मध्य प्रदेश में मछली पालन से खुलेंगे कमाई और निर्यात के नए रास्ते, 49 जलाशयों के विकास को ₹87.56 करोड़ की मंजूरी

Fisheries will open up new avenues for earning and export in Madhya Pradesh, with ₹87.56 crore approved for the development of 49 reservoirs.

Fisheries will open up new avenues for earning and export in Madhya Pradesh, with ₹87.56 crore approved for the development of 49 reservoirs.

Fisheries will open up new avenues for earning and export in Madhya Pradesh, with ₹87.56 crore approved for the development of 49 reservoirs.

मध्य प्रदेश में मछली पालन को आधुनिक व्यवसाय और ग्रामीण रोजगार के मजबूत माध्यम के रूप में विकसित करने की तैयारी तेज हो गई है। राज्य में उपलब्ध नदियों, जलाशयों, तालाबों और अन्य मीठे जल संसाधनों का बेहतर उपयोग करके मछली उत्पादन बढ़ाने, निजी निवेश आकर्षित करने और अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंच बनाने पर जोर दिया जा रहा है। इसी दिशा में भोपाल में मत्स्य निवेशक एवं निर्यातक सम्मेलन 2026 आयोजित किया गया, जिसमें केंद्र और राज्य सरकार के प्रतिनिधियों, निवेशकों, निर्यातकों, मत्स्य पालकों, उद्यमियों, सहकारी समितियों और वित्तीय संस्थानों ने भाग लिया।

सम्मेलन में मध्य प्रदेश मत्स्य निवेश एवं निर्यात दिशा-निर्देश, 2026 जारी किए गए। साथ ही, अंतर्देशीय राज्यों की निर्यात क्षमता बढ़ाने के लिए Standard Operating Procedure (SOP) भी सामने लाई गई। कार्यक्रम में एकीकृत केज कल्चर इकाइयों का वर्चुअल उद्घाटन किया गया और राज्य के 49 जलाशयों तथा पांच अमृत सरोवरों के विकास से संबंधित परियोजनाओं को प्रशासनिक मंजूरी सौंपी गई।

राज्य सरकार का लक्ष्य मत्स्य पालन को पारंपरिक आजीविका गतिविधि से आगे बढ़ाकर निवेश, प्रसंस्करण, पैकेजिंग, ब्रांडिंग और निर्यात से जुड़ा संगठित उद्योग बनाना है। सम्मेलन में यह भी रेखांकित किया गया कि मछली उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ मछुआरों और मत्स्य पालकों को बेहतर बाजार, उचित मूल्य और रोजगार के अवसर उपलब्ध कराना आवश्यक है।

49 जलाशयों और 5 अमृत सरोवरों के विकास पर बड़ा फोकस

सम्मेलन की प्रमुख घोषणाओं में प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY) के तहत मध्य प्रदेश के जलाशयों के एकीकृत विकास के लिए स्वीकृति शामिल रही। केंद्रीय मत्स्य पालन, पशुपालन एवं डेयरी तथा पंचायती राज मंत्री राजीव रंजन सिंह ने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को संबंधित प्रशासनिक स्वीकृति सौंपी।

प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, राज्य के 49 जलाशयों के विकास के लिए 8,755.60 लाख रुपये और पांच अमृत सरोवरों के विकास के लिए 69 लाख रुपये की स्वीकृत परियोजना लागत निर्धारित की गई है। इन दोनों मदों को मिलाकर कुल राशि 8,824.60 लाख रुपये यानी लगभग 88.25 करोड़ रुपये होती है।

इन परियोजनाओं का उद्देश्य जलाशयों की मत्स्य उत्पादन क्षमता का बेहतर उपयोग करना, मछलियों की उत्पादकता बढ़ाना और मत्स्य पालन से जुड़ी आधारभूत सुविधाओं को मजबूत करना है। इसके साथ ही स्थानीय मछुआरों और मत्स्य पालकों के लिए आजीविका तथा रोजगार के नए अवसर तैयार करने पर भी ध्यान दिया जाएगा।

जलाशयों का योजनाबद्ध विकास होने से मत्स्य उत्पादन को व्यवस्थित तरीके से बढ़ाने की संभावना बनती है। हालांकि, इसका वास्तविक लाभ जल स्रोतों की स्थिति, उपयुक्त मत्स्य प्रजातियों, तकनीकी प्रबंधन और बाजार से जुड़ी सुविधाओं पर भी निर्भर करेगा।

अगले दो से तीन वर्षों में 10-11 लाख टन उत्पादन का लक्ष्य

मध्य प्रदेश सरकार ने आने वाले वर्षों में मछली उत्पादन को तेजी से बढ़ाने का लक्ष्य रखा है। राज्य के मुख्य सचिव अशोक बर्णवाल ने सम्मेलन में बताया कि आधुनिक मत्स्य पालन तकनीकों को अपनाकर अगले दो से तीन वर्षों में उत्पादन को मौजूदा लगभग 4.5 लाख टन से बढ़ाकर 10 से 11 लाख टन तक पहुंचाने की योजना है।

उन्होंने कहा कि इस विस्तार से मत्स्य क्षेत्र में प्रतिवर्ष लगभग 5,000 करोड़ रुपये की अतिरिक्त आय सृजित होने का अनुमान है, जिससे कम से कम 50,000 लोगों को लाभ मिल सकता है। यह सरकार की ओर से बताया गया अनुमान है; वास्तविक परिणाम उत्पादन, निवेश, बाजार और परियोजनाओं के क्रियान्वयन पर निर्भर करेंगे।

राज्य में मत्स्य पालन के विस्तार के लिए उपलब्ध जल संसाधन महत्वपूर्ण आधार प्रदान करते हैं। मध्य प्रदेश में लगभग 4.50 लाख हेक्टेयर अंतर्देशीय जल क्षेत्र उपलब्ध है, जिसमें करीब 3.75 लाख हेक्टेयर जलाशय क्षेत्र शामिल है। यह क्षेत्र मछली पालन और Aquaculture के विकास के लिए व्यापक संभावनाएं प्रस्तुत करता है।

राज्य में रोहू, कतला, मृगल, तिलापिया, पंगासियस, कॉमन कार्प और ग्रास कार्प जैसी प्रमुख मछली प्रजातियों का उत्पादन किया जाता है। सरकार की योजना है कि उपलब्ध जल संसाधनों और आधुनिक तकनीकों के बेहतर इस्तेमाल से उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ मछली पालन को निवेश और पूर्णकालिक रोजगार के अवसरों से जोड़ा जाए।

भारत के कुल मछली उत्पादन में अंतर्देशीय मत्स्य पालन की बड़ी हिस्सेदारी

भारत का मत्स्य क्षेत्र खाद्य आपूर्ति, पोषण, रोजगार और निर्यात के लिहाज से महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। सम्मेलन में प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2024-25 में देश का कुल मछली उत्पादन 197.75 लाख मीट्रिक टन तक पहुंच गया था। इसमें अंतर्देशीय मत्स्य पालन का योगदान 151.60 लाख मीट्रिक टन रहा, जो कुल उत्पादन का लगभग तीन-चौथाई है।

ये आंकड़े बताते हैं कि देश के भीतर मौजूद नदियों, तालाबों, झीलों और जलाशयों का मछली उत्पादन में बड़ा योगदान है। इसके बावजूद अंतर्देशीय राज्यों की मत्स्य निर्यात में हिस्सेदारी सीमित बनी हुई है।

केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन सिंह ने बताया कि भारत लगभग 130 देशों को मछली का निर्यात करता है, लेकिन कुल मत्स्य निर्यात में अंतर्देशीय राज्यों की हिस्सेदारी केवल 2 प्रतिशत है। उन्होंने यह भी कहा कि इन राज्यों में मछली उत्पादन में 147 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।

इस अंतर को कम करने के लिए उत्पादन को बाजार की मांग, प्रसंस्करण, शीत भंडारण और निर्यात की आवश्यकताओं से जोड़ना जरूरी है। केवल अधिक मछली पैदा करना पर्याप्त नहीं होगा; उत्पाद की गुणवत्ता बनाए रखना, समय पर बाजार तक पहुंचाना और खरीदारों की जरूरतों के अनुरूप आपूर्ति करना भी महत्वपूर्ण होगा।

मध्य प्रदेश मत्स्य निवेश एवं निर्यात दिशा-निर्देश 2026 जारी

सम्मेलन में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन सिंह ने मध्य प्रदेश मत्स्य निवेश एवं निर्यात दिशा-निर्देश, 2026 जारी किए। इनका उद्देश्य मत्स्य क्षेत्र में निजी निवेश और उद्यमिता को प्रोत्साहित करना है।

दिशा-निर्देशों में मत्स्य बीज उत्पादन केंद्रों, मछली बीज और आहार, जलाशय मत्स्य पालन, Cage Culture, जलीय जीव स्वास्थ्य, प्रसंस्करण, कोल्ड स्टोरेज, परिवहन, लॉजिस्टिक्स, मूल्य संवर्धन और बाजार विकास जैसे क्षेत्रों में निवेश को बढ़ावा देने पर ध्यान दिया गया है।

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि राज्य में मत्स्य पालन के क्षेत्र में निवेश, उद्यमिता, औद्योगिक विकास और निर्यात की व्यापक संभावनाएं हैं। उन्होंने निवेशकों, निर्यातकों, उद्यमियों और स्टार्टअप की बढ़ती भागीदारी को उत्साहजनक बताया।

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि जल संसाधनों का बेहतर प्रबंधन मत्स्य पालन के विकास के लिए जरूरी है। मुख्यमंत्री के अनुसार, पिछले ढाई वर्षों में राज्य की सिंचाई क्षमता बढ़कर 60 लाख हेक्टेयर हो गई है और सरकार के कार्यकाल के अंत तक इसे 100 लाख हेक्टेयर तक पहुंचाने का लक्ष्य है। उन्होंने केन-बेतवा तथा पार्वती-कालीसिंध-चंबल नदी जोड़ो परियोजनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि जल उपलब्धता बढ़ने और पारंपरिक जल निकायों के संरक्षण से मत्स्य पालन के अवसरों को भी बढ़ावा मिल सकता है।

केज कल्चर से जलाशयों में आधुनिक मछली पालन

सम्मेलन में एकीकृत Cage Culture इकाइयों का वर्चुअल उद्घाटन भी किया गया। केज कल्चर मछली पालन की ऐसी तकनीक है, जिसमें प्राकृतिक जल स्रोतों के भीतर जाल से बने विशेष ढांचों में मछलियों को पाला जाता है। इसका उपयोग उपयुक्त नदियों, झीलों और जलाशयों में किया जा सकता है।

इस पद्धति में मछलियों को निर्धारित क्षेत्र में रखकर उनके आहार, वृद्धि और उत्पादन का प्रबंधन किया जाता है। उपयुक्त जल गुणवत्ता, पर्याप्त ऑक्सीजन, सही प्रजाति का चयन और नियमित निगरानी इसके सफल संचालन के लिए महत्वपूर्ण हैं।

केंद्रीय राज्य मंत्री प्रो. एस. पी. सिंह बघेल ने मध्य प्रदेश के बड़े जलाशयों में केज कल्चर की संभावनाओं पर जोर दिया। उन्होंने इंदिरा सागर जलाशय का उल्लेख करते हुए वहां बड़े पैमाने पर केज विकसित करने की संभावना बताई और एक लाख केज विकसित करने के विचार को देश के लिए एक उदाहरण बनने की संभावना से जोड़ा।

राज्य में हलाली जलाशय पर 316 केज स्थापित किए जाने की जानकारी भी दी गई। इस जलाशय को जलाशय मत्स्य पालन क्लस्टर के रूप में अधिसूचित किया गया है।

केज कल्चर के साथ पेन कल्चर जैसी वैज्ञानिक तकनीकों का भी उल्लेख किया गया। इन तकनीकों के माध्यम से बड़े जल निकायों की उत्पादन क्षमता का बेहतर इस्तेमाल किया जा सकता है। हालांकि, विस्तार के दौरान पर्यावरणीय संतुलन, पानी की गुणवत्ता और स्थानीय समुदायों के हितों का ध्यान रखना भी आवश्यक होगा।

मछली पालन को Food Processing Industry से जोड़ेगी सरकार

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने सम्मेलन में तीन प्रमुख पहलों की घोषणा की। इनमें मत्स्य पालन को खाद्य प्रसंस्करण उद्योग से जोड़ना, मत्स्य उद्यमों को MSME ढांचे के अंतर्गत सहायता और प्रोत्साहन देना तथा मध्य प्रदेश मत्स्य नीति 2026 लागू करना शामिल है।

खाद्य प्रसंस्करण से जुड़ने पर मछली को केवल ताजा उत्पाद के रूप में बेचने के बजाय विभिन्न Value-Added Products में बदला जा सकता है। इसके लिए प्रसंस्करण इकाइयों, पैकेजिंग, शीत शृंखला और वितरण नेटवर्क की जरूरत होती है।

मुख्यमंत्री के अनुसार, सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों के ढांचे में मत्स्य व्यवसायों को भूमि और अन्य सुविधाओं सहित सहायता देने पर विचार किया जाएगा। राज्य की प्रस्तावित मत्स्य नीति के अंतर्गत मत्स्य क्षेत्र से जुड़े उद्यमों को भूमि आवंटन और आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराने का प्रावधान होगा।

इन पहलों का उद्देश्य निवेश को आकर्षित करना, स्थानीय स्तर पर उद्यम स्थापित करना और रोजगार के अवसर बढ़ाना है। प्रसंस्करण तथा पैकेजिंग की सुविधाएं विकसित होने से उत्पाद को बाजार की मांग के अनुसार तैयार करने और उसकी गुणवत्ता बनाए रखने में मदद मिल सकती है।

निर्यात बढ़ाने के लिए गुणवत्ता और Cold Chain जरूरी

केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन सिंह ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ाने के लिए गुणवत्तापूर्ण मछली उत्पादन, प्रभावी लॉजिस्टिक्स, मूल्य संवर्धन और भरोसेमंद Supply Chain आवश्यक हैं।

उन्होंने निर्यात बढ़ाने के लिए पांच प्रमुख प्राथमिकताओं पर जोर दिया। इनमें मीठे पानी की मछली प्रजातियों और लक्षित बाजारों की पहचान, मछली संग्रह केंद्रों तथा बड़े प्रसंस्करण केंद्रों का विकास, मछुआरों और निर्यातकों के बीच साझेदारी मजबूत करना, शुरुआत से गुणवत्ता प्रमाणन और उत्पाद की Traceability सुनिश्चित करना तथा अंतरराष्ट्रीय खरीदारों से नियमित संपर्क बनाए रखना शामिल है।

Traceability का अर्थ है कि उत्पाद की आपूर्ति शृंखला में उसकी उत्पत्ति और संबंधित जानकारी का पता लगाया जा सके। निर्यात बाजारों में यह व्यवस्था उत्पाद की पहचान और निर्धारित मानकों के अनुपालन के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है।

केंद्रीय मंत्री ने राष्ट्रीय जलीय कृषि ट्रेसेबिलिटी फ्रेमवर्क 2025 और राष्ट्रीय मत्स्य डिजिटल प्लेटफॉर्म का भी उल्लेख किया। इन पहलों का उद्देश्य जलीय कृषि की Value Chain में डिजिटल दस्तावेजीकरण को बढ़ावा देना है। उन्होंने बताया कि समुद्री उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (MPEDA) अंतर्देशीय राज्यों के निर्यातकों को बाजार संबंधी जानकारी उपलब्ध कराने में मदद करेगा।

सम्मेलन में जारी SOP के तहत मत्स्य बीज के संचयन और उत्पादन से लेकर निर्यात की आवश्यकताओं तक पूरी Value Chain के लिए दिशा-निर्देश दिए गए हैं। राज्य सरकार और उद्योग जगत के बीच समन्वय से इन प्रक्रियाओं को अपनाने पर जोर दिया गया।

पंगासियस और तिलापिया के निर्यात में वृद्धि की संभावना

मत्स्य विभाग के सचिव डॉ. अभिलक्ष लिखी ने अंतर्देशीय मत्स्य पालन की अप्रयुक्त निर्यात क्षमता पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि पंगासियस और तिलापिया जैसी मीठे पानी की मछली प्रजातियों की समुद्री खाद्य निर्यात में हिस्सेदारी अभी लगभग 2 प्रतिशत है। इसे अगले पांच वर्षों में बढ़ाकर 10 प्रतिशत करने का लक्ष्य रखा गया है।

इस लक्ष्य की दिशा में मध्य प्रदेश जैसे अंतर्देशीय राज्यों की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। राज्य में जलाशयों, तालाबों, झीलों और नदियों का व्यापक क्षेत्र उपलब्ध है, जिसका उपयोग उपयुक्त प्रजातियों के उत्पादन और निर्यात योग्य आपूर्ति विकसित करने के लिए किया जा सकता है।

हालांकि, निर्यात में वृद्धि के लिए उत्पादन बढ़ाने के साथ शीत भंडारण केंद्र, गुणवत्ता प्रमाणन, प्रसंस्करण सुविधाएं और अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंच भी जरूरी होगी। यदि उत्पादन और बाजार के बीच प्रभावी समन्वय स्थापित होता है, तो मत्स्य पालकों को नए खरीदारों और बेहतर विपणन अवसरों तक पहुंच मिल सकती है।

डॉ. लिखी ने प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के तहत अगले पांच वर्षों में राज्य सरकारों के सहयोग से Cluster-Based Approach अपनाने की बात कही। इसके अंतर्गत प्रशिक्षण, मूल्य संवर्धन, पैकेजिंग, ब्रांडिंग और निर्यात लॉजिस्टिक्स को बढ़ावा देने पर जोर रहेगा।

प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना से राज्य में उत्पादन बढ़ा

मध्य प्रदेश में मत्स्य क्षेत्र के विकास के लिए प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के तहत कई परियोजनाओं को मंजूरी दी गई है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, राज्य के लिए कुल 910.81 करोड़ रुपये की परियोजनाएं स्वीकृत की गई हैं, जिनमें केंद्र सरकार की हिस्सेदारी 305.50 करोड़ रुपये है। स्वीकृत केंद्रीय हिस्से में से 301.27 करोड़ रुपये जारी किए जा चुके हैं।

योजना के तहत राज्य में मछली उत्पादन वर्ष 2019-20 के 2 लाख मीट्रिक टन से बढ़कर वर्ष 2024-25 में 4.45 लाख मीट्रिक टन हो गया। यह लगभग 123 प्रतिशत की वृद्धि है।

उत्पादन बढ़ाने के लिए स्वीकृत प्रमुख पहलों में 78 मत्स्य बीज उत्पादन केंद्र यानी Hatcheries, 1,157 RAS और Biofloc इकाइयां, तालाब क्षेत्र में 5,700 हेक्टेयर से अधिक की वृद्धि तथा एक एकीकृत Aquapark की स्थापना शामिल है।

इसके अतिरिक्त, मत्स्य पालन एवं जलीय कृषि अवसंरचना विकास निधि के अंतर्गत राज्य में पांच परियोजनाओं को मंजूरी दी गई है। इनमें 5 करोड़ रुपये की लागत वाला मत्स्य प्रशिक्षण केंद्र, शीत भंडारण केंद्र, दो नवाचार आधारित परियोजनाएं और रोग निदान प्रयोगशाला शामिल हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इनमें मत्स्य प्रशिक्षण केंद्र का कार्य प्रगति पर है, जबकि बाकी चार परियोजनाओं का काम शुरू होना बाकी है।

मछुआरों की आय और रोजगार बढ़ाने पर रहेगा जोर

सम्मेलन में किसान क्रेडिट कार्ड, मत्स्य सहकारी समितियों, मत्स्य क्षेत्र के स्टार्टअप और प्रधानमंत्री मत्स्य किसान समृद्धि सह-योजना के प्रदर्शन अनुदान से जुड़े लाभार्थियों को प्रमाण-पत्र भी वितरित किए गए।

मध्य प्रदेश के मत्स्य कल्याण एवं मत्स्य विकास मंत्री नारायण सिंह पंवार ने कहा कि राज्य सरकार आधुनिक तकनीक, निवेश और उद्यमिता के माध्यम से मत्स्य पालन को अधिक आय और रोजगार आधारित क्षेत्र बनाने के लिए काम कर रही है। उन्होंने निवेशकों और उद्यमियों को राज्य की अंतर्देशीय जल अर्थव्यवस्था में भागीदारी के लिए आमंत्रित किया।

राज्य सरकार का जोर उत्पादन से लेकर बाजार तक एकीकृत व्यवस्था विकसित करने पर है। इसके तहत मछुआरों, निवेशकों, प्रसंस्करणकर्ताओं और निर्यातकों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करने की जरूरत है।

मध्य प्रदेश में उपलब्ध जल संसाधनों और बढ़ते उत्पादन को देखते हुए मत्स्य क्षेत्र में विकास की संभावनाएं मौजूद हैं। अब चुनौती इन संभावनाओं को टिकाऊ निवेश, मजबूत बाजार व्यवस्था और स्थानीय समुदायों की बेहतर आय में बदलने की है।

भोपाल में आयोजित सम्मेलन ने इस दिशा में नीतिगत पहल, निवेश प्रोत्साहन और निर्यात क्षमता बढ़ाने का रोडमैप सामने रखा है। यदि घोषित योजनाओं के क्रियान्वयन के साथ गुणवत्ता, पर्यावरण संरक्षण और मछुआरों की भागीदारी पर ध्यान दिया जाता है, तो मध्य प्रदेश का मत्स्य क्षेत्र ग्रामीण अर्थव्यवस्था और रोजगार सृजन में अधिक महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है।

 

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