खाद डालने के बाद भी फसल कमजोर क्यों? जानें असली कारण

खेत में खाद डालने के बाद भी फसल कमजोर क्यों रहती है? जानें मिट्टी के पीएच, पोषक तत्वों की कमी, सिंचाई और खाद के सही इस्तेमाल से जुड़ी जरूरी बातें।

खेत में खाद डालने के बाद भी कमजोर फसल और पोषक तत्वों की कमी

खेत में किसान समय पर बुवाई करता है, सिंचाई की व्यवस्था करता है और फसल की जरूरत के अनुसार खाद भी डालता है। इसके बावजूद कई बार पौधों की बढ़वार कमजोर रहती है, पत्तियां पीली पड़ने लगती हैं, जड़ें ठीक से विकसित नहीं होतीं और फसल की उपज उम्मीद के मुताबिक नहीं मिलती। ऐसी स्थिति में अक्सर किसान मान लेते हैं कि खाद की मात्रा कम पड़ गई है और वे दोबारा यूरिया या दूसरी खाद डाल देते हैं। लेकिन हर बार कमजोर फसल का कारण खाद की कमी नहीं होता।

फसल को खाद देना और खाद में मौजूद पोषक तत्वों का पौधों तक पहुंचना दो अलग-अलग बातें हैं। खाद का असर मिट्टी की स्थिति, नमी, तापमान, पोषक तत्वों के संतुलन, जड़ों के विकास और खाद डालने के तरीके पर निर्भर करता है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) भी मिट्टी की जांच के आधार पर संतुलित पोषण और जैविक तथा रासायनिक उर्वरकों के समन्वित उपयोग की सिफारिश करती है।

मिट्टी में मौजूद पोषक तत्व पौधों को मिलना जरूरी

पौधों की अच्छी बढ़वार के लिए नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश के साथ सल्फर, जिंक, बोरॉन, आयरन और अन्य आवश्यक पोषक तत्वों की भी जरूरत होती है। प्रत्येक तत्व की भूमिका अलग होती है। नाइट्रोजन पत्तियों और तनों की बढ़वार में महत्वपूर्ण है, फास्फोरस जड़ों के विकास तथा ऊर्जा संबंधी प्रक्रियाओं में भूमिका निभाता है, जबकि पोटाश जल संतुलन और कई शारीरिक प्रक्रियाओं में सहायक होता है।

यदि किसान मुख्य रूप से यूरिया और डीएपी का इस्तेमाल कर रहा है, तो यह जरूरी नहीं कि फसल को सभी पोषक तत्व पर्याप्त मात्रा में मिल रहे हों। लगातार एक ही प्रकार की खाद का इस्तेमाल करने या मिट्टी की वास्तविक जरूरत को नजरअंदाज करने से पोषक तत्वों का असंतुलन पैदा हो सकता है।

उदाहरण के लिए, नाइट्रोजन की उपलब्धता पर्याप्त होने पर भी यदि किसी जरूरी सूक्ष्म पोषक तत्व की कमी है, तो पौधों की वृद्धि प्रभावित हो सकती है। इसी तरह मिट्टी में किसी पोषक तत्व की कुल मात्रा मौजूद होने का अर्थ यह नहीं है कि पौधा उसे आसानी से अवशोषित भी कर पाएगा।

मिट्टी का पीएच भी तय करता है खाद का असर

मिट्टी अम्लीय है या क्षारीय, इसका प्रभाव भी पोषक तत्वों की उपलब्धता पर पड़ता है। मिट्टी का पीएच बहुत कम या बहुत अधिक होने पर कुछ पोषक तत्व पौधों के लिए कम उपलब्ध हो सकते हैं। विशेष रूप से जिंक और आयरन जैसे सूक्ष्म पोषक तत्वों की उपलब्धता मिट्टी की रासायनिक स्थिति से प्रभावित होती है।

भारत के कृषि मंत्रालय की मार्च 2026 की जानकारी के अनुसार, उत्तर प्रदेश, बिहार और ओडिशा सहित कई राज्यों में मिट्टी में जिंक की कमी प्रमुख रूप से पाई जाती है। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि हर खेत में जिंक की कमी है। इसकी पुष्टि खेत की मिट्टी की जांच से ही की जानी चाहिए।

इसलिए केवल फसल की कमजोर बढ़वार देखकर जिंक, आयरन या किसी अन्य सूक्ष्म पोषक तत्व का इस्तेमाल शुरू करना उचित नहीं है। पहले कमी का कारण समझना और फिर कृषि विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार सुधार करना जरूरी है।

नमी और सिंचाई की भूमिका को न करें नजरअंदाज

मिट्टी में पर्याप्त खाद होने के बावजूद पानी की कमी या अधिकता पौधों के पोषण को प्रभावित कर सकती है। जड़ों को पोषक तत्वों के अवशोषण के लिए उपयुक्त नमी और हवा की जरूरत होती है। मिट्टी में लंबे समय तक पानी भरा रहने से जड़ों तक ऑक्सीजन की आपूर्ति घट सकती है। इससे जड़ों की सक्रियता और पोषक तत्वों को ग्रहण करने की क्षमता प्रभावित होती है।

दूसरी ओर, मिट्टी में नमी कम होने पर पोषक तत्वों का जड़ों तक पहुंचना कठिन हो सकता है। अधिक सिंचाई की स्थिति में नाइट्रेट के रूप में मौजूद नाइट्रोजन जड़ों के सक्रिय क्षेत्र से नीचे जा सकती है, विशेषकर ऐसी मिट्टी में जहां पानी तेजी से नीचे रिसता है।

इसका समाधान हर खेत में सिंचाई बढ़ाना या घटाना नहीं है। किसान को मिट्टी के प्रकार, फसल की अवस्था, मौसम और खेत में जल निकास की स्थिति के अनुसार सिंचाई करनी चाहिए। खाद की मात्रा बढ़ाने से पहले यह देखना जरूरी है कि जड़ें स्वस्थ हैं और उन्हें पर्याप्त नमी मिल रही है या नहीं।

खाद डालने का समय और तरीका भी है महत्वपूर्ण

फसल को पोषक तत्वों की जरूरत उसकी वृद्धि की अलग-अलग अवस्थाओं में बदलती रहती है। यदि खाद गलत समय पर या अनुचित तरीके से डाली जाए, तो उसका पूरा लाभ नहीं मिल पाता। उदाहरण के लिए, नाइट्रोजन की पूरी मात्रा एक बार में देने के बजाय फसल और क्षेत्र के लिए अनुशंसित मात्रा को उचित किस्तों में देना कई परिस्थितियों में अधिक प्रभावी हो सकता है।

इसी तरह फास्फोरस की खाद को जड़ों के सक्रिय क्षेत्र के पास उचित तरीके से देना उसके उपयोग में मदद कर सकता है। हालांकि, खाद की सही मात्रा, स्थान और समय फसल, मिट्टी तथा स्थानीय कृषि सिफारिशों पर निर्भर करते हैं। इसलिए सभी फसलों के लिए एक ही तरीका अपनाना उचित नहीं है।

आईसीएआर ने भी नाइट्रोजन के बेहतर उपयोग के लिए किस्तों में प्रयोग और उपयुक्त स्थान पर खाद देने जैसे उपायों की सिफारिश की है।

केवल पत्तियों का रंग देखकर न तय करें पोषण की कमी

पत्तियों का पीला पड़ना, किनारों का सूखना, पौधों की बढ़वार रुकना या पत्तियों पर धब्बे दिखाई देना पोषण संबंधी समस्या का संकेत हो सकता है। लेकिन इन लक्षणों का कारण हमेशा खाद की कमी नहीं होता। पानी का तनाव, जड़ों की बीमारी, कीटों का प्रकोप और दूसरी पर्यावरणीय परिस्थितियां भी ऐसे लक्षण पैदा कर सकती हैं।

अलग-अलग पोषक तत्वों की कमी के लक्षण एक-दूसरे से मिलते-जुलते हो सकते हैं। इसलिए केवल पत्तियों का रंग देखकर यूरिया या सूक्ष्म पोषक तत्वों का छिड़काव करना गलत निदान का कारण बन सकता है।

यदि खेत के कुछ हिस्सों में फसल अच्छी है और कुछ हिस्सों में कमजोर, तो दोनों क्षेत्रों की मिट्टी, नमी, जल निकास और जड़ों की स्थिति की तुलना करना उपयोगी होगा। जरूरत पड़ने पर मिट्टी की जांच के साथ पौधों के ऊतकों का परीक्षण भी कराया जा सकता है।

किसान कैसे पहचानें असली समस्या?

कमजोर फसल में अतिरिक्त खाद डालने से पहले किसान कुछ जरूरी कदम उठा सकते हैं।

खाद बढ़ाने से पहले कारण समझना जरूरी

खेत में खाद डालने के बाद भी फसल कमजोर रहना इस बात का संकेत हो सकता है कि समस्या केवल पोषक तत्वों की मात्रा में नहीं, बल्कि उनकी उपलब्धता, मिट्टी की दशा, सिंचाई, जड़ों या खाद के उपयोग के तरीके में भी है। ऐसे में बिना जांच के अतिरिक्त खाद डालने से लागत बढ़ सकती है, जबकि वास्तविक समस्या बनी रह सकती है।

किसान के लिए सबसे उपयोगी तरीका है कि वह मिट्टी की जांच, फसल की अवस्था और स्थानीय कृषि विशेषज्ञों की सिफारिश के आधार पर पोषण प्रबंधन करे। संतुलित उर्वरक उपयोग, उचित सिंचाई और मिट्टी में जैविक पदार्थों का संरक्षण मिलकर फसल की बढ़वार तथा मिट्टी की दीर्घकालीन उर्वरता बनाए रखने में मदद कर सकते हैं।

खेती में सफलता केवल इस बात पर निर्भर नहीं करती कि खेत में कितनी खाद डाली गई, बल्कि इस पर भी निर्भर करती है कि फसल को उसकी जरूरत के पोषक तत्व सही समय पर कितनी प्रभावी ढंग से मिल पाए। यही समझ अनावश्यक खर्च घटाने और फसल की सेहत सुधारने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।

 

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