कीटनाशक कानून में बड़ा बदलाव: औद्योगिक रसायनों के आयात पर भी परमिट जरूरी

CBIC के नए निर्देश के बाद Insecticides Act की अनुसूची में शामिल रसायनों के आयात पर अंतिम उपयोग की परवाह किए बिना परमिट जरूरी होगा। जानिए एक्रिलोनाइट्राइल समेत नए नियम।

एक्रिलोनाइट्राइल और औद्योगिक रसायनों के आयात पर परमिट नियम

भारत में ऐसे रसायनों के आयात को लेकर बड़ा बदलाव हुआ है, जो भले ही औद्योगिक उत्पादन में इस्तेमाल होते हों, लेकिन उनका नाम कीटनाशक अधिनियम, 1968 की अनुसूची में शामिल है। केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर एवं सीमा शुल्क बोर्ड यानी सीबीआईसी ने 1 अक्टूबर 2026 को जारी निर्देश संख्या 18/2026-Customs के जरिए देशभर के सीमा शुल्क अधिकारियों को ऐसे रसायनों के आयात पर नियमों का सख्ती से पालन कराने का निर्देश दिया है।

इस निर्देश का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि किसी रसायन का अंतिम इस्तेमाल कीटनाशक या कृषि क्षेत्र में नहीं होने के बावजूद उसके आयात के लिए परमिट जरूरी होगा, अगर वह रसायन Insecticides Act, 1968 की अनुसूची में शामिल है। यानी अब आयातक केवल यह तर्क देकर परमिट की आवश्यकता से बाहर नहीं निकल सकेंगे कि संबंधित रसायन का इस्तेमाल औद्योगिक उद्देश्य के लिए किया जाना है।

एक्रिलोनाइट्राइल पर खत्म हुआ कानूनी भ्रम

सीबीआईसी के नए निर्देश में एक्रिलोनाइट्राइल का विशेष रूप से उल्लेख किया गया है। यह एक महत्वपूर्ण औद्योगिक रसायन है, जिसका इस्तेमाल एक्रिलिक फाइबर, एबीएस प्लास्टिक और सिंथेटिक रबर जैसे उत्पादों के निर्माण में किया जाता है।

अब तक कुछ आयातकों का तर्क था कि यदि एक्रिलोनाइट्राइल का इस्तेमाल कीटनाशक बनाने या किसी कीट नियंत्रण गतिविधि में नहीं हो रहा है, तो उसके आयात पर Insecticides Act के तहत परमिट की शर्त लागू नहीं होनी चाहिए।

इस मुद्दे पर गुजरात हाई कोर्ट के एक फैसले ने भी गैर-कीटनाशक उपयोग के लिए आयात किए जाने वाले रसायन पर परमिट की आवश्यकता को लेकर आयातकों के पक्ष में स्थिति बनाई थी। एपीकोटेक्स इंडस्ट्रीज समेत कुछ कंपनियों ने बिना परमिट एक्रिलोनाइट्राइल का आयात किया था।

लेकिन अब सीबीआईसी के नए निर्देश ने सीमा शुल्क स्तर पर इस स्थिति को स्पष्ट कर दिया है। बोर्ड ने कहा है कि अनुसूची में शामिल रसायन के आयात के लिए परमिट लेना वैधानिक आवश्यकता है। इसका पालन अंतिम उपयोग को ध्यान में रखे बिना करना होगा, जब तक कि नियमों में उस शिपमेंट के लिए कोई विशेष छूट उपलब्ध न हो।

जुलाई में बदले गए थे नियम

इस बदलाव की कानूनी पृष्ठभूमि 8 जुलाई 2026 को जारी राजपत्र अधिसूचना से जुड़ी है। इसी के जरिए Insecticides (Third Amendment) Rules, 2026 पेश किए गए थे।

इसके बाद केंद्रीय कीटनाशक बोर्ड के तहत काम करने वाली Registration Committee ने 30 जुलाई 2026 को अपनी 474वीं बैठक में इन संशोधनों पर चर्चा की। Registration Committee की भूमिका कीटनाशक अधिनियम के तहत पंजीकरण और उससे जुड़े तकनीकी मामलों को देखने की है।

जुलाई में नियमों में किए गए बदलाव के बाद अब सीबीआईसी का 1 अक्टूबर का निर्देश इनके सीमा शुल्क स्तर पर लागू होने की प्रक्रिया को स्पष्ट करता है। यानी अब बंदरगाहों और अन्य सीमा शुल्क केंद्रों पर अधिकारियों को अनुसूची में शामिल रसायनों के आयात की जांच करते समय परमिट की उपलब्धता सुनिश्चित करनी होगी।

गैर–कीटनाशक उपयोग के लिए भी Form IA जरूरी

नए प्रावधान के तहत यदि कोई कंपनी अनुसूची में शामिल रसायन को ऐसे उद्देश्य के लिए आयात करना चाहती है, जिसका संबंध कीटनाशक इस्तेमाल से नहीं है, तो उसे Registration Committee के समक्ष Form IA दाखिल करना होगा।

इसके साथ 5,000 रुपये का शुल्क भी देना होगा। आवेदन की प्रक्रिया के लिए सामान्य तौर पर 45 दिनों तक का समय निर्धारित किया गया है। जटिल मामलों में इस अवधि को अतिरिक्त 15 दिन तक बढ़ाया जा सकता है।

इसका मतलब है कि औद्योगिक कंपनियों को अब ऐसे रसायनों की आयात योजना पहले से बनानी होगी। केवल सीमा शुल्क पर दस्तावेज दिखाकर प्रक्रिया पूरी करने की संभावना नहीं रहेगी। आयात से पहले संबंधित नियामकीय अनुमति हासिल करना जरूरी होगा।

परमिट की अवधि कितनी होगी?

स्वीकृत आयात परमिट सामान्य तौर पर एक वर्ष के लिए वैध रहेगा। हालांकि कुछ मामलों में इसकी वैधता अवधि अधिक हो सकती है।

यदि किसी आयातक के पास पहले से संबंधित रसायन को कच्चे माल के रूप में कवर करने वाला कीटनाशक पंजीकरण प्रमाणपत्र मौजूद है, तो परमिट की वैधता तीन वर्ष तक हो सकती है।

इस प्रावधान से उन कंपनियों को कुछ सुविधा मिल सकती है, जो पहले से नियामकीय व्यवस्था के तहत संबंधित रसायन के साथ काम कर रही हैं।

कंपनियों को देने होंगे कई दस्तावेज

परमिट हासिल करने के लिए केवल आवेदन और शुल्क पर्याप्त नहीं होगा। कंपनियों को अपने औद्योगिक इस्तेमाल और रसायन की आवश्यकता को साबित करने वाले दस्तावेज भी देने होंगे।

इनमें औद्योगिक लाइसेंस, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से संबंधित मंजूरी और रसायन की पिछले तीन वर्षों की खपत का रिकॉर्ड शामिल है। इसके अलावा कंपनी को यह भी बताना होगा कि वह जिस मात्रा में रसायन का आयात करना चाहती है, उसकी आवश्यकता क्यों है।

इस व्यवस्था का उद्देश्य आयात की मात्रा और उसके वास्तविक औद्योगिक इस्तेमाल के बीच संबंध को स्पष्ट करना है। इससे नियामक को यह आकलन करने में मदद मिलेगी कि मांगी गई मात्रा कंपनी की वास्तविक जरूरत के अनुरूप है या नहीं।

छोटे संदर्भ नमूनों को मिली सीमित छूट

नए नियमों में एक सीमित छूट भी रखी गई है। प्रमाणित संदर्भ सामग्री यानी certified reference materials यदि 5 ग्राम या उससे कम की यूनिट पैकिंग में आयात की जाती है, तो उनके लिए आयात परमिट की आवश्यकता नहीं होगी।

हालांकि यह छूट काफी सीमित है और सामान्य औद्योगिक आयात पर लागू नहीं होती। इसलिए कंपनियों को यह समझना होगा कि उनका आयात इस विशेष श्रेणी में आता है या नहीं।

औद्योगिक क्षेत्र पर क्या होगा असर?

नए नियम का सबसे बड़ा प्रभाव उन उद्योगों पर पड़ सकता है, जो अनुसूची में शामिल रसायनों का इस्तेमाल कीटनाशक उत्पादन के अलावा अन्य औद्योगिक गतिविधियों में करते हैं।

एक्रिलोनाइट्राइल इसका प्रमुख उदाहरण है। इसका उपयोग प्लास्टिक, सिंथेटिक रबर और फाइबर जैसे क्षेत्रों में होता है। ऐसे उद्योगों के लिए रसायन की नियमित और समय पर उपलब्धता उत्पादन प्रक्रिया से सीधे जुड़ी हो सकती है।

अब कंपनियों को आयात की योजना बनाते समय परमिट प्राप्त करने में लगने वाले समय को भी ध्यान में रखना होगा। सामान्य प्रक्रिया में 45 दिन और जटिल मामलों में अतिरिक्त 15 दिन तक लग सकते हैं। इसलिए बिना नियामकीय मंजूरी के आयात की योजना बनाना सीमा शुल्क पर परेशानी पैदा कर सकता है।

पुराने विवाद पर क्या असर पड़ेगा?

इस पूरे बदलाव का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इससे पहले गैर-कीटनाशक उपयोग को लेकर कानूनी व्याख्या को लेकर विवाद था। कुछ आयातकों का कहना था कि Insecticides Act का उद्देश्य कीटनाशकों को नियंत्रित करना है, इसलिए किसी रसायन के औद्योगिक इस्तेमाल पर उसी तरह की परमिट व्यवस्था लागू नहीं होनी चाहिए।

गुजरात हाई कोर्ट के फैसले ने भी इसी विवाद को अलग संदर्भ में प्रभावित किया था। लेकिन जुलाई 2026 में नियमों में संशोधन और उसके बाद सीबीआईसी के अक्टूबर निर्देश ने सीमा शुल्क अधिकारियों के लिए स्थिति को अधिक स्पष्ट कर दिया है।

अब किसी अनुसूचीबद्ध रसायन के मामले में केवल उसके अंतिम उपयोग का हवाला देकर परमिट से छूट का दावा करना मुश्किल होगा।

आयातकों के लिए बढ़ी अनुपालन की जिम्मेदारी

नए नियमों के बाद कंपनियों के लिए नियामकीय अनुपालन और महत्वपूर्ण हो गया है। आयातकों को यह जांचना होगा कि जिस रसायन को वे भारत में ला रहे हैं, वह Insecticides Act की अनुसूची में शामिल है या नहीं।

अगर रसायन अनुसूची में है, तो उसके अंतिम इस्तेमाल की प्रकृति की जांच के साथ-साथ संबंधित परमिट की जरूरत भी देखनी होगी। औद्योगिक उपयोग होने का मतलब अपने आप परमिट से छूट नहीं होगा।

एक्रिलोनाइट्राइल के मामले में सीबीआईसी का निर्देश इस बदलाव को स्पष्ट रूप से सामने लाता है। अब बंदरगाहों पर यह तर्क कि रसायन कृषि या कीट नियंत्रण के लिए नहीं है, अकेले परमिट की आवश्यकता को खत्म नहीं करेगा।

निष्कर्ष

सीबीआईसी का 1 अक्टूबर 2026 का निर्देश अनुसूचीबद्ध रसायनों के आयात को लेकर नियामकीय व्यवस्था को सख्त और स्पष्ट करता है। अब कीटनाशक अधिनियम की अनुसूची में शामिल रसायनों के लिए आयात परमिट की आवश्यकता केवल उनके इस्तेमाल पर निर्भर नहीं रहेगी।

एक्रिलोनाइट्राइल जैसे रसायन, जिनका व्यापक औद्योगिक इस्तेमाल है, इस बदलाव के केंद्र में हैं। गैर-कीटनाशक उपयोग के लिए भी कंपनियों को Form IA के जरिए परमिट के लिए आवेदन करना होगा, 5,000 रुपये शुल्क देना होगा और आवश्यक औद्योगिक तथा खपत संबंधी दस्तावेज उपलब्ध कराने होंगे।

हालांकि 5 ग्राम या उससे कम के प्रमाणित संदर्भ नमूनों को सीमित छूट दी गई है। कुल मिलाकर, नए नियमों के बाद रसायन आयात करने वाली कंपनियों के लिए पहले से नियामकीय जांच करना और परमिट प्रक्रिया को समय रहते पूरा करना अधिक जरूरी हो गया है।

 

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