मूँग की फसल में जिंक का महत्व एवं प्रबंधन

Published on: December 18, 2020 (04:07 IST) , by: उम्मेद सिंह

मूँग एक दलहनी फसल है जो भारत के शुष्क और अर्ध शुष्क क्षेत्रों में सबसे महत्वपूर्ण और बड़े पैमाने पर खेती की जाने वाली दलहनी फसलों में से एक है। यह एक स्वपरागित वार्षिक फसल है जो अपनी छोटी वृद्धि अवधि ज्यादा दाना उत्पादन और चारे के रूप में उत्कृष्ट पोषक मूल्य के आधार पर दलहनी फसलों में प्रमुख स्थान रखती है। पोषक तत्वों की भरपूर मात्रा होने के साथ-साथ शाकाहारी लोगों की प्रोटीन की आवश्यकता को पूर्ति करने में पूर्ण रूप से सक्षम है।

मूँग क्षेत्रफल उत्पादन एवं उत्पादकता:

पिछले दशक से मूँग का क्षेत्रफल गैर परंपरागत हिस्सों में बढ़ने के कारण वर्तमान में इसकी खेती लगभग 4.25 मिलियन हेक्टर में हो रही है, साथ ही मूँग का उत्पादन 2.41 मिलियन टन एवं उत्पादकता 567 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर है। मूँग उत्पादन के प्रमुख राज्यों में राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, उड़ीसा, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु और बिहार है।

मूँग में पोषक तत्व:

गेहूं एवं चावल जैसी अनाज वाली फसलों की तुलना में मूँग के दानों में जिंक एवं लौह सूक्ष्म तत्वों की   मात्रा अत्यधिक होती है, साथ ही मूँग अन्य पौषक तत्वों की मात्रा भी प्रयाप्त होती है।

मूँग का मृदा उर्वरकता में महत्व :

मूँग को खरीफ रबी और जायद में दलहन फसलों के रूप में उगाया जाता है। मूँग प्रोटीन का अच्छा स्रोत है और मनुष्य के स्वास्थ्य के साथ-साथ मृदा को भी बेहतर बनाती है मूँग की फलियां तोड़ने के बाद फसल के शेष भाग की खेत में जुताई करके मिला देने से आमदनी के साथ-साथ मृदा उपजाऊ क्षमता में वृद्धि होती हैं मूँग की फसल की जड़ों मेंग्रंथियां पाई जाती है जिनमें राइजोबियम नामक जीवाणु वायुमंडल में उपस्थित नाइट्रोजन का स्थिरीकरण करके इसे पौधों को उपलब्ध कराते हैं और इसका लाभ अगली फसल को मिलता है जिससे मृदा की उर्वरा शक्ति बनी रहती है।

ज़िंक का मानव स्वास्थ्य में महत्व :

दुनिया भर में एक तिहाई जनसंख्या जिंक पोषक तत्वों की कमी के दायरे में आती है, जबकि एशिया में 28 प्रतिशत जनसंख्या जिंक की कमी के दायरे में आती है। जिंक की कमी के चलते शरीर की प्रतिरोधक क्षमता में कम होना, दृष्टि कम होना, त्वचा कमजोर होना, शारीरिक विकास में कमी, कमजोर पाचन शक्ति, भोजन के लिए अरुचि पैदा होती है। छोटे बच्चों में दस्त लगना, मलेरिया होना तथा बच्चों का लंबाई की तुलना में वजन में वृद्धि आदि जैसी विकृतियां पैदा होती हैं। इन सभी बीमारियों एवं शारीरिक रोगों से बचने हेतु जिंक का मानव शरीर में बहुत अधिक महत्व है। जिंक की कमी से प्रतिरक्षा तंत्र भी मंद पड़ जाता है।

जिंक प्रबंधन के तरीक़े :

मूँग की फसल में जिंक की कमी की पूर्ति निम्नांकित विधियों एवं तरीकों द्वारा की जा सकती हैं। ये विधियां इस प्रकार है

  1. मृदा में प्रयोग

फसल की बुवाई के समय मृदा में 25 किलोग्राम जिंक सल्फेट प्रति हैक्टेयर की दर से मिट्टी में मिलाने की अनुशंसा की जाती हैं, जिसका असर 3 वर्ष तक रहता हैं। इसी प्रकार मूँग की फसल में जिंक ऑक्साइड 5 किग्रा प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करने पर उपज में 10-12 प्रतिशत एवं दानों में जिंक अवयव में 9-14 प्रतिशत वृद्धि आंकी गई हैं।

निम्न बिन्दूओं के आधार पर जिंक का अच्छे से प्रबंधन किया जा सकता हैं-

  • जिंक की सही दर प्रयोग करना
  • जिंक का सही समय पर प्रयोग करना
  • जिंक का स्रोत सही चुनना
  • जिंक का सही स्थापना

इसके अतिरिक्त जैविक खाद जैसे कंपोस्ट या गोबर की सड़ी खाद को जिंक सल्फेट के साथ मिलाकर मिट्टी में डालने से जिंक की कार्य क्षमता बढ़ जाती है।

  1. पर्णीय छिड़काव

इस विधि में जिंक की कमी वाली फसलों में जल्दी सुधार करने हेतु और जिंक की पूर्ति करने हेतु 5 ग्राम जिंक सल्फेट एवं 2.5 ग्राम बुझा हुआ चुना प्रति लीटर पानी के हिसाब से घोल बनाकर खड़ी फसल पर 10 से 15 दिनों के अंतराल पर दो से तीन छिड़काव कर देने से जिंक की कमी के लक्षण दूर हो जाते हैं। फसलों में 12-16 प्रतिशत की वृद्धि होती है।

  1. सीड प्राईमिंग

सीड प्राईमिंग एक नियंत्रित जलयोजन तकनीक हैं। इसमें मूँग के बीजों को जिंक युक्त घोल में भिगोकर एक निश्चित समय तक रखा जाता है, जिससे जिंक बीज में अन्तः शोषण के रूप में प्रवेश कर जाता है। इस विधि में बीज अंकुरण की उपापचयी क्रिया तो शुरू हो जाती है परंतु मूल नहीं निकलने से पहले तक घोल में रखते हैं। इस विधि में मूँग को जिंक की उपलब्धता जल्दी होती हैं और जिंक का नुकसान कम होता है। मूँग के बीजों को 0.05 प्रतिशत जिंक सल्फेट के घोल में 6 घंटे तक रखने पर 21 प्रतिशत तक ज़िंक अवयव की वृद्धि होती है।

  1. बीज कोटिंग

इस विधि में जिंक पोषक तत्व की मूँग बीज के बाहरी हिस्से पर सूक्ष्म पर विकसित की जाती है जो मूँग के बीज और उनको पूरी तरह ढक लेता है जिनक पोषक तत्व और चिपकने वाले पदार्थ से बीज के ऊपर एक परत बन जाती है जो बीज को अंकुरण के तुरंत बाद जी की पर्याप्त मात्रा उपलब्ध करवाता है और यह जिंक की कमी पौधों में शुरुआती अवस्था में नहीं होने देता।

दोग्राम जिंक प्रति किलोग्राम की दर से बीजों पर कोटिंग करना अत्यंत लाभकारी रहता हैं। इससे मूँग की 6-18 प्रतिशत तक उपज में वृद्धि दर्ज की गईं हैं।

  1. नैनो जिंक उर्वरक

भारत में जिंक नाइट्रोजन, फॉस्फोरस ओर पोटैसियम के बाद में चौथा एकमात्र पोषक तत्व हैं जिसकी वजह से उपज प्रभावित होती है जिंक की कमी गंभीर रूप से फसल को प्रभावित करती है। मृदा में जिंक का उपयोग करने पर यह आसानी से मिलता संरचना से नीचे चला जाता है इसलिए मृदा में जिंक की उपयोग क्षमता बहुत कम होती है। अभी तक कृषि में पानी में घुलनशील जिंक सल्फेट का उपयोग किया जा रहा है, जो कि काफी महंगा है परंतु इसकी जगह पर एक अघुलनशील जिंक ऑक्साइड का उपयोग किया जा सकता है जोकि बहुत सस्ता है अभी-अभी यह ज्ञात हुआ है कि नैनो कणों को कोशिका झिल्ली के माध्यम से पेनिट्रेट करके ग्रहण करने की दक्षता को बढ़ाया जा सकता है। बीज अंकुरण प्रतिशत जांचने के लिए भी एक प्रयोग किया गया जिसमें नैनो जिंक ऑक्साइड काओलियोरेजिन के साथ लेपन किया गया जिसमें परिणाम स्वरुप यह देखा गया कि बिना लेपित बीज की 80 प्रतिशत की तुलना में लेपित बीजों का अंकुरण 90 से 98 प्रतिशत रहा। पाइनओलियो रेजिन के साथ जिंक ऑक्साइड को लेपित किया जाता है तो वह पोषक तत्व को धीरे धीरे स्त्रावित करता है, तथा उसके नुकसान होने से बचाता है, साथ ही ग्रहण करने की क्षमता बढ़ाता है। जिंक उर्वरक का उपयोग करके एन्ज़ाइम की क्रियाशीलता को बढ़ाया जा सकता है, जिससे प्रोटीन से एमिनो एसिड तथा स्टार्च एवंवसा में परिवर्तन होने की क्रिया में मदद मिलती है। आर्थिक तथा पर्यावरण दृष्टि से बीज लेपन तकनीक में पाइन ओलियो रेजिन का उपयोग किया जा सकता है।

मूँग की किस्में :

मानव शरीर में जिंक की कमी की पूर्ति अधिक जिंक युक्त मूँग की किस्मों की खेती   करके की जा सकती है क्योंकि  जिंक युक्त मूँगदाल का प्रयोग करने पर मानव शरीर में इसकी कमी की पूर्ति अत्यधिक होती है। साथ ही यह एक टिकाऊ तरीका भी है। अतः किसाओं को अधिक जिंक वाली या जिंक पौषक तत्व संवर्धित या जिंक पौष्टीकृत किस्मों का प्रयोग करना चाहिए।

 

उम्मेद सिंह, पुष्कर देव, दमा राम एवं चंद्रशेखर प्रहराज1
कृषि विश्वविद्यालय, जोधपुर–342 304, राजस्थान
1भा.कृ.अ.प.–भारतीय दलहन अनुसंधान संस्थान, कानपूर–208 024, उत्तर प्रदेश

Comments

Want your advertisement here?
Contact us!

Latest News