वैश्विक गैस संकट से यूरिया बाजार पर दबाव, किसानों और उर्वरक उद्योग के लिए बढ़ी चिंता

वैश्विक गैस संकट से पश्चिम एशिया में तनाव और वैश्विक यूरिया बाजार पर दिख रहा है। जानिए भारत, उर्वरक उद्योग और किसानों पर इसका संभावित प्रभाव।

वैश्विक गैस संकट से यूरिया बाजार पर दबाव

वैश्विक गैस संकट से अब उर्वरक उद्योग पर भी साफ दिखाई दे रहा है। विशेष रूप से पश्चिम एशिया (Middle East) में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और प्राकृतिक गैस आपूर्ति में व्यवधान के कारण नाइट्रोजन उर्वरकों, खासकर यूरिया, की अंतरराष्ट्रीय कीमतों पर लगातार दबाव बना हुआ है। उद्योग विशेषज्ञों का मानना है कि यदि गैस आपूर्ति जल्द सामान्य नहीं हुई, तो आने वाले महीनों में वैश्विक यूरिया बाजार में कीमतों में और उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है।

भारत जैसे देशों के लिए यह स्थिति इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि देश अपनी उर्वरक आवश्यकता का एक बड़ा हिस्सा घरेलू उत्पादन के साथ-साथ आयात से भी पूरा करता है। ऐसे में वैश्विक गैस बाजार में होने वाला हर बदलाव सीधे तौर पर उर्वरक उत्पादन लागत, आयात कीमतों और सरकारी सब्सिडी पर प्रभाव डाल सकता है।

यूरिया उत्पादन में वैश्विक गैस संकट की अहम भूमिका

यूरिया दुनिया का सबसे अधिक उपयोग किया जाने वाला नाइट्रोजन उर्वरक है। इसके निर्माण में प्राकृतिक गैस (Natural Gas) सबसे महत्वपूर्ण कच्चा माल है। गैस से अमोनिया तैयार किया जाता है और उसी अमोनिया से यूरिया का उत्पादन होता है।

यूरिया उत्पादन की कुल लागत में प्राकृतिक गैस की हिस्सेदारी लगभग 70–80 प्रतिशत तक मानी जाती है। इसलिए जैसे ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में गैस महंगी होती है, यूरिया उत्पादन लागत भी बढ़ जाती है।

इसी कारण वैश्विक गैस संकट का सीधा असर उर्वरक उद्योग पर दिखाई देता है।

पश्चिम एशिया में तनाव के कारण हो रहा वैश्विक गैस संकट

दुनिया के कई प्रमुख गैस उत्पादक देश पश्चिम एशिया में स्थित हैं। इस क्षेत्र में किसी भी प्रकार का सैन्य संघर्ष, समुद्री मार्गों में व्यवधान या निर्यात पर असर वैश्विक ऊर्जा बाजार को प्रभावित करता है।

विशेषज्ञों के अनुसार तनाव बढ़ने पर—

इन सभी कारणों से यूरिया और अन्य नाइट्रोजन उर्वरकों की वैश्विक कीमतों पर दबाव बनता है।

वैश्विक गैस संकट से यूरिया बाजार में बढ़ी अनिश्चितता

विश्लेषकों का कहना है कि फिलहाल यूरिया बाजार पूरी तरह गैस कीमतों पर निर्भर नजर आ रहा है। यदि प्राकृतिक गैस की कीमतें ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं तो कई देशों के उर्वरक संयंत्र उत्पादन कम कर सकते हैं।

कुछ यूरोपीय देशों में पहले भी गैस महंगी होने के कारण कई अमोनिया संयंत्रों ने अस्थायी रूप से उत्पादन घटाया था। ऐसी स्थिति दोबारा बनने पर वैश्विक आपूर्ति प्रभावित हो सकती है।

उत्पादन घटने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में यूरिया की उपलब्धता कम होगी और कीमतों में तेजी आ सकती है।

वैश्विक गैस संकट से भारत पर क्या पड़ सकता है असर?

भारत विश्व के सबसे बड़े उर्वरक उपभोक्ता देशों में शामिल है। देश में अधिकांश यूरिया का उत्पादन घरेलू संयंत्रों में होता है, लेकिन मांग पूरी करने के लिए हर वर्ष बड़ी मात्रा में यूरिया का आयात भी किया जाता है।

यदि वैश्विक कीमतें बढ़ती हैं तो—

हालांकि सरकार किसानों के लिए यूरिया की खुदरा कीमत नियंत्रित रखती है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय कीमत बढ़ने का सीधा असर किसानों पर नहीं पड़ता। लेकिन इसका वित्तीय भार सरकार को अतिरिक्त सब्सिडी के रूप में उठाना पड़ सकता है।

वैश्विक गैस संकट को लेकर सरकार की रणनीति क्या है?

केंद्र सरकार लगातार उर्वरक आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय बाजार की स्थिति पर नजर बनाए हुए है। खरीफ और रबी दोनों मौसमों के लिए पर्याप्त स्टॉक सुनिश्चित करने के उद्देश्य से समय-समय पर आयात टेंडर जारी किए जाते हैं।

इसके अलावा सरकार—

इन कदमों का उद्देश्य आयात पर निर्भरता कम करना और दीर्घकाल में उर्वरक सुरक्षा मजबूत करना है।

उर्वरक कंपनियों के सामने चुनौतियां

वैश्विक गैस संकट केवल कीमतों तक सीमित नहीं है। कंपनियों के सामने कई अन्य चुनौतियां भी हैं।

यदि गैस संकट लंबा चलता है तो कई देशों की कंपनियां उत्पादन कम कर सकती हैं, जिससे वैश्विक बाजार और अधिक अस्थिर हो सकता है।

किसानों के लिए इसका क्या मतलब है?

विशेषज्ञों का कहना है कि फिलहाल किसानों को घबराने की जरूरत नहीं है। सरकार ने खरीफ सीजन के लिए उर्वरकों की उपलब्धता सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं और राज्यों में लगातार स्टॉक की निगरानी की जा रही है।

फिर भी किसानों को सलाह दी जाती है कि—

इससे उर्वरकों की खपत कम होगी और लागत भी नियंत्रित रहेगी।

आगे क्या रह सकती है स्थिति?

बाजार विशेषज्ञों के अनुसार आने वाले कुछ महीनों में यूरिया बाजार की दिशा मुख्य रूप से तीन कारकों पर निर्भर करेगी—

  1. पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक स्थिति।
  2. प्राकृतिक गैस की वैश्विक कीमतें।
  3. प्रमुख उत्पादक देशों का उत्पादन स्तर।

यदि गैस आपूर्ति सामान्य होती है तो यूरिया बाजार में स्थिरता लौट सकती है। लेकिन तनाव लंबे समय तक जारी रहने पर कीमतों में अस्थिरता बनी रह सकती है।

निष्कर्ष

वैश्विक प्राकृतिक गैस संकट ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि ऊर्जा बाजार और उर्वरक उद्योग एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं। पश्चिम एशिया में तनाव के कारण गैस आपूर्ति प्रभावित होने से यूरिया और अन्य नाइट्रोजन उर्वरकों की वैश्विक कीमतों पर दबाव बना हुआ है। भारत के लिए यह स्थिति इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि देश को घरेलू उत्पादन के साथ आयात पर भी निर्भर रहना पड़ता है।

फिलहाल केंद्र सरकार उर्वरकों की उपलब्धता सुनिश्चित करने और किसानों को किसी प्रकार की कमी न होने देने के लिए सक्रिय है। यदि वैश्विक हालात सामान्य होते हैं तो बाजार में स्थिरता लौट सकती है, लेकिन मौजूदा परिस्थितियों में ऊर्जा और उर्वरक बाजार दोनों पर लगातार नजर बनाए रखना आवश्यक होगा।

 

Exit mobile version