अत्यधिक दुग्ध उत्पादन हेतु शुष्क गाय का उन्नत एवं बेहतर प्रबंधन

Published on: January 21, 2021 (23:28 IST) , by: इन्दु देवी

शुष्क या सूखी गाय (जब गाए दूध नहीं देती) का प्रबंधन डेयरी पालन के सबसे चुनौतीपूर्ण पहलुओं में से एक है। सूखी अवधि के दौरान लागू किए गए प्रबंधन, पोषण और स्वास्थ्य प्रथाओं का आने वाले दुग्धकाल में गाय की उत्पादकता और लाभप्रदता पर गहरा प्रभाव पड़ता है। भारत का दूध उत्पादन पिछले वित्त वर्ष के दौरान 6.5 प्रतिशत की दर से बढ़कर 187.70 मिलियन टन हो गया है। परन्तु पशुओं की उत्पादन क्षमता के कुशल दोहन का अभी भी अभाव प्रर्दिशत होता है क्योकिं प्रति पशु प्रतिदिन औसत दूध उत्पादन की दर काफी कम है।

सामान्यतः यह देखा गया है की पशुपालक अधिक दुग्ध उत्पादन हेतु दुधारू पशु का उचित प्रबंधन उनके ब्याने के पश्चात या दुग्धावस्था आने पर ही करते हैं। यह पशु उत्पादन एवं प्रबंधन दृष्टिकोण से उचित नहीं है क्योंकि इससे दुग्ध उत्पादन तो मिलता रहता है, किन्तु दुधारू पशु की उत्पादन क्षमता का सम्पूर्ण दोहन नहीं हो पाता और पशु के दुग्ध उत्पादन में वृद्धि न हो कर गिरावट होने लगती है। इसीलिए पशु की उत्पादन क्षमता को बढ़ाने की रणनीति दुधारू पशु के शुष्क अवस्था (ड्राई पीरियड) में ही तैयार कर लेनी चाहिए। रणनीति बनाने से पहले पशु पालक को दुग्ध उत्पादन सम्बन्धी प्राथमिक जानकारी होना आवश्यक है।  

दुग्धकाल एवं दुग्ध उत्पादन चक्र:

दुग्ध उत्पादन चक्र को अंग्रेज़ी में लैक्टेशन कर्व कहा जाता है जिसे शीर्ष दूध उत्पादन और दूध उत्पादन की दृढ़ता पर नजर रखने के लिए उपयोग किया जाता है। दुधारू पशु एक ब्यात में कितने दिनों तक दूध में रहता है, यह उसके नस्ल तथा प्रबंधन नीती पर निर्भर करता है। प्रायः एक दुधारू पशु का औसत दुग्धकाल 300 अथवा 305 दिन का होता है। उच्च कोटि की गाय एक वर्ष (365 दिनों ) में ब्यात का मानक दुग्धकाल पूरा करती है और साथ ही अंतिम दो महीनो में शुष्क रहते हुए अगले ब्यात के लिए तैयार करती है।   

दुधारू पशु को सुखाने की विधि:

दुग्धकाल के अंतिम चरण में पशु का गर्भ यदि अग्रिम अवस्था (6 या 7 माह ) का गर्भ में होता है, तो दुधारू गाय का प्रजनन चक्र बेहतर होता है। उपरोक्त परिस्थिति मिलने पर दुधारू पशु को उसके दुग्धकाल के अंतिम समय पर निम्न विधि से सुखाना चाहिए। सब से पहले दुधारू पशु को आवश्यकता अनुसार दिया जाने वाले दाने की मात्रा कम कर दे और उसे सूखा चारा ही देना चाहिए। दुधारू पशुओं को सुखाने के लिए तीन विधियां प्रचलित हैं, किन्तु विधि का चयन पशु की उत्पादन क्षमता पर निर्भर करता हैं। यदि पशु 4-5 किलोग्राम प्रतिदिन दूध दे रहा हो एवं कम उत्पादन क्षमता वाला हो तो ऐसे पशु का दूध तुरंत निकालना बंद कर देना चाहिए। इस विधि में जो दूध थन में भरा रहता हैं, वह शरीर में चला जाता हैं एवं दुधारू पशु सुख जाता हैं। शोध द्वारा यह पता चला है कि यदि दुधारू पशु को लगातार 35 घंटे तक न दुहा जाए तो दूध आना बंद हो जाता है। ज्यादा उत्पादन क्षमता वाले पशु का दुग्ध उत्पादन दुग्धकाल के अंतिम चरण में यदि 5 किलोग्राम से भी ज्यादा हो तब उसे सुखाने के लिए दाना मिश्रण एवं पानी की मात्रा में कमी कर एवं उक्त पशु का दूध रुक-रुक कर क्रमश एक या दो, तीन दिन के अंतराल पर दुहाई करने से पशु दूध देना बंद कर देता है। इस तरह उपयुक्त विधि का चुनाव करने से दुधारू पशु अपने आने वाले दुग्धकाल में थनैला रोग की संभावना से निजात पा सकते हैं। 

शुस्कावस्था में प्रबंधन नीती :

प्रत्येक दुधारू पशु को औसतन 2-3 महीने तक शुष्क अवस्था में रखना जरूरी होता है। इस समय यदि पशु का गर्भ 6 या 7 महीने का हो तो स्थिति ओर बेहतर हो जाती है, क्यूंकी 280 दिन का गर्भकाल पूर्ण होते ही पशु पुनः अपनी दुग्धवस्था में आ जाता है। ऐसे समय शुष्क पशु का उचित प्रबंधन आवश्यक हो जाता है। एक लंबे अंतराल तक दूध के रूप मे पोशक तत्वों के निकलते रहने से शरीर कमजोर हो जाता है और 6-7 महीने का गर्भ हो तो उचित प्रबंधन के अभाव मे स्थिति काफी खराब हो सकती है। 6 या 7 महीने का गर्भ तीव्रता से वृद्धि करता है व यदि गर्भस्थ बछड़े की उचित वृद्धि के लिए आवश्यक पोषक तत्वों की कमी रहती है तो उनके अभाव मे बछड़े कमजोर पैदा होंगे, जो उन्नत पशु पालन के लिए कभी भी लाभप्रद नहीं होते है।

सर्वप्रथम शुष्क ग्याभिन पशु को दुधारू पशु के समूह से अलग कर शुष्क पशुओं के समूह मे रखें। प्रत्येक पशु को पूर्णरूप से शुष्क करने के पश्चयात उन्हें “स्टीम अप” करवाएँ। “स्टीम अप” करवाने के लिए उन्हें 2-2.5 किलो दाना मिश्रण प्रतिदिन के हिसाब से दें। यह दाना मिश्रण पशु के रख रखाव के लिए दिये जाने वाले 2 किलो प्रतिदिन दाना मिश्रण के अतिरिक्त होगा। दाना मिश्रण के इस मात्रा को उक्त पशु के प्रसव काल तक लगातार दें। इस तरह “स्टीम अप” करवाने के निम्न लाभ हैं:

1- यह आने वाली दुग्धवस्था मे उत्पादन स्तर को बढ़ाता है व ब्याने के बाद मिलने वाले अधिक दाने के लिए भी शरीर को तैयार करता है।

2- “स्टीम अप” से दुग्धकाल का समय बढ़ता है जिसमे पशु अपना 305 दिन का दुग्धकाल पूर्ण करने मे सक्षम हो जाते हैं।

3- लगातार दूध उत्पादन से दुधारू पशु के शरीर मे आई कमी पूरी होती है, जिससे अग्रिम दुग्धवस्था मे उत्पादन स्तर को बढ्ने मे मदद मिलती है।

4- दूध मे बसा की मात्रा मे भी वृद्धि होती है।

5- गर्भस्थ बछड़ा स्वस्थ एवं सामान्य दर से वृद्धि करता है, जन्म के समय उसका वजन सामान्य होता है व बछड़ो की मृत्युदर कम रहती है।

शुष्क पशु का पोषण:

  • यही पशु को गर्भ न हो-

ऐसे पशु को 5-6 किलोग्राम गेहूं का भूसा, 2 किलो दाना मिश्रण व ज्वार या मक्का का हरा चारा हो तो उसे 35 किलो प्रीतिदिन के हिसाब से दें।

  • गर्भस्थ शुष्क पशु को-

दलहनी किस्म का हरा चारा खिलाएँ तथा दाना मिश्रण की मात्रा पहले बताई जा चुकी है, उसे खिलाएँ। गर्भस्थ शुष्क पशु के लिए निम्न प्रकार से दाना तैयार करें:

अनाज (दरा हुआ) – मक्का, गेहूं, ज्वार, बाजरा आदि - 35 प्रतिशत

चोकर (गेहूं या चावल का)                               – 25 प्रतिशत

खली (सरसों, सोयाबीन, कपास आदि)                 – 30 प्रतिशत

शीरा                                                      – 5 प्रतिशत

नमक                                                      – 2 प्रतिशत

खनिज मिश्रण(– (ब्याने से 15 दिन पहले बंद कर दे)  – 2 प्रतिशत

“ बाएपास फैट”  यदि उपलब्ध है तो                    – 1 प्रतिशत

उपर्युक्त दाना मिश्रण पशु के प्रसव तक 2.5 - 3 किलो प्रतिदिन की दर से खिलाएं।

प्रसव के दो सप्ताह पहले शुष्क पशु का व्यवस्थापन:

प्रसव के दो सप्ताह पहले शुष्क पशु एवं ग्याभिन पशु के लिए दो प्रमुख कार्य करने पड़ते है:

क -

1- ऐसे पशु को उसके समूह से अलग कर उन्हे प्रसव ग्रह मे रखें।

2- सुविधा युक्त पशुशाला मे प्रसव कक्ष का निर्माण प्रबन्धक आवास के निकट होना चाहिए ।

3- पशुशाला मे यदि कोई रोग या गर्भपात जैसे कोई बीमारी फैली है तो प्रसव कक्ष को 4 प्रतिशत धोने का सोडा गरम पानी मे मिलकर अच्छी तरह धो लें। इसके बाद ही पशु का प्रवेश करवाएँ।

4- भूमिहीन या सीमांत कृषकों के पास सुविधायुक्त आवास नहीं होता है। ऐसे कृषक ग्याभिन पशु को अन्य पशु से अलग कर साफ-सुथरी जगह पर रखें। यदि जमीन गीली हो तो उस पर सूखी घास बिछाएँ।

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ठीक उसी दिन अर्थात प्रसव के दो सप्ताह पहले से पशु को “चेलेंज फीडिंग” कारवाई जाती है, जिसमे पशु को निर्धारित मात्रा मे दाना मिश्रण दिया जाता है। इस दाना मिश्रण की निश्चित मात्रा बढ़ाते हुए उसे दुधारू पशु के शीर्ष दुग्ध उत्पादन तक खिलाते हैं। इस तरह की पोषण विधि से उच्च उत्पादन क्षमता वाले दुधारू पशु को बढ़ती हुई मात्रा में दाना मिश्रण देकर उसकी उत्पादन क्षमता के अनुरूप दुग्ध उत्पादन हेतु तैयार करते हैं।

चुनौती पूर्ण (“चेलेंज फीडिंग”) आहार योजना –

1 – प्रसव के दो सप्ताह पहले :

शुरुआत मे 500 ग्राम दाना दें एवं इस मात्रा को 300 से 40 ग्राम की दर से प्रतिदिन तब तक बढ़ाएँ जब तक दुधारू पशु 500 से 1000 ग्राम प्रति 100 किलोग्राम पशु के शारीरिक वजन के हिसाब से खाने लगे।

2 – प्रसव के दो सप्ताह बाद:

दाना मिश्रण की मात्रा को 500 ग्राम प्रतिदिन के हिसाब से बढ़ाते हुए पशु को उनकी इच्छानुसार जितना खा सके उतना दाना खिलाएँ।

3 - प्रसव के दो सप्ताह से शीर्ष दूध उत्पादन तक:

इस समय पशु जितना खाना खा सके उतना दाना दें, इस प्रणाली के तहत हमारा उद्देश्य दुग्धकाल की शुरुआत मे अत्यधिक दूध उत्पादन के लिए पशु को प्रचुर मात्रा मे पोशक तत्व उपलब्ध करना होता है।

4 - शीर्ष दूध उत्पादन से आगे:

शीर्ष दूध उत्पादन मिलने के बाद दुधारू पशु को उत्पादन की मात्रा के हिसाब से दाना मिश्रण प्रदान करें। सामान्यत: 1 किलो दाना मिश्रण प्रति 2.5 या 3.0 किलो दूध उत्पादन के हिसाब से दिया जाता है। इसके साथ बढ़िया किस्म का दलहानी चारा उक्त पशु की आहरण क्षमता के हिसाब से दें।

ग – प्रसव के तीन दिन पहले :

प्रसव के तीन दिन पहले उसे हल्का आहार दें। गेहूं के चोकर को गुड़ मे मिलकर देने से पशु का प्रसव बिना तकलीफ के आसानी से हो जाता है।

यदि पशुपालक उपरोक्त जानकारियों को समयानुसार अमल करें तो दुधारू पशु से उसकी उत्पादन क्षमता के अनुरूप दूध पैदा किया जा सकता है एवं दुधारू पशु की उत्पादन क्षमता में वृद्धि भी की जा सकती है।

 

इन्दु देवी1 एवं एस॰ एस॰ लठवाल2
वैज्ञानिक, 1भा.कृ...-राष्ट्रीय गोवंश अनुसंधान केंद्र, मेरठ;
2भा.कृ...-राष्ट्रीय डेरी अनुसंधान संस्थान, करनाल

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