Poultry Farming : देश में पोल्ट्री फार्मिंग से जुड़े किसानों और छोटे कारोबारियों के सामने एक नई आर्थिक चुनौती खड़ी हो गई है। मुर्गियों के दाने में इस्तेमाल होने वाले मक्का और सोयाबीन की बढ़ती कीमतों ने पोल्ट्री फार्म चलाना महंगा कर दिया है। इसी परेशानी को लेकर Poultry Federation of India (PFI) ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र भेजकर पोल्ट्री उद्योग को राहत देने और पशु आहार की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए ठोस सरकारी नीति बनाने की मांग की है।
30 अक्टूबर 2026 को पोल्ट्री फेडरेशन के प्रतिनिधियों ने पशुपालन विभाग के अधिकारियों से भी मुलाकात की। संगठन का कहना है कि चारे की लगातार बढ़ती कीमतों से छोटे पोल्ट्री फार्म सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं। कई कारोबारी लागत निकालने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, जबकि कुछ को अपना कारोबार बंद करना पड़ रहा है। संगठन ने सरकार से अनाज के भंडारण, व्यापार, आपूर्ति और औद्योगिक इस्तेमाल की बेहतर निगरानी की अपील की है।
पोल्ट्री फार्मिंग का संकट आखिर क्यों बढ़ रहा है?
भारत में Poultry Farming ग्रामीण अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। अंडा और चिकन उत्पादन से जुड़े कारोबार में छोटे किसान, मजदूर, परिवहनकर्ता, दाना निर्माता और स्थानीय व्यापारी काम करते हैं। कई ग्रामीण परिवार अतिरिक्त आमदनी के लिए सीमित संख्या में मुर्गियां पालते हैं, जबकि कुछ किसान व्यावसायिक स्तर पर ब्रॉयलर और लेयर फार्म संचालित करते हैं।
लेकिन पिछले कुछ समय से पोल्ट्री व्यवसाय की लागत तेजी से बढ़ रही है। सबसे बड़ी परेशानी चारे की कीमतों को लेकर है। पोल्ट्री फार्म में मुर्गियों के भोजन, पानी, दवाओं, बिजली और रखरखाव पर खर्च होता है। इनमें Poultry Feed सबसे महत्वपूर्ण खर्चों में शामिल है। अक्टूबर 2026 की मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, कुछ बाजारों में पोल्ट्री फीड की कीमत पहले लगभग 22 से 23 रुपये प्रति किलो थी, जो बढ़कर 30 रुपये प्रति किलो से ऊपर पहुंच गई है। हालांकि वास्तविक कीमत गुणवत्ता, क्षेत्र, फीड के प्रकार और खरीद की मात्रा के अनुसार अलग-अलग हो सकती है।
इस बदलाव को एक उदाहरण से समझ सकते हैं। यदि किसी पोल्ट्री फार्म में रोजाना 500 किलो दाने की खपत होती है और कीमत 23 रुपये से बढ़कर 30 रुपये प्रति किलो हो जाती है, तो दैनिक खर्च 3,500 रुपये बढ़ जाएगा। पूरे 30 दिन में यही अतिरिक्त खर्च 1.05 लाख रुपये तक पहुंच सकता है। यह केवल उदाहरण है, लेकिन इससे समझा जा सकता है कि Poultry Feed Price में मामूली दिखाई देने वाली बढ़ोतरी भी बड़े स्तर पर उत्पादन लागत को प्रभावित कर सकती है।
PM MODI को लिखे पत्र में पोल्ट्री किसानों ने क्या मांग की?
PFI ने सरकार के सामने केवल चारे की बढ़ती कीमतों का मुद्दा नहीं उठाया है, बल्कि इसके समाधान के लिए दीर्घकालिक व्यवस्था बनाने का भी आग्रह किया है। संगठन की प्रमुख मांगों में अनाज की उपलब्धता का सही आकलन, बड़े कारोबारियों के स्टॉक की निगरानी, बाजार में पारदर्शिता, फीड और इथेनॉल उद्योग के बीच अनाज का संतुलित आवंटन तथा राष्ट्रीय स्तर पर Animal Feed Security की व्यवस्था बनाना शामिल है।
संगठन का मानना है कि अगले पांच से दस वर्षों की जरूरतों को ध्यान में रखकर राष्ट्रीय टास्क फोर्स बनाई जानी चाहिए। यह टास्क फोर्स अनाज के उत्पादन, खपत, भंडारण, मांग और संभावित कमी का अध्ययन कर सकेगी। इसके अतिरिक्त बेहतर गुणवत्ता वाले मक्का बीजों की उपलब्धता, पशु आहार निर्माण में विविधता और जरूरत पड़ने पर नियंत्रित आयात की व्यवस्था करने की मांग भी सामने आई है।
मक्का और सोयाबीन क्यों बने पोल्ट्री उद्योग की सबसे बड़ी चिंता?
पोल्ट्री दाने में मक्का ऊर्जा का प्रमुख स्रोत है, जबकि सोयाबीन खली से प्रोटीन मिलता है। मुर्गियों की वृद्धि, अंडा उत्पादन और स्वास्थ्य के लिए संतुलित पोषण जरूरी है। यही कारण है कि मक्का और Soybean Meal की कीमत बढ़ने पर पोल्ट्री फीड निर्माता तथा किसान दोनों प्रभावित होते हैं। अक्टूबर 2026 में सामने आई रिपोर्टों के अनुसार, मक्का की मांग केवल पोल्ट्री उद्योग तक सीमित नहीं है। स्टार्च निर्माण, खाद्य प्रसंस्करण और इथेनॉल उत्पादन में भी इसका उपयोग बढ़ा है। नेशनल एग कोऑर्डिनेशन कमेटी (NECC) ने सरकार को बताया है कि देश में मक्का की कुल खपत का लगभग 55 से 60 प्रतिशत हिस्सा पोल्ट्री फीड में इस्तेमाल होता है। यह उद्योग संगठन का अनुमान है। जब एक ही फसल की मांग कई उद्योगों में बढ़ती है और उपलब्धता सीमित होती है, तो बाजार में कीमतों का दबाव बढ़ सकता है।
इथेनॉल उत्पादन और पोल्ट्री उद्योग के बीच क्यों बढ़ी प्रतिस्पर्धा?
भारत में पेट्रोल के साथ इथेनॉल मिलाने की नीति के तहत अनाज आधारित इथेनॉल उत्पादन का विस्तार हुआ है। मक्का इस उद्योग के लिए महत्वपूर्ण कच्चा माल बन चुका है।इथेनॉल उद्योग मक्का किसानों को अतिरिक्त बाजार उपलब्ध कराता है। इससे किसानों के लिए बिक्री के नए अवसर बन सकते हैं। लेकिन दूसरी ओर, पोल्ट्री उद्योग को आशंका है कि इथेनॉल में अनाज की बढ़ती खपत पशु आहार की उपलब्धता और कीमतों को प्रभावित कर सकती है। इसीलिए पोल्ट्री संगठनों ने सरकार से मांग की है कि अनाज आधारित इथेनॉल क्षमता बढ़ाने से पहले पशु आहार की जरूरतों का आकलन किया जाए।
संगठन का सुझाव है कि यदि भविष्य में अनाज की गंभीर कमी होती है, तो ऐसी स्थिति से निपटने के लिए पहले से नीति तैयार हो। इसका उद्देश्य खाद्य सुरक्षा, पशु आहार और औद्योगिक उपयोग के बीच संतुलन बनाना है। यहां ध्यान देने वाली बात है कि इथेनॉल उत्पादन को पूरी तरह रोकने की मांग और अनाज आवंटन में संतुलन बनाने की मांग अलग-अलग बातें हैं। पोल्ट्री उद्योग मुख्य रूप से फीड की उपलब्धता सुनिश्चित करने और मूल्य अस्थिरता कम करने पर जोर दे रहा है।
सोयाबीन खली की कीमतों को लेकर भी बढ़ा विवाद
Poultry Farming के बीच सोयाबीन खली की उपलब्धता और आयात का सवाल भी महत्वपूर्ण हो गया है। 28 अक्टूबर 2026 के आसपास सामने आई रिपोर्टों के मुताबिक, पोल्ट्री उद्योग के कुछ संगठनों ने सरकार से लगभग 30 लाख टन Soybean Meal के आयात की अनुमति देने की मांग की है। उनका तर्क है कि घरेलू बाजार में सोयाबीन खली की ऊंची कीमतों से पोल्ट्री किसानों की उत्पादन लागत बढ़ रही है।
हालांकि सोयाबीन प्रसंस्करण उद्योग इस मांग से सहमत नहीं है। Soybean Processors Association of India (SOPA) के अनुसार, अक्टूबर 2026 से सितंबर 2027 के विपणन वर्ष में घरेलू सोयाबीन खली की अनुमानित उपलब्धता लगभग 81.72 लाख टन है, जबकि मांग करीब 80 लाख टन रहने का अनुमान है।
SOPA का तर्क है कि अतिरिक्त आयात से घरेलू सोयाबीन उत्पादकों को नुकसान हो सकता है। संगठन ने सरकार से भारतीय किसानों के हितों को ध्यान में रखकर निर्णय लेने की अपील की है। इस स्थिति में सरकार के सामने दो महत्वपूर्ण चुनौतियां हैं। पहली, पोल्ट्री किसानों को उचित कीमत पर दाना उपलब्ध कराना और दूसरी, सोयाबीन उगाने वाले किसानों को उनकी उपज का लाभकारी मूल्य दिलाना।
अनाज की जमाखोरी रोकने के लिए डिजिटल निगरानी की मांग
पोल्ट्री फेडरेशन ने अनाज बाजार में पारदर्शिता बढ़ाने के लिए एक राष्ट्रीय डिजिटल व्यवस्था बनाने का सुझाव दिया है। प्रस्ताव के अनुसार, बड़े अनाज व्यापारियों, गोदाम संचालकों और स्टॉक रखने वाले कारोबारियों की खरीद-बिक्री तथा उपलब्ध अनाज का रिकॉर्ड डिजिटल माध्यम से रखा जा सकता है। इससे सरकार को पता चल सकेगा कि किस क्षेत्र में कितना अनाज उपलब्ध है और कहां मांग की तुलना में आपूर्ति कम हो रही है। संगठन ने बाजार में संभावित जमाखोरी तथा अनुचित कारोबारी गतिविधियों की जांच करने का भी सुझाव दिया है। हालांकि इन चिंताओं को सभी व्यापारियों के विरुद्ध सिद्ध आरोप नहीं माना जाना चाहिए।यदि ऐसी व्यवस्था लागू होती है, तो सरकार को अनाज की उपलब्धता के बारे में बेहतर जानकारी मिल सकती है। साथ ही किसानों को बाजार की वास्तविक परिस्थितियों को समझने में सहायता मिल सकती है।
अंडे और चिकन की कीमतों पर क्या पड़ेगा असर?
Poultry Feed Price बढ़ने का असर केवल पोल्ट्री फार्मर की आमदनी तक सीमित नहीं रहता। इससे अंडे और चिकन की उत्पादन लागत भी प्रभावित होती है। 30 अक्टूबर 2026 को प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक, उपभोक्ता मामलों के विभाग की मूल्य निगरानी व्यवस्था में अंडों की औसत खुदरा कीमत लगभग 84.93 रुपये प्रति दर्जन दर्ज की गई थी। यह पिछले वर्ष की तुलना में करीब 8 प्रतिशत अधिक बताई गई। वहीं अक्टूबर के दौरान दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में NECC की औसत अनुशंसित फार्म-गेट कीमत लगभग 5.85 रुपये प्रति अंडा बताई गई। फार्म-गेट कीमत और खुदरा बिक्री मूल्य अलग होते हैं।
सर्दियों में कई बाजारों में अंडों की मांग बढ़ती है। यदि इस दौरान चारे की लागत भी ऊंची रहती है, तो खुदरा कीमतों पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है। हालांकि अंडे या चिकन की कीमत केवल चारे से तय नहीं होती। स्थानीय मांग, उत्पादन, मौसम, परिवहन और बाजार में उपलब्धता भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
छोटे पोल्ट्री किसानों के सामने सबसे बड़ी परेशानी
भारत में अनेक किसान सीमित पूंजी से Poultry Business शुरू करते हैं। ऐसे किसानों के पास महंगा दाना बड़ी मात्रा में खरीदकर जमा करने की आर्थिक क्षमता नहीं होती।उनकी आमदनी बाजार में मिलने वाली बिक्री कीमत पर निर्भर करती है। यदि फीड की कीमत बढ़ जाए, लेकिन अंडों या तैयार मुर्गियों का बिक्री मूल्य उसी अनुपात में नहीं बढ़े, तो मुनाफा घट सकता है।छोटे पोल्ट्री फार्मों के सामने तीन प्रमुख चुनौतियां सामने आती हैं।
पहली चुनौती नकदी की व्यवस्था है। किसानों को दाने और दूसरे जरूरी सामान का भुगतान नियमित रूप से करना पड़ता है।दूसरी चुनौती बाजार में कीमतों का उतार-चढ़ाव है। उत्पादन लागत का अनुमान लगाना मुश्किल हो जाता है।तीसरी चुनौती लंबे समय तक कारोबार बनाए रखने की है। लगातार घाटा होने से नई बैच शुरू करने और फार्म के रखरखाव पर असर पड़ सकता है।
पोल्ट्री किसान बढ़ती लागत से कैसे निपट सकते हैं?
जब तक सरकारी स्तर पर कोई नई व्यवस्था लागू नहीं होती, तब तक किसानों के लिए फार्म प्रबंधन और खर्चों की निगरानी विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।
1. दाने की गुणवत्ता पर ध्यान दें: केवल सस्ता दाना खरीदने के बजाय उसकी गुणवत्ता, पोषण और विश्वसनीयता की जांच करें। घटिया गुणवत्ता वाला फीड पक्षियों के स्वास्थ्य और उत्पादन को प्रभावित कर सकता है।
2. फीड की बर्बादी रोकें: फीडर की उचित व्यवस्था करें। दाने का अनावश्यक फैलाव, नमी और खराब भंडारण अतिरिक्त खर्च बढ़ा सकते हैं।
3. खरीद की योजना बनाएं: स्थानीय आपूर्तिकर्ताओं से कीमतों की तुलना करें। किसान समूहों के माध्यम से सामूहिक खरीद की संभावनाएं भी देखी जा सकती हैं।
4. फार्म का रिकॉर्ड रखें: प्रतिदिन दाने की खपत, पक्षियों की संख्या, मृत्यु दर, उत्पादन और बिक्री का रिकॉर्ड रखने से वास्तविक लागत का आकलन आसान होता है।
5. पशु चिकित्सक की सलाह लें: फीड की मात्रा या उसकी संरचना में अचानक बदलाव न करें। कम कीमत वाले वैकल्पिक फीड का इस्तेमाल भी पशु पोषण विशेषज्ञ की सलाह से ही करना चाहिए।
6. जैव-सुरक्षा मजबूत रखें: फार्म में नियमित सफाई, स्वच्छ पानी और बीमारी की रोकथाम के उपाय अपनाएं। बीमारियों के कारण होने वाले नुकसान से बचना भी लागत प्रबंधन का हिस्सा है।
क्या सरकार को अलग Poultry Feed Policy बनानी चाहिए?
पोल्ट्री उद्योग की वर्तमान स्थिति बताती है कि पशु आहार के लिए दीर्घकालिक योजना महत्वपूर्ण हो सकती है।यदि देश में मक्का उत्पादन बढ़ाने, बेहतर बीज उपलब्ध कराने, भंडारण सुविधाओं का विस्तार करने और बाजार की जानकारी किसानों तक पहुंचाने पर ध्यान दिया जाए, तो पशु आहार की आपूर्ति को अधिक स्थिर बनाने में मदद मिल सकती है।इसके अलावा, अनाज का इस्तेमाल खाद्य प्रसंस्करण, इथेनॉल और पशु आहार में किस अनुपात में किया जाए, इसके लिए पारदर्शी और नियमित आकलन उपयोगी होगा। यह जरूरी है कि किसी भी नई नीति में केवल पोल्ट्री उद्योग ही नहीं, बल्कि मक्का और सोयाबीन पैदा करने वाले किसानों की आय और बाजार हितों पर भी ध्यान दिया जाए।
आगे क्या होगा? सरकार के फैसले पर टिकी नजर
31 अक्टूबर 2026 तक उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, पोल्ट्री फेडरेशन ने अपनी मांगें प्रधानमंत्री कार्यालय और संबंधित अधिकारियों तक पहुंचाई हैं। हालांकि इन मांगों को लेकर किसी नई राष्ट्रीय Poultry Feed Policy को मंजूरी दिए जाने या विशेष राहत पैकेज की औपचारिक घोषणा की पुष्टि नहीं हुई है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार अनाज की उपलब्धता, सोयाबीन खली के आयात, बाजार निगरानी और पशु आहार की दीर्घकालिक सुरक्षा पर क्या निर्णय लेती है।
पोल्ट्री उद्योग को राहत के साथ संतुलित नीति की जरूरत
देश में Poultry Farming Crisis केवल दाने के महंगे होने की समस्या नहीं है। यह कृषि उत्पादन, पशुपालन, खाद्य प्रसंस्करण और ऊर्जा उद्योग के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा से भी जुड़ा मुद्दा है। पोल्ट्री किसानों की मांग है कि उन्हें उचित कीमत पर अच्छी गुणवत्ता वाला दाना उपलब्ध हो, बाजार में पारदर्शिता बढ़े और आने वाले वर्षों के लिए पशु आहार की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।
यदि सरकार उत्पादन बढ़ाने, बेहतर भंडारण, उचित बाजार सूचना और संतुलित अनाज आवंटन की दिशा में कदम उठाती है, तो इसका लाभ पोल्ट्री किसानों के साथ मक्का और सोयाबीन उत्पादकों को भी मिल सकता है। फिलहाल प्रधानमंत्री मोदी को भेजा गया यह पत्र पोल्ट्री उद्योग की बढ़ती चिंताओं को राष्ट्रीय स्तर पर सामने लाने की एक महत्वपूर्ण पहल है।
