El Nino Impact on Rabi Crops: खरीफ के बाद रबी फसलों पर भी बढ़ा संकट

El Niño Impact on Rabi Crops: Crisis Intensifies for Rabi Crops Following Kharif Crops

El Nino Impact on Rabi Crops

El Nino Impact on Rabi Crops

El Nino Impact on Rabi Crops: देश में कमजोर मानसून के बाद अब रबी की खेती को लेकर चिंता बढ़ने लगी है। वर्ष 2026 में सामान्य से कम बारिश और प्रशांत महासागर में मजबूत होते अल नीनो ने किसानों के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है। खासकर गेहूं, चना और सरसों जैसी फसलों पर मौसम की अनिश्चितता का असर पड़ सकता है। मौसम विशेषज्ञों के पूर्वानुमान बताते हैं कि 2026-27 की सर्दियों में अल नीनो का प्रभाव बना रह सकता है। हालांकि इसका मतलब यह नहीं कि देश के सभी इलाकों में फसल खराब होगी, लेकिन कम मिट्टी की नमी, सिंचाई के पानी की उपलब्धता और तापमान में बदलाव किसानों के लिए परेशानी बढ़ा सकते हैं।

कमजोर मानसून के बाद रबी की खेती पर मंडराया नया खतरा

भारत में खेती का बड़ा हिस्सा मौसम पर निर्भर करता है। खरीफ की फसलों के लिए जून से सितंबर के बीच होने वाली मानसूनी बारिश बेहद महत्वपूर्ण होती है। इसी बारिश से न केवल धान, मक्का, सोयाबीन और कपास जैसी फसलों को पानी मिलता है, बल्कि खेतों में नमी भी जमा होती है। यही नमी आगे चलकर रबी की बुवाई में काम आती है।

लेकिन वर्ष 2026 में मानसून का प्रदर्शन कमजोर रहा। देशभर में जून से सितंबर के दौरान सामान्य से लगभग 13 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई। कई इलाकों में बारिश का वितरण भी असमान रहा। कहीं लंबे समय तक सूखा मौसम बना रहा, तो कहीं थोड़े समय में तेज बारिश हुई। अब इस स्थिति का असर रबी की तैयारियों पर दिखाई देने की आशंका है। जिन किसानों के खेतों में पर्याप्त नमी नहीं है, उन्हें बुवाई से पहले सिंचाई करनी पड़ सकती है। जिन क्षेत्रों में तालाब, कुएं या दूसरे जलस्रोत बारिश पर निर्भर हैं, वहां परेशानी ज्यादा हो सकती है।

कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, रबी की सफल खेती के लिए केवल बीज और खाद का प्रबंध काफी नहीं होता। समय पर बुवाई, मिट्टी में उचित नमी और फसल की अलग-अलग अवस्थाओं में अनुकूल तापमान भी जरूरी है। ऐसे में अल नीनो की मजबूत स्थिति ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है।

अल नीनो को लेकर अक्टूबर 2026 में क्या आया नया अपडेट?

अमेरिका के नेशनल ओशनिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन (NOAA) के क्लाइमेट प्रेडिक्शन सेंटर ने 8 अक्टूबर 2026 को जारी अपने ताजा पूर्वानुमान में बताया कि प्रशांत महासागर में अल नीनो मजबूत हो रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, जनवरी से मार्च 2027 तक मजबूत या अत्यधिक मजबूत अल नीनो की स्थिति बने रहने की संभावना 83 प्रतिशत से अधिक है।

इतना ही नहीं, अक्टूबर से दिसंबर 2026 के दौरान अल नीनो के ऐतिहासिक रूप से बेहद मजबूत स्तर तक पहुंचने की संभावना 83 प्रतिशत बताई गई है। नवंबर 2026 से जनवरी 2027 के लिए इस तरह की स्थिति की संभावना करीब 70 प्रतिशत है। यह जानकारी महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसी अवधि में भारत के बड़े हिस्से में गेहूं, चना और सरसों जैसी रबी फसलें खेतों में होती हैं।

हालांकि वैज्ञानिक स्पष्ट करते हैं कि अल नीनो का प्रभाव हर देश और हर क्षेत्र में एक जैसा नहीं होता। भारत में सर्दियों के दौरान तापमान, पश्चिमी विक्षोभ, स्थानीय बारिश और दूसरी मौसम प्रणालियां भी फसलों की स्थिति निर्धारित करती हैं। इसलिए अभी से पूरे देश में उत्पादन घटने का दावा करना जल्दबाजी होगी। फिर भी किसानों के लिए बदलते मौसम को ध्यान में रखकर खेती की योजना बनाना जरूरी है।

आखिर क्या है अल नीनो और क्यों बदल जाता है मौसम?

अल नीनो प्रशांत महासागर से जुड़ी एक प्राकृतिक जलवायु घटना है। इस दौरान भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से अधिक हो जाता है।समुद्र के तापमान में होने वाला यह बदलाव वायुमंडलीय हवाओं और वर्षा के वितरण को प्रभावित कर सकता है।अल नीनो का प्रभाव केवल प्रशांत महासागर तक सीमित नहीं रहता। इसकी वजह से दुनिया के विभिन्न हिस्सों में कहीं कम बारिश, कहीं अधिक वर्षा और कहीं असामान्य तापमान की स्थिति बन सकती है।भारत में अल नीनो को विशेष रूप से दक्षिण-पश्चिम मानसून के संदर्भ में देखा जाता है। कई वर्षों में इसके दौरान मानसून कमजोर पाया गया है। हालांकि हर अल नीनो वर्ष में सूखा पड़ना जरूरी नहीं है।भारतीय मानसून पर हिंद महासागर के तापमान, इंडियन ओशन डाइपोल, मानसूनी हवाओं और दूसरी प्राकृतिक परिस्थितियों का भी असर पड़ता है।

इस बार चिंता इसलिए अधिक है, क्योंकि कमजोर मानसून के बाद अल नीनो का मजबूत चरण रबी की खेती के समय सामने आ रहा है। यानी किसानों को एक तरफ पहले से मौजूद पानी की कमी का सामना करना पड़ सकता है और दूसरी तरफ आगामी महीनों में मौसम के संभावित बदलाव पर नजर रखनी होगी।

2026 का मानसून कितना कमजोर रहा?

भारत मौसम विज्ञान विभाग के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2026 में दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान देश में करीब 759 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई, जबकि दीर्घकालिक औसत लगभग 868 मिलीमीटर है।इस हिसाब से बारिश में लगभग 12.6 प्रतिशत की कमी रही।

देश में मानसून की वापसी के साथ अक्टूबर के मध्य से दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों में उत्तर-पूर्वी मानसून भी सक्रिय होने लगा है।इसका फायदा तमिलनाडु और आसपास के कुछ क्षेत्रों को मिल सकता है। हालांकि उत्तर-पूर्वी मानसून से मिलने वाली बारिश पूरे देश में खरीफ के दौरान हुई कमी की भरपाई नहीं कर सकती।विशेष रूप से मध्य और पश्चिमी भारत के ऐसे कृषि क्षेत्रों में समस्या हो सकती है, जहां रबी की खेती के लिए वर्षा से जमा मिट्टी की नमी और स्थानीय जलस्रोत महत्वपूर्ण हैं।महाराष्ट्र और कर्नाटक के कुछ हिस्सों में पानी की कमी को लेकर चिंता सामने आई है। वहीं उत्तर भारत के सिंचित क्षेत्रों में स्थिति अलग हो सकती है।इसलिए राष्ट्रीय स्तर पर कम बारिश का आंकड़ा महत्वपूर्ण जरूर है, लेकिन प्रत्येक जिले और खेत की वास्तविक स्थिति को समझना उससे भी ज्यादा जरूरी है।

गेहूं की फसल पर क्यों बढ़ सकता है खतरा?

भारत की रबी खेती में गेहूं सबसे महत्वपूर्ण फसलों में शामिल है। पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान और बिहार सहित कई राज्यों में बड़े पैमाने पर इसकी खेती होती है।गेहूं की फसल को शुरुआती विकास के दौरान अनुकूल ठंडक की आवश्यकता होती है। पौधों की बढ़वार, बालियां निकलने और दानों के भरने के समय तापमान महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।अगर सर्दियों में सामान्य से अधिक गर्मी रहती है या फरवरी और मार्च में तापमान तेजी से बढ़ता है, तो गेहूं की फसल प्रभावित हो सकती है।विशेष रूप से दाना भरने की अवस्था में अधिक तापमान रहने से दानों का आकार और वजन कम होने का जोखिम रहता है।इससे प्रति हेक्टेयर उत्पादन प्रभावित हो सकता है।

हालांकि केवल अल नीनो के आधार पर यह तय नहीं किया जा सकता कि फरवरी 2027 में उत्तर भारत के सभी गेहूं उत्पादक क्षेत्रों में गर्मी बढ़ेगी।इसके लिए भारत मौसम विज्ञान विभाग के मासिक और मौसमी तापमान पूर्वानुमानों पर नजर रखना जरूरी होगा।

गेहूं की बुवाई में देरी क्यों बन सकती है परेशानी?

जिन इलाकों में खरीफ की फसल देर से कटती है या खेत में पर्याप्त नमी नहीं होती, वहां गेहूं की बुवाई प्रभावित हो सकती है।देर से बोए गए गेहूं को फसल के अंतिम चरण में अपेक्षाकृत अधिक तापमान का सामना करना पड़ सकता है।यदि फरवरी या मार्च में गर्मी सामान्य से ज्यादा रहती है, तो यह स्थिति चुनौतीपूर्ण बन सकती है।ऐसे में किसानों को स्थानीय कृषि विज्ञान केंद्र की सलाह के अनुसार बुवाई का समय और उपयुक्त किस्म चुननी चाहिए।हर क्षेत्र के लिए एक ही किस्म या बुवाई की तारीख सही नहीं होती।समय पर बुवाई, प्रमाणित बीज, संतुलित पोषण और जरूरत के अनुसार सिंचाई से मौसम के जोखिम को कुछ हद तक कम किया जा सकता है।

चने की खेती के सामने पानी और गर्मी की दोहरी चुनौती

चना भारत की महत्वपूर्ण दलहनी फसलों में शामिल है। मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और कर्नाटक सहित अनेक राज्यों में इसका उत्पादन होता है। कई क्षेत्रों में चने की खेती सीमित सिंचाई या बारिश से बची मिट्टी की नमी के सहारे की जाती है।

इसलिए कमजोर मानसून के बाद चना उत्पादक क्षेत्रों में मिट्टी की नमी बड़ी चिंता बन सकती है। यदि बुवाई के समय पर्याप्त नमी नहीं होगी, तो बीजों का अंकुरण प्रभावित हो सकता है। पौधों की शुरुआती बढ़वार कमजोर होने का जोखिम भी रहता है। चने में फूल आने और फलियां बनने की अवस्थाएं बेहद महत्वपूर्ण होती हैं। इन चरणों में अत्यधिक गर्मी और नमी की कमी एक साथ होने पर फूलों तथा फलियों का विकास प्रभावित हो सकता है। हालांकि चना अपेक्षाकृत कम पानी वाली फसल मानी जाती है, इसका अर्थ यह नहीं है कि उसे बिल्कुल पानी की जरूरत नहीं होती। अच्छी पैदावार के लिए मिट्टी में उपलब्ध नमी, उपयुक्त किस्म और फसल प्रबंधन का संतुलन जरूरी है।

चना उत्पादक किसान किन बातों पर ध्यान दें?

किसानों को सबसे पहले खेत की मिट्टी में उपलब्ध नमी की स्थिति समझनी चाहिए। जहां नमी कम है, वहां बिना तैयारी के बुवाई करने से अंकुरण कमजोर हो सकता है।

कृषि विभाग की सलाह के अनुसार बीजोपचार करना, क्षेत्र के अनुकूल किस्म चुनना और समय पर खरपतवार नियंत्रण करना फायदेमंद हो सकता है। जिन किसानों के पास सीमित सिंचाई सुविधा है, उन्हें फसल की महत्वपूर्ण अवस्थाओं को ध्यान में रखकर पानी के उपयोग की योजना बनानी चाहिए। फसल में रोग और कीटों की निगरानी भी जरूरी है, क्योंकि बदलते मौसम में इनका प्रकोप अलग-अलग ढंग से सामने आ सकता है।

सरसों की फसल पर तापमान में बदलाव का क्या असर होगा?

सरसों देश की प्रमुख तिलहनी फसल है। राजस्थान, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, मध्य प्रदेश और कई दूसरे राज्यों में इसकी बड़े स्तर पर खेती होती है। रबी के मौसम में सरसों की बुवाई आमतौर पर अक्टूबर और नवंबर के दौरान की जाती है। हालांकि उचित समय क्षेत्र और किस्म के अनुसार बदलता है। सरसों की शुरुआती वृद्धि के लिए अपेक्षाकृत ठंडा मौसम अनुकूल माना जाता है।

फूल आने और दाना बनने की अवस्थाओं में मौसम का विशेष महत्व होता है। यदि सर्दियों के दौरान तापमान असामान्य रूप से अधिक रहता है, तो फसल की वृद्धि और प्रजनन प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। पानी की कमी के साथ अधिक तापमान का प्रभाव कुछ क्षेत्रों में और गंभीर हो सकता है। लेकिन सरसों पर मौसम का असर केवल गर्मी तक सीमित नहीं है। कोहरा, पाला, अत्यधिक नमी और बेमौसम बारिश भी कुछ परिस्थितियों में नुकसान पहुंचा सकते हैं। यही कारण है कि सरसों की खेती में स्थानीय मौसम पूर्वानुमान के आधार पर निर्णय लेना ज्यादा उपयोगी होता है।

सही किस्म का चुनाव क्यों जरूरी?

सरसों की अलग-अलग किस्मों की परिपक्वता अवधि और अनुकूल परिस्थितियां अलग होती हैं।कुछ किस्में सिंचित क्षेत्रों के लिए उपयुक्त होती हैं, जबकि कुछ को सीमित पानी वाले इलाकों में उगाया जाता है।किसानों को केवल अधिक उत्पादन के विज्ञापन देखकर बीज नहीं खरीदना चाहिए।बीज का चुनाव करते समय स्थानीय कृषि विश्वविद्यालय, कृषि विज्ञान केंद्र और कृषि विभाग की अनुशंसा को प्राथमिकता देनी चाहिए।यदि बुवाई में देरी हो रही है, तो देर से बुवाई के लिए अनुशंसित किस्म की जानकारी लेना जरूरी है।

क्या इस बार सर्दियों में सामान्य से ज्यादा गर्मी पड़ेगी?

अल नीनो के मजबूत होने के साथ भारत में सर्दियों के तापमान को लेकर सवाल उठ रहे हैं।कुछ मौसमी विश्लेषणों में वर्ष 2026-27 के दौरान सामान्य से अधिक गर्म परिस्थितियों की आशंका जताई गई है।लेकिन अभी यह कहना सही नहीं होगा कि पूरे उत्तर भारत में सर्दी कमजोर ही रहेगी या फरवरी 2027 में निश्चित रूप से असामान्य गर्मी पड़ेगी।क्योंकि सर्दियों के मौसम को प्रभावित करने वाली अनेक प्रणालियां हैं।पश्चिमी विक्षोभ उत्तर भारत में बारिश और पहाड़ी क्षेत्रों में बर्फबारी ला सकते हैं। इनके प्रभाव से तापमान में अस्थायी गिरावट भी आ सकती है।इसके अलावा स्थानीय हवाएं, बादल, कोहरा और अन्य मौसम संबंधी परिस्थितियां भी तापमान को प्रभावित करती हैं। इसलिए किसानों को किसी एक वैश्विक संकेत के आधार पर पूरे सीजन का निर्णय लेने के बजाय नियमित स्थानीय पूर्वानुमानों का इस्तेमाल करना चाहिए।

पश्चिमी विक्षोभ की भूमिका हो सकती है महत्वपूर्ण

उत्तर भारत में रबी की फसलों के लिए सर्दियों के दौरान होने वाली बारिश कई बार उपयोगी साबित होती है।विशेष रूप से असिंचित या सीमित सिंचाई वाले क्षेत्रों में पश्चिमी विक्षोभ से होने वाली हल्की से मध्यम बारिश मिट्टी की नमी बढ़ाने में मदद कर सकती है।लेकिन इसके समय और तीव्रता का महत्व भी है।फसल की जरूरत के अनुसार बारिश होने पर लाभ मिल सकता है, जबकि तेज बारिश या ओलावृष्टि कुछ अवस्थाओं में नुकसान पहुंचा सकती है।इसलिए पश्चिमी विक्षोभ को हमेशा लाभदायक या हमेशा नुकसानदायक मानना सही नहीं होगा।आने वाले महीनों में इन प्रणालियों की सक्रियता रबी फसलों के लिए महत्वपूर्ण रहेगी।अल नीनो की स्थिति के बावजूद भारत के विभिन्न क्षेत्रों में मौसम का वास्तविक स्वरूप अलग हो सकता है।

महाराष्ट्र में रबी की खेती के लिए बढ़ी चिंता

महाराष्ट्र के कई कृषि क्षेत्रों में वर्षा आधारित खेती का महत्वपूर्ण स्थान है।राज्य के कुछ हिस्सों में कमजोर मानसून के कारण जल उपलब्धता को लेकर चिंता बढ़ी है।यदि खेतों में पर्याप्त नमी नहीं है, तो चना, गेहूं और अन्य रबी फसलों की बुवाई की योजना प्रभावित हो सकती है। विशेष रूप से उन किसानों के सामने समस्या अधिक हो सकती है जो सीमित सिंचाई सुविधा पर निर्भर हैं। कृषि क्षेत्र में पानी की जरूरत केवल बुवाई तक सीमित नहीं रहती। फसल बढ़ने के साथ अलग-अलग चरणों में पानी की आवश्यकता पड़ती है। ऐसे में किसानों को उपलब्ध पानी का आकलन करके फसल का चुनाव करना होगा। जहां सिंचाई के साधन कम हैं, वहां स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप फसल और किस्म चुनने से जोखिम कम किया जा सकता है। फसल क्षेत्र बढ़ाने के बजाय उपलब्ध संसाधनों के अनुसार खेती की योजना बनाना कुछ किसानों के लिए ज्यादा उपयोगी हो सकता है।

मध्य प्रदेश में गेहूं और चने की खेती पर नजर

मध्य प्रदेश देश के प्रमुख गेहूं और चना उत्पादक राज्यों में शामिल है।यहां रबी की खेती में सिंचित और असिंचित दोनों प्रकार के क्षेत्र महत्वपूर्ण हैं। जिन किसानों के पास पर्याप्त सिंचाई सुविधा है, वे मौसम की कुछ चुनौतियों का बेहतर प्रबंधन कर सकते हैं। इसके विपरीत वर्षा आधारित खेती वाले क्षेत्रों में मिट्टी की नमी का स्तर काफी अहम होगा। यदि अक्टूबर और नवंबर में खेतों में नमी पर्याप्त नहीं रहती, तो बुवाई की तैयारी प्रभावित हो सकती है। इसके अलावा फरवरी और मार्च का तापमान फसलों के अंतिम विकास चरण के लिए महत्वपूर्ण रहेगा। मध्य प्रदेश के किसानों को अपने जिले की कृषि मौसम सलाह, मिट्टी की स्थिति और पानी की उपलब्धता को ध्यान में रखकर बुवाई का फैसला करना चाहिए।

राजस्थान में सरसों और चने के लिए क्या संकेत?

राजस्थान के कृषि क्षेत्र में सरसों और चने का विशेष महत्व है। राज्य के बड़े हिस्से में वर्षा का वितरण असमान रहता है और पानी की उपलब्धता क्षेत्र के अनुसार काफी बदलती है। ऐसे में रबी की खेती से पहले खेत की नमी और सिंचाई के साधनों का आकलन जरूरी है। सरसों के किसानों को बुवाई की सही अवधि, बीज की किस्म और मिट्टी की स्थिति पर ध्यान देना होगा। वहीं चने की खेती करने वाले किसानों को सीमित नमी की परिस्थितियों के लिए उपयुक्त कृषि तकनीकों की जानकारी लेनी चाहिए। यदि आगे चलकर सर्दियों में तापमान अधिक रहता है, तो फसलों की बढ़वार पर असर पड़ने की आशंका हो सकती है। हालांकि राजस्थान के सभी जिलों में जोखिम एक जैसा नहीं होगा।

पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में क्या स्थिति रह सकती है?

पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश देश के प्रमुख गेहूं उत्पादक क्षेत्र हैं।इन क्षेत्रों में सिंचाई का मजबूत ढांचा कई किसानों के लिए सहायक हो सकता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि मौसम का कोई खतरा नहीं होगा।गेहूं की फसल पर तापमान का असर सिंचाई की पर्याप्त उपलब्धता के बावजूद पड़ सकता है। दाना भरने की अवस्था में अधिक गर्मी रहने से उत्पादन प्रभावित होने का जोखिम रहता है। इसके अलावा भूजल स्तर, सिंचाई की लागत और बिजली की उपलब्धता भी खेती की आर्थिक स्थिति पर असर डालती है। पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के कुछ इलाकों में जलभराव, मिट्टी की नमी तथा स्थानीय सिंचाई परिस्थितियां अलग प्रकार की चुनौतियां पैदा कर सकती हैं।इन क्षेत्रों के लिए अलग-अलग कृषि मौसम सलाह का पालन करना जरूरी होगा।

पानी की कमी बनी तो रबी की बुवाई का क्षेत्र भी हो सकता है प्रभावित

रबी की खेती में पानी की उपलब्धता सबसे बड़ा निर्णायक कारक बन सकती है। कमजोर मानसून के बाद कुछ इलाकों में जलस्रोतों का पुनर्भरण अपेक्षित स्तर तक नहीं हुआ है। ऐसी स्थिति में किसानों को यह तय करना पड़ सकता है कि उपलब्ध पानी से कितनी भूमि पर सफलतापूर्वक फसल उगाई जा सकती है। यदि किसान पानी की वास्तविक उपलब्धता से अधिक क्षेत्र में बुवाई कर देते हैं, तो आगे चलकर सिंचाई की कमी का सामना करना पड़ सकता है। इसलिए फसल का चुनाव केवल बाजार भाव देखकर नहीं करना चाहिए। मिट्टी की प्रकृति, सिंचाई का स्रोत, फसल की अवधि और मौसम की संभावित परिस्थितियों को भी ध्यान में रखना चाहिए। हालांकि पूरे देश में रबी की बुवाई का क्षेत्र घटेगा या नहीं, यह अभी निश्चित नहीं है। वास्तविक स्थिति आगामी बुवाई आंकड़ों और जल उपलब्धता के आधार पर स्पष्ट होगी।

किसानों के सामने बढ़ सकती है खेती की लागत

मौसम की अनिश्चितता का असर केवल पैदावार पर नहीं, बल्कि खेती के खर्च पर भी पड़ सकता है। यदि बुवाई के समय खेत में पर्याप्त नमी नहीं है, तो अतिरिक्त सिंचाई की जरूरत पड़ सकती है।जहां डीजल पंपों से पानी निकाला जाता है, वहां सिंचाई का खर्च बढ़ सकता है। कुछ क्षेत्रों में पानी दूर से लाने या सीमित स्रोतों का उपयोग करने की समस्या भी सामने आ सकती है।

इसके अलावा यदि मौसम के कारण बुवाई में देरी होती है, तो किसानों को कृषि कार्यों की योजना बदलनी पड़ सकती है। हालांकि हर किसान की लागत समान रूप से नहीं बढ़ेगी। जिनके पास पर्याप्त नहर सिंचाई या अन्य भरोसेमंद जलस्रोत हैं, उनकी स्थिति अलग हो सकती है। कृषि लागत पर वास्तविक असर स्थानीय पानी की उपलब्धता, ऊर्जा की कीमतों और मौसम की परिस्थितियों से तय होगा।

गेहूं, चना और सरसों की कीमतों पर क्या असर पड़ सकता है?

मौसम की अनिश्चितता बढ़ने पर कृषि बाजार में भी भविष्य के उत्पादन को लेकर चर्चा तेज हो जाती है। गेहूं देश की खाद्य सुरक्षा से जुड़ी प्रमुख फसल है, जबकि चना दलहन और सरसों खाद्य तेल के उत्पादन के लिहाज से महत्वपूर्ण हैं। यदि किसी प्रमुख उत्पादक क्षेत्र में मौसम के कारण पैदावार प्रभावित होती है, तो उसका असर बाजार की आपूर्ति पर पड़ सकता है। लेकिन केवल अल नीनो की वजह से फसलों के दाम बढ़ने का निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा। कीमतों पर कुल उत्पादन, सरकारी खरीद, उपलब्ध भंडार, आयात-निर्यात नीति और बाजार की मांग जैसे कई कारकों का प्रभाव पड़ता है। अभी रबी 2026-27 की फसल का वास्तविक उत्पादन सामने नहीं आया है। इसलिए भविष्य में गेहूं, चना या सरसों के दाम कितने बढ़ेंगे, इसका निश्चित अनुमान लगाना संभव नहीं है।किसानों को बाजार की अफवाहों के बजाय आधिकारिक उत्पादन अनुमान और स्थानीय मंडी भाव पर ध्यान देना चाहिए।

किसानों को अभी से कौन-सी तैयारी करनी चाहिए?

बदलते मौसम के बीच खेती की तैयारी पहले से करना उपयोगी हो सकता है। सबसे जरूरी है कि किसान अपने खेत और संसाधनों की वास्तविक स्थिति समझें। बुवाई से पहले मिट्टी में नमी की जांच करना महत्वपूर्ण है। केवल ऊपरी मिट्टी देखकर पूरे खेत में उपलब्ध नमी का अनुमान नहीं लगाना चाहिए। मिट्टी परीक्षण के आधार पर उर्वरकों का इस्तेमाल करने से पोषक तत्वों का बेहतर प्रबंधन संभव है। किसानों को ऐसी फसल और किस्म का चुनाव करना चाहिए जो उनके क्षेत्र की जलवायु तथा उपलब्ध सिंचाई सुविधा के अनुकूल हो।जहां पानी सीमित है, वहां सिंचाई की योजना बनाना विशेष रूप से जरूरी है। खेत में पानी के अनावश्यक नुकसान को कम करने के उपाय भी अपनाए जा सकते हैं। फसल अवशेषों का उचित प्रबंधन, मिट्टी की संरचना बनाए रखना और जरूरत के अनुसार जल संरक्षण तकनीकों का इस्तेमाल कुछ परिस्थितियों में लाभदायक हो सकता है। हालांकि प्रत्येक तकनीक हर खेत के लिए उपयुक्त नहीं होती। इसलिए स्थानीय कृषि विशेषज्ञों की सलाह लेना बेहतर रहेगा।

बदलते मौसम में समय पर बुवाई की अहमियत बढ़ी

रबी की खेती में बुवाई का समय उत्पादन को प्रभावित करने वाला महत्वपूर्ण कारक है।सही समय पर बोई गई फसल को स्थानीय मौसम की सामान्य परिस्थितियों का बेहतर लाभ मिल सकता है।देर से बुवाई होने पर कुछ फसलों का संवेदनशील विकास चरण अपेक्षाकृत अधिक तापमान के समय पहुंच सकता है।इसलिए किसान खरीफ की फसल कटने के बाद खेत की तैयारी में अनावश्यक देरी से बचें।लेकिन जल्दबाजी में सूखी मिट्टी में बुवाई करना भी उचित नहीं होगा।सही निर्णय के लिए खेत की नमी, तापमान, बीज की किस्म और स्थानीय कृषि सलाह को साथ में देखना जरूरी है। गेहूं, चना और सरसों की बुवाई की उपयुक्त अवधि अलग-अलग होती है। एक ही समय-सारणी पूरे भारत में लागू नहीं की जा सकती।

कम पानी में खेती के लिए क्या विकल्प हैं?

जिन क्षेत्रों में पानी की कमी की आशंका है, वहां फसल चयन और जल प्रबंधन का महत्व बढ़ जाता है।कुछ किसान स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार कम अवधि वाली या सीमित नमी के अनुकूल अनुशंसित किस्मों पर विचार कर सकते हैं।लेकिन कम अवधि वाली किस्म का अर्थ हमेशा कम पानी की जरूरत नहीं होता। वास्तविक जरूरत फसल और किस्म पर निर्भर करती है।खेत की मिट्टी में नमी सुरक्षित रखने के लिए उपयुक्त जुताई, अवशेष प्रबंधन और जल संरक्षण उपायों का उपयोग किया जा सकता है।सिंचाई उपलब्ध होने पर पानी का इस्तेमाल फसल की आवश्यकता के अनुसार करना चाहिए।बिना जरूरत अत्यधिक सिंचाई करना भी लाभदायक नहीं है।इससे पानी और ऊर्जा दोनों का अनावश्यक खर्च हो सकता है।

किसानों को स्थानीय कृषि विज्ञान केंद्र से अपने क्षेत्र के लिए उपयुक्त जल प्रबंधन तकनीकों की जानकारी लेनी चाहिए।

मौसम की जानकारी अब खेती की जरूरत बन गई है

पहले कई किसान मौसम का अनुमान लंबे अनुभव के आधार पर लगाते थे।आज जलवायु की अनिश्चितता के कारण नियमित मौसम सूचना का महत्व और बढ़ गया है।भारत मौसम विज्ञान विभाग किसानों के लिए कृषि मौसम संबंधी सलाह जारी करता है।इन सूचनाओं में बारिश, तापमान, तेज हवा और अन्य मौसम परिस्थितियों को ध्यान में रखकर कृषि कार्यों के बारे में मार्गदर्शन दिया जाता है।किसान अपने जिले की कृषि मौसम सलाह के आधार पर बुवाई, सिंचाई और दूसरे कृषि कार्यों की योजना बना सकते हैं।इसके अलावा कृषि विज्ञान केंद्र और राज्य कृषि विभाग भी उपयोगी जानकारी उपलब्ध कराते हैं।यह ध्यान रखना जरूरी है कि लंबी अवधि का मौसमी पूर्वानुमान संभावनाओं पर आधारित होता है।जैसे-जैसे फसल का मौसम आगे बढ़ता है, नए पूर्वानुमानों के आधार पर खेती की रणनीति में बदलाव करना पड़ सकता है।

सरकार और कृषि विभाग के सामने भी चुनौती

यदि रबी सीजन में मौसम की अनिश्चितता बनी रहती है, तो किसानों तक समय पर जानकारी पहुंचाना महत्वपूर्ण होगा।विशेष रूप से वर्षा आधारित खेती वाले क्षेत्रों में जल उपलब्धता और बुवाई की परिस्थितियों की निगरानी जरूरी हो सकती है।कृषि विभागों के लिए जिला स्तर पर मौसम और खेती की स्थिति का आकलन उपयोगी रहेगा।किसानों को क्षेत्र के अनुकूल बीज, मिट्टी प्रबंधन तथा सिंचाई के बारे में विश्वसनीय जानकारी उपलब्ध कराना भी महत्वपूर्ण है।इसके अलावा किसानों को फसल बीमा योजना की पात्रता, अधिसूचित फसलों और संबंधित नियमों की जानकारी समय रहते प्राप्त करनी चाहिए।किसी भी योजना का लाभ उसकी निर्धारित शर्तों और समयसीमा के अनुसार मिलता है।

प्राकृतिक जोखिम को पूरी तरह समाप्त नहीं किया जा सकता, लेकिन बेहतर तैयारी से नुकसान की संभावना और उसके प्रभाव को सीमित करने में मदद मिल सकती है।

क्या अल नीनो से देश में खाद्यान्न संकट पैदा हो सकता है?

मजबूत अल नीनो के पूर्वानुमान के बाद खाद्यान्न उत्पादन को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।लेकिन वर्तमान स्थिति को सीधे राष्ट्रीय खाद्यान्न संकट से जोड़ना उचित नहीं होगा। रबी का उत्पादन अभी कई महीनों की मौसम परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।

फसलों की बुवाई का क्षेत्र, सिंचाई की स्थिति, सर्दियों का तापमान, पश्चिमी विक्षोभ और किसानों द्वारा अपनाए गए प्रबंधन उपाय महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।भारत में अलग-अलग कृषि जलवायु वाले क्षेत्र हैं।इसलिए एक क्षेत्र में प्रतिकूल मौसम का प्रभाव दूसरे क्षेत्र जैसा होना जरूरी नहीं है।किसी राज्य में पानी की कमी परेशानी पैदा कर सकती है, जबकि दूसरे क्षेत्र में पर्याप्त सिंचाई और अनुकूल तापमान अच्छी पैदावार में मदद कर सकते हैं।राष्ट्रीय स्तर पर वास्तविक उत्पादन की स्थिति कृषि मंत्रालय के बुवाई और फसल उत्पादन संबंधी आंकड़ों से ही स्पष्ट होगी।फिलहाल इसे गंभीर कृषि जोखिम के रूप में देखना उचित है, निश्चित उत्पादन संकट के रूप में नहीं।

नवंबर से मार्च तक इन परिस्थितियों पर रहेगी नजर

आने वाले महीनों में रबी की खेती का भविष्य समझने के लिए कई मौसम संबंधी संकेत महत्वपूर्ण होंगे।अक्टूबर और नवंबर में मिट्टी की नमी तथा बुवाई की परिस्थितियां प्रमुख रहेंगी।दिसंबर और जनवरी में फसलों की बढ़वार के दौरान तापमान और सिंचाई की उपलब्धता महत्वपूर्ण होगी।फरवरी में कई क्षेत्रों में गेहूं और दूसरी रबी फसलों की संवेदनशील अवस्थाएं शुरू हो सकती हैं।

मार्च के दौरान कुछ गेहूं उत्पादक क्षेत्रों में दाना भरने और पकने के समय तापमान की भूमिका और बढ़ जाती है।इसी तरह चना और सरसों की फसल पर भी उनके विकास चरणों के अनुसार मौसम का असर होगा। यदि मौसम अनुकूल रहता है और किसानों को पर्याप्त पानी मिलता है, तो मजबूत अल नीनो के बावजूद कई क्षेत्रों में संतोषजनक उत्पादन संभव है।

लेकिन यदि पानी की कमी और असामान्य गर्मी एक साथ सामने आती हैं, तो जोखिम बढ़ सकता है।

क्या किसानों को रबी की खेती कम कर देनी चाहिए?

इस सवाल का जवाब पूरे देश के लिए एक जैसा नहीं हो सकता।केवल अल नीनो का पूर्वानुमान देखकर खेती छोड़ देना या बुवाई का क्षेत्र घटा देना जरूरी नहीं है। जिन किसानों के पास पर्याप्त सिंचाई और अनुकूल कृषि परिस्थितियां हैं, वे स्थानीय सलाह के अनुसार सामान्य खेती की योजना बना सकते हैं। दूसरी ओर जिन क्षेत्रों में जल उपलब्धता बहुत सीमित है, वहां उपलब्ध संसाधनों का सावधानीपूर्वक आकलन करना चाहिए। कुछ परिस्थितियों में फसल बदलना, उपयुक्त किस्म चुनना या सीमित क्षेत्र में खेती करना व्यावहारिक विकल्प हो सकता है। लेकिन ऐसा निर्णय स्थानीय खेत की स्थिति और कृषि विशेषज्ञों की सलाह के आधार पर ही लेना चाहिए। अल नीनो एक व्यापक जलवायु संकेत है, किसी एक खेत की पैदावार का निश्चित भविष्य नहीं।

रबी सीजन की असली परीक्षा अभी बाकी

वर्ष 2026 का कमजोर मानसून और लगातार मजबूत होता अल नीनो भारतीय कृषि के लिए महत्वपूर्ण चुनौती बनकर सामने आया है।खरीफ की फसलों के बाद अब गेहूं, चना और सरसों की खेती को लेकर किसानों की चिंता बढ़ना स्वाभाविक है।कम बारिश के कारण कुछ क्षेत्रों में मिट्टी की नमी और सिंचाई के पानी की कमी पहले से एक समस्या बनी हुई है।दूसरी तरफ अल नीनो के मजबूत रहने से आगामी सर्दियों के मौसम को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है।हालांकि यह याद रखना जरूरी है कि अल नीनो का मतलब हर जगह सूखा, अधिक गर्मी या फसल खराब होना नहीं है। रबी 2026-27 का वास्तविक प्रदर्शन आने वाले महीनों के स्थानीय मौसम और खेती की परिस्थितियों से तय होगा।

इस समय किसानों के लिए सबसे उपयोगी कदम है कि वे मिट्टी में नमी का आकलन करें, सिंचाई की योजना बनाएं, स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप फसल की किस्म चुनें और नियमित मौसम पूर्वानुमान देखते रहें।

फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि अल नीनो कितना मजबूत होगा, बल्कि यह है कि आने वाले महीनों में किसानों को कितनी नमी, कितना पानी और कितना अनुकूल मौसम मिल पाएगा। यही तीन बातें गेहूं, चना और सरसों के उत्पादन की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी।

Exit mobile version