यूरिया की कीमतें दुनिया में गिर रहीं, फिर भी भारत में MRP क्यों नहीं बदलती?

जब वैश्विक कीमतें घटती हैं तो उसका सबसे बड़ा लाभ सरकार को कम सब्सिडी बोझ के रूप में मिलता है, जबकि किसानों के लिए कीमतें स्थिर रखी जाती हैं।

जब भी अंतरराष्ट्रीय बाजार में यूरिया की कीमतों में गिरावट आती है, किसानों और कृषि क्षेत्र से जुड़े लोगों के मन में एक सवाल जरूर उठता है—यदि दुनिया में यूरिया सस्ता हो रहा है तो भारत में इसकी अधिकतम खुदरा कीमत (MRP) क्यों नहीं घटती? आखिर जब कच्चा माल या आयातित उर्वरक सस्ता हो जाता है तो उसका फायदा सीधे किसानों को क्यों नहीं मिलता?

इस सवाल का जवाब भारत की उर्वरक नीति, सब्सिडी व्यवस्था और कृषि अर्थव्यवस्था में छिपा है। वास्तव में भारत में यूरिया का बाजार अन्य वस्तुओं की तरह पूरी तरह मुक्त नहीं है। यहां यूरिया की कीमतें सरकार नियंत्रित करती है और यही कारण है कि वैश्विक बाजार में उतार-चढ़ाव का असर सीधे किसानों द्वारा चुकाई जाने वाली कीमत पर दिखाई नहीं देता।

भारत में यूरिया एक नियंत्रित उर्वरक है

भारत दुनिया के सबसे बड़े यूरिया उपभोक्ताओं में से एक है। देश में करोड़ों किसान धान, गेहूं, मक्का, गन्ना और अन्य फसलों के लिए यूरिया का उपयोग करते हैं।

यूरिया को सरकार “नियंत्रित उर्वरक” की श्रेणी में रखती है। इसका मतलब है कि इसकी खुदरा कीमत बाजार नहीं बल्कि सरकार तय करती है। वर्तमान में किसान जिस कीमत पर यूरिया खरीदते हैं, वह वास्तविक उत्पादन या आयात लागत से काफी कम होती है।

यदि कंपनियों को यूरिया बनाने या आयात करने में अधिक खर्च आता है तो सरकार उस अंतर को सब्सिडी के रूप में भरती है। इसी व्यवस्था के कारण किसान अपेक्षाकृत कम कीमत पर यूरिया प्राप्त कर पाते हैं।

अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें क्यों बदलती रहती हैं?

यूरिया की वैश्विक कीमतें कई कारकों पर निर्भर करती हैं:

उदाहरण के लिए, रूस-यूक्रेन संघर्ष, पश्चिम एशिया में तनाव या प्राकृतिक गैस की कीमतों में वृद्धि से अंतरराष्ट्रीय यूरिया कीमतें तेजी से बढ़ सकती हैं। इसी तरह यदि आपूर्ति बढ़ जाए और मांग कमजोर हो तो कीमतें गिर सकती हैं।

लेकिन भारत में किसान इन उतार-चढ़ावों को सीधे महसूस नहीं करते क्योंकि उनके लिए बिक्री मूल्य पहले से तय होता है।

वैश्विक कीमतें घटने पर सबसे बड़ा फायदा किसे मिलता है?

जब दुनिया में यूरिया सस्ता होता है तो आम धारणा होती है कि किसानों को भी सस्ती खाद मिलनी चाहिए। लेकिन भारत की मौजूदा व्यवस्था में इसका सबसे बड़ा फायदा सरकार को मिलता है।

मान लीजिए कि किसी समय सरकार को एक बोरी यूरिया पर 1,500 रुपये की सब्सिडी देनी पड़ रही थी। यदि वैश्विक कीमतें गिर जाती हैं और लागत कम हो जाती है तो वही सब्सिडी घटकर 1,000 रुपये रह सकती है।

ऐसी स्थिति में:

यानी अंतरराष्ट्रीय कीमतों में गिरावट का लाभ पहले सरकारी खजाने को मिलता है, न कि सीधे MRP में कमी के रूप में किसानों को।

सरकार बार-बार MRP क्यों नहीं बदलती?

कृषि क्षेत्र में स्थिरता बनाए रखना सरकार की प्राथमिकता होती है। यदि यूरिया की कीमत हर कुछ महीनों में अंतरराष्ट्रीय बाजार के अनुसार बदलने लगे तो किसानों के लिए लागत का अनुमान लगाना मुश्किल हो जाएगा।

कल्पना कीजिए कि खरीफ सीजन में यूरिया सस्ता हो और रबी सीजन में महंगा। इससे खेती की योजना बनाना कठिन हो सकता है।

इसीलिए सरकार आमतौर पर MRP को स्थिर रखने की कोशिश करती है ताकि किसानों को लागत के बारे में निश्चितता बनी रहे।

अगर कीमतें बढ़ती हैं तो क्या होता है?

इस प्रश्न का उत्तर समझना भी जरूरी है।

जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में यूरिया महंगा होता है, तब भी सरकार अक्सर किसानों की कीमत नहीं बढ़ाती। इसके बजाय वह अतिरिक्त सब्सिडी देती है।

यानी:

यही संतुलन भारत की सब्सिडी आधारित यूरिया नीति की आधारशिला है।

राजनीतिक कारण भी हैं महत्वपूर्ण

भारत में कृषि केवल आर्थिक गतिविधि नहीं बल्कि सामाजिक और राजनीतिक रूप से भी बेहद महत्वपूर्ण क्षेत्र है।

यूरिया की कीमत में छोटा सा बदलाव भी करोड़ों किसानों को प्रभावित कर सकता है। इसलिए सरकारें आमतौर पर उर्वरक कीमतों को लेकर बेहद सावधानी बरतती हैं।

यदि MRP में लगातार बदलाव किए जाएं तो:

इसी कारण सरकार अक्सर स्थिर मूल्य नीति को प्राथमिकता देती है।

क्या MRP घटाने से समस्या हल हो जाएगी?

पहली नजर में लगता है कि वैश्विक कीमतें घटने पर MRP भी घटा देनी चाहिए। लेकिन इसके कुछ नकारात्मक प्रभाव भी हो सकते हैं।

पहला, भारत में पहले से ही यूरिया का अत्यधिक उपयोग होता है। कम कीमत होने पर इसका उपयोग और बढ़ सकता है।

दूसरा, सस्ती यूरिया किसानों को संतुलित पोषण से दूर कर सकती है। कई किसान पहले से ही नाइट्रोजन आधारित उर्वरकों का जरूरत से ज्यादा उपयोग करते हैं जबकि फॉस्फोरस, पोटाश और सूक्ष्म पोषक तत्वों पर कम ध्यान देते हैं।

तीसरा, अत्यधिक यूरिया उपयोग से मिट्टी की गुणवत्ता और पर्यावरण दोनों प्रभावित हो सकते हैं।

इसलिए सरकार केवल कीमत घटाने के बजाय संतुलित उर्वरक उपयोग को बढ़ावा देने की कोशिश करती है।

नैनो यूरिया और नई नीतियां क्या बदल सकती हैं?

हाल के वर्षों में नैनो यूरिया को बढ़ावा दिया गया है। इसका उद्देश्य पारंपरिक यूरिया पर निर्भरता कम करना और पोषक तत्व उपयोग दक्षता बढ़ाना है।

यदि भविष्य में:

तो यूरिया मूल्य निर्धारण प्रणाली में भी बदलाव देखने को मिल सकते हैं।

हालांकि फिलहाल सरकार पूरी तरह नियंत्रित मूल्य व्यवस्था बनाए हुए है।

क्या भारत कभी यूरिया को डीकंट्रोल कर सकता है?

उर्वरक क्षेत्र के कई विशेषज्ञ लंबे समय से यूरिया के डीकंट्रोल यानी मूल्य नियंत्रण हटाने की वकालत करते रहे हैं।

उनका मानना है कि:

लेकिन इसके साथ यह जोखिम भी जुड़ा है कि किसानों की लागत अचानक बढ़ सकती है। इसलिए सरकार इस दिशा में बहुत सावधानी से कदम उठाती है।

निकट भविष्य में पूर्ण डीकंट्रोल की संभावना सीमित दिखाई देती है।

किसानों को वास्तव में क्या समझना चाहिए?

किसानों के लिए यह समझना जरूरी है कि यूरिया की वैश्विक कीमत और भारतीय MRP के बीच सीधा संबंध नहीं है।

भारत में यूरिया की कीमतें मुख्य रूप से:

के आधार पर तय होती हैं।

इसलिए दुनिया में यूरिया सस्ता होने का मतलब यह नहीं है कि अगले ही दिन भारतीय बाजार में इसकी बोरी सस्ती हो जाएगी।

निष्कर्ष

दुनिया में यूरिया की कीमतें गिरने के बावजूद भारत में MRP स्थिर रहने का मुख्य कारण सरकार की नियंत्रित मूल्य और सब्सिडी आधारित नीति है। भारत में यूरिया का खुदरा मूल्य अंतरराष्ट्रीय बाजार के बजाय सरकारी निर्णयों से तय होता है। जब वैश्विक कीमतें घटती हैं तो उसका सबसे बड़ा लाभ सरकार को कम सब्सिडी बोझ के रूप में मिलता है, जबकि किसानों के लिए कीमतें स्थिर रखी जाती हैं। इस नीति का उद्देश्य किसानों को मूल्य अस्थिरता से बचाना, कृषि लागत को नियंत्रित रखना और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना है। यही वजह है कि वैश्विक बाजार और भारतीय यूरिया MRP अक्सर अलग-अलग दिशा में चलते दिखाई देते हैं।

 

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