धान की कटाई के बाद गेहूं की बुवाई की तैयारी में जुटे किसानों के सामने सबसे अहम सवाल यह होता है कि खेत में कितनी खाद डालनी चाहिए। कई किसान हर साल एक जैसी मात्रा में यूरिया और डीएपी का इस्तेमाल करते हैं, जबकि धान की फसल से खेत में बचे पोषक तत्व, मिट्टी की उर्वरता, सिंचाई और फसल अवशेषों की स्थिति के अनुसार खाद की जरूरत बदल सकती है। ऐसे में बिना जरूरत ज्यादा खाद डालने से खेती की लागत बढ़ सकती है, जबकि पोषक तत्वों की कमी से गेहूं की पैदावार प्रभावित हो सकती है।
धान के बाद गेहूं की अच्छी पैदावार हासिल करने के लिए जरूरी है कि किसान मिट्टी की जांच, पिछली फसल में इस्तेमाल की गई खाद और गेहूं की निर्धारित पोषक जरूरत को ध्यान में रखकर उर्वरकों की मात्रा तय करें। सही खाद प्रबंधन से फसल को संतुलित पोषण देने और अनावश्यक खर्च कम करने में मदद मिल सकती है।
- सबसे पहले मिट्टी की जांच कराएं
धान के बाद गेहूं की बुवाई से पहले मिट्टी की जांच कराना खाद की मात्रा निर्धारित करने का सबसे बेहतर तरीका है। मिट्टी की जांच से फास्फोरस, पोटाश और अन्य पोषक तत्वों की उपलब्धता के बारे में जानकारी मिलती है। इसके आधार पर किसान समझ सकते हैं कि खेत में किस पोषक तत्व की कमी है और किसकी मात्रा पर्याप्त है।
धान की फसल में इस्तेमाल की गई खाद के कारण यह जरूरी नहीं कि गेहूं के लिए भी उतनी ही मात्रा में खाद डालनी पड़े। दोनों फसलों की पोषक तत्वों की जरूरत अलग होती है। इसलिए पिछली फसल में खाद डालने के आधार पर अगली फसल की मात्रा तय करने के बजाय मिट्टी की जांच और कृषि विभाग की सिफारिशों को प्राथमिकता देनी चाहिए।
यदि मिट्टी की जांच उपलब्ध नहीं है, तो किसानों को अपने क्षेत्र के कृषि विज्ञान केंद्र या कृषि विभाग की सामान्य उर्वरक सिफारिशों के अनुसार खाद का इस्तेमाल करना चाहिए।
- गेहूं में यूरिया की मात्रा कैसे तय करें?
यूरिया गेहूं की फसल के लिए नाइट्रोजन का प्रमुख स्रोत है। नाइट्रोजन पौधों की पत्तियों, तनों और बढ़वार के लिए जरूरी होती है। इसकी कमी होने पर पत्तियां पीली पड़ सकती हैं और पौधों की बढ़वार प्रभावित हो सकती है।
यूरिया की मात्रा तय करते समय यह देखना जरूरी है कि खेत की मिट्टी कैसी है, सिंचाई की सुविधा उपलब्ध है या नहीं और गेहूं की किस्म तथा बुवाई का समय क्या है। नाइट्रोजन की जरूरत को पूरा करने के लिए यूरिया का इस्तेमाल अनुशंसित मात्रा और सही समय पर करना चाहिए।
यूरिया को एक बार में जरूरत से ज्यादा डालने के बजाय कृषि सिफारिश के अनुसार अलग-अलग समय पर देना उपयोगी हो सकता है। इससे फसल की जरूरत के अनुसार नाइट्रोजन उपलब्ध कराने में मदद मिलती है।
ध्यान रखें कि ज्यादा यूरिया डालने से हमेशा पैदावार नहीं बढ़ती। जरूरत से ज्यादा नाइट्रोजन से पौधों की अनावश्यक बढ़वार हो सकती है और कुछ परिस्थितियों में फसल गिरने का जोखिम बढ़ सकता है। इसलिए यूरिया की मात्रा वैज्ञानिक सलाह के आधार पर तय करनी चाहिए।
- धान के बाद गेहूं में DAP कितना डालें?
डीएपी यानी डाई-अमोनियम फॉस्फेट गेहूं की शुरुआती बढ़वार और जड़ों के विकास के लिए महत्वपूर्ण उर्वरक है। सामान्य डीएपी में 18 प्रतिशत नाइट्रोजन और 46 प्रतिशत फास्फोरस (P₂O₅ के रूप में) होता है।
गेहूं की बुवाई के समय फास्फोरस की उपलब्धता महत्वपूर्ण होती है, इसलिए डीएपी का इस्तेमाल आमतौर पर बुवाई के समय किया जाता है। हालांकि, इसकी मात्रा खेत में उपलब्ध फास्फोरस और स्थानीय कृषि सिफारिशों के आधार पर तय करनी चाहिए।
अगर मिट्टी में फास्फोरस पहले से पर्याप्त है, तो अतिरिक्त डीएपी की जरूरत कम हो सकती है। दूसरी ओर, फास्फोरस की कमी वाली मिट्टी में इसकी उचित मात्रा जरूरी हो सकती है।
किसानों को यह भी समझना चाहिए कि डीएपी में नाइट्रोजन मौजूद होने के कारण इसकी मात्रा बढ़ाने पर नाइट्रोजन की आपूर्ति भी बढ़ती है। इसलिए डीएपी और यूरिया दोनों की मात्रा तय करते समय कुल नाइट्रोजन की जरूरत का हिसाब रखना चाहिए।
- क्या धान के बाद गेहूं में पोटाश डालना जरूरी है?
पोटाश पौधों में पानी के संतुलन, एंजाइम गतिविधियों और दूसरी शारीरिक प्रक्रियाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। गेहूं की फसल को भी इसकी जरूरत होती है, लेकिन हर खेत में पोटाश की अतिरिक्त मात्रा देना जरूरी नहीं है।
धान की खेती में पोषक तत्वों का उपयोग और खेत की मिट्टी की स्थिति अगली फसल के लिए पोटाश की जरूरत को प्रभावित कर सकती है। इसलिए मिट्टी की जांच के आधार पर यह तय करना बेहतर है कि पोटाश डालने की आवश्यकता है या नहीं।
यदि खेत में पोटाश की कमी है, तो कृषि विभाग की सिफारिश के अनुसार उपयुक्त पोटाश उर्वरक का इस्तेमाल करना चाहिए। बिना जांच के लगातार एक जैसी मात्रा डालने से बचना चाहिए।
- धान की पराली का गेहूं की खाद पर क्या असर पड़ता है?
धान की कटाई के बाद खेत में बची पराली का प्रबंधन भी गेहूं की खाद व्यवस्था को प्रभावित कर सकता है। पराली में पौधों द्वारा अवशोषित किए गए कुछ पोषक तत्व मौजूद रहते हैं। इसके उचित प्रबंधन से जैविक पदार्थों और पोषक तत्वों को खेत में वापस पहुंचाने में मदद मिल सकती है।
हालांकि, ताजा धान के अवशेषों में मौजूद कार्बन के विघटन के दौरान सूक्ष्मजीव कुछ समय के लिए मिट्टी में उपलब्ध नाइट्रोजन का उपयोग कर सकते हैं। इससे शुरुआती अवस्था में गेहूं के पौधों को उपलब्ध नाइट्रोजन प्रभावित हो सकती है।
इसलिए पराली का प्रबंधन करते समय स्थानीय कृषि सलाह का पालन करना चाहिए। पराली को जलाने के बजाय उपयुक्त मशीनों और विधियों से उसका प्रबंधन करना मिट्टी की सेहत के लिए उपयोगी हो सकता है।
- गेहूं में खाद डालने का सही समय क्या है?
खाद की सही मात्रा के साथ उसका सही समय भी जरूरी है। फास्फोरस जैसे कम गतिशील पोषक तत्वों को सामान्यतः बुवाई के समय मिट्टी में देना उपयोगी होता है। नाइट्रोजन की आपूर्ति फसल की जरूरत के अनुसार निर्धारित समय पर की जाती है।
यूरिया डालने का समय गेहूं की बुवाई, मिट्टी में नमी और सिंचाई की उपलब्धता पर निर्भर करता है। सिंचित गेहूं में नाइट्रोजन की मात्रा को स्थानीय कृषि सिफारिश के अनुसार बांटकर देना बेहतर हो सकता है।
खाद डालने के बाद खेत की स्थिति और सिंचाई का ध्यान रखना चाहिए, ताकि पोषक तत्वों का उपयोग बेहतर तरीके से हो सके। बहुत अधिक पानी देने या अनुचित समय पर खाद डालने से पोषक तत्वों के नुकसान का जोखिम बढ़ सकता है।
- खाद की लागत कम करने के लिए किसान क्या करें?
धान के बाद गेहूं में खाद का खर्च नियंत्रित रखने के लिए किसान कुछ जरूरी कदम उठा सकते हैं।
- बुवाई से पहले मिट्टी की जांच कराएं।
- यूरिया और डीएपी की मात्रा फसल की जरूरत के अनुसार तय करें।
- मिट्टी में पर्याप्त मात्रा में मौजूद पोषक तत्वों के लिए अनावश्यक खाद न डालें।
- गोबर की अच्छी तरह सड़ी खाद या कम्पोस्ट का इस्तेमाल करें और उससे मिलने वाले पोषक तत्वों को खाद प्रबंधन में ध्यान में रखें।
- पराली को जलाने के बजाय उचित तरीके से प्रबंधित करें।
- खाद की मात्रा और इस्तेमाल की तारीख का रिकॉर्ड रखें।
- कृषि विभाग या कृषि विज्ञान केंद्र की स्थानीय सिफारिशों का पालन करें।
इन उपायों से अनावश्यक उर्वरक खर्च को नियंत्रित करने और फसल को जरूरत के अनुसार पोषण देने में मदद मिल सकती है।
निष्कर्ष
धान के बाद गेहूं में खाद की मात्रा तय करने के लिए हर खेत में एक ही फार्मूला अपनाना सही नहीं है। मिट्टी की जांच, पिछली फसल में पोषक तत्वों का इस्तेमाल, पराली की स्थिति और गेहूं की जरूरत को ध्यान में रखना जरूरी है।
यूरिया से नाइट्रोजन, डीएपी से नाइट्रोजन और फास्फोरस तथा जरूरत के अनुसार पोटाश की आपूर्ति की जा सकती है। किसानों को इन उर्वरकों की मात्रा स्थानीय कृषि सिफारिशों के अनुसार तय करनी चाहिए। संतुलित खाद प्रबंधन से खेती की लागत नियंत्रित करने, मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने और गेहूं की अच्छी पैदावार हासिल करने में मदद मिल सकती है।
