Parali Management Scheme: पराली जलाने पर रोक के लिए राज्यों का नया Action Plan, किसानों के लिए बड़े बदलाव

Stubble Management Scheme: States' new action plan to curb stubble burning; major changes for farmers.

Parali Management Scheme

Parali Management Scheme

Parali Management Scheme: हर साल धान की कटाई का मौसम आते ही उत्तर भारत में पराली का मुद्दा चर्चा में आ जाता है। पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश जैसे कृषि प्रधान इलाकों में कम समय के भीतर धान की कटाई पूरी करके गेहूं की बुवाई करनी होती है। खेत में बचे फसल अवशेष को हटाने का सबसे तेज और सस्ता तरीका कई किसानों को उसे जलाना दिखाई देता है। यही कारण है कि तमाम जागरूकता अभियानों, मशीनों और सरकारी योजनाओं के बावजूद पराली जलाने की घटनाएं पूरी तरह समाप्त नहीं हो पाई हैं।

लेकिन 2026 में सरकार की रणनीति पहले की तुलना में अधिक व्यापक दिखाई दे रही है। अब मामला केवल किसानों को पराली न जलाने की सलाह देने या घटनाओं के बाद कार्रवाई करने तक सीमित नहीं है। खेतों की मैपिंग, किसानों को नोडल अधिकारियों से जोड़ना, मशीनों की उपलब्धता, Custom Hiring Centres, औद्योगिक इकाइयों में पराली के इस्तेमाल, बायोमास पेलेट और ब्रिकेट, डिजिटल मॉनिटरिंग, Flying Squads तथा वास्तविक समय की निगरानी जैसे कई स्तर एक साथ जोड़े जा रहे हैं।

5 अक्टूबर 2026 को केंद्र सरकार द्वारा जारी जानकारी के अनुसार पंजाब और हरियाणा के 34 जिलों में पराली जलाने की रोकथाम के लिए Flying Squads तैनात किए गए हैं। इनमें पंजाब के 18 और हरियाणा के 16 जिले शामिल हैं। ये टीमें 1 अक्टूबर से 30 नवंबर 2026 के महत्वपूर्ण धान कटाई सीजन के दौरान जमीनी स्थिति की निगरानी कर रही हैं।ऐसे में यह समझना जरूरी है कि पराली प्रबंधन पर राज्य सरकारों की नई व्यवस्था आखिर है क्या, किसानों को इससे क्या फायदा मिल सकता है और क्या यह मॉडल पराली की समस्या का स्थायी समाधान बन सकता है।

पराली क्या है और समस्या इतनी बड़ी क्यों है?

धान, गेहूं और दूसरी फसलों की कटाई के बाद खेत में तना, पत्तियां और अन्य अवशेष बच जाते हैं। इन्हीं कृषि अवशेषों को सामान्य भाषा में पराली कहा जाता है। विशेष रूप से धान की पराली को लेकर समस्या अधिक देखने को मिलती है।

धान की कटाई और गेहूं की बुवाई के बीच किसानों के पास सीमित समय होता है। अगर किसान पारंपरिक तरीके से अवशेष हटाते हैं तो इसमें श्रम, मशीन, परिवहन और अतिरिक्त खर्च लगता है। पराली जलाने पर कुछ ही समय में खेत अगली फसल के लिए तैयार दिखाई देने लगता है। तत्काल तौर पर यह आसान विकल्प लगता है, लेकिन इसका पर्यावरण और मिट्टी पर गंभीर प्रभाव पड़ता है।

पराली जलाने से धुआं और महीन प्रदूषक तत्व वातावरण में पहुंचते हैं। सर्दियों की शुरुआत में हवा की गति कम होने और मौसम संबंधी परिस्थितियों के कारण उत्तर भारत के कई क्षेत्रों में प्रदूषण लंबे समय तक बना रह सकता है। हालांकि दिल्ली-NCR के वायु प्रदूषण के पीछे वाहन, उद्योग, सड़क की धूल, निर्माण गतिविधियां, कचरा जलाना और मौसम समेत कई कारण हैं, लेकिन फसल अवशेष जलाना भी कुछ समय के लिए प्रदूषण का अतिरिक्त स्रोत बनता है।

खेत के स्तर पर भी आग लगाना लाभकारी नहीं माना जाता। इससे फसल अवशेष में मौजूद उपयोगी जैविक पदार्थ नष्ट हो सकता है और मिट्टी की ऊपरी परत के सूक्ष्म जीवों पर प्रभाव पड़ सकता है। इसलिए नई नीति का जोर पराली को केवल “कचरे” की तरह देखने के बजाय कृषि संसाधन और औद्योगिक कच्चे माल में बदलने पर है।

2026 में पराली प्रबंधन की नई व्यवस्था क्या है?

2026 की रणनीति में प्रशासनिक निगरानी, तकनीक, मशीनों की उपलब्धता और पराली के व्यावसायिक उपयोग को एक साथ जोड़ा गया है।CAQM ने पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश को 2026 के दौरान पराली जलाने की घटनाओं को समाप्त करने की दिशा में अपने Action Plans प्रभावी तरीके से लागू करने के निर्देश दिए हैं। इनमें प्रत्येक खेत की मैपिंग, किसान समूहों को नोडल अधिकारियों से जोड़ना, Crop Residue Management मशीनों की समीक्षा, Custom Hiring Centres की पहुंच और डिजिटल निगरानी जैसे उपाय शामिल हैं।यह बदलाव महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे व्यवस्था केवल जिले या गांव के स्तर पर नहीं, बल्कि खेत और किसान के स्तर तक पहुंचाने की कोशिश की जा रही है।

हर खेत की मैपिंग बनेगी नई व्यवस्था की नींव

नई व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा प्रत्येक खेत के लिए पहले से यह तय करना है कि वहां पैदा होने वाली पराली का प्रबंधन किस माध्यम से किया जाएगा।उदाहरण के लिए किसी खेत में पराली को मिट्टी में मिलाया जा सकता है, जबकि दूसरे खेत की पराली बेलर की मदद से इकट्ठी करके किसी औद्योगिक इकाई को भेजी जा सकती है। कुछ फसल अवशेष पशु चारे के रूप में काम आ सकते हैं।

इसका उद्देश्य यह है कि कटाई के बाद प्रशासन और किसान के सामने अचानक यह सवाल न आए कि खेत में पड़े अवशेष का क्या करना है। अगर गांव और खेत के स्तर पर पहले से योजना तैयार हो तो मशीन, परिवहन और खरीदार की व्यवस्था समय पर की जा सकती है।गेहूं के फसल अवशेष के लिए भी 2026 की सरकारी दिशा-निर्देशों में खेतवार मैपिंग तथा in-situ, ex-situ, fodder और crop diversification जैसे विकल्पों की पहचान पर जोर दिया गया।

किसानों को नोडल अधिकारियों से जोड़ा जाएगा

पराली प्रबंधन की योजनाओं में एक बड़ी चुनौती यह रही है कि राज्य स्तर पर बनाई गई योजना हर किसान तक समान रूप से नहीं पहुंच पाती। इसे देखते हुए अब किसानों के समूहों को नोडल अधिकारियों से जोड़ने का मॉडल अपनाया गया है।

2026 के दिशा-निर्देशों में एक नोडल अधिकारी के साथ अधिकतम 100 किसानों को जोड़ने की व्यवस्था बताई गई है। Hotspot villages में यह संख्या कम रखी जा सकती है, ताकि निगरानी और समन्वय अधिक प्रभावी हो।

इस मॉडल का उद्देश्य सिर्फ कार्रवाई करना नहीं होना चाहिए। अगर सही तरीके से लागू किया जाए तो नोडल अधिकारी किसान को यह जानकारी भी दे सकता है कि उसके आसपास कौन-सी मशीन उपलब्ध है, Custom Hiring Centre कहां है और पराली बेचने या पहुंचाने की व्यवस्था किस एजेंसी के पास है।यानी प्रशासनिक व्यवस्था को केवल enforcement से आगे बढ़ाकर facilitation से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है।

34 जिलों में Flying Squads की तैनाती

2026 में जमीनी स्तर पर निगरानी भी बढ़ाई गई है। 5 अक्टूबर 2026 को जारी आधिकारिक जानकारी के मुताबिक पंजाब और हरियाणा के कुल 34 जिलों में Flying Squads तैनात किए गए हैं।पंजाब में संगरूर, तरनतारन, फिरोजपुर, मुक्तसर, बठिंडा, अमृतसर, मोगा, मानसा, फाजिल्का, पटियाला, लुधियाना, कपूरथला, फरीदकोट, बरनाला, मालेरकोटला, गुरदासपुर, जालंधर और फतेहगढ़ साहिब जैसे जिले इसमें शामिल हैं।हरियाणा में जींद, फतेहाबाद, हिसार, कैथल, सोनीपत, रोहतक, सिरसा, करनाल, पलवल, झज्जर, कुरुक्षेत्र, अंबाला, यमुनानगर, फरीदाबाद, पानीपत और हांसी को शामिल किया गया है।

इन Flying Squads की जिम्मेदारी केवल खेत में आग देखने तक सीमित नहीं है। वे स्थानीय प्रशासन, किसानों, Parali Protection Force, राज्य सरकार के नोडल अधिकारियों, Pollution Control Boards और CAQM के संबंधित तंत्र के साथ समन्वय कर रहे हैं। जमीनी स्थिति की रिपोर्ट CAQM Cell को नियमित रूप से भेजने की व्यवस्था भी बनाई गई है।

मशीन आधारित पराली प्रबंधन पर बड़ा जोर

Crop Residue Management में मशीनों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। अगर किसान के पास उचित समय पर मशीन उपलब्ध नहीं होगी तो केवल पराली न जलाने की अपील व्यावहारिक समाधान नहीं बन सकती।पराली प्रबंधन में Happy Seeder, Super Seeder, Smart Seeder, Super Straw Management System, Mulcher, Baler, Straw Rake और Zero Till Seed Drill जैसी मशीनों का इस्तेमाल किया जाता है।

इनमें कुछ मशीनें पराली को खेत में ही काटकर या मिट्टी में मिलाकर अगली फसल की बुवाई में मदद करती हैं। दूसरी तरफ Baler और Rake जैसी मशीनें पराली को खेत से इकट्ठा करने में मदद करती हैं, ताकि उसे उद्योगों, बायोमास प्लांट या अन्य उपयोग के लिए भेजा जा सके।

सरकारी Crop Residue Management Scheme के अंतर्गत पात्र किसानों को मशीन की लागत पर आर्थिक सहायता देने तथा Cooperative Societies, Farmer Producer Organisations, पंचायतों और संबंधित संस्थाओं के माध्यम से Custom Hiring Centres स्थापित करने का प्रावधान रहा है। उपलब्ध आधिकारिक विवरण के अनुसार व्यक्तिगत किसानों के लिए मशीन लागत पर 50 प्रतिशत तक सहायता और पात्र समूहों/संस्थाओं द्वारा CHC स्थापना के लिए कुछ श्रेणियों में 80 प्रतिशत तक सहायता की व्यवस्था रही है। वास्तविक पात्रता और वर्तमान आवेदन शर्तें संबंधित राज्य तथा योजना के नियमों के अनुसार जांचना जरूरी है।

छोटे किसानों के लिए Custom Hiring Centre क्यों जरूरी?

हर किसान के लिए लाखों रुपये की कृषि मशीन खरीदना संभव नहीं है। विशेष रूप से छोटे और सीमांत किसानों के लिए मशीन खरीदने की तुलना में किराये या सामुदायिक उपयोग का मॉडल अधिक उपयोगी हो सकता है।इसी वजह से Custom Hiring Centres यानी CHCs पर सरकार का जोर बढ़ा है।

2026 के केंद्र सरकार के आंकड़ों के मुताबिक Crop Residue Management Scheme शुरू होने के बाद 3.54 लाख से अधिक CRM मशीनें वितरित की जा चुकी थीं और 43,500 से अधिक Custom Hiring Centres स्थापित हो चुके थे।

2026-27 के लिए 910 और Custom Hiring Centres स्थापित करने का लक्ष्य भी बताया गया है।व्यवस्था का सबसे बड़ा फायदा तभी होगा जब किसान को कटाई के ठीक समय मशीन आसानी से मिले। मशीन अगर दस दिन बाद मिले तो किसान के लिए उसका फायदा बहुत कम हो जाता है, क्योंकि गेहूं की बुवाई का समय निकल सकता है।इसी कारण नई नीति में मशीन की संख्या बढ़ाने के साथ उसके timely availability और वास्तविक उपयोग पर भी ध्यान देना जरूरी माना गया है।

2026-27 में 46 हजार से अधिक मशीनों का लक्ष्य

जून 2026 में केंद्र सरकार ने बताया कि Crop Residue Management Scheme के लिए वित्त वर्ष 2026-27 में 544.15 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। इसमें से उस समय 272.07 करोड़ रुपये की पहली किस्त जारी की जा चुकी थी।

राज्यों के लिए 46,000 से अधिक Crop Residue Management machines के वितरण, 910 Custom Hiring Centres और 141 stubble supply chain projects विकसित करने का लक्ष्य रखा गया। 2026 के धान सीजन में अनुमानित 2.762 करोड़ टन पराली के प्रबंधन से संबंधित राज्य कार्ययोजनाओं की भी समीक्षा की गई।यह आंकड़ा बताता है कि सरकार अब मशीन वितरण के साथ-साथ supply chain तैयार करने पर भी ध्यान दे रही है।

In-Situ Management क्या है?

पराली प्रबंधन के मुख्य रूप से दो मॉडल हैं: In-Situ Management और Ex-Situ Management।In-Situ Management का अर्थ है फसल अवशेष का खेत के अंदर ही प्रबंधन करना।

इसमें मशीनों की सहायता से पराली को काटकर खेत में फैलाया या मिट्टी में मिलाया जा सकता है। इसके बाद उसी खेत में अगली फसल की बुवाई की जा सकती है।Happy Seeder और Super Seeder जैसी तकनीकों का उद्देश्य किसानों को पराली जलाए बिना गेहूं की बुवाई करने का विकल्प उपलब्ध कराना है।

इस तरीके का फायदा यह है कि पराली को बाहर ले जाने, स्टोर करने और ट्रांसपोर्ट करने की जरूरत कम हो सकती है। हालांकि इसकी सफलता मशीन की उपलब्धता, खेत की स्थिति और किसानों के प्रशिक्षण पर निर्भर करती है।

Ex-Situ Management से पराली बनेगी कमाई का जरिया

दूसरा मॉडल है Ex-Situ Crop Residue Management। इसमें पराली को खेत से बाहर निकालकर किसी दूसरे उपयोग में लगाया जाता है।सरकार अब इस क्षेत्र को बड़े स्तर पर विकसित करने की कोशिश कर रही है। पराली का इस्तेमाल biomass power plants, Compressed Biogas यानी CBG plants, ethanol production, pellet manufacturing और दूसरे औद्योगिक कार्यों में किया जा सकता है।जून 2026 की सरकारी समीक्षा में भी biomass power plants, CBG units, ethanol plants और pellet manufacturing units के माध्यम से पराली के ex-situ उपयोग को बढ़ाने पर विशेष जोर दिया गया।इस मॉडल में सबसे महत्वपूर्ण बात बाजार की है। किसान को तभी पराली इकट्ठी करवाने में आर्थिक रुचि होगी जब उसे पता हो कि इसे कौन खरीदेगा और परिवहन की लागत कौन वहन करेगा।इसलिए आने वाले वर्षों में केवल मशीनों की संख्या नहीं, बल्कि stubble supply chain की मजबूती पर नीति की सफलता निर्भर करेगी।

ईंट भट्टों में भी होगा पराली आधारित ईंधन का उपयोग

पराली के औद्योगिक उपयोग को बढ़ाने के लिए ईंट भट्टों को भी योजना से जोड़ा गया है।

CAQM के Direction No. 92 के तहत पंजाब और हरियाणा के संबंधित गैर-NCR क्षेत्रों के ईंट भट्टों में धान की पराली से बने biomass pellets और briquettes के इस्तेमाल को चरणबद्ध तरीके से बढ़ाने की व्यवस्था की गई है।निर्धारित योजना के अनुसार इसका न्यूनतम हिस्सा 1 नवंबर 2026 से 30 प्रतिशत, 1 नवंबर 2027 से 40 प्रतिशत और 1 नवंबर 2028 से 50 प्रतिशत तक ले जाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।अगर इस तरह के औद्योगिक खरीदारों की संख्या बढ़ती है तो इसका बड़ा लाभ यह होगा कि पराली के लिए स्थायी मांग पैदा हो सकती है।पराली की समस्या तभी स्थायी रूप से हल होगी जब किसान के लिए उसे जलाना आर्थिक रूप से कम आकर्षक और बेचना या प्रबंधित करना अधिक सुविधाजनक बन जाए।

Satellite Monitoring और Digital Tracking से बढ़ेगी निगरानी

नई व्यवस्था का एक और महत्वपूर्ण भाग तकनीकी निगरानी है।फसल अवशेष जलाने की घटनाओं की पहचान के लिए satellite data का उपयोग पहले से किया जा रहा है। ISRO, राज्य Remote Sensing Centres और Indian Agricultural Research Institute से जुड़े मानक प्रोटोकॉल के माध्यम से सक्रिय आग की घटनाओं की पहचान की जाती है।लेकिन 2026 की व्यवस्था इससे आगे जाती दिखाई देती है।राज्य स्तर पर web-based dashboards के माध्यम से crop area, residue generation, in-situ और ex-situ utilisation, storage facilities, harvesting, sowing तथा enforcement संबंधी जानकारी को track करने की व्यवस्था पर जोर दिया गया है।इससे प्रशासन को यह समझने में मदद मिल सकती है कि किस जिले में कितनी पराली पैदा हुई, कितनी मशीनें उपलब्ध हैं और किस क्षेत्र में अतिरिक्त संसाधन की जरूरत है।

मशीनों की संख्या से ज्यादा जरूरी है उनकी कार्यशील स्थिति

कई बार सरकारी आंकड़ों में हजारों मशीनें मौजूद दिखाई देती हैं, लेकिन जमीन पर सभी मशीनें काम करने की स्थिति में हों यह जरूरी नहीं।इसी समस्या को ध्यान में रखते हुए CAQM ने राज्यों से functional CRM machines की वास्तविक स्थिति की समीक्षा करने को कहा है। मई 2026 की समीक्षा में पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश से मशीनों की स्थिति पर विस्तृत रिपोर्ट मांगी गई थी।

2026 के निर्देशों में पुराने और non-functional equipment को सूची से हटाने, वास्तविक आवश्यकता का gap analysis करने तथा नई मशीनों की समय पर खरीद पर भी जोर दिया गया।इसका सीधा मतलब है कि अब केवल यह बताना पर्याप्त नहीं होगा कि किसी जिले में 1,000 मशीनें पंजीकृत हैं। जरूरी यह है कि कटाई के समय उनमें से कितनी वास्तव में उपलब्ध और चालू हैं।

Repair and Maintenance Centre की भूमिका

खेती के व्यस्त सीजन में मशीन खराब हो जाए तो किसान कई दिन इंतजार नहीं कर सकता। इसलिए नई व्यवस्था में मशीन वितरण के साथ repair और maintenance व्यवस्था को भी महत्वपूर्ण माना गया है।अगर ब्लॉक या जिला स्तर पर तेजी से मरम्मत की सुविधा उपलब्ध हो तो मशीनों की उपयोगिता बढ़ सकती है। यह विशेष रूप से उन Custom Hiring Centres के लिए महत्वपूर्ण है जहां एक ही मशीन का इस्तेमाल कई किसानों द्वारा किया जाता है।यानी आने वाले समय में Stubble Management की सफलता केवल “कितनी मशीनें बांटी गईं” से नहीं बल्कि “कितनी मशीनों ने वास्तव में कितने खेतों में काम किया” से मापी जानी चाहिए।

किसानों के लिए नई व्यवस्था में क्या फायदा है?

पराली प्रबंधन व्यवस्था सही तरीके से लागू होने पर किसान को कई स्तरों पर फायदा मिल सकता है।सबसे पहला फायदा मशीन तक पहुंच का है। अगर Custom Hiring Centre मजबूत होता है तो किसान को महंगी मशीन स्वयं खरीदने की जरूरत नहीं पड़ सकती।दूसरा फायदा खेत में पराली का बेहतर इस्तेमाल है। Crop residue को मिट्टी में शामिल करने से जैविक पदार्थ खेत में रह सकता है।

तीसरा फायदा औद्योगिक बाजार बनने से संभव है। अगर biomass, CBG, pellet, ethanol और दूसरे उद्योग नियमित रूप से पराली खरीदते हैं तो भविष्य में फसल अवशेष किसान के लिए अतिरिक्त आय का स्रोत भी बन सकता है।

चौथा फायदा समय पर मशीन मिलने से है। खेत जल्दी तैयार होगा तो गेहूं की बुवाई समय पर हो सकेगी।

लेकिन इन फायदों का वास्तविक असर तभी होगा जब गांव स्तर तक सरकारी व्यवस्था सरल, भरोसेमंद और समय पर उपलब्ध हो।

Crop Diversification को भी समाधान का हिस्सा बनाया जा रहा है

पराली की समस्या केवल कटाई के बाद की समस्या नहीं है। यह उस cropping pattern से भी जुड़ी हुई है जिसमें बड़े क्षेत्र में एक ही समय पर धान तैयार होता है।इसीलिए सरकार short-duration और कम पानी की जरूरत वाली धान की किस्मों को बढ़ावा देने पर जोर दे रही है। जून 2026 की समीक्षा में ऐसी किस्मों को बढ़ावा देने का उद्देश्य धान की कटाई और गेहूं की बुवाई के बीच उपलब्ध समय बढ़ाना बताया गया। Direct Seeded Rice यानी DSR को भी प्रोत्साहित करने की बात कही गई।

अगर किसान को कटाई के बाद कुछ अतिरिक्त दिन मिलते हैं तो पराली प्रबंधन के लिए मशीनों पर अचानक पड़ने वाला दबाव कम किया जा सकता है।लंबे समय में फसल विविधीकरण भी उन राज्यों के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है जहां धान-गेहूं चक्र ने पानी और मिट्टी पर दबाव बढ़ाया है।

केवल जुर्माना समाधान क्यों नहीं?

पराली जलाने को रोकने के लिए enforcement जरूरी है, लेकिन समस्या का समाधान केवल सजा या जुर्माने से करना व्यावहारिक नहीं होगा।किसान के सामने सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न होता है कि धान कटने के बाद वह कुछ दिनों के भीतर अपने खेत को अगली फसल के लिए कैसे तैयार करे।

अगर उसके पास मशीन उपलब्ध नहीं है, मशीन का किराया अधिक है, पराली उठाने वाला कोई खरीदार नहीं है और गेहूं की बुवाई में देर होने का खतरा है तो केवल दंड का डर स्थायी व्यवहार परिवर्तन नहीं ला सकता।इसलिए नई नीति में तीन चीजों का संतुलन जरूरी है:सुविधा, आर्थिक प्रोत्साहन और निगरानी।किसान को पहले व्यवहारिक विकल्प देना होगा। इसके साथ जागरूकता और जरूरत पड़ने पर enforcement को जोड़ा जा सकता है।

नई व्यवस्था के सामने प्रमुख चुनौतियां

सरकार की योजना व्यापक है, लेकिन इसका वास्तविक परिणाम जमीन पर लागू होने से तय होगा।पहली चुनौती है मशीनों की समय पर उपलब्धता। कटाई का सीजन छोटा होता है और बड़ी संख्या में किसानों को एक साथ मशीन चाहिए होती है।दूसरी चुनौती है पराली का transportation। Baler से गांठ बन जाने के बाद भी उसे औद्योगिक प्लांट तक ले जाना पड़ता है। दूरी अधिक होने पर लागत तेजी से बढ़ सकती है।तीसरी चुनौती storage की है। पराली को सुरक्षित रखने के लिए पर्याप्त जगह और आग से सुरक्षा की व्यवस्था चाहिए।चौथी चुनौती buyer network की है। किसान तभी पराली बेच पाएगा जब आसपास biomass plant, CBG plant, pellet unit, paper industry या अन्य उपभोक्ता मौजूद हो।पांचवीं चुनौती सरकारी विभागों के बीच coordination की है। कृषि विभाग, जिला प्रशासन, Pollution Control Board, पंचायत, उद्योग, परिवहन एजेंसियों और किसानों को एक ही योजना के तहत काम करना होगा।

पराली को समस्या नहीं, संसाधन बनाने की जरूरत

पराली प्रबंधन का सबसे स्थायी मॉडल वह होगा जिसमें किसान को पराली जलाने से रोकने के लिए बार-बार समझाना ही न पड़े।अगर पराली का आर्थिक मूल्य पैदा हो जाए तो किसान स्वयं उसे बचाने में रुचि लेगा।

इसे biomass pellet, briquette, CBG, biofuel, industrial fuel और अन्य उत्पादों के लिए raw material बनाया जा सकता है। पशुपालन वाले क्षेत्रों में कुछ फसल अवशेष का उपयोग चारे के रूप में भी किया जाता है।

इसी सोच के तहत 2026 की सरकारी रणनीति stubble supply chain projects को बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ती दिखाई देती है।

लंबे समय में किसान, उद्योग और स्थानीय उद्यमियों के बीच ऐसा बाजार बनाना होगा जिसमें खेत से निकली पराली सीधे आर्थिक गतिविधि का हिस्सा बन जाए।

गांव स्तर पर स्थानीय मॉडल क्यों जरूरी है?

हर क्षेत्र की कृषि परिस्थिति एक जैसी नहीं होती। पंजाब के किसी बड़े धान उत्पादक गांव की आवश्यकता उत्तर प्रदेश के छोटे खेतों वाले गांव से अलग हो सकती है।इसलिए एक ही समाधान हर जगह लागू करना व्यावहारिक नहीं होगा।जहां बड़े खेत हैं, वहां Baler और industrial collection model अच्छा काम कर सकता है। छोटे खेतों वाले क्षेत्र में Custom Hiring Centre और in-situ management ज्यादा उपयोगी हो सकता है।जहां CBG या biomass plant नजदीक है, वहां पराली बेचने की supply chain विकसित की जा सकती है।इसलिए district और village-level planning नई व्यवस्था का बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा है।

क्या 2026 में पराली जलाने की समस्या खत्म हो जाएगी?

यह कहना जल्दबाजी होगी कि किसी एक साल में पराली जलाने की समस्या पूरी तरह खत्म हो जाएगी।लेकिन 2026 की व्यवस्था में कुछ महत्वपूर्ण बदलाव साफ दिखाई देते हैं। सरकार खेतवार planning, डिजिटल निगरानी, मशीन उपलब्धता, Custom Hiring Centres, Flying Squads, industrial utilisation और supply chain को एक साथ जोड़ने की कोशिश कर रही है।यह पुराने मॉडल की तुलना में अधिक समग्र दृष्टिकोण है।

फिर भी सफलता का सबसे बड़ा पैमाना सरकारी बैठकों की संख्या या खरीदी गई मशीनों की संख्या नहीं होना चाहिए। असली सवाल यह होना चाहिए कि कितने किसानों को कटाई के सही समय पर सस्ता और व्यावहारिक विकल्प मिला।

अगर किसान के लिए पराली जलाने की तुलना में उसका प्रबंधन आसान और आर्थिक रूप से फायदेमंद बन गया, तभी इस नीति को सफल माना जा सकेगा।

आगे सरकारों को किन बातों पर ध्यान देना चाहिए?

राज्य सरकारों को सबसे पहले गांव स्तर पर मशीनों की वास्तविक उपलब्धता सार्वजनिक करनी चाहिए। किसान मोबाइल या स्थानीय केंद्र के माध्यम से यह जान सके कि कौन-सी मशीन कब और कहां उपलब्ध है।

इससे सरकारी खर्च का वास्तविक प्रभाव समझना आसान होगा।

पराली प्रबंधन से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मिल सकता है नया बाजार

पराली प्रबंधन को केवल प्रदूषण रोकने के कार्यक्रम की तरह देखने से इसकी संभावनाएं सीमित हो जाती हैं।अगर गांव स्तर पर straw collection, baling, transportation, pellet manufacturing और bioenergy supply chain विकसित होती है तो इससे स्थानीय रोजगार भी पैदा हो सकता है।ट्रैक्टर मालिक, मशीन ऑपरेटर, ग्रामीण उद्यमी, FPO, Cooperative Society और biomass processing units इस पूरी value chain में भाग ले सकते हैं।इसका अर्थ है कि Agricultural Waste Management आने वाले वर्षों में ग्रामीण अर्थव्यवस्था का अलग क्षेत्र बन सकता है।इसके लिए सरकार को निजी उद्योग और किसानों के बीच लंबे समय की खरीद व्यवस्था विकसित करनी होगी।

पर्यावरण और किसान दोनों को साथ लेकर चलना होगा

पराली जलाने से होने वाले प्रदूषण पर चर्चा अक्सर किसान बनाम शहर की बहस में बदल जाती है। यह दृष्टिकोण समस्या का समाधान नहीं देता।किसान पराली इसलिए नहीं जलाता कि वह प्रदूषण पैदा करना चाहता है। अधिकतर मामलों में इसके पीछे कम समय, संसाधनों की कमी और लागत जैसी व्यावहारिक समस्याएं होती हैं।दूसरी ओर प्रदूषण के स्वास्थ्य और पर्यावरण संबंधी प्रभावों को नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता।इसलिए ऐसी नीति की जरूरत है जिसमें किसान को दोषी मानने के बजाय उसे समाधान का मुख्य भाग बनाया जाए।2026 में मशीन, Custom Hiring Centre, field mapping, supply chain और industrial utilisation पर बढ़ता जोर इसी दिशा में महत्वपूर्ण कदम बन सकता है।

पराली प्रबंधन पर राज्य सरकारों की नई व्यवस्था अब केवल पराली जलाने पर रोक लगाने की नीति नहीं रह गई है। इसका स्वरूप धीरे-धीरे एक पूरे Crop Residue Management ecosystem में बदल रहा है।

2026 में पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों के लिए खेतों की मैपिंग, नोडल अधिकारी, CRM machinery, Custom Hiring Centres, digital dashboards, satellite monitoring, Flying Squads और industrial utilisation को एक साथ जोड़ने पर जोर दिया गया है।1 अक्टूबर से 30 नवंबर 2026 के बीच पंजाब और हरियाणा के 34 जिलों में Flying Squads की तैनाती यह बताती है कि इस बार जमीनी निगरानी भी काफी मजबूत की गई है।साथ ही 2026-27 में Crop Residue Management Scheme के लिए 544.15 करोड़ रुपये का प्रावधान, 46 हजार से अधिक मशीनों के वितरण का लक्ष्य, 910 नए Custom Hiring Centres और 141 stubble supply chain projects विकसित करने की योजना इस समस्या को लंबे समय के समाधान से जोड़ने का प्रयास है।फिर भी असली सफलता खेत में तय होगी।

अगर छोटे किसान को कटाई के समय आसानी से मशीन मिलती है, पराली उठाने वाला खरीदार उपलब्ध होता है, transportation की व्यवस्था सस्ती रहती है और फसल अवशेष से किसान को आर्थिक लाभ मिलता है, तो पराली जलाने की जरूरत अपने आप कम हो सकती है।इसलिए भविष्य का सबसे प्रभावी मॉडल “पराली मत जलाओ” से आगे बढ़कर “पराली बचाओ, उसका उपयोग करो और उससे आय पैदा करो” होना चाहिए।यही बदलाव पराली को पर्यावरण की समस्या से ग्रामीण अर्थव्यवस्था के उपयोगी संसाधन में बदल सकता है।

 

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