खाद्य एवं पोषण सुरक्षा को मजबूत करने पर भारत सरकार और संयुक्त राष्ट्र के बीच मंथन

Deliberations between the Government of India and the United Nations on strengthening food and nutrition security.

खाद्य

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देश में खाद्य एवं पोषण सुरक्षा को और अधिक प्रभावी बनाने तथा सतत कृषि से जुड़े विकास लक्ष्यों को गति देने के उद्देश्य से भारत सरकार और संयुक्त राष्ट्र के बीच सहयोग को मजबूत करने पर चर्चा की गई। कृषि एवं किसान कल्याण विभाग के सचिव श्री अतिश चंद्र की अध्यक्षता में भारत सरकार–संयुक्त राष्ट्र सतत विकास सहयोग रूपरेखा (2023–27) के अंतर्गत आउटकम स्टैंडिंग कमेटी-2 (OSC-2) की बैठक आयोजित हुई। बैठक में सरकार के विभिन्न मंत्रालयों और विभागों तथा संयुक्त राष्ट्र के साझेदारों ने भाग लिया। इस दौरान मौजूदा सहयोग रूपरेखा के तहत अब तक हुई प्रगति की समीक्षा की गई और वर्ष 2028–32 के लिए प्रस्तावित नई सहयोग रूपरेखा को लेकर संबंधित मंत्रालयों और विभागों से सुझाव आमंत्रित किए गए।

बैठक का प्रमुख उद्देश्य खाद्य एवं पोषण सुरक्षा के क्षेत्र में सामूहिक प्रयासों को मजबूत करना, विभिन्न संस्थाओं के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करना और भविष्य की विकास प्राथमिकताओं पर विचार-विमर्श करना रहा। खाद्य उपलब्धता, पोषण संबंधी आवश्यकताओं और टिकाऊ कृषि प्रणालियों को व्यापक विकास लक्ष्यों से जोड़ना इस तरह के सहयोग की दिशा में महत्वपूर्ण माना जाता है।

OSC-2 की बैठक में मौजूदा सहयोग रूपरेखा की प्रगति की समीक्षा

भारत सरकार–संयुक्त राष्ट्र सतत विकास सहयोग रूपरेखा 2023–27 के अंतर्गत आयोजित बैठक में अब तक किए गए कार्यों और सहयोग से संबंधित प्रगति पर चर्चा की गई। इस रूपरेखा का उद्देश्य भारत की विकास प्राथमिकताओं और संयुक्त राष्ट्र के सहयोग को एक साझा ढांचे के अंतर्गत आगे बढ़ाना है।

आउटकम स्टैंडिंग कमेटी-2 की बैठक में सरकारी और संयुक्त राष्ट्र के साझेदारों को एक मंच पर लाकर खाद्य एवं पोषण सुरक्षा से जुड़े प्रयासों को मजबूत करने पर विचार किया गया। बैठक में विभिन्न मंत्रालयों और विभागों से प्राप्त होने वाले सुझावों को आगामी सहयोग रूपरेखा की तैयारी के लिए महत्वपूर्ण माना गया।

वर्ष 2023–27 की मौजूदा रूपरेखा के अनुभवों की समीक्षा से भविष्य की प्राथमिकताओं को बेहतर ढंग से निर्धारित करने में मदद मिल सकती है। इसके माध्यम से यह समझने का अवसर मिलता है कि किन क्षेत्रों में सहयोग को आगे बढ़ाने, संस्थागत समन्वय को मजबूत करने और विकास संबंधी गतिविधियों को अधिक प्रभावी बनाने की आवश्यकता है।

बैठक में चर्चा का एक महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि भविष्य की योजना तैयार करते समय विभिन्न विभागों के अनुभवों और सुझावों को शामिल किया जाए। इससे कृषि, खाद्य सुरक्षा और पोषण जैसे परस्पर जुड़े क्षेत्रों में नीतिगत प्राथमिकताओं को अधिक व्यवस्थित तरीके से आगे बढ़ाने में मदद मिल सकती है।

2028–32 की नई रूपरेखा के लिए मंत्रालयों और विभागों से सुझाव आमंत्रित

बैठक के दौरान वर्ष 2028–32 के लिए प्रस्तावित भारत सरकार–संयुक्त राष्ट्र सतत विकास सहयोग रूपरेखा को लेकर विभिन्न मंत्रालयों और विभागों से सुझाव आमंत्रित किए गए। इसका उद्देश्य आगामी अवधि के लिए विकास प्राथमिकताओं की पहचान करना और सहयोग के संभावित क्षेत्रों पर विचार करना है।

नई रूपरेखा की तैयारी में संबंधित मंत्रालयों और विभागों की भागीदारी महत्वपूर्ण होगी, क्योंकि अलग-अलग विभाग अपने कार्यक्षेत्र के अनुभवों, आवश्यकताओं और प्राथमिकताओं के आधार पर उपयोगी सुझाव दे सकते हैं। खाद्य एवं पोषण सुरक्षा जैसे व्यापक विषयों पर प्रभावी कार्ययोजना तैयार करने के लिए कृषि उत्पादन, खाद्य उपलब्धता, पोषण संबंधी आवश्यकताओं और सतत विकास के बीच संबंधों को समझना आवश्यक है।

2028–32 की अवधि के लिए सुझाव आमंत्रित करना भविष्य की सहयोग रणनीति तैयार करने की प्रक्रिया का हिस्सा है। इस प्रक्रिया में वर्तमान रूपरेखा से प्राप्त अनुभवों और संबंधित विभागों की प्राथमिकताओं को ध्यान में रखा जा सकता है।

हालांकि, बैठक के संबंध में उपलब्ध जानकारी में आगामी रूपरेखा के लिए अंतिम रूप से तय किए गए लक्ष्यों, बजट, नई योजनाओं या समयबद्ध कार्ययोजना का विवरण नहीं दिया गया है। इसलिए इन विषयों पर किसी अंतिम निर्णय की घोषणा के बजाय बैठक को भविष्य की प्राथमिकताओं पर चर्चा और सुझाव आमंत्रित करने की प्रक्रिया के रूप में देखा जाना चाहिए।

खाद्य सुरक्षा और पोषण सुरक्षा क्यों हैं महत्वपूर्ण?

खाद्य सुरक्षा का संबंध लोगों के लिए पर्याप्त, सुरक्षित और सुलभ भोजन की उपलब्धता से है। वहीं, पोषण सुरक्षा का व्यापक अर्थ ऐसा भोजन उपलब्ध होना है, जो शरीर की पोषण संबंधी आवश्यकताओं को पूरा करने में सक्षम हो। दोनों विषय एक-दूसरे से जुड़े हैं, लेकिन इनके उद्देश्य केवल खाद्यान्न उत्पादन या भोजन की उपलब्धता तक सीमित नहीं हैं।

किसी देश में खाद्यान्न का पर्याप्त उत्पादन होने के बावजूद सभी लोगों तक संतुलित और पोषक आहार की समान पहुंच सुनिश्चित करना एक अलग चुनौती हो सकती है। इसके लिए खाद्य पदार्थों की उपलब्धता, उनकी वहनीयता, वितरण व्यवस्था, पोषण संबंधी जागरूकता और विभिन्न सामाजिक समूहों की आवश्यकताओं पर ध्यान देना जरूरी होता है।

भारत जैसे कृषि प्रधान देश में खाद्य एवं पोषण सुरक्षा का कृषि क्षेत्र से सीधा संबंध है। कृषि उत्पादन की स्थिरता, फसलों की विविधता, किसानों की आय, जल और मिट्टी जैसे प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण तथा जलवायु संबंधी जोखिम खाद्य प्रणाली को प्रभावित कर सकते हैं।

ऐसे में खाद्य एवं पोषण सुरक्षा पर केंद्रित नीतियों को केवल उत्पादन बढ़ाने तक सीमित रखने के बजाय पूरी खाद्य प्रणाली के संदर्भ में देखना उपयोगी है। इसमें कृषि उत्पादन से लेकर भंडारण, परिवहन, वितरण और उपभोक्ताओं तक खाद्य पदार्थों की पहुंच जैसे पहलू शामिल होते हैं।

भारत सरकार और संयुक्त राष्ट्र के बीच सहयोग से संबंधित बैठकों में इन विषयों पर समन्वय को मजबूत करने की संभावनाओं पर विचार किया जा सकता है। हालांकि, इस बैठक में घोषित विशिष्ट कार्यक्रमों या परियोजनाओं का विवरण उपलब्ध नहीं है।

सतत कृषि की भूमिका भी महत्वपूर्ण

खाद्य सुरक्षा को लंबे समय तक बनाए रखने के लिए कृषि उत्पादन के साथ प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण भी आवश्यक है। सतत कृषि ऐसी कृषि प्रणालियों को बढ़ावा देने पर केंद्रित है, जिनमें वर्तमान की खाद्य आवश्यकताओं को पूरा करते हुए भविष्य की उत्पादन क्षमता और पर्यावरणीय संतुलन का भी ध्यान रखा जाए।

मिट्टी की उर्वरता बनाए रखना, जल संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग, फसल विविधीकरण, उपयुक्त कृषि तकनीकों को अपनाना और जलवायु संबंधी जोखिमों के प्रति कृषि प्रणालियों की क्षमता बढ़ाना इस व्यापक दृष्टिकोण के महत्वपूर्ण पहलू हैं।

कृषि क्षेत्र में संसाधनों का संतुलित उपयोग किसानों की उत्पादन लागत, फसल की स्थिरता और प्राकृतिक संसाधनों की दीर्घकालिक उपलब्धता से जुड़ा है। यदि कृषि उत्पादन प्राकृतिक संसाधनों पर अत्यधिक दबाव डालते हुए बढ़ता है, तो भविष्य में खाद्य उत्पादन को बनाए रखना कठिन हो सकता है। इसलिए उत्पादकता और संसाधन संरक्षण के बीच संतुलन महत्वपूर्ण है।

सतत कृषि और पोषण सुरक्षा के बीच भी संबंध है। फसल विविधीकरण तथा विविध खाद्य पदार्थों की उपलब्धता खाद्य प्रणालियों को अधिक मजबूत बनाने में योगदान दे सकती है। हालांकि, किसी भी कृषि रणनीति का वास्तविक प्रभाव स्थानीय परिस्थितियों, किसानों की जरूरतों, बाजार तक पहुंच और उपलब्ध संसाधनों पर निर्भर करता है।

बैठक में खाद्य एवं पोषण सुरक्षा तथा सतत कृषि से जुड़े विषयों को व्यापक विकास प्राथमिकताओं के संदर्भ में समझना महत्वपूर्ण है। संबंधित मंत्रालयों और विभागों के सुझाव आगामी सहयोग रूपरेखा में इन क्षेत्रों की जरूरतों को बेहतर ढंग से शामिल करने में उपयोगी हो सकते हैं।

सरकार और संयुक्त राष्ट्र के बीच समन्वय का महत्व

विकास से जुड़े कई विषय एक-दूसरे से जुड़े होते हैं। खाद्य सुरक्षा, पोषण, कृषि, ग्रामीण विकास और पर्यावरण संरक्षण जैसे क्षेत्रों में बेहतर परिणाम प्राप्त करने के लिए विभिन्न संस्थाओं के बीच समन्वय की आवश्यकता होती है।

सरकारी मंत्रालय और विभाग अपने-अपने कार्यक्षेत्र के अनुसार योजनाओं, नीतियों और कार्यक्रमों पर काम करते हैं। वहीं, संयुक्त राष्ट्र की सहयोग रूपरेखा विकास संबंधी प्राथमिकताओं पर साझा प्रयासों को व्यवस्थित करने के लिए एक मंच प्रदान करती है।

ऐसे सहयोग का महत्व केवल बैठक आयोजित करने तक सीमित नहीं है। इसकी उपयोगिता इस बात पर निर्भर करती है कि चर्चा से प्राप्त सुझावों को किस तरह प्राथमिकताओं, कार्यक्रमों और परिणामों से जोड़ा जाता है। स्पष्ट लक्ष्य, जिम्मेदारियों का निर्धारण, विभागों के बीच सूचनाओं का आदान-प्रदान और प्रगति की समीक्षा सहयोग को अधिक प्रभावी बनाने में सहायक हो सकते हैं।

OSC-2 की बैठक में सरकारी और संयुक्त राष्ट्र के साझेदारों का एक साथ आना खाद्य एवं पोषण सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर सामूहिक विचार-विमर्श के महत्व को दर्शाता है। आगामी 2028–32 की सहयोग रूपरेखा के लिए सुझाव आमंत्रित करने की प्रक्रिया भी इसी व्यापक समन्वय का हिस्सा है।

नई रूपरेखा तैयार करते समय विभिन्न विभागों की प्राथमिकताओं को एक साझा दृष्टिकोण में शामिल करना उपयोगी हो सकता है। इससे विकास संबंधी चुनौतियों की पहचान करने और अलग-अलग क्षेत्रों के प्रयासों के बीच बेहतर तालमेल स्थापित करने की संभावनाएं बढ़ती हैं।

भविष्य की रूपरेखा से जुड़ी अपेक्षाएं

वर्ष 2028–32 की सहयोग रूपरेखा के लिए सुझाव आमंत्रित किए जाने के बाद आगे की प्रक्रिया में विभिन्न मंत्रालयों और विभागों की प्राथमिकताओं का संकलन और मूल्यांकन महत्वपूर्ण होगा। इसके आधार पर खाद्य एवं पोषण सुरक्षा सहित अन्य विकास क्षेत्रों में सहयोग की संभावित दिशाओं पर विचार किया जा सकता है।

भविष्य की रूपरेखा को प्रभावी बनाने के लिए लक्ष्यों की स्पष्टता, संबंधित संस्थाओं की भूमिका और प्रगति का आकलन करने की व्यवस्था महत्वपूर्ण हो सकती है। इसके साथ ही, विभिन्न क्षेत्रों की जरूरतों और स्थानीय परिस्थितियों को ध्यान में रखना भी आवश्यक है।

खाद्य एवं पोषण सुरक्षा के मामले में उत्पादन और उपलब्धता के साथ-साथ पोषण संबंधी जरूरतों तथा भोजन तक पहुंच को भी व्यापक दृष्टिकोण में शामिल करना जरूरी है। इसी तरह सतत कृषि के लिए किसानों की आवश्यकताओं, प्राकृतिक संसाधनों और बदलती जलवायु परिस्थितियों पर ध्यान देना महत्वपूर्ण है।

हालांकि, अभी उपलब्ध जानकारी के अनुसार 2028–32 की रूपरेखा के अंतिम लक्ष्य या विस्तृत कार्यक्रम घोषित नहीं किए गए हैं। इसलिए आगामी अवधि में किस तरह की विशिष्ट पहलें शामिल होंगी, यह संबंधित प्रक्रिया और आधिकारिक निर्णयों के बाद ही स्पष्ट होगा।

खाद्य एवं पोषण सुरक्षा को लेकर सामूहिक प्रयासों पर जोर

श्री अतिश चंद्र की अध्यक्षता में आयोजित OSC-2 की बैठक ने भारत सरकार और संयुक्त राष्ट्र के बीच विकास संबंधी प्राथमिकताओं पर समन्वय को मजबूत करने के लिए विचार-विमर्श का अवसर प्रदान किया। बैठक में वर्ष 2023–27 की सहयोग रूपरेखा के तहत हुई प्रगति की समीक्षा की गई और 2028–32 की प्रस्तावित रूपरेखा के लिए मंत्रालयों तथा विभागों से सुझाव आमंत्रित किए गए।

खाद्य एवं पोषण सुरक्षा जैसे विषयों पर प्रभावी कार्य के लिए कृषि उत्पादन, खाद्य उपलब्धता, पोषण संबंधी आवश्यकताओं और सतत विकास के बीच बेहतर तालमेल महत्वपूर्ण है। सरकार के विभिन्न विभागों और संयुक्त राष्ट्र के साझेदारों के बीच संवाद भविष्य की प्राथमिकताओं को निर्धारित करने की प्रक्रिया में उपयोगी भूमिका निभा सकता है।

आगामी सहयोग रूपरेखा की प्रभावशीलता इस बात पर निर्भर करेगी कि प्राप्त सुझावों को किस प्रकार स्पष्ट प्राथमिकताओं और परिणामोन्मुखी प्रयासों में बदला जाता है। फिलहाल बैठक का प्रमुख निष्कर्ष खाद्य एवं पोषण सुरक्षा को मजबूत करने के लिए सामूहिक कार्रवाई पर चर्चा, मौजूदा सहयोग की समीक्षा और भविष्य की रूपरेखा के लिए सुझाव आमंत्रित करना है।

 

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