किसान के लिए बकरी पालन है अतिरिक्त आमदनी का स्रोत

Published on: February 12, 2020 (20:06 IST) , by: प्रवीण चोयल

 

भारत में बकरी पालन गरीब किसानों के लिए अन्य पशुओं की अपेक्षा अधिक लाभदायक है। इसके पालन के लिए बहुत अधिक धन, श्रम व संसाधनों की आवश्यकता नहीं होती और कम क्षेत्र में भी इसे आसानी से रखा जा सकता है। ग्रामीण व भूमिहीन किसान बकरी पालन करके अतिरिक्त आमदनी कर सकते हैं। बकरियां चारे के अलावा जंगली झाड़ियां, पत्तियां इत्यादि बड़े चाव से खाती हैं तथा ये तापमान की विषम परिस्थितियों में भी अपने आप को ढाल लेती हैं।

किसानों के लिए बकरी एक बहुमुखी एवं बहुउद्देशीय पशु है। यह भारत में ‘गरीब आदमी की गाय’ व यूरोप में ‘शिशुओं की नर्स’ के रूप में जानी जाती है। बदलते वातावरण, बढ़ती हुए जनसंख्या व घटते हुए संसाधनां को देखते हुए बकरी भविष्य के पशु के रूप में ग्रामीण अंचल में उपयुक्त साबित हो सकती है। गाय-भैंस की बढ़ती हुई कीमत की तुलना में बकरी की कीमत अत्याधिक कम है। भविष्य में बकरी पालन ग्रामीण अंचलों में रोजगार का अच्छा विकल्प हो सकता है।

बकरी का दूध

मानव पोषण में इसका योगदान अद्वितीय है। बकरी का दूध फेफड़े के घावों व गले की पीड़ा को दूर करता है। यह पेट को शीतलता प्रदान करता है। यह दूध एक सम्पूर्ण आहार है तथा मानव में ऐसी बीमारियां, जिनमें खून में प्लेटलेट्स की संख्या घट जाती है, के उपचार के लिए रामबाण होता है। बकरी का दूध डेंगू के मरीजों के लिए प्राकृतिक उपचार है। इसमें खनिज पदार्थ जैसे आयरन, कैल्शियम, फॉस्फोरस और मैग्निशियम भी पाये जाते हैं एवं यह प्लाज्मा कोलेस्ट्रोल का संतुलन बनाये रखता है। बकरियों के दूध में सिलिनियम अधिक मात्रा में पाया जाता है। यह खून का थक्का बनने की क्रियाओं को भी नियंत्रित करता है। यह एंटीऑक्सीडेंट की तरह भी कार्य करता है व टी-कोशिका व इंटरलुकिन की वृद्भि भी प्रभावित करता है।

दूध की रासायनिक संरचना

बकरी के दूध में मुख्यतः वसा, प्रोटीन, लेक्टोज तथा खनिज लवण का अनुपात विभिन्न प्रजातियों में अलग-अलग होता है

वसा

बकरी के दूध में वसा कीमात्रा सामान्यतः भैंस व भेड़ से कम पायी जाती है। वसा की मात्रा लगभगः 3.5-4.4 प्रतिशत पायी जाती है। इसमें मध्यम चेन वाले फैटीऐसिड अधिक पाये जाते हैं। वसा की मात्रा आनुवंशिकता, पर्यावरण व चारे पर निर्भर करती है। कपास की खली-खिलाने से वसा की मात्रा बढ़ाई जा सकती है। मध्य चेन फैटी एसिड वसा अवशोषण सिंड्रोम से पीड़ित लोगां के लिए यह ऊर्जा का स्रोत है। बकरी के दूध के वसा का आकार गाय व भैंस के दूध से कम होता है। विभिन्न प्रजातियों में बकरी के दूध मेंछोटे वसा कणों की मात्रा गाय व भैंसके दूध से अधिक होती है, अतः यह जल्दी पच जाता है।

प्रोटीनः

इस दूध में प्रोटीन की मात्रा 2 से 6 प्रतिशत तक पायी जाती है। केसीन बकरी के दूध में पाया जाने वाला मुख्य प्रोटीन है। हाइपो एलर्जिक होने के कारण बकरी का दूध, मानव दूध का विकल्प माना जा सकता है। वीटा-केसीन बकरी के दूध के केसीन का मुख्य घटक है, जिसके कारण ही बकरी के दूध से एलर्जी कम होती है तथा शारीरिक विकास में अधिक मदद मिलती है। लैक्टोफरिन, यह गाय के दूध के समान व ओराटिक अम्ल बकरी के दूध में कम पाया जाता है तथा यह राइबोन्यूक्लियोटाइड से भरपूर होता है। यह कोशिका के नवीनीकरण व रोग के खिलाफ लड़ने में मदद करता है।

विटामिनः

बकरी के दूध में मुख्यतः विटामिन-बी कॉम्प्लैक्स, जो कि पानी में घुलनशील होता है, पाया जाता है। इसमें थियामिन, राइबोफ्रलेबिन, नियासीन, पैंटोथीनिक व बायोटीन क्रमशः 0.05, 0.14, 0.20, 0.31व 2.06 मि.ग्रा./लीटर भी होता है। बकरी के दूध में विटामिन ‘ए’ भी प्रचुर मात्रा में पाया जाता है।

खनिज लवणः

इस दूध में क्लोराइडव पोटेशियम क्रमशः 1600 मि.ग्रा. व1900 मि.ग्रा./लीटर होता है, जो कि गाय व भैंस के दूध से अधिक होता है। दूध में कैल्शियम की मात्रा का विशेष महत्व होता है। यह बकरी के दूध में 1250 मि.ग्रा./लीटर होता है और उच्च रक्त चाप और ऑस्टीयोपोरोसिस में राहत प्रदान करता है। बकरी के दूध में कैल्शियम व आयरन 550 मि.ग्रा./कि.ग्रा की उपलब्धता गाय के दूध से अधिक होती है। इन खनिज लवणां का कार्य हमारे शरीर की हड्डियों का निर्माण एवं उनको मजबूती प्रदान करना होता है।

लैक्टोज

बकरी के दूध में लैक्टोज की मात्रा गाय या भैंस की दूध से अधिक होती है। गाय के दूध से एलर्जी वाले लोगों के लिए बकरी का दूध लाभदायक होता है, क्योंकि यह आसानी से पच जाता है। यह दिल व कैंसर के रोगियों के लिए लाभदायक होता है। बकरी के दध्ू का पाचन मनष्ुय में अधिक आसानी से होता है। बकरी के दूध में केसीन प्रोटीन के कारण दही नरम बनता है। वसा के ग्लोब्यूल का आकार छोटा तथा एग्लुटीनीन नहीं पाया जाता है तथा मध्यम व छोटे चेन के फैटी ऐसिड पाये जाते हैं। इसके कारण बकरी का दूध गाय व भैंस के दूध से अधिक सुपाच्य होता है। साथ ही बकरी के दूध में औषधीय गुण अत्यधिक पाये जाते हैं, क्योंकि बकरी जंगल में चरने के दौरान विभिन्न प्रकार के पेड़-पौधों की पत्तियों का भी सेवन करती है। इस वजह से अधिक औषधीय गुण आ जाते हैं।

बकरी के दूध से बनाये जाने वाले व्यंजन

पनीर, चीज, योगहर्ट, घी, खोआ, श्रीखण्ड, छेना, संदेश, रसगुल्ला, दही, पनीर, आईसक्रीम व दूध पाउडर इत्यादि व्यंजन दूध से बनाये जा सकते हैं। बकरी का दूध बच्चोंको पिलाने के लिहाज से बहुत उपयोगी होता है।

ऊन की प्राप्ति

बकरियों की विभिन्न प्रजातियां, जैसे पशमीना, चुगू, चंगथान्गी आदि जोकि पर्वतीय क्षेत्रों में पायी जाती हैं, से श्रेष्ठ गुणवत्ता वाली ऊन प्राप्त की जा सकती है। पशमीना बकरी से सर्वोत्तम प्रकार का ऊन प्राप्त किया जाता है और यह बहतु ही गर्म व बहमुल्ूय होता है कई बकरियों की प्रजातियों में बड़े-बड़े बाल पाये जाते हैं, उनके बालों का उपयोग कालीन, चटाई व दरी बनाने में किया जाता है।

बकरियों की खाल से चमड़ा उत्पादन एवं अन्य शरीर अंगों का उपयोग

बकरियां से चमड़ा, हड्डियां, सींग तथा अन्य उपयोगी उत्पादों की प्राप्ति होती है। इससे सिद्भ होता है कि बकरी पालन न केवल जीते जी बल्कि मरने के बाद भी मनुष्यां के लिए उपयोगी सिद्भ हो रहा है। हडिड्यों का चूरा बनाकर पशुदाने में डालने से पशुआहार संतुलित होता है और कैल्शियम एवं फॉस्फोरस की कमी नहीं हो पाती। सींगों से बटन, कंघी, वाद्य यंत्रों के मूढ़ इत्यादि बनाए जा सकते हैं। बकरी के चमडे़ का उपयोग ढोलक, तबला, ढपली, पर्स, जैकेट बेल्ट बनाने इत्यादि में होता है

खाद की प्राप्ति

बकरी के गोबर को लेड़ी कहते हैं, जो कि खाद के रूप में अधिक उपयोगी होती है। बकरियां चरते समय बंजर भूमि को भी वहां पर लेड़ी करके उपजाऊ बना सकती हैं।

बकरी उत्पादन की संभावनाएं

बकरी को भविष्य का पशु कहते हैं। इसका दूध अत्याधिक फायदेमंद होता है, मांस उत्पादन में कोई धार्मिक समस्या सामने नहीं आती है। कम लागत से अधिक उत्पादन की संभावना बनी रहती है। एशिया में मांस के उत्पादन के क्षेत्रा में 6 प्रतिशत की वृद्भि हो रही है, जबकि भारत में यह वृद्भि 3-4 प्रतिशत तक है। मांस उत्पादन में वृद्भि के लिए बकरियां काफी उपयोगी सिद्भ हो सकती हैं। बकरी के बारे में यह कहा जा सकता है कि भविष्य में न केवल भारत में बल्कि विश्व में पशुपालन उद्योग की एक महत्वपूर्ण कड़ी बन जाएगी। इसके लिए बकरी के अनुसंधान कार्यों में तेजी लाने की आवश्यकता है। मथुरा स्थित भाकृअनुप-केन्द्रीय बकरी अनुसंधान संस्थान, फरह, मथुरा इस दिशा में सराहनीय कार्य कर रहा है। बकरी पालन से विश्व के प्रत्येक व्यक्ति तक कम लागत में न केवल दूध, मांस एवं इनके उत्पादों को पहुंचाया जा सकता है बल्कि बकरी पालन से विदेशी मुद्रा भी अर्जित की जा सकती है।

 

प्रवीण चोयल, राहुल कुमार ब्याड़वाल, मंजु नेटवाल व अदिती शर्मा
विद्यावाचस्पति,(उघान विज्ञान विभाग),श्री कर्ण नरेन्द्र कृषि विश्वविद्यालय, जोबनेर,  जयपुर. 303329;राजस्थान)

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