राष्ट्रीय अभ्यास ‘वज्र-सैट’ का बेंगलुरु में समापन, खुरपका-मुंहपका रोग से निपटने की भारत की तैयारियों को मिलेगी मजबूती

National Exercise 'Vajra-SAT' concludes in Bengaluru, strengthening India's preparedness to combat Foot and Mouth Disease

राष्ट्रीय अभ्यास

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भारत में पशुधन स्वास्थ्य की सुरक्षा और संक्रामक पशु रोगों से निपटने की तैयारियों को मजबूत करने के लिए बेंगलुरु में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय अभ्यास ‘वज्र-सैट’ का 5 नवंबर को समापन हो गया। इस अभ्यास का मुख्य उद्देश्य मवेशियों में होने वाले खुरपका और मुंहपका रोग (Foot-and-Mouth Disease-FMD) के सीरोटाइप SAT-1 से संभावित जोखिमों को ध्यान में रखते हुए देश की निगरानी, प्रारंभिक पहचान, प्रयोगशाला पुष्टि और आपातकालीन प्रतिक्रिया प्रणाली को अधिक प्रभावी बनाना था।

पशुपालन और डेयरी विभाग (Department of Animal Husbandry and Dairying-DAHD), भारत सरकार ने ICAR-राष्ट्रीय पशु चिकित्सा महामारी विज्ञान एवं रोग सूचना विज्ञान संस्थान (ICAR-NIVEDI), बेंगलुरु के समन्वय से 4 और 5 नवंबर 2026 को इस National Tabletop Exercise का आयोजन किया। ‘जल्दी पता लगाएं, तेजी से पुष्टि करें, एक साथ प्रतिक्रिया दें’ (Detect Early, Confirm Fast, Respond Together) विषय पर आधारित इस अभ्यास में देश के 25 राज्यों, 3 केंद्र शासित प्रदेशों और प्रमुख राष्ट्रीय संस्थानों के कुल 83 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया।

इस अभ्यास के माध्यम से पशु रोगों के संभावित प्रकोप की स्थिति में केंद्र और राज्य सरकारों, पशु चिकित्सा संस्थानों, प्रयोगशालाओं, वैक्सीन निर्माताओं तथा सुरक्षा एजेंसियों के बीच बेहतर तालमेल विकसित करने पर जोर दिया गया। विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया कि किसी भी संक्रामक पशु रोग के प्रसार को रोकने के लिए केवल उपचार या टीकाकरण पर्याप्त नहीं है, बल्कि समय पर निगरानी, त्वरित जांच, वैज्ञानिक जानकारी और समन्वित कार्रवाई भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।

भारत में SAT-1 के मामले सामने नहीं आए, फिर भी सतर्कता जरूरी

खुरपका और मुंहपका रोग (FMD) पशुधन क्षेत्र की प्रमुख संक्रामक बीमारियों में से एक है। यह मुख्य रूप से गाय, भैंस, भेड़, बकरी और सूअर जैसे खुर वाले पशुओं को प्रभावित करता है। इस रोग के कारण पशुओं के मुंह, जीभ, मसूड़ों और खुरों के आसपास छाले या फफोले बन सकते हैं। संक्रमित पशुओं में बुखार, लार गिरना, भोजन खाने में परेशानी, लंगड़ापन और दूध उत्पादन में गिरावट जैसे लक्षण दिखाई दे सकते हैं।

भारत में FMD के नियंत्रण के लिए टीकाकरण और निगरानी कार्यक्रम संचालित किए जा रहे हैं। हालांकि, इस रोग के वायरस के अलग-अलग सीरोटाइप मौजूद हैं। इनमें SAT-1 भी शामिल है। किसी एक सीरोटाइप के विरुद्ध विकसित प्रतिरक्षा दूसरे सीरोटाइप के विरुद्ध समान सुरक्षा दे, यह जरूरी नहीं है। इसलिए रोग के अलग-अलग सीरोटाइप की पहचान और उनके अनुरूप टीका तैयारियों का विशेष महत्व है।

पशुपालन और डेयरी विभाग की ओर से जारी जानकारी के अनुसार, भारत में अब तक FMD Serotype SAT-1 के मामले सामने नहीं आए हैं। हालांकि, अफ्रीका से पश्चिम एशिया के कुछ हिस्सों तक इस सीरोटाइप के भौगोलिक प्रसार को देखते हुए भारत ने एहतियाती तैयारी को प्राथमिकता दी है।

सीमा पार पशु रोगों का प्रसार अंतरराष्ट्रीय पशु आवाजाही, पशु उत्पादों के व्यापार और अन्य संपर्क माध्यमों से हो सकता है। ऐसे में किसी नए सीरोटाइप के संभावित प्रवेश से पहले ही निगरानी और प्रतिक्रिया प्रणाली को मजबूत करना आवश्यक है। इसी सोच के तहत ‘वज्र-सैट’ अभ्यास आयोजित किया गया।

25 राज्यों और 3 केंद्र शासित प्रदेशों के 83 प्रतिभागियों ने लिया हिस्सा

‘वज्र-सैट’ अभ्यास में केंद्र और राज्य स्तर की विभिन्न एजेंसियों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इसमें राज्य पशुपालन विभागों, ICAR संस्थानों, पशु चिकित्सा निदान प्रयोगशालाओं, पशु चिकित्सा विश्वविद्यालयों, वैक्सीन निर्माताओं तथा रक्षा और सीमा सुरक्षा से जुड़ी एजेंसियों के अधिकारी और विशेषज्ञ शामिल हुए।

कुल 83 प्रतिभागियों की भागीदारी ने इस अभ्यास को राष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण बनाया। इसमें विभिन्न संस्थानों ने अपने अनुभव साझा किए और यह समझने का प्रयास किया कि यदि किसी क्षेत्र में SAT-1 से संबंधित संदिग्ध मामला सामने आता है, तो उसकी पहचान से लेकर नियंत्रण तक किस प्रकार की कार्रवाई की जानी चाहिए।

अभ्यास में वास्तविक रोग प्रकोप जैसी काल्पनिक परिस्थितियां प्रस्तुत की गईं। इन परिस्थितियों के आधार पर प्रतिभागियों ने निर्णय लेने, सूचना साझा करने, प्रयोगशाला जांच कराने और प्रभावित क्षेत्रों में आवश्यक नियंत्रण उपाय लागू करने की प्रक्रिया पर विचार-विमर्श किया।

इस प्रकार के Tabletop Exercise का उद्देश्य किसी बीमारी को वास्तविक रूप से फैलाकर परीक्षण करना नहीं होता, बल्कि काल्पनिक परिस्थितियों के माध्यम से संबंधित विभागों की तैयारी, निर्णय क्षमता और आपसी समन्वय की जांच करना होता है।

प्रारंभिक पहचान और निगरानी व्यवस्था पर विशेष जोर

FMD जैसे संक्रामक रोगों को नियंत्रित करने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका प्रारंभिक पहचान (Early Detection) की होती है। यदि किसी पशु में बीमारी के लक्षण दिखाई देने के बाद समय पर सूचना दी जाए और जांच शुरू हो जाए, तो संभावित संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए तेजी से कदम उठाए जा सकते हैं।

‘वज्र-सैट’ अभ्यास में Risk-based Surveillance यानी जोखिम आधारित निगरानी को मजबूत करने पर विशेष चर्चा हुई। इसके तहत उन क्षेत्रों, पशु समूहों और गतिविधियों पर अधिक ध्यान दिया जाता है, जहां संक्रमण फैलने की आशंका अपेक्षाकृत अधिक हो सकती है।

इसमें पशुओं की नियमित स्वास्थ्य जांच, असामान्य लक्षणों की रिपोर्टिंग, पशु बाजारों और परिवहन पर निगरानी तथा सीमावर्ती क्षेत्रों में सतर्कता जैसे पहलू शामिल हैं।

विशेषज्ञों ने इस बात पर भी जोर दिया कि पशुपालकों, पशु चिकित्सकों और स्थानीय पशुपालन कर्मचारियों के बीच सूचना का प्रभावी नेटवर्क होना चाहिए। कई बार पशुपालक बीमारी के शुरुआती लक्षणों को सामान्य समस्या समझकर समय पर सूचना नहीं देते। इससे रोग की पहचान और नियंत्रण में देरी हो सकती है।

इसलिए पशुपालकों को रोग के लक्षणों, संक्रमण के जोखिम और रिपोर्टिंग प्रक्रिया के बारे में जागरूक करना जरूरी है।

तेजी से Laboratory Diagnosis और पुष्टि की जरूरत

किसी संदिग्ध पशु में FMD के लक्षण दिखाई देने के बाद केवल बाहरी लक्षणों के आधार पर वायरस के सीरोटाइप की पुष्टि नहीं की जा सकती। इसके लिए वैज्ञानिक जांच और प्रयोगशाला परीक्षण जरूरी होते हैं।

अभ्यास में Laboratory Diagnosis और Rapid Confirmation की क्षमता मजबूत करने पर विशेष ध्यान दिया गया। इसमें नमूना संग्रह, सुरक्षित परिवहन, प्रयोगशाला तक समय पर पहुंच, उपयुक्त Diagnostic Test और रिपोर्टिंग की प्रक्रिया पर चर्चा की गई।

FMD के अलग-अलग सीरोटाइप की पहचान के लिए प्रयोगशालाओं की तकनीकी क्षमता महत्वपूर्ण है। यदि किसी संदिग्ध मामले में जांच और पुष्टि में देरी होती है, तो संक्रमण नियंत्रण के उपाय भी प्रभावित हो सकते हैं।

इसी कारण राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर की प्रयोगशालाओं के बीच समन्वय, प्रशिक्षित मानव संसाधन, आवश्यक उपकरणों की उपलब्धता और Diagnostic Protocol का पालन जरूरी है।

अभ्यास के दौरान प्रतिभागियों ने इस बात पर भी विचार किया कि राज्य स्तर पर संदिग्ध मामलों की सूचना किस प्रकार राष्ट्रीय संस्थानों तक पहुंचे और प्रयोगशाला परिणाम मिलने के बाद संबंधित विभागों को कितनी तेजी से कार्रवाई करनी चाहिए।

महामारी विज्ञान जांच से संक्रमण के स्रोत का पता लगाने में मदद

किसी संक्रामक रोग का नियंत्रण केवल संक्रमित पशु की पहचान तक सीमित नहीं होता। यह जानना भी जरूरी है कि संक्रमण कहां से आया, किन पशुओं के संपर्क में आया और किन क्षेत्रों में फैलने की आशंका है।

इसी उद्देश्य से ‘वज्र-सैट’ अभ्यास में Epidemiological Investigation यानी महामारी विज्ञान जांच को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया।

इस प्रक्रिया में प्रभावित पशुओं की संख्या, उनके संपर्क में आए अन्य पशुओं, पशु परिवहन, स्थानीय पशु बाजारों, डेयरी फार्मों और संभावित संक्रमण स्रोतों की जानकारी एकत्र की जाती है।

इस तरह प्राप्त जानकारी के आधार पर संक्रमण के संभावित फैलाव का आकलन किया जा सकता है और प्रभावित क्षेत्र में आवश्यक नियंत्रण उपाय लागू किए जा सकते हैं।

अभ्यास में यह भी समझने पर जोर दिया गया कि विभिन्न राज्यों के बीच पशुओं की आवाजाही से संबंधित जानकारी साझा करने की व्यवस्था मजबूत होनी चाहिए। इससे संक्रमण के संभावित मार्गों का पता लगाने और समय रहते सावधानी बरतने में मदद मिल सकती है।

पशुओं की आवाजाही पर नियंत्रण और आपातकालीन टीकाकरण की तैयारी

FMD एक अत्यधिक संक्रामक रोग है। संक्रमित पशुओं और उनके संपर्क में आए पशुओं के माध्यम से इसका प्रसार हो सकता है। इसलिए किसी संभावित प्रकोप की स्थिति में पशुओं की आवाजाही को नियंत्रित करना महत्वपूर्ण होता है।

‘वज्र-सैट’ में Movement Control यानी पशुओं की आवाजाही पर नियंत्रण से संबंधित उपायों पर विचार किया गया। इसमें प्रभावित क्षेत्र की पहचान, आवश्यक प्रतिबंध, पशु परिवहन की निगरानी और संबंधित विभागों के बीच समन्वय शामिल हैं।

इसके साथ ही Emergency Vaccination Preparedness यानी आपातकालीन टीकाकरण की तैयारी पर भी चर्चा हुई। किसी नए सीरोटाइप के संभावित प्रवेश की स्थिति में उपयुक्त वैक्सीन की उपलब्धता, उसकी गुणवत्ता, वितरण व्यवस्था और टीकाकरण की प्राथमिकता तय करना जरूरी होता है।

FMD के अलग-अलग सीरोटाइप के लिए टीके की उपयुक्तता महत्वपूर्ण है। इसलिए SAT-1 जैसे सीरोटाइप के संभावित जोखिम को देखते हुए वैक्सीन की तैयारी और तकनीकी क्षमता का आकलन किया गया।

विशेषज्ञों के अनुसार, टीकाकरण के साथ-साथ निगरानी, रोग की पुष्टि और आवाजाही नियंत्रण जैसे उपायों को एकीकृत रूप से लागू करना आवश्यक है।

उद्घाटन सत्र में वैज्ञानिक निगरानी और समन्वय पर जोर

राष्ट्रीय अभ्यास ‘वज्र-सैट’ का उद्घाटन 4 नवंबर 2026 को पशुपालन और डेयरी विभाग की पशुपालन आयुक्त डॉ. नवीना बी.एम. ने किया।

उन्होंने केंद्रीय और राज्य एजेंसियों के बीच अग्रिम तैयारी, रोग की प्रारंभिक पहचान, समय पर प्रतिक्रिया और प्रभावी समन्वय के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि पशु रोगों के संभावित खतरे से निपटने के लिए विभिन्न संस्थानों को पहले से तैयार रहना चाहिए, ताकि किसी भी संदिग्ध स्थिति में बिना देरी के आवश्यक कार्रवाई की जा सके।

ICAR-NIVEDI के निदेशक डॉ. बलदेव आर. गुलाटी ने FMD SAT-1 की उभरती महामारी विज्ञान संबंधी स्थिति पर प्रकाश डाला। उन्होंने Risk-based Surveillance, Epidemiological Intelligence और Early Warning Systems के महत्व को रेखांकित किया।

उनके अनुसार, पशु रोगों की प्रभावी रोकथाम के लिए वैज्ञानिक निगरानी और समय पर मिलने वाली चेतावनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यदि संभावित खतरे की पहचान शुरुआती चरण में हो जाए, तो संबंधित विभाग आवश्यक संसाधनों और नियंत्रण उपायों की तैयारी कर सकते हैं।

ICAR-NIFMD के निदेशक डॉ. जे.के. महापात्रा ने प्रयोगशाला की तैयारी, तेजी से निदान और वैक्सीन संबंधी तैयारियों को मजबूत करने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने बताया कि किसी भी नए रोग सीरोटाइप के जोखिम से निपटने के लिए Diagnostic Capacity और Vaccine Preparedness महत्वपूर्ण हैं।

राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद सचिवालय के निदेशक ब्रिगेडियर एम.एम. रामचंद्र ने सीमा पार पशु रोगों की रोकथाम में अंतर-एजेंसी समन्वय और सीमा सतर्कता की भूमिका को रेखांकित किया। उन्होंने संकेत दिया कि पशु रोगों से जुड़े जोखिमों का प्रभाव केवल पशुपालन विभाग तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसके लिए कई राष्ट्रीय एजेंसियों की संयुक्त भूमिका जरूरी होती है।

समापन सत्र में राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय प्रयोगशालाओं को मजबूत करने पर जोर

अभ्यास का समापन 5 नवंबर 2026 को हुआ। समापन सत्र की अध्यक्षता पशुपालन और डेयरी विभाग के अपर सचिव (पशुधन स्वास्थ्य) श्री रमाशंकर सिन्हा ने की।

उन्होंने राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर रोग निदान की क्षमता को मजबूत करने की आवश्यकता पर जोर दिया। इस दौरान ICAR-NIFMD के तकनीकी सहयोग के साथ Regional FMD Laboratories और Regional Disease Diagnostic Laboratories (RDDLs) की भूमिका पर चर्चा की गई।

उन्होंने कहा कि किसी भी संक्रामक पशु रोग के प्रभावी नियंत्रण के लिए प्रयोगशालाओं की क्षमता, प्रशिक्षित विशेषज्ञों और त्वरित जांच व्यवस्था का मजबूत होना जरूरी है।

राज्य स्तर पर रोग की पहचान और राष्ट्रीय स्तर पर उसकी वैज्ञानिक पुष्टि के बीच बेहतर तालमेल विकसित करने से प्रतिक्रिया प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है। इसके लिए प्रयोगशालाओं के बीच समन्वय, नमूनों की समय पर जांच और रिपोर्टिंग व्यवस्था को मजबूत करने की आवश्यकता है।

अभ्यास से सामने आईं प्रमुख प्राथमिकताएं

दो दिवसीय अभ्यास के दौरान प्रतिभागियों ने कई महत्वपूर्ण पहलुओं पर विचार-विमर्श किया। इनमें समय पर रिपोर्टिंग, त्वरित प्रयोगशाला पुष्टि, रोग निगरानी, पशुओं की आवाजाही पर नियंत्रण, वैक्सीन की उपलब्धता और अंतरराज्यीय समन्वय प्रमुख रहे।

इस अभ्यास ने यह स्पष्ट किया कि पशु रोगों से निपटने के लिए एक ऐसी व्यवस्था जरूरी है, जिसमें किसान, पशुपालक, स्थानीय पशु चिकित्सक, राज्य पशुपालन विभाग, राष्ट्रीय संस्थान और प्रयोगशालाएं एक-दूसरे से जुड़े हों।

अभ्यास के दौरान प्राप्त जानकारी, सुझाव और सिफारिशें भविष्य में राष्ट्रीय तैयारियों तथा समन्वित प्रतिक्रिया तंत्र को मजबूत करने में सहायक होंगी।

FMD-मुक्त Compartments पर अलग तकनीकी बैठक

‘वज्र-सैट’ के साथ ही 5 नवंबर 2026 को राज्यों की भागीदारी से FMD-मुक्त Compartmentalisation पर एक अलग तकनीकी बैठक भी आयोजित की गई। इसकी सह-अध्यक्षता पशुपालन और डेयरी विभाग के अपर सचिव (पशुधन स्वास्थ्य) तथा पशुपालन आयुक्त ने की।

इस बैठक का मुख्य फोकस वीर्य उत्पादन केंद्रों (Semen Production Centres) और वीर्य बैंकों (Semen Banks) को FMD-मुक्त इकाइयों के रूप में विकसित करने से संबंधित पहलुओं पर था।

Compartmentalisation एक ऐसी व्यवस्था है, जिसमें किसी निर्धारित पशुधन इकाई या उत्पादन क्षेत्र में कड़े जैव-सुरक्षा (Biosecurity), निगरानी और रोग नियंत्रण उपाय लागू किए जाते हैं। इसका उद्देश्य पूरे क्षेत्र की स्थिति से अलग, उस विशेष इकाई की रोग-मुक्त स्थिति को वैज्ञानिक तरीके से प्रमाणित और बनाए रखना है।

इस पहल से मूल्यवान पशुधन आनुवंशिक संसाधनों (Livestock Genetic Resources) की सुरक्षा मजबूत करने और सुरक्षित पशुधन व्यापार को बढ़ावा देने में मदद मिल सकती है।

विशेष रूप से वीर्य उत्पादन केंद्रों और वीर्य बैंकों में रोग नियंत्रण का महत्व अधिक है, क्योंकि यहां से प्राप्त आनुवंशिक सामग्री का उपयोग कृत्रिम गर्भाधान और पशुधन नस्ल सुधार कार्यक्रमों में किया जाता है। यदि इन केंद्रों में रोग नियंत्रण के मजबूत मानक लागू होते हैं, तो पशुधन प्रजनन से जुड़े संसाधनों की सुरक्षा में मदद मिल सकती है।

पशुपालकों और डेयरी अर्थव्यवस्था के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह पहल?

भारत में पशुपालन ग्रामीण अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। बड़ी संख्या में किसान खेती के साथ-साथ गाय, भैंस और अन्य पशुओं का पालन करते हैं। दूध उत्पादन, पशु बिक्री और अन्य पशुधन गतिविधियां ग्रामीण परिवारों की नियमित आय का आधार हैं।

FMD जैसे रोगों के कारण पशुओं का स्वास्थ्य प्रभावित हो सकता है। संक्रमित पशुओं में दूध उत्पादन घट सकता है, वजन कम हो सकता है और काम करने की क्षमता प्रभावित हो सकती है। इसके अलावा उपचार, देखभाल और उत्पादन में कमी के कारण पशुपालकों की लागत बढ़ सकती है।

यदि किसी क्षेत्र में रोग का व्यापक प्रकोप होता है, तो उसका प्रभाव दूध संग्रहण, डेयरी आपूर्ति श्रृंखला, पशु व्यापार और संबंधित उद्योगों पर भी पड़ सकता है।

इसलिए SAT-1 जैसे संभावित जोखिमों के लिए पहले से तैयारी करना केवल पशु स्वास्थ्य का विषय नहीं है, बल्कि किसानों की आजीविका, ग्रामीण रोजगार और राष्ट्रीय पशुधन अर्थव्यवस्था की सुरक्षा से भी जुड़ा है।

पशुपालकों को भी इस दिशा में सक्रिय भूमिका निभानी होगी। उन्हें पशुओं में असामान्य लक्षण दिखाई देने पर तुरंत स्थानीय पशु चिकित्सक या पशुपालन विभाग को सूचना देनी चाहिए। नए पशुओं को झुंड में शामिल करते समय आवश्यक स्वास्थ्य जांच और Biosecurity उपाय अपनाने चाहिए। पशुओं के बाड़े की स्वच्छता, संक्रमित पशुओं को अलग रखने और निर्धारित टीकाकरण कार्यक्रम का पालन करने से रोग नियंत्रण में मदद मिल सकती है।

पशुधन सुरक्षा के लिए पूर्व तैयारी और समन्वित कार्रवाई जरूरी

राष्ट्रीय अभ्यास ‘वज्र-सैट’ भारत की पशुधन स्वास्थ्य सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण तैयारी पहल है। भारत में FMD Serotype SAT-1 के मामले सामने नहीं आए हैं, लेकिन इसके भौगोलिक प्रसार को देखते हुए निगरानी, प्रयोगशाला जांच और आपातकालीन प्रतिक्रिया की तैयारी को मजबूत करना आवश्यक है।

दो दिवसीय अभ्यास में 25 राज्यों, 3 केंद्र शासित प्रदेशों और प्रमुख राष्ट्रीय संस्थानों के 83 प्रतिभागियों की भागीदारी ने केंद्र, राज्य और तकनीकी संस्थानों के बीच समन्वय की आवश्यकता को रेखांकित किया।

प्रारंभिक पहचान, त्वरित निदान, महामारी विज्ञान जांच, पशुओं की आवाजाही पर नियंत्रण, आपातकालीन टीकाकरण और जोखिम संचार जैसे उपाय किसी भी संभावित प्रकोप को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण होंगे।

इसके साथ ही FMD-मुक्त Compartmentalisation की दिशा में की गई तकनीकी चर्चा वीर्य उत्पादन केंद्रों, पशुधन आनुवंशिक संसाधनों और सुरक्षित व्यापार के लिए उपयोगी साबित हो सकती है।

कुल मिलाकर, ‘वज्र-सैट’ का संदेश स्पष्ट है—पशुधन रोगों से सुरक्षा के लिए केवल बीमारी फैलने के बाद कार्रवाई करना पर्याप्त नहीं है। समय रहते खतरे की पहचान, वैज्ञानिक तैयारी और सभी संबंधित एजेंसियों की संयुक्त प्रतिक्रिया ही किसानों की आजीविका और देश की पशुधन अर्थव्यवस्था को सुरक्षित रखने का मजबूत आधार बन सकती है।

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