Mass plantation: गिरिडीह में सामूहिक वृक्षारोपण कार्यक्रम आयोजित, 100 से अधिक पौधे लगाए गए

Mass plantation drive organized in Giridih; over 100 saplings plant

Mass plantation

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गिरिडीह। सामुदायिक विकास, पर्यावरण संरक्षण और ग्रामीण आजीविका को मजबूत करने के उद्देश्य से गिरिडीह जिले में दो दिवसीय सामूहिक वृक्षारोपण (Mass plantation) कार्यक्रम का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम 8 और 9 जुलाई को संपन्न हुआ, जिसमें 100 से अधिक औषधीय, फलदार और वन प्रजातियों के पौधे लगाए गए।

कार्यक्रम का नेतृत्व भारतीय सांख्यिकी संस्थान, गिरिडीह की समाजशास्त्रीय अनुसंधान इकाई के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. हरि चरण बेहरा और राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय, गिरिडीह के मनीष आनंद ने किया। पौधारोपण अभियान के लिए स्थानीय वन क्षेत्र कार्यालय की ओर से पौधों का सहयोग उपलब्ध कराया गया।

अर्जुन, महुआ, साल और फलदार पौधों का रोपण

अभियान के दौरान अर्जुन, आँवला, सीताफल, कटहल, महुआ, साल और अमरूद सहित कई उपयोगी प्रजातियों के पौधे लगाए गए। गिरिडीह जिले के बेंगाबाद प्रखंड के बांडगारी गांव में भी पौधारोपण किया गया। इसके अलावा पौधों की देखभाल और संरक्षण में रुचि रखने वाले स्थानीय सदस्यों को पौधे वितरित किए गए।

आयोजकों के अनुसार, इन पौधों का चयन केवल हरित क्षेत्र बढ़ाने के लिए नहीं किया गया, बल्कि स्थानीय जैव विविधता को समृद्ध करने, पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने और ग्रामीण परिवारों के लिए आजीविका के नए अवसर विकसित करने के उद्देश्य से भी किया गया है।

औषधीय और आर्थिक दृष्टि से उपयोगी हैं पौधे

विशेषज्ञों ने बताया कि लगाए गए अधिकांश वृक्ष औषधीय, पोषण, पर्यावरणीय और आर्थिक दृष्टि से उपयोगी हैं। अर्जुन की छाल का पारंपरिक चिकित्सा पद्धति में उपयोग किया जाता है। आँवला विटामिन-सी का प्रमुख स्रोत माना जाता है और पोषण सुरक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

महुआ के फूल, फल और बीज ग्रामीण तथा जनजातीय समुदायों की आजीविका से जुड़े हुए हैं। इनसे खाद्य सामग्री, तेल, पारंपरिक औषधियां और अन्य उपयोगी उत्पाद तैयार किए जाते हैं। वहीं, कटहल, सीताफल और अमरूद जैसे फलदार वृक्ष भविष्य में ग्रामीण परिवारों के लिए पोषण और अतिरिक्त आय का स्रोत बन सकते हैं।

साल के वृक्ष वन पारिस्थितिकी, मिट्टी संरक्षण और जैव विविधता को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

जनजातीय संस्कृति से जुड़े हैं महुआ और साल

महुआ और साल जैसे वृक्षों का स्थानीय जनजातीय समाज में विशेष सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व है। ये वृक्ष प्राकृतिक संसाधनों के साथ-साथ स्थानीय परंपराओं, आस्था और सामुदायिक पहचान से भी जुड़े हुए हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसे वृक्षों का संरक्षण पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने के साथ स्थानीय सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित करने में भी सहायक साबित हो सकता है।

CiLLAGE मॉडल के अंतर्गत किया गया आयोजन

यह वृक्षारोपण और कृषि-वनीकरण कार्यक्रम CiLLAGE मॉडल के अंतर्गत संचालित सामुदायिक विकास पहल का हिस्सा है। मॉडल का पायलट कार्यान्वयन गिरिडीह जिले के बेंगाबाद प्रखंड में किया जा रहा है।

इस पहल का उद्देश्य ग्रामीण समुदायों की सक्रिय भागीदारी के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण, जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के प्रति अनुकूलन, जैव विविधता संवर्धन और प्राकृतिक संसाधनों का सतत प्रबंधन करना है। इसके साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार और आजीविका के नए अवसर विकसित करने पर भी जोर दिया जा रहा है।

पौधों की देखभाल के लिए लोगों को किया जागरूक

कार्यक्रम के दौरान स्थानीय लोगों को पौधारोपण के साथ पौधों की नियमित देखभाल, सुरक्षा और कृषि-वनीकरण के महत्व के बारे में जानकारी दी गई।

विशेषज्ञों ने बताया कि केवल पौधे लगाना पर्याप्त नहीं है। पौधों के जीवित रहने, विकसित होने और भविष्य में लाभ देने के लिए नियमित सिंचाई, पशुओं से सुरक्षा और सामुदायिक स्तर पर निरंतर निगरानी आवश्यक है।

समुदाय की भागीदारी से संभव है सतत विकास

डॉ. हरि चरण बेहरा ने कहा कि सतत ग्रामीण विकास तभी संभव है, जब पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय समुदायों की भागीदारी एक साथ आगे बढ़े।

उन्होंने बताया कि उनकी टीम प्रशिक्षण, क्षमता निर्माण, कृषि नवाचार, वृक्षारोपण, प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन और अन्य सामुदायिक पहलों के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों में दीर्घकालिक और समावेशी विकास के लिए लगातार कार्य कर रही है।

आय और पोषण सुरक्षा बढ़ाने में मिलेगी मदद

आयोजकों ने उम्मीद जताई कि इस प्रकार के सामूहिक वृक्षारोपण अभियान आने वाले वर्षों में जिले का हरित आवरण बढ़ाने में मदद करेंगे। इससे मिट्टी और जल संरक्षण को मजबूती मिलेगी और जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निपटने में भी सहायता मिलेगी।

फलदार, औषधीय और आर्थिक महत्व वाले वृक्षों के विकसित होने से ग्रामीण परिवारों की आय और पोषण सुरक्षा बढ़ने की संभावना है। कार्यक्रम के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण को ग्रामीण आजीविका और सामुदायिक विकास से जोड़ने का प्रयास किया गया।

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