नारियल खेती को मिलेगा नया सुरक्षा कवच, भाकृअनुप-एनबीएआईआर ने सिखाईं जलवायु-स्मार्ट जैव नियंत्रण तकनीकें

Coconut farming to get a new protective shield, ICAR-NBAIR teaches climate-smart biocontrol techniques

बदलते जलवायु परिदृश्य, नए कीटों और रोगों के बढ़ते प्रकोप के बीच नारियल उत्पादन को सुरक्षित और टिकाऊ बनाए रखने के लिए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद–राष्ट्रीय कृषि कीट संसाधन ब्यूरो (भाकृअनुप-एनबीएआईआर), बेंगलुरु ने एक महत्वपूर्ण पहल की है। संस्थान ने नारियल विकास बोर्ड (सीडीबी), कोच्चि के सहयोग से 11 से 15 मई 2026 तक “नारियल में कीट एवं रोग प्रबंधन हेतु जलवायु-स्मार्ट जैव नियंत्रण रणनीतियाँ” विषय पर पांच दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन किया।

इस प्रशिक्षण कार्यक्रम का उद्देश्य नारियल उत्पादक क्षेत्रों में कार्यरत अधिकारियों, वैज्ञानिकों और कृषि विशेषज्ञों को ऐसी आधुनिक एवं पर्यावरण-अनुकूल तकनीकों से परिचित कराना था, जिनकी मदद से उभरते कीटों और रोगों का प्रभावी तथा टिकाऊ प्रबंधन किया जा सके।

देशभर के कृषि विशेषज्ञों ने लिया प्रशिक्षण

इस विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम में नारियल विकास बोर्ड के नव-नियुक्त फील्ड अधिकारियों, सहायक निदेशकों और उपनिदेशकों (विकास एवं विपणन), कृषि विज्ञान केंद्रों के विषय विशेषज्ञों, केरल कृषि विश्वविद्यालय के सहायक प्राध्यापकों तथा तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और गुजरात के उद्यानिकी अधिकारियों ने भाग लिया।

इसके अलावा ओडिशा, कर्नाटक, केरल, महाराष्ट्र, बिहार, असम, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़, त्रिपुरा और अन्य राज्यों से भी कृषि विशेषज्ञ कार्यक्रम में शामिल हुए। कुल मिलाकर लगभग 30 प्रतिभागियों ने प्रशिक्षण प्राप्त किया।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के प्रशिक्षण कार्यक्रम कृषि विस्तार तंत्र को मजबूत बनाने और नई तकनीकों को तेजी से किसानों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

उभरते कीटों की पहचान और नियंत्रण पर विशेष फोकस

प्रशिक्षण के दौरान नारियल फसलों में तेजी से फैल रहे कई गंभीर कीटों की पहचान और उनके नियंत्रण के उपायों पर विस्तार से चर्चा की गई।

प्रतिभागियों को आक्रामक सफेद मक्खी (इनवेसिव व्हाइटफ्लाई), नारियल ब्लैक हेडेड कैटरपिलर, एरियोफाइड माइट और स्लग कैटरपिलर जैसे खतरनाक कीटों के बारे में जानकारी दी गई। विशेषज्ञों ने बताया कि जलवायु परिवर्तन और बदलती पर्यावरणीय परिस्थितियों के कारण इन कीटों का प्रभाव कई राज्यों में तेजी से बढ़ रहा है।

इन कीटों की समय रहते पहचान और वैज्ञानिक प्रबंधन किसानों को भारी आर्थिक नुकसान से बचा सकता है।

जैव नियंत्रण तकनीकों का दिया व्यावहारिक प्रशिक्षण

कार्यक्रम की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता जैव नियंत्रण तकनीकों का व्यावहारिक प्रशिक्षण रहा। प्रतिभागियों को विभिन्न प्राकृतिक शत्रुओं, परजीवी कीटों, परभक्षी जीवों और कीट-रोगजनक सूक्ष्मजीवों के उपयोग के बारे में विस्तार से जानकारी दी गई।

विशेषज्ञों ने कीट-रोगजनक फफूंद, लाभकारी बैक्टीरिया और निमेटोड के बड़े पैमाने पर उत्पादन और उपयोग की तकनीकों का प्रदर्शन किया। इन जैविक उपायों की मदद से रासायनिक कीटनाशकों पर निर्भरता कम की जा सकती है और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना कीट नियंत्रण संभव हो सकता है।

वैज्ञानिकों ने बताया कि जैव नियंत्रण न केवल लागत को कम करता है, बल्कि नारियल बागानों की जैव विविधता और पारिस्थितिक संतुलन को भी बनाए रखने में मदद करता है।

नारियल के प्रमुख रोगों के प्रबंधन पर भी हुई चर्चा

कीट नियंत्रण के साथ-साथ प्रशिक्षण में नारियल के प्रमुख रोगों के प्रबंधन पर भी विशेष ध्यान दिया गया।

प्रतिभागियों को बड रॉट, रूट विल्ट, लीफ ब्लाइट, स्टेम ब्लीडिंग और तंजौर विल्ट जैसे गंभीर रोगों की पहचान, कारण और जैविक प्रबंधन उपायों की जानकारी दी गई।

विशेषज्ञों ने बताया कि रोगों का समय पर निदान और जैविक नियंत्रण उपायों का उपयोग करके उत्पादन हानि को काफी हद तक कम किया जा सकता है। साथ ही किसानों को रासायनिक फफूंदनाशकों के अत्यधिक उपयोग से भी बचाया जा सकता है।

कृषि ड्रोन और आधुनिक तकनीकों का प्रदर्शन

प्रशिक्षण कार्यक्रम में आधुनिक कृषि तकनीकों का भी प्रदर्शन किया गया। प्रतिभागियों को प्राकृतिक शत्रुओं को खेतों में छोड़ने की प्रक्रिया दिखाई गई तथा कृषि ड्रोन के माध्यम से कीट-रोगजनक जीवों के पर्णीय छिड़काव का प्रदर्शन भी किया गया।

विशेषज्ञों ने बताया कि ड्रोन तकनीक बड़े क्षेत्र में कम समय में प्रभावी ढंग से जैव नियंत्रण एजेंटों के उपयोग को संभव बनाती है। इससे श्रम लागत कम होती है और उपचार की दक्षता बढ़ती है।

कृषि क्षेत्र में डिजिटल और स्मार्ट तकनीकों का बढ़ता उपयोग भविष्य की खेती को अधिक प्रभावी और टिकाऊ बना सकता है।

परागणकर्ताओं और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण पर जोर

कार्यक्रम के दौरान केवल कीट और रोग प्रबंधन तक ही चर्चा सीमित नहीं रही। प्रतिभागियों को नारियल आधारित बहु-फसली एवं समेकित कृषि प्रणालियों के बारे में भी जानकारी दी गई।

विशेषज्ञों ने परागणकर्ताओं के संरक्षण, जल संसाधनों के कुशल उपयोग, संतुलित उर्वरक प्रबंधन और टिकाऊ कृषि पद्धतियों को अपनाने पर जोर दिया। उनका कहना था कि कृषि उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा भी उतनी ही आवश्यक है।

किसानों तक तकनीक पहुंचाने का आह्वान

भाकृअनुप-एनबीएआईआर के कार्यवाहक निदेशक डॉ. टी. वेंकटेशन ने प्रतिभागियों को संबोधित करते हुए कहा कि हाल के वर्षों में कई नए और आक्रामक कीट तेजी से उभरकर सामने आए हैं, जिनके कारण नारियल उत्पादक किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है।

उन्होंने कहा कि ऐसी परिस्थितियों में जैव नियंत्रण आधारित जलवायु-स्मार्ट रणनीतियां भविष्य का रास्ता हैं। उन्होंने सभी प्रतिभागियों से आग्रह किया कि वे प्रशिक्षण में प्राप्त ज्ञान और तकनीकों को किसानों तक पहुंचाएं ताकि नारियल में कीट एवं रोग प्रबंधन अधिक प्रभावी और टिकाऊ बन सके।

सतत नारियल उत्पादन की दिशा में बड़ा कदम

विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के दौर में पारंपरिक कीट प्रबंधन रणनीतियों के साथ-साथ जैविक और पर्यावरण-अनुकूल तकनीकों को अपनाना समय की मांग है। भाकृअनुप-एनबीएआईआर द्वारा आयोजित यह प्रशिक्षण कार्यक्रम इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास है।

इस कार्यक्रम से प्रशिक्षित अधिकारी और वैज्ञानिक अब अपने-अपने क्षेत्रों में किसानों को आधुनिक जैव नियंत्रण तकनीकों की जानकारी देंगे, जिससे नारियल उत्पादन को सुरक्षित, टिकाऊ और लाभकारी बनाने में मदद मिलेगी। यह पहल न केवल किसानों की आय बढ़ाने में सहायक होगी, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों के सतत उपयोग को भी बढ़ावा देगी।

 

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