीमत तय नहीं करती बल्कि प्रत्येक पोषक तत्व पर निश्चित सब्सिडी घोषित करती है।

जैसे:

उर्वरक में जितना पोषक तत्व होगा, उसी आधार पर सब्सिडी दी जाती है।

इसके बाद कंपनियां बाजार परिस्थितियों के अनुसार बिक्री मूल्य तय करती हैं।

सरकार का सब्सिडी बिल कितना होता है?

उर्वरक सब्सिडी भारत सरकार के सबसे बड़े व्यय मदों में से एक है।

हाल के वर्षों में:

जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में गैस, अमोनिया, फॉस्फेट या यूरिया की कीमतें बढ़ती हैं, तब सरकार का सब्सिडी बिल भी बढ़ जाता है।

अंतरराष्ट्रीय कीमतों का असर कैसे पड़ता है?

भारत अभी भी कई उर्वरकों और कच्चे माल के लिए आयात पर निर्भर है।

देश:

यदि वैश्विक कीमतें बढ़ती हैं तो उर्वरक उत्पादन और आयात दोनों महंगे हो जाते हैं।

लेकिन किसान को नियंत्रित कीमत पर खाद मिलती रहती है।

इसलिए अतिरिक्त लागत सरकार को उठानी पड़ती है।

DBT प्रणाली कैसे काम करती है?

आज उर्वरक सब्सिडी Direct Benefit Transfer (DBT) प्रणाली के माध्यम से संचालित की जाती है।

हालांकि यह पैसा सीधे किसान के खाते में नहीं जाता।

प्रक्रिया इस प्रकार है:

  1. किसान अधिकृत विक्रेता से खाद खरीदता है।
  2. खरीद का रिकॉर्ड पॉइंट ऑफ सेल (PoS) मशीन में दर्ज होता है।
  3. बिक्री की पुष्टि होने के बाद सरकार संबंधित कंपनी को सब्सिडी जारी करती है।

इस व्यवस्था से फर्जी बिक्री और सब्सिडी दुरुपयोग को कम करने में मदद मिली है।

सब्सिडी व्यवस्था की चुनौतियां

फर्टिलाइज़र सब्सिडी प्रणाली के कई फायदे हैं, लेकिन कुछ चुनौतियां भी हैं।

यूरिया का अधिक उपयोग

यूरिया सस्ता होने के कारण किसान अक्सर आवश्यकता से अधिक मात्रा में इसका उपयोग करते हैं।

इससे:

सरकारी वित्तीय बोझ

सब्सिडी पर भारी खर्च के कारण सरकार पर वित्तीय दबाव बढ़ता है।

आयात निर्भरता

कच्चे माल और उर्वरकों के आयात पर निर्भरता के कारण वैश्विक संकटों का सीधा असर भारत पर पड़ता है।

क्या भविष्य में सब्सिडी व्यवस्था बदलेगी?

विशेषज्ञ लंबे समय से सुझाव दे रहे हैं कि भविष्य में सब्सिडी को अधिक लक्षित और दक्ष बनाया जाए।

संभावित विकल्प:

हालांकि फिलहाल सरकार किसानों को सस्ती दर पर उर्वरक उपलब्ध कराने की नीति जारी रखे हुए है।

निष्कर्ष

फर्टिलाइज़र सब्सिडी भारतीय कृषि व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है। यह किसानों को सस्ती दर पर खाद उपलब्ध कराकर खेती को लाभकारी बनाए रखने में मदद करती है। लेकिन इसके पीछे सरकार को हर वर्ष लाखों करोड़ रुपये खर्च करने पड़ते हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में गैस और उर्वरकों की कीमतों में उतार-चढ़ाव सीधे इस खर्च को प्रभावित करते हैं। इसलिए भविष्य में भारत के लिए चुनौती केवल सब्सिडी जारी रखना नहीं, बल्कि उर्वरकों के संतुलित उपयोग और आत्मनिर्भरता के माध्यम से इस व्यवस्था को अधिक टिकाऊ बनाना भी है।

 

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