देश में उर्वरक कीमतों और बढ़ती सब्सिडी को लेकर वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बड़ी चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि वैश्विक स्तर पर उर्वरकों की कीमतें काफी ज्यादा बढ़ गई हैं और इसका सीधा असर भारत की खाद व्यवस्था पर पड़ रहा है। वित्त मंत्री के अनुसार, किसान को करीब 300 रुपये में मिलने वाली एक इकाई की आयात लागत लगभग 3,000 रुपये तक पहुंच सकती है। ऐसी स्थिति में सरकार करीब 2,700 रुपये का बोझ उठाती है, ताकि किसानों पर अंतरराष्ट्रीय कीमतों में हुई बढ़ोतरी का पूरा असर न पड़े।
वित्त मंत्री का यह बयान ऐसे समय में आया है जब देश में रबी सीजन की शुरुआत हो चुकी है और किसानों के लिए DAP, यूरिया तथा अन्य उर्वरकों की उपलब्धता महत्वपूर्ण बनी हुई है। वैश्विक बाजार में उर्वरकों और उनके कच्चे माल की कीमतों में बढ़ोतरी के कारण भारत के सामने खाद की लागत और सब्सिडी दोनों को संभालने की चुनौती बढ़ रही है।
वैश्विक कीमतों में तेजी से बढ़ा दबाव
भारत अपनी कृषि जरूरतों को पूरा करने के लिए घरेलू उत्पादन के साथ-साथ आयात पर भी निर्भर करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में उर्वरकों की कीमत बढ़ने का असर सीधे देश की आयात लागत पर पड़ता है।
वित्त मंत्री ने इसी अंतर को उदाहरण के जरिए समझाया। उनके अनुसार, जिस उर्वरक की एक इकाई किसान को करीब 300 रुपये में उपलब्ध होती है, उसकी आयात लागत करीब 3,000 रुपये तक पहुंच सकती है। यानी आयात लागत और किसान से ली जाने वाली कीमत के बीच बहुत बड़ा अंतर है।
इस अंतर को सरकार सब्सिडी के जरिए पूरा करती है। उदाहरण के तौर पर यदि लागत 3,000 रुपये और किसान से कीमत करीब 300 रुपये हो, तो करीब 2,700 रुपये का बोझ सरकार को उठाना पड़ सकता है।
यह व्यवस्था किसानों को अंतरराष्ट्रीय बाजार में होने वाले तेज उतार-चढ़ाव से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
किसानों पर महंगी खाद का पूरा असर नहीं
उर्वरकों की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में बढ़ोतरी का सबसे सीधा असर किसानों पर पड़ सकता है। यदि वैश्विक कीमत के अनुरूप घरेलू बाजार में उर्वरकों की कीमत बढ़ाई जाए तो किसानों की खेती की लागत काफी बढ़ सकती है।
कृषि में पहले से ही बीज, सिंचाई, मजदूरी, मशीनरी और अन्य इनपुट पर खर्च होता है। ऐसे में खाद की कीमत में तेज वृद्धि किसानों के लिए अतिरिक्त आर्थिक दबाव पैदा कर सकती है।
इसी वजह से सरकार उर्वरकों को किसानों के लिए अपेक्षाकृत कम कीमत पर उपलब्ध कराने के लिए सब्सिडी व्यवस्था का इस्तेमाल करती है। वित्त मंत्री के बयान से यह स्पष्ट होता है कि वैश्विक कीमतों और किसानों को मिलने वाली कीमत के बीच अंतर को सरकार बड़े स्तर पर वहन कर रही है।
सब्सिडी का बोझ लगातार महत्वपूर्ण मुद्दा
उर्वरक सब्सिडी सरकार के लिए एक बड़ा वित्तीय दायित्व है। अंतरराष्ट्रीय कीमतों में तेजी आने पर सब्सिडी की जरूरत बढ़ जाती है। खासकर ऐसे समय में जब आयातित उर्वरकों और उनके कच्चे माल की लागत बढ़ रही हो।
सरकार के सामने चुनौती यह है कि किसानों को खाद उचित कीमत पर मिलती रहे और साथ ही सब्सिडी खर्च को भी संभाला जाए।
यदि वैश्विक कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं तो सरकार के उर्वरक सब्सिडी बिल पर दबाव बढ़ सकता है। यही कारण है कि उर्वरक क्षेत्र में केवल उपलब्धता ही नहीं, बल्कि लागत और आयात निर्भरता भी महत्वपूर्ण मुद्दे बन गए हैं।
घरेलू उत्पादन बढ़ाने पर जोर
वित्त मंत्री ने बताया कि सरकार घरेलू स्तर पर यूरिया और फॉस्फेट उत्पादन बढ़ाने की कोशिश कर रही है। इसका उद्देश्य देश की आयात निर्भरता को कम करना और घरेलू उत्पादन क्षमता को मजबूत करना है।
घरेलू उत्पादन बढ़ने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में होने वाले उतार-चढ़ाव का असर कुछ हद तक कम किया जा सकता है। यदि देश में पर्याप्त मात्रा में उर्वरक उत्पादन होता है तो आयात पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है।
हालांकि, घरेलू उत्पादन बढ़ाने के लिए संयंत्रों की क्षमता, कच्चे माल की उपलब्धता और उत्पादन लागत जैसे कई पहलुओं पर काम करना जरूरी होता है।
यूरिया उत्पादन बढ़ाना क्यों जरूरी?
यूरिया देश में सबसे ज्यादा इस्तेमाल किए जाने वाले उर्वरकों में शामिल है। कृषि क्षेत्र में इसकी मांग लगातार बनी रहती है। इसलिए यूरिया की पर्याप्त घरेलू उपलब्धता खाद सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण है।
यदि देश में यूरिया का उत्पादन बढ़ता है तो आयात की जरूरत कम की जा सकती है। इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत बढ़ने की स्थिति में देश पर पड़ने वाला दबाव भी कम हो सकता है।
वित्त मंत्री के बयान में घरेलू यूरिया उत्पादन बढ़ाने पर जोर इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा है। सरकार की कोशिश है कि आने वाले समय में देश अपनी जरूरत के बड़े हिस्से को घरेलू उत्पादन के जरिए पूरा कर सके।
फॉस्फेट उत्पादन पर भी ध्यान
यूरिया के साथ फॉस्फेटिक उर्वरकों का घरेलू उत्पादन बढ़ाना भी महत्वपूर्ण है। DAP किसानों के बीच प्रमुख फॉस्फेटिक उर्वरक है और रबी सीजन में इसकी मांग विशेष रूप से महत्वपूर्ण रहती है।
फॉस्फेटिक उर्वरकों के मामले में कच्चे माल और वैश्विक आपूर्ति की स्थिति भारत की लागत को प्रभावित करती है। इसलिए घरेलू उत्पादन क्षमता और कच्चे माल की सुरक्षित उपलब्धता मजबूत करना लंबे समय में महत्वपूर्ण हो सकता है।
वित्त मंत्री का बयान ऐसे समय में आया है जब DAP समेत उर्वरकों की कीमतों को लेकर वैश्विक बाजार की स्थिति चिंता का विषय बनी हुई है।
मजबूत स्टॉक के बावजूद लागत की चुनौती
रबी सीजन की शुरुआत से पहले देश में उर्वरक स्टॉक की स्थिति पिछले साल की तुलना में बेहतर बताई जा रही है। इसका मतलब है कि उपलब्धता के मोर्चे पर शुरुआती स्थिति अपेक्षाकृत मजबूत है।
लेकिन खाद का पर्याप्त स्टॉक होना और खाद की लागत दो अलग-अलग मुद्दे हैं। गोदामों में पर्याप्त उर्वरक मौजूद होने के बावजूद यदि अंतरराष्ट्रीय कीमतें ऊंची हैं तो सरकार पर सब्सिडी का बोझ बढ़ सकता है।
इसलिए मौजूदा समय में भारत के सामने दोहरी चुनौती है। एक तरफ किसानों को समय पर पर्याप्त खाद उपलब्ध करानी है और दूसरी तरफ अंतरराष्ट्रीय कीमतों के कारण बढ़ती लागत को संभालना है।
किसानों के लिए सरकार का संरक्षण
वित्त मंत्री द्वारा दिए गए उदाहरण से यह समझा जा सकता है कि सरकार किसानों को अंतरराष्ट्रीय बाजार की महंगी कीमतों से बचाने के लिए कितना बड़ा वित्तीय बोझ उठा रही है।
यदि आयात लागत करीब 3,000 रुपये तक पहुंचती है और किसान को वही उर्वरक करीब 300 रुपये में मिलता है, तो दोनों कीमतों के बीच लगभग 2,700 रुपये का अंतर है। इस अंतर का बड़ा हिस्सा सरकार द्वारा वहन किया जाना किसानों के लिए महत्वपूर्ण सुरक्षा प्रदान करता है।
हालांकि, लंबे समय तक इतनी बड़ी लागत को सब्सिडी के माध्यम से संभालना सरकार के लिए आसान नहीं है। इसलिए घरेलू उत्पादन बढ़ाने की दिशा में प्रयास महत्वपूर्ण हो जाते हैं।
आत्मनिर्भरता पर बढ़ता जोर
उर्वरक क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को मजबूत करना भारत के लिए लंबे समय की रणनीतिक जरूरत बनती जा रही है। वैश्विक बाजार में कीमतों और आपूर्ति में बदलाव का असर कम करने के लिए घरेलू उत्पादन क्षमता बढ़ाना महत्वपूर्ण है।
यूरिया और फॉस्फेट उत्पादन बढ़ने से देश की आयात जरूरत कम हो सकती है। इससे किसानों को स्थिर कीमत पर खाद उपलब्ध कराने और सरकार पर सब्सिडी के दबाव को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है।
हालांकि, इस दिशा में परिणाम हासिल करने में समय लगेगा। तब तक भारत को घरेलू उत्पादन, आयात और सब्सिडी के बीच संतुलन बनाए रखना होगा।
रबी सीजन में उपलब्धता पर रहेगी नजर
रबी सीजन की शुरुआत के साथ किसानों की खाद की मांग बढ़ रही है। ऐसे में DAP और यूरिया की पर्याप्त उपलब्धता बनाए रखना सरकार और उर्वरक कंपनियों के लिए महत्वपूर्ण होगा।
वित्त मंत्री का बयान यह भी बताता है कि मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों में खाद की लागत कितनी तेजी से बढ़ सकती है। किसानों को राहत देने के लिए सरकार सब्सिडी के जरिए बड़ा वित्तीय बोझ उठा रही है, लेकिन लंबे समय में घरेलू उत्पादन क्षमता बढ़ाना ही इस दबाव को कम करने का स्थायी रास्ता हो सकता है।
कुल मिलाकर, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण का बयान भारत के उर्वरक क्षेत्र के सामने मौजूद चुनौती को स्पष्ट करता है। एक तरफ वैश्विक बाजार में खाद की कीमतें ऊंची हैं, दूसरी तरफ किसानों को कम कीमत पर उर्वरक उपलब्ध कराने की जरूरत है। सरकार दोनों के बीच के बड़े अंतर को सब्सिडी के जरिए भर रही है।
अब सरकार की कोशिश घरेलू यूरिया और फॉस्फेट उत्पादन बढ़ाकर आयात निर्भरता कम करने की है। यदि घरेलू उत्पादन क्षमता मजबूत होती है तो भविष्य में अंतरराष्ट्रीय कीमतों के उतार-चढ़ाव का असर कम किया जा सकता है और किसानों के लिए खाद की उपलब्धता तथा कीमत दोनों को स्थिर रखने में मदद मिल सकती है।
