भारत को दक्षिणी हिंद महासागर में मछली पकड़ने के नए अवसर, SIOFA समझौते में शामिल होने को केंद्र सरकार की मंजूरी

New fishing opportunities for India in the Southern Indian Ocean, Central Government approves joining the SIOFA agreement

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भारत की समुद्री अर्थव्यवस्था, मत्स्य पालन क्षेत्र और अंतरराष्ट्रीय समुद्री संसाधनों तक पहुंच को मजबूत करने की दिशा में केंद्र सरकार ने एक महत्वपूर्ण फैसला लिया है। केंद्र सरकार ने दक्षिणी हिंद महासागर मत्स्य पालन समझौते (Southern Indian Ocean Fisheries Agreement–SIOFA) में भारत के प्रवेश को मंजूरी दे दी है। इस फैसले से भारत को खुले समुद्र में मछली पकड़ने की गतिविधियों का विस्तार करने, उच्च मूल्य वाली समुद्री प्रजातियों के संसाधनों तक वैध पहुंच हासिल करने और वैश्विक मत्स्य पालन प्रबंधन में अपनी भागीदारी मजबूत करने का अवसर मिलेगा।

यह निर्णय भारत की Blue Economy यानी नीली अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। खुले समुद्र में मत्स्य संसाधनों का वैज्ञानिक प्रबंधन, अंतरराष्ट्रीय नियमों के अनुरूप मछली पकड़ना और समुद्री जैव विविधता का संरक्षण इस पहल के प्रमुख पहलू हैं। SIOFA के अंतर्गत भारतीय ध्वज वाले मछली पकड़ने वाले जहाजों और मत्स्य व्यवसायों के लिए स्क्विड, टूथफिश, अल्फोंसो और अन्य गैर-प्रवासी मछली प्रजातियों के दोहन के अवसर बढ़ सकते हैं, बशर्ते संबंधित प्रजातियों, क्षेत्र और गतिविधियों के लिए लागू संरक्षण उपायों, अनुमतियों तथा प्रबंधन नियमों का पालन किया जाए।

सरकार के अनुसार, यह फैसला दिसंबर 2025 में जारी खुले समुद्र में मत्स्य पालन संबंधी दिशानिर्देशों के बाद उठाया गया एक महत्वपूर्ण कदम है। इससे भारतीय मछली पकड़ने वाले बेड़े को अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में अपनी गतिविधियों के विस्तार के लिए एक क्षेत्रीय संस्थागत ढांचा मिलेगा। साथ ही, भारत को समुद्री संसाधनों के वैज्ञानिक आकलन, मत्स्य प्रबंधन संबंधी निर्णयों और अवैध मछली पकड़ने पर नियंत्रण के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग में अधिक सक्रिय भूमिका निभाने का अवसर मिलेगा।

क्या है SIOFA समझौता और भारत के लिए क्यों है महत्वपूर्ण?

Southern Indian Ocean Fisheries Agreement यानी SIOFA दक्षिणी हिंद महासागर क्षेत्र में मत्स्य संसाधनों के संरक्षण और प्रबंधन से संबंधित एक अंतरराष्ट्रीय समझौता है। इसका उद्देश्य संबंधित समुद्री क्षेत्रों में उपलब्ध मत्स्य संसाधनों का वैज्ञानिक आधार पर प्रबंधन करना, उनके टिकाऊ उपयोग को बढ़ावा देना और सदस्य पक्षों के बीच सहयोग मजबूत करना है।

खुले समुद्र में मछली पकड़ने की गतिविधियां किसी एक देश के तटीय जलक्षेत्र तक सीमित नहीं होतीं। इन क्षेत्रों में विभिन्न देशों के मछली पकड़ने वाले जहाज काम करते हैं और समुद्री संसाधनों के उचित प्रबंधन के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग की जरूरत होती है। यदि वैज्ञानिक आकलन और प्रभावी निगरानी के बिना मछली पकड़ने की गतिविधियां बढ़ती हैं, तो कुछ प्रजातियों के भंडार पर दबाव बढ़ सकता है।

SIOFA इस चुनौती से निपटने के लिए क्षेत्रीय सहयोग का ढांचा उपलब्ध कराता है। इसके तहत संबंधित पक्ष समुद्री संसाधनों की स्थिति का अध्ययन करने, मत्स्य गतिविधियों की निगरानी करने, संरक्षण उपायों पर विचार करने और नियमों के अनुपालन को बेहतर बनाने के लिए सहयोग कर सकते हैं।

भारत के लिए इस समझौते का महत्व इसलिए भी अधिक है, क्योंकि देश का मत्स्य पालन क्षेत्र लाखों मछुआरों, मछली उत्पादकों, प्रसंस्करण इकाइयों, परिवहन कारोबारियों और निर्यातकों की आजीविका से जुड़ा हुआ है। समुद्री मत्स्य पालन में नए अवसर विकसित होने से इस पूरी मूल्य शृंखला को लाभ पहुंचाने की संभावना बन सकती है।

हालांकि, अंतरराष्ट्रीय समझौते में प्रवेश का अर्थ यह नहीं है कि भारतीय जहाजों को बिना किसी सीमा या अनुमति के पूरे दक्षिणी हिंद महासागर में मछली पकड़ने की छूट मिल जाएगी। वास्तविक गतिविधियां संबंधित क्षेत्रीय नियमों, प्रजातियों के लिए निर्धारित संरक्षण उपायों, अनुमतियों और लागू निगरानी व्यवस्था के अनुसार संचालित होंगी।

स्क्विड, टूथफिश और अल्फोंसो जैसी प्रजातियों तक बढ़ेगी पहुंच

सरकार की घोषणा के अनुसार, SIOFA में भारत के प्रवेश से भारतीय ध्वज वाले मछली पकड़ने वाले जहाजों और व्यवसायों को समझौते के दायरे में आने वाली कुछ उच्च मूल्य वाली समुद्री प्रजातियों के मत्स्य संसाधनों तक अधिकृत पहुंच बनाने का अवसर मिलेगा। इनमें स्क्विड, टूथफिश, अल्फोंसो और अन्य गैर-प्रवासी प्रजातियां शामिल हैं।

इन प्रजातियों का व्यावसायिक महत्व समुद्री खाद्य बाजारों में उनकी मांग और उपयोग के कारण है। इनके लिए उपयुक्त प्रबंधन व्यवस्था के अंतर्गत मछली पकड़ने की गतिविधियां भारतीय समुद्री खाद्य उद्योग के लिए नए कारोबार के अवसर पैदा कर सकती हैं।

स्क्विड (Squid): स्क्विड समुद्री खाद्य बाजार में महत्वपूर्ण स्थान रखने वाला मोलस्क है। इसका उपयोग घरेलू खपत के साथ अंतरराष्ट्रीय Seafood Trade में भी किया जाता है। उचित संसाधन प्रबंधन और बाजार तक पहुंच के माध्यम से इससे जुड़े कारोबार को विस्तार मिल सकता है।

टूथफिश (Toothfish): टूथफिश ठंडे समुद्री क्षेत्रों में पाई जाने वाली उच्च मूल्य वाली मछली है, जिसकी कुछ अंतरराष्ट्रीय बाजारों में मांग रहती है। इसके मत्स्य संसाधनों का उपयोग करते समय प्रजाति की पहचान, उपलब्ध भंडार, संरक्षण नियमों और निर्धारित प्रबंधन उपायों का पालन विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।

अल्फोंसो (Alfonsino): अल्फोंसो गहरे समुद्री क्षेत्रों में पाई जाने वाली व्यावसायिक रूप से महत्वपूर्ण मछली है। इसका बाजार मूल्य और मांग इसे समुद्री मत्स्य पालन के लिए संभावित रूप से उपयोगी संसाधन बनाते हैं।

इन प्रजातियों के लिए नए अवसर विकसित होने से भारतीय कंपनियों को अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अपनी उपस्थिति बढ़ाने की संभावना मिल सकती है। लेकिन इसके लिए आधुनिक जहाजों, गहरे समुद्र में मछली पकड़ने की तकनीक, सुरक्षित भंडारण, शीत शृंखला, प्रसंस्करण और बाजार संबंधी जानकारी में निवेश की जरूरत होगी।

इसके साथ ही यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि मछली पकड़ने की गतिविधियां वैज्ञानिक रूप से निर्धारित सीमाओं के भीतर हों, ताकि अल्पकालिक आर्थिक लाभ के लिए समुद्री संसाधनों की दीर्घकालिक उपलब्धता प्रभावित न हो।

भारतीय मछुआरों और Seafood Export उद्योग को क्या मिलेगा लाभ?

भारत के समुद्री मत्स्य पालन क्षेत्र में नए अंतरराष्ट्रीय अवसर विकसित होने से मछुआरों, मत्स्य उद्यमियों, जहाज संचालकों, प्रसंस्करण कंपनियों और निर्यातकों के लिए संभावनाएं बढ़ सकती हैं। SIOFA में प्रवेश से भारत को ऐसे क्षेत्रीय प्रबंधन निर्णयों में अधिक सक्रिय भूमिका निभाने का अवसर मिलेगा, जो खुले समुद्र में मत्स्य गतिविधियों को प्रभावित करते हैं।

भारत पहले से ही समुद्री खाद्य उत्पादों के उत्पादन और निर्यात में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। झींगा, मछली और अन्य समुद्री उत्पाद भारतीय Seafood Export क्षेत्र के प्रमुख हिस्से हैं। नए समुद्री क्षेत्रों तक नियंत्रित और वैध पहुंच से भविष्य में उत्पादों की विविधता बढ़ाने और कुछ बाजारों में नए अवसर तलाशने में मदद मिल सकती है।

हालांकि, खुले समुद्र में मछली पकड़ने का कारोबार तटीय मछली पकड़ने की तुलना में अधिक पूंजी और तकनीकी क्षमता मांग सकता है। लंबी समुद्री यात्राओं, ईंधन, जहाजों के रखरखाव, चालक दल की सुरक्षा, रेफ्रिजरेशन और उत्पादों को सुरक्षित बंदरगाह तक पहुंचाने की लागत अधिक हो सकती है।

इसलिए इस फैसले का लाभ छोटे मछुआरों तक पहुंचाने के लिए केवल अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में जाने की अनुमति पर्याप्त नहीं होगी। उन्हें वित्तीय सहायता, तकनीकी प्रशिक्षण, आधुनिक उपकरण, बाजार संपर्क और उपयुक्त व्यावसायिक साझेदारी की भी जरूरत पड़ सकती है।

जहाज संचालकों और मत्स्य उद्यमियों के लिए यह आवश्यक होगा कि वे किसी भी अभियान से पहले लागत, संभावित पकड़, संबंधित नियमों और बाजार की मांग का आकलन करें। इसी तरह, समुद्री उत्पादों की गुणवत्ता और अंतरराष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मानकों का पालन भी निर्यात कारोबार के लिए महत्वपूर्ण रहेगा।

2025 के खुले समुद्री मत्स्य पालन दिशानिर्देशों से जुड़ा फैसला

केंद्र सरकार ने दिसंबर 2025 में खुले समुद्र में मत्स्य पालन से संबंधित दिशानिर्देश जारी किए थे। SIOFA में भारत के प्रवेश को मंजूरी इस व्यापक पहल के अगले महत्वपूर्ण कदम के रूप में देखा जा सकता है।

खुले समुद्र में मत्स्य पालन का विस्तार करने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर नीतिगत दिशा और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त प्रबंधन व्यवस्था, दोनों की जरूरत होती है। घरेलू दिशानिर्देश भारतीय जहाजों और उद्यमों की गतिविधियों के लिए नीतिगत आधार उपलब्ध कराते हैं, जबकि क्षेत्रीय मत्स्य समझौते संबंधित समुद्री क्षेत्र में संरक्षण, प्रबंधन और सहयोग के नियम निर्धारित करने में भूमिका निभाते हैं।

भारत की समुद्री मत्स्य नीति का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य तटीय जलक्षेत्र से आगे उपलब्ध संभावनाओं का आकलन करना और मत्स्य संसाधनों का जिम्मेदार उपयोग सुनिश्चित करना है। इससे समुद्री अर्थव्यवस्था में विविधता लाने के अवसर विकसित हो सकते हैं।

लेकिन खुले समुद्र में मछली पकड़ने का विस्तार करते समय जहाजों की क्षमता, वैज्ञानिक जानकारी, संसाधनों की उपलब्धता, समुद्री सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण को साथ लेकर चलना होगा। केवल मछली पकड़ने की मात्रा बढ़ाने के बजाय संसाधनों की दीर्घकालिक स्थिति को ध्यान में रखना आवश्यक होगा।

भारत को मिलेगा वैज्ञानिक समिति और अनुपालन समिति में अधिक सक्रिय स्थान

अब तक भारत SIOFA में Cooperative Non-Contracting Party (CNCP) यानी सहयोगी गैर-अनुबंधित पक्ष के रूप में शामिल रहा है। भारत वर्ष 2022 से इस व्यवस्था के अंतर्गत भागीदारी कर रहा था।

CNCP की स्थिति में भारत को समझौते की गतिविधियों में सहयोग का अवसर मिलता था, लेकिन प्रमुख निर्णय लेने वाली प्रक्रियाओं में उसकी भागीदारी सीमित थी। विशेष रूप से वैज्ञानिक समिति और अनुपालन समिति जैसे निकायों में पूर्ण भागीदारी का महत्व अधिक है, क्योंकि इन्हीं मंचों पर मत्स्य संसाधनों के आकलन, संरक्षण उपायों और नियमों के अनुपालन से जुड़े मुद्दों पर विचार किया जाता है।

सरकार द्वारा भारत के प्रवेश को मंजूरी मिलने के बाद समझौते के अंतर्गत पूर्ण भागीदारी की दिशा में आगे बढ़ने का अवसर मिलेगा। इसके लिए आवश्यक औपचारिक प्रक्रियाओं के पूरा होने के बाद भारत संबंधित निकायों में अपनी भूमिका मजबूत कर सकेगा।

इससे भारतीय विशेषज्ञों को वैज्ञानिक आंकड़ों, अनुसंधान कार्यक्रमों और मछली भंडार के आकलन से संबंधित प्रक्रियाओं में अधिक व्यवस्थित भागीदारी का अवसर मिल सकता है। समुद्री संसाधनों की स्थिति को समझने के लिए वैज्ञानिक डेटा महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि इसके आधार पर यह तय किया जा सकता है कि किसी प्रजाति के संसाधनों का उपयोग किस सीमा तक टिकाऊ रह सकता है।

इसके अतिरिक्त, भारत को अन्य सहयोगी पक्षों के साथ संरक्षण और प्रबंधन से संबंधित प्रस्तावों पर विचार-विमर्श करने का अवसर मिलेगा। इससे देश अपने आर्थिक और पर्यावरणीय हितों को अंतरराष्ट्रीय मत्स्य शासन की प्रक्रियाओं में अधिक प्रभावी ढंग से सामने रख सकता है।

अवैध मछली पकड़ने पर नियंत्रण और समुद्री सुरक्षा को बढ़ावा

SIOFA में भारत की अधिक सक्रिय भागीदारी का एक महत्वपूर्ण पहलू अवैध, अनिर्दिष्ट और अनियंत्रित मछली पकड़ने पर नियंत्रण से जुड़ा है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसे Illegal, Unreported and Unregulated Fishing यानी IUU Fishing कहा जाता है।

IUU Fishing के अंतर्गत ऐसी गतिविधियां शामिल हो सकती हैं, जो लागू नियमों का उल्लंघन करती हैं, जिनकी सही जानकारी संबंधित अधिकारियों को नहीं दी जाती या जो प्रभावी प्रबंधन व्यवस्था के बाहर संचालित होती हैं। इससे मत्स्य संसाधनों की वास्तविक स्थिति का आकलन करना कठिन हो जाता है और नियमों का पालन करने वाले मछुआरों तथा व्यवसायों को नुकसान पहुंच सकता है।

खुले समुद्र में निगरानी करना चुनौतीपूर्ण होता है, क्योंकि विशाल समुद्री क्षेत्रों में अनेक देशों के जहाज सक्रिय रहते हैं। ऐसे में जहाजों की पहचान, गतिविधियों की निगरानी, पकड़ की रिपोर्टिंग और अंतरराष्ट्रीय सहयोग महत्वपूर्ण हो जाते हैं।

SIOFA के अंतर्गत भारत को समुद्री निगरानी और अनुपालन संबंधी व्यवस्थाओं में अधिक सक्रिय भूमिका निभाने का अवसर मिलेगा। इससे नियमों के पालन, मत्स्य संसाधनों के संरक्षण और अवैध गतिविधियों की रोकथाम में सहयोग मजबूत किया जा सकता है।

सरकार ने समझौते के अंतर्गत अपनाई गई High Seas Boarding and Inspection (HSBI) योजना में सक्रिय भागीदारी को भी महत्वपूर्ण बताया है। इस व्यवस्था का उद्देश्य निर्धारित नियमों के अनुसार खुले समुद्र में जहाजों की जांच और निरीक्षण से संबंधित सहयोग को मजबूत करना है।

यहां यह ध्यान रखना जरूरी है कि बोर्डिंग और निरीक्षण की गतिविधियां संबंधित अंतरराष्ट्रीय नियमों तथा निर्धारित प्रक्रियाओं के अनुसार ही संचालित होती हैं। भारत की भागीदारी से समुद्री क्षेत्र में निगरानी और अनुपालन संबंधी सहयोग को आगे बढ़ाने का अवसर मिलेगा।

हिंद महासागर में भारत की मौजूदा भूमिका

हिंद महासागर क्षेत्र में मत्स्य संसाधनों के प्रबंधन के लिए विभिन्न क्षेत्रीय व्यवस्थाएं मौजूद हैं। इनमें Indian Ocean Tuna Commission (IOTC) और Southern Indian Ocean Fisheries Agreement (SIOFA) महत्वपूर्ण हैं, हालांकि दोनों का दायरा और प्रबंधित संसाधन अलग-अलग हैं।

भारत वर्ष 1996 से IOTC का अनुबंधित पक्ष रहा है। IOTC मुख्य रूप से टूना और टूना जैसी अत्यधिक प्रवासी प्रजातियों के प्रबंधन से संबंधित है। दूसरी ओर, SIOFA समझौते के दायरे में आने वाले दक्षिणी हिंद महासागर के मत्स्य संसाधनों पर केंद्रित है, जिनमें कई गैर-अत्यधिक प्रवासी प्रजातियां शामिल हैं।

भारत की SIOFA में भागीदारी मजबूत होने से हिंद महासागर के अलग-अलग मत्स्य प्रबंधन ढांचों में उसकी भूमिका को विस्तार मिलने की संभावना है। इससे देश को क्षेत्रीय संसाधनों के वैज्ञानिक प्रबंधन और अंतरराष्ट्रीय मत्स्य नीतियों पर चर्चा में अधिक सक्रिय योगदान देने का अवसर मिलेगा।

भारत की समुद्री अर्थव्यवस्था के लिए यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि समुद्री मत्स्य पालन केवल मछली उत्पादन का विषय नहीं है। इसका संबंध निर्यात, रोजगार, बंदरगाह आधारित आर्थिक गतिविधियों, समुद्री परिवहन, प्रसंस्करण उद्योग और तटीय समुदायों की आजीविका से भी है।

खुले समुद्र में मछली पकड़ने में अभी कई चुनौतियां

सरकार की इस पहल से अवसर बढ़ने की संभावना है, लेकिन खुले समुद्र में मछली पकड़ने का विस्तार आसान नहीं होगा। भारतीय मछली पकड़ने वाले जहाज फिलहाल सामान्य रूप से अपने तटीय क्षेत्रों से लगभग 60 से 80 नॉटिकल मील तक की दूरी पर काम करते हैं, हालांकि परिचालन दूरी जहाज, क्षेत्र और गतिविधि के अनुसार अलग-अलग हो सकती है।

इसके मुकाबले दूरस्थ खुले समुद्री क्षेत्रों में मछली पकड़ने के लिए अधिक सक्षम जहाज, लंबी यात्राओं की योजना, आधुनिक नेविगेशन सिस्टम, सुरक्षित संचार व्यवस्था और पर्याप्त भंडारण सुविधाओं की आवश्यकता होती है।

जहाजों को समुद्र में लंबे समय तक काम करने के लिए ईंधन, चालक दल के रहने की व्यवस्था, समुद्री मौसम की जानकारी, आपातकालीन सहायता और पकड़ को सुरक्षित रखने के लिए Cold Storage की जरूरत होती है। इन व्यवस्थाओं में निवेश किए बिना नए समुद्री क्षेत्रों में व्यावसायिक गतिविधियां शुरू करना जोखिमपूर्ण हो सकता है।

इसके अलावा, प्रत्येक क्षेत्र में उपलब्ध मछली संसाधनों की मात्रा और उनकी जैविक स्थिति को समझना भी जरूरी है। यदि किसी प्रजाति का भंडार सीमित है या उस पर पहले से अधिक दबाव है, तो अतिरिक्त मछली पकड़ने की गतिविधियां उसके संरक्षण को प्रभावित कर सकती हैं।

इसलिए भारत के लिए वैज्ञानिक अनुसंधान, व्यावसायिक क्षमता और पर्यावरणीय जिम्मेदारी के बीच संतुलन बनाना महत्वपूर्ण होगा। खुले समुद्र में मत्स्य पालन का विस्तार तभी लंबे समय तक लाभकारी साबित हो सकता है, जब आर्थिक गतिविधियों के साथ समुद्री जैव विविधता और संसाधनों की पुनःपूर्ति क्षमता को भी सुरक्षित रखा जाए।

वैश्विक मत्स्य पालन बाजार में भारत के लिए नई संभावनाएं

खुले समुद्र में वैध मत्स्य गतिविधियों के अवसर बढ़ने से भारत को अपने समुद्री खाद्य कारोबार को विविध बनाने की संभावना मिल सकती है। नए संसाधनों तक नियंत्रित पहुंच, वैज्ञानिक जानकारी और अंतरराष्ट्रीय नियमों में अधिक सक्रिय भागीदारी से भारतीय कंपनियों को भविष्य की व्यावसायिक रणनीतियां तैयार करने में मदद मिल सकती है।

हालांकि, वैश्विक मत्स्य पालन बाजार में प्रतिस्पर्धा के लिए केवल संसाधनों तक पहुंच पर्याप्त नहीं है। उत्पादों की गुणवत्ता, पकड़ का प्रमाणित रिकॉर्ड, ट्रेसबिलिटी, प्रसंस्करण क्षमता और अंतरराष्ट्रीय बाजारों की आवश्यकताओं का पालन भी आवश्यक है।

भारतीय उद्यमियों के लिए यह अवसर आधुनिक समुद्री मत्स्य तकनीक, जहाज प्रबंधन, कोल्ड चेन और Seafood Processing में निवेश को बढ़ावा दे सकता है। वहीं, सरकार और संबंधित संस्थानों के लिए वैज्ञानिक डेटा संग्रह, प्रशिक्षण तथा नियमों के अनुपालन की प्रभावी व्यवस्था विकसित करना महत्वपूर्ण रहेगा।

यदि इस पहल को योजनाबद्ध तरीके से लागू किया जाता है, तो भारत अपनी समुद्री अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के साथ अंतरराष्ट्रीय मत्स्य संसाधनों के जिम्मेदार उपयोग में भी योगदान दे सकता है।

समुद्री अर्थव्यवस्था और टिकाऊ मत्स्य पालन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम

दक्षिणी हिंद महासागर मत्स्य पालन समझौते में भारत के प्रवेश को मंजूरी देना देश की समुद्री रणनीति और मत्स्य पालन क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण घटनाक्रम है। इससे भारत को खुले समुद्र में मत्स्य संसाधनों तक वैध पहुंच के अवसर विकसित करने, अंतरराष्ट्रीय निर्णय प्रक्रियाओं में भागीदारी बढ़ाने और वैज्ञानिक अनुसंधान तथा संरक्षण उपायों में सहयोग मजबूत करने का रास्ता मिलेगा।

स्क्विड, टूथफिश, अल्फोंसो और अन्य संबंधित समुद्री प्रजातियों के संसाधनों तक पहुंच भारतीय मत्स्य व्यवसायों के लिए नए अवसर पैदा कर सकती है। साथ ही, IUU Fishing की रोकथाम, वैज्ञानिक आकलन और समुद्री निगरानी में सहयोग भारत की अंतरराष्ट्रीय भूमिका को मजबूत कर सकता है।

फिर भी, इस फैसले का वास्तविक आर्थिक लाभ भारतीय जहाजों की क्षमता, संबंधित अनुमतियों, निवेश, बाजार तक पहुंच और टिकाऊ मत्स्य प्रबंधन पर निर्भर करेगा। सरकार, वैज्ञानिक संस्थानों, मछुआरों और निजी क्षेत्र के बीच बेहतर समन्वय इस पहल को सफल बनाने में महत्वपूर्ण होगा।

कुल मिलाकर, SIOFA में भारत की भागीदारी का उद्देश्य केवल अधिक मछली पकड़ना नहीं, बल्कि खुले समुद्र में भारत की मान्यता प्राप्त उपस्थिति को मजबूत करना, समुद्री संसाधनों का जिम्मेदार उपयोग सुनिश्चित करना और देश की Blue Economy को दीर्घकालिक आधार प्रदान करना है।

 

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