भारत में खेती केवल खाद्यान्न उत्पादन का जरिया नहीं, बल्कि करोड़ों परिवारों की आजीविका का आधार है। हालांकि, बढ़ती खेती की लागत, मौसम में बदलाव, सिंचाई के लिए बिजली की जरूरत और किसानों की आय बढ़ाने की चुनौती लगातार बनी हुई है। ऐसे में एक ऐसी तकनीक चर्चा में है, जो किसानों को एक ही जमीन से दोहरा लाभ दिलाने की क्षमता रखती है। इस तकनीक का नाम है एग्रीवोल्टाइक मॉडल (Agrivoltaics)।
इस मॉडल में खेत की जमीन पर सोलर पैनल लगाए जाते हैं और उन्हीं पैनलों के नीचे या उनके बीच खेती भी की जाती है। यानी किसान एक तरफ गेहूं, सब्जियां, दालें, चारा या दूसरी उपयुक्त फसलें उगा सकते हैं, तो दूसरी तरफ सौर ऊर्जा का उत्पादन करके बिजली की जरूरत पूरी कर सकते हैं या बिजली बेचकर अतिरिक्त आय अर्जित करने की संभावना तलाश सकते हैं।
ऐसे समय में जब देश स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देने और किसानों की आमदनी में विविधता लाने पर जोर दे रहा है, एग्रीवोल्टाइक मॉडल कृषि और ऊर्जा क्षेत्र के बीच एक नई साझेदारी का रास्ता खोल सकता है। लेकिन क्या यह तकनीक हर किसान के लिए फायदेमंद है? क्या सोलर पैनलों की छाया में फसल अच्छी तरह उग सकती है? इसे अपनाने में कितना खर्च आता है और किसानों के सामने कौन-सी चुनौतियां हैं? आइए, विस्तार से समझते हैं।
क्या है Agrivoltaics Model?
एग्रीवोल्टाइक (Agrivoltaics Model) दो शब्दों से मिलकर बना है—एग्रीकल्चर यानी कृषि और फोटोवोल्टाइक यानी सौर पैनलों के माध्यम से बिजली उत्पादन। इस तकनीक में कृषि भूमि का इस्तेमाल फसल उगाने और सौर ऊर्जा पैदा करने, दोनों कामों के लिए किया जाता है।
पारंपरिक सोलर पावर प्लांट में जमीन का बड़ा हिस्सा बिजली उत्पादन के लिए इस्तेमाल होता है। कई परियोजनाओं में पैनल लगाने के कारण उस जमीन पर सामान्य तरीके से खेती करना मुश्किल हो जाता है। इसके विपरीत, एग्रीवोल्टाइक मॉडल में सोलर पैनलों की ऊंचाई, उनके बीच की दूरी और उनकी दिशा इस तरह तय की जाती है कि उनके नीचे या आसपास खेती जारी रखी जा सके।
उदाहरण के लिए, किसी खेत में ऊंचे ढांचे पर सोलर पैनल लगाए जा सकते हैं। इनके नीचे किसान छाया सहन करने वाली सब्जियां, पत्तेदार फसलें, चारा या स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल दूसरी फसलें उगा सकता है। वहीं, पर्याप्त धूप वाले हिस्सों में ऐसी फसलें लगाई जा सकती हैं जिन्हें अधिक सूर्यप्रकाश की जरूरत होती है।
हालांकि, हर फसल और हर क्षेत्र के लिए एक जैसा डिजाइन काम नहीं करता। फसल की किस्म, मिट्टी, तापमान, वर्षा, पैनलों की ऊंचाई और खेत में पहुंचने वाली धूप के आधार पर पूरी व्यवस्था तैयार करनी पड़ती है।
एक खेत से दो तरह की कमाई कैसे होगी?
एग्रीवोल्टाइक मॉडल की सबसे बड़ी खासियत आय के अलग-अलग स्रोत तैयार करने की संभावना है। किसान अपनी कृषि गतिविधियां जारी रखते हुए बिजली उत्पादन से भी आर्थिक लाभ प्राप्त कर सकता है।
1. फसल बेचकर कमाई
सोलर पैनलों के नीचे या बीच में उगाई गई फसलों को स्थानीय मंडियों, व्यापारियों या सीधे उपभोक्ताओं तक पहुंचाया जा सकता है। यदि फसल का चयन सही हो और उत्पादन संतोषजनक रहे, तो खेती से होने वाली आमदनी जारी रह सकती है।
2. बिजली से आर्थिक लाभ
सौर पैनलों से पैदा होने वाली बिजली का इस्तेमाल खेत में सिंचाई पंप, कृषि उपकरण और अन्य जरूरतों के लिए किया जा सकता है। इससे खरीदी जाने वाली बिजली या डीजल पर होने वाला खर्च कम हो सकता है। यदि परियोजना की क्षमता, स्थानीय नियम और बिजली खरीदने की व्यवस्था अनुमति दें, तो अतिरिक्त बिजली ग्रिड को बेचने का विकल्प भी मिल सकता है।
3. गर्मी और पानी के प्रबंधन में संभावित मदद
कुछ परिस्थितियों में सोलर पैनलों की आंशिक छाया मिट्टी से नमी के नुकसान को कम करने और पौधों को अत्यधिक गर्मी से बचाने में मदद कर सकती है। इससे कुछ फसलों को फायदा हो सकता है। लेकिन इसका परिणाम स्थानीय जलवायु, फसल और पैनलों की बनावट पर निर्भर करेगा।
4. खेती के जोखिम में विविधता
खेती में कभी सूखा, कभी बेमौसम बारिश और कभी बाजार में कीमतों की गिरावट से नुकसान होता है। बिजली उत्पादन से मिलने वाली आय, यदि परियोजना में सुनिश्चित और व्यावहारिक व्यवस्था हो, तो किसान की आर्थिक निर्भरता केवल फसल पर रहने के बजाय कई स्रोतों में बंट सकती है।
फिर भी यह समझना जरूरी है कि बिजली से कमाई अपने आप शुरू नहीं हो जाती। इसके लिए शुरुआती निवेश, बिजली कनेक्शन, उपयुक्त उपकरण, रखरखाव और बिजली बेचने की स्पष्ट व्यवस्था की जरूरत होती है।
भारत में एग्रीवोल्टाइक को लेकर क्या हो रहे हैं प्रयास?
भारत में एग्रीवोल्टाइक को केवल एक विचार के रूप में नहीं देखा जा रहा, बल्कि कृषि और सौर ऊर्जा को साथ जोड़ने के लिए अनुसंधान और पायलट परियोजनाओं पर भी काम हो रहा है।
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) से जुड़े केंद्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान, जोधपुर ने पश्चिमी भारत के शुष्क इलाकों में इस तकनीक की उपयोगिता पर काम किया है। राजस्थान जैसे क्षेत्रों में जहां तेज गर्मी, कम बारिश और पानी की कमी खेती को प्रभावित करती है, वहां सोलर पैनलों की छाया, वर्षाजल संग्रह और फसल उत्पादन को एक साथ जोड़ने की संभावनाओं का अध्ययन किया जा रहा है।
दिल्ली में भी इस दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल हुई। ICAR के भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI) में 18 दिसंबर 2025 को 100 किलोवाट क्षमता की एग्री-फोटोवोल्टाइक पायलट परियोजना का उद्घाटन किया गया। ICAR के अनुसार, यह परियोजना कृषि और सौर ऊर्जा को एक ही स्थान पर जोड़ने के लिए स्थापित की गई है। इसमें सौर पैनलों की दिशा बदलने वाली तकनीक और जमीन पर कम प्रभाव डालने वाली संरचना जैसे प्रयोगात्मक पहलू शामिल हैं।
ये पहलें बताती हैं कि भारत में इस मॉडल को स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार विकसित करने की कोशिश हो रही है। हालांकि, किसी एक परियोजना के सफल होने का अर्थ यह नहीं है कि वही डिजाइन देश के सभी राज्यों और सभी फसलों के लिए उपयुक्त होगा।
सरकार की योजनाओं से कैसे मिल सकती है मदद?
किसानों के लिए सौर ऊर्जा से जुड़ी प्रमुख सरकारी पहलों में प्रधानमंत्री किसान ऊर्जा सुरक्षा एवं उत्थान महाभियान यानी पीएम-कुसुम (PM-KUSUM) शामिल है।
नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय की इस योजना का उद्देश्य कृषि क्षेत्र में सौर ऊर्जा को बढ़ावा देना, सिंचाई के लिए ऊर्जा उपलब्ध कराना और किसानों की आय बढ़ाने में मदद करना है। योजना के अलग-अलग घटकों के तहत सौर कृषि पंप लगाने, मौजूदा ग्रिड से जुड़े पंपों का सौरकरण करने और विकेंद्रीकृत सौर बिजली संयंत्र स्थापित करने की व्यवस्था की गई है।
योजना के घटक-ए के तहत पात्र किसान, किसानों के समूह, सहकारी संस्थाएं, पंचायतें और किसान उत्पादक संगठन निर्धारित शर्तों के अनुसार 500 किलोवाट से 2 मेगावाट तक के ग्रिड से जुड़े बिजली संयंत्र स्थापित कर सकते हैं। उत्पादित बिजली संबंधित वितरण कंपनी यानी डिस्कॉम को राज्य विद्युत नियामक आयोग द्वारा निर्धारित टैरिफ पर बेची जा सकती है। कुछ परिस्थितियों में किसान किसी डेवलपर के साथ साझेदारी भी कर सकते हैं और तय समझौते के अनुसार जमीन का किराया प्राप्त कर सकते हैं।
लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। पीएम-कुसुम के तहत सोलर प्लांट लगाने की सुविधा और एग्रीवोल्टाइक मॉडल एक ही चीज नहीं हैं। योजना के अंतर्गत सौर संयंत्र लगाने की अनुमति मिलने का अर्थ यह नहीं कि हर परियोजना में पैनलों के नीचे खेती करना अनिवार्य है या हर एग्रीवोल्टाइक परियोजना को स्वतः सब्सिडी मिल जाएगी।
इसलिए किसानों को परियोजना शुरू करने से पहले अपने राज्य के संबंधित विभाग, डिस्कॉम और योजना के अधिकृत कार्यान्वयन निकाय से वर्तमान नियम, पात्रता, वित्तीय सहायता और बिजली खरीद की शर्तों की जानकारी लेनी चाहिए।
किन फसलों के लिए बेहतर हो सकता है यह मॉडल?
एग्रीवोल्टाइक मॉडल (Agrivoltaics Model) में फसल का चुनाव सबसे महत्वपूर्ण निर्णयों में से एक है। सोलर पैनलों की वजह से खेत के कुछ हिस्सों में धूप कम पहुंच सकती है। इससे उन फसलों को नुकसान हो सकता है जिन्हें भरपूर सूर्यप्रकाश की जरूरत होती है। दूसरी ओर, कुछ फसलें आंशिक छाया में बेहतर प्रदर्शन कर सकती हैं।
संभावित विकल्पों में निम्न फसलें शामिल हो सकती हैं, बशर्ते स्थानीय कृषि विशेषज्ञ उनकी उपयुक्तता की पुष्टि करें:
- पत्तेदार सब्जियां: कुछ परिस्थितियों में पालक और दूसरी पत्तेदार सब्जियों को आंशिक छाया से लाभ मिल सकता है।
- हल्दी और कुछ मसाला फसलें: उपयुक्त मिट्टी, नमी और छाया की स्थिति में इन पर विचार किया जा सकता है।
- चारा फसलें: पशुपालन वाले क्षेत्रों में ऐसी प्रजातियां उपयोगी हो सकती हैं जो पैनलों के नीचे उपलब्ध रोशनी में अच्छी तरह उगें।
- कुछ बागवानी फसलें: अंगूर और दूसरी फसलों में भी विशेष डिजाइन के साथ प्रयोग किए जा सकते हैं, लेकिन इसके लिए फसल-विशिष्ट अध्ययन जरूरी है।
- क्षेत्रीय और कम ऊंचाई वाली फसलें: ऐसी फसलें जिनकी ऊंचाई, जड़ों और मशीनों की जरूरत पैनलों की संरचना के अनुकूल हो, बेहतर विकल्प बन सकती हैं।
ICRISAT के एग्रीवोल्टाइक संबंधी ज्ञान-संसाधन में भी छाया सहन करने वाली फसलों, कम ऊंचाई वाली कृषि प्रणालियों और शुष्क क्षेत्रों की जरूरतों पर जोर दिया गया है।
किसान को केवल इस आधार पर फसल नहीं चुननी चाहिए कि वह छाया में उग सकती है। बाजार में उसकी मांग, बीज और खाद की लागत, स्थानीय जलवायु, सिंचाई की उपलब्धता और बिक्री की सुविधा को भी ध्यान में रखना जरूरी है।
एग्रीवोल्टाइक मॉडल के प्रमुख फायदे
इस तकनीक का सबसे बड़ा फायदा जमीन का दोहरा इस्तेमाल है। भारत में जहां खेती योग्य जमीन सीमित है और सौर ऊर्जा परियोजनाओं के लिए भी बड़े क्षेत्र की जरूरत पड़ सकती है, वहां दोनों गतिविधियों को साथ चलाना उपयोगी साबित हो सकता है।
1. जमीन की उत्पादकता में बढ़ोतरी: एक ही भूखंड से कृषि उत्पाद और बिजली दोनों प्राप्त हो सकते हैं। हालांकि, कुल लाभ इस बात पर निर्भर करता है कि फसल उत्पादन में कितनी कमी या बढ़ोतरी हुई और कितनी बिजली पैदा हुई।
2. सिंचाई खर्च में संभावित कमी: यदि सौर बिजली का इस्तेमाल खेत में ही किया जाए, तो किसान की बिजली और डीजल पर निर्भरता कम हो सकती है। इससे खासकर उन क्षेत्रों में मदद मिल सकती है जहां सिंचाई ऊर्जा महंगी या अनियमित है।
3. पानी के संरक्षण की संभावना: पैनलों की छाया कुछ परिस्थितियों में मिट्टी से पानी के वाष्पीकरण को कम कर सकती है। साथ ही, पैनलों से बहने वाले बारिश के पानी को एकत्र करके उपयोग करने की व्यवस्था भी बनाई जा सकती है।
4. पर्यावरण को फायदा: सौर ऊर्जा से बिजली उत्पादन के दौरान जीवाश्म ईंधन आधारित बिजली की तुलना में परिचालन उत्सर्जन कम होता है। यदि परियोजना सही तरीके से विकसित हो, तो यह स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देने में योगदान दे सकती है।
5. ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती: सोलर प्लांट की स्थापना, सफाई, मरम्मत और संचालन के लिए स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर पैदा हो सकते हैं। इसके अलावा, कृषि और ऊर्जा से जुड़ी सेवाओं की मांग भी बढ़ सकती है।
फिर भी, इन फायदों को सुनिश्चित परिणाम नहीं मानना चाहिए। एग्रीवोल्टाइक के लिए उपयुक्त डिजाइन और स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार योजना बनाना बेहद जरूरी है।
क्या हैं Agrivoltaics Model की चुनौतियां?
जहां इस तकनीक में अवसर हैं, वहीं कुछ व्यावहारिक मुश्किलें भी हैं जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।पहली चुनौती है शुरुआती निवेश। खेती के अनुकूल ऊंचे ढांचे, सोलर पैनल, वायरिंग, सुरक्षा व्यवस्था और बिजली को ग्रिड तक पहुंचाने के लिए पर्याप्त पूंजी की जरूरत हो सकती है। सामान्य जमीन पर लगाए जाने वाले सोलर प्लांट की तुलना में कृषि कार्य के लिए विशेष डिजाइन की लागत अधिक हो सकती है।
दूसरी चुनौती फसल उत्पादन का जोखिम है। यदि पैनलों से बहुत ज्यादा छाया पड़ती है, तो फसल की पैदावार घट सकती है। वहीं, कुछ फसलों को अत्यधिक छाया से लाभ के बजाय नुकसान हो सकता है। इसलिए बिना परीक्षण के पूरे खेत में पैनल लगाना जोखिम भरा कदम हो सकता है।
तीसरी चुनौती बिजली बेचने की व्यवस्था है। ग्रिड से कनेक्शन, संबंधित डिस्कॉम की मंजूरी, बिजली खरीद समझौता और भुगतान की समयसीमा परियोजना की आर्थिक सफलता को प्रभावित करते हैं। भारत में एग्री-PV से जुड़ी नीतियों और व्यावसायिक मॉडलों पर किए गए अध्ययनों में वित्तपोषण, भुगतान में देरी और अलग-अलग विभागों के बीच समन्वय को महत्वपूर्ण मुद्दों के रूप में पहचाना गया है।
चौथी चुनौती कृषि मशीनों का संचालन है। यदि पैनल बहुत नीचे लगाए गए हैं या उनके बीच पर्याप्त जगह नहीं है, तो ट्रैक्टर, हार्वेस्टर और दूसरी कृषि मशीनों का इस्तेमाल मुश्किल हो सकता है। ऐसे में किसानों को खेती के पारंपरिक तरीकों में बदलाव करना पड़ सकता है।
पांचवीं चुनौती रखरखाव की है। धूल, आंधी, बारिश और तेज गर्मी सोलर पैनलों तथा उनकी संरचना को प्रभावित कर सकते हैं। नियमित सफाई, तकनीकी निरीक्षण और मरम्मत के लिए भी खर्च की जरूरत होगी।इन सभी कारणों से एग्रीवोल्टाइक को अपनाने से पहले विस्तृत आर्थिक और कृषि संबंधी आकलन करना आवश्यक है।
किसान Agrivoltaics Model को अपनाने से पहले क्या करें?
विशेषज्ञों की सलाह है कि किसान सीधे बड़े निवेश से शुरुआत करने के बजाय छोटे स्तर पर इसकी व्यवहार्यता समझें। सबसे पहले कृषि विज्ञान केंद्र (KVK), कृषि विश्वविद्यालय या संबंधित कृषि विशेषज्ञ से संपर्क करके अपनी जमीन और फसल के लिए उपयुक्त डिजाइन की जानकारी लें। इसके बाद कुछ जरूरी कदम उठाए जा सकते हैं:
- मिट्टी, जलवायु और फसल के अनुसार सोलर पैनलों की ऊंचाई तथा दूरी तय करें।
- परियोजना की लागत, बैंक ऋण, संभावित बिजली उत्पादन और रखरखाव का अनुमान तैयार करें।
- स्थानीय डिस्कॉम से ग्रिड कनेक्शन और बिजली खरीद की शर्तों की पुष्टि करें।
- पीएम-कुसुम या दूसरी लागू योजनाओं की वर्तमान पात्रता और सहायता संबंधी नियम जांचें।
- फसल उत्पादन, पानी की खपत और बिजली से होने वाली आय का अलग-अलग रिकॉर्ड रखें।
- जमीन की लीज या डेवलपर के साथ साझेदारी करने से पहले समझौते की शर्तें ध्यान से पढ़ें।
खास तौर पर छोटे किसानों के लिए किसान उत्पादक संगठन (FPO), सहकारी संस्थाओं या सामूहिक परियोजनाओं के जरिए निवेश और तकनीकी सहयोग जुटाना एक विकल्प हो सकता है।
भविष्य में कितनी बदल सकती है भारतीय खेती?
भारत में एग्रीवोल्टाइक की संभावनाओं को लेकर वैज्ञानिक और नीतिगत स्तर पर रुचि बढ़ रही है। मई 2026 में प्रकाशित एक शोध समीक्षा ने भारत में इस मॉडल की संभावनाओं और सीमाओं का विश्लेषण किया। अध्ययन के अनुसार, जमीन की उत्पादकता और किसानों की आय में सुधार संभव है, लेकिन परिणाम फसल, पैनलों के घनत्व, बिजली की कीमत और स्थानीय परिस्थितियों पर निर्भर करते हैं।
आने वाले समय में इस तकनीक की सफलता इस बात से तय होगी कि किसानों को कितनी किफायती तकनीक मिलती है, फसल उत्पादन कितना सुरक्षित रहता है और बिजली बेचने की व्यवस्था कितनी भरोसेमंद होती है। कृषि अनुसंधान संस्थानों, सौर ऊर्जा कंपनियों, बैंकों और सरकारी विभागों के बीच बेहतर तालमेल भी इसकी पहुंच बढ़ाने में अहम भूमिका निभा सकता है।
खेती और बिजली का साथ, लेकिन सही योजना के साथ
एग्रीवोल्टाइक मॉडल (Agrivoltaics Model) खेती और स्वच्छ ऊर्जा को एक साथ जोड़ने का एक संभावनाशील तरीका है। यह किसानों को फसल से होने वाली कमाई के साथ बिजली उत्पादन से अतिरिक्त आर्थिक लाभ का अवसर दे सकता है। साथ ही, सिंचाई लागत कम करने, पानी के बेहतर प्रबंधन और जमीन के अधिक प्रभावी इस्तेमाल में भी मदद कर सकता है।
लेकिन इसे हर किसान के लिए तुरंत लाभ देने वाला समाधान मानना सही नहीं होगा। शुरुआती निवेश, फसल की उपयुक्तता, बिजली खरीद की शर्तें और रखरखाव की लागत जैसे पहलुओं पर ध्यान देना जरूरी है।
असल में, एग्रीवोल्टाइक मॉडल की सफलता का पैमाना सिर्फ यह नहीं होगा कि खेत में कितनी बिजली पैदा हुई, बल्कि यह भी होगा कि किसान की फसल, जमीन और कुल आमदनी पर उसका क्या असर पड़ा। सही तकनीक, वैज्ञानिक सलाह और व्यावहारिक वित्तीय योजना के साथ यह मॉडल भारतीय खेती को अधिक टिकाऊ और ऊर्जा के लिहाज से आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बन सकता है।
