खेत में अच्छी फसल लेने के लिए किसान नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश जैसे पोषक तत्वों वाली रासायनिक खाद का इस्तेमाल करते हैं। इनसे पौधों को जरूरी पोषण मिलता है और उत्पादन बढ़ाने में मदद मिलती है। लेकिन सवाल यह है कि जब साल-दर-साल खेती में रासायनिक खाद का इस्तेमाल होता है, तो मिट्टी के अंदर क्या बदलाव आते हैं? क्या इससे मिट्टी की उर्वरता घटती है, सूक्ष्मजीव प्रभावित होते हैं और जमीन की संरचना कमजोर पड़ती है?
वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार, इसका जवाब केवल हां या ना में नहीं दिया जा सकता। मिट्टी पर रासायनिक खाद का दीर्घकालीन प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है कि किस प्रकार की खाद, कितनी मात्रा में, किस फसल में और किस तरीके से इस्तेमाल की जा रही है। खाद के साथ जैविक पदार्थों की वापसी, फसल चक्र, सिंचाई और मिट्टी का शुरुआती स्वास्थ्य भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
मिट्टी के जैविक पदार्थों पर पड़ता है असर
मिट्टी की सेहत का एक महत्वपूर्ण आधार उसमें मौजूद जैविक पदार्थ या जैविक कार्बन है। इसमें फसल अवशेष, जड़ों के अंश, सड़ी-गली पत्तियां, गोबर की खाद और दूसरे जैविक पदार्थ शामिल होते हैं। ये मिट्टी को केवल पोषक तत्व ही नहीं देते, बल्कि उसकी संरचना, नमी रोकने की क्षमता और सूक्ष्मजीवों के लिए भोजन का स्रोत भी बनते हैं।
जब किसान हर फसल के बाद खेत से पूरा अवशेष हटा देते हैं या पराली जला देते हैं और मिट्टी में जैविक पदार्थ वापस नहीं पहुंचाते, तो लंबे समय में जैविक कार्बन का स्तर घट सकता है। ऐसी स्थिति में मिट्टी की पानी रोकने और पोषक तत्वों को संभालकर रखने की क्षमता प्रभावित हो सकती है।
हालांकि, यह कहना सही नहीं होगा कि रासायनिक खाद डालने से जैविक पदार्थ हमेशा घटते हैं। संतुलित मात्रा में नाइट्रोजन और अन्य पोषक तत्व मिलने से फसल की बढ़वार, जड़ों और अवशेषों का उत्पादन बढ़ सकता है। यदि इन अवशेषों को मिट्टी में वापस मिलाया जाए, तो जैविक कार्बन बनाए रखने में मदद मिल सकती है। दूसरी ओर, केवल रासायनिक खाद पर निर्भर रहकर जैविक पदार्थों की अनदेखी करना मिट्टी की सेहत के लिए नुकसानदेह हो सकता है। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) के अनुसार, मिट्टी में जैविक पदार्थों की मात्रा बनाए रखने के लिए फसल अवशेषों और दूसरे जैविक स्रोतों की नियमित वापसी महत्वपूर्ण है। <Link url=”https://www.fao.org/4/a0100e/a0100e02.htm” title=”एफएओ का मिट्टी के जैविक पदार्थों पर अध्ययन”/>।
सूक्ष्मजीवों की संख्या ही नहीं, उनकी गतिविधि भी महत्वपूर्ण
मिट्टी के भीतर बैक्टीरिया, कवक और दूसरे सूक्ष्मजीव पोषक तत्वों के चक्र को चलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ये जैविक पदार्थों को विघटित करते हैं और उनमें मौजूद पोषक तत्वों को पौधों के लिए उपलब्ध कराने में मदद करते हैं। कुछ सूक्ष्मजीव वायुमंडलीय नाइट्रोजन को उपयोगी रूप में बदलने, फास्फोरस की उपलब्धता बढ़ाने और पौधों की जड़ों के विकास में भी योगदान देते हैं।
लगातार रासायनिक खाद डालने से इन सूक्ष्मजीवों पर क्या असर होगा, यह खाद के प्रकार, मिट्टी के पीएच, नमी और पोषक तत्वों की मात्रा पर निर्भर करता है। वर्ष 2014 में Soil Biology and Biochemistry में प्रकाशित एक समीक्षा में 64 दीर्घकालीन प्रयोगों के 107 आंकड़ा-समूहों का विश्लेषण किया गया। इसमें खनिज उर्वरकों के इस्तेमाल वाले खेतों में औसतन सूक्ष्मजीवी जैवभार नियंत्रण वाले खेतों से 15.1 प्रतिशत अधिक पाया गया। हालांकि, अम्लीय मिट्टी में इसका प्रभाव अलग था और कुछ परिस्थितियों में सूक्ष्मजीवी जैवभार घटा भी। इससे स्पष्ट है कि रासायनिक खाद का प्रभाव हर मिट्टी में एक जैसा नहीं होता। <Link url=”https://www.sciencedirect.com/science/article/pii/S0038071714001187” title=”सूक्ष्मजीवों पर खनिज उर्वरकों के दीर्घकालीन प्रभावों की समीक्षा”/>।
इसलिए यह धारणा सही नहीं है कि रासायनिक खाद डालते ही मिट्टी के सभी लाभकारी सूक्ष्मजीव मर जाते हैं। लेकिन जरूरत से अधिक खाद, मिट्टी की प्रतिकूल अम्लता और कुछ उर्वरकों की अधिक सांद्रता जड़ों के आसपास के सूक्ष्मजीवी वातावरण को प्रभावित कर सकती है। लगातार एक ही तरह का प्रबंधन अपनाने से सूक्ष्मजीवों की संरचना और उनकी गतिविधियों में भी बदलाव आ सकता है।
मिट्टी की संरचना और पानी रोकने की क्षमता
अच्छी मिट्टी में छोटे-बड़े कण एक-दूसरे से जुड़कर ऐसी संरचना बनाते हैं, जिसके बीच हवा और पानी के आवागमन के लिए जगह रहती है। जैविक पदार्थ, फफूंद के तंतु, बैक्टीरिया से बनने वाले चिपचिपे पदार्थ और केंचुओं की गतिविधियां मिट्टी के कणों को जोड़ने में मदद करती हैं।
यदि खेत में जैविक पदार्थ लगातार कम होते जाएं, तो मिट्टी के कणों के बीच मजबूत जुड़ाव कमजोर पड़ सकता है। इससे सतह पर पपड़ी बनने, पानी के बहकर निकल जाने और मिट्टी के कटाव का जोखिम बढ़ सकता है। कुछ परिस्थितियों में मिट्टी की नमी रोकने की क्षमता भी प्रभावित होती है।
लेकिन मिट्टी की संरचना में होने वाले बदलावों के लिए केवल रासायनिक खाद को जिम्मेदार ठहराना वैज्ञानिक रूप से सही नहीं है। बार-बार गहरी जुताई, भारी मशीनों से गीली मिट्टी पर काम करना, फसल अवशेषों को हटाना और अनुचित सिंचाई भी मिट्टी को सख्त या सघन बना सकती है। इसलिए मिट्टी की संरचना सुधारने के लिए खाद के सही इस्तेमाल के साथ जैविक पदार्थों का प्रबंधन और उचित जुताई भी जरूरी है।
पोषक तत्वों का संतुलन बिगड़ने का खतरा
रासायनिक खाद का एक महत्वपूर्ण लाभ यह है कि इससे पौधों को जरूरत के अनुसार पोषक तत्व उपलब्ध कराए जा सकते हैं। समस्या तब पैदा होती है, जब किसान लंबे समय तक केवल एक या दो पोषक तत्वों पर ध्यान देते हैं और बाकी तत्वों की जरूरत की जांच नहीं करते।
उदाहरण के लिए, नाइट्रोजन की जरूरत पूरी करने के लिए लगातार यूरिया डालने पर भी फसल में फास्फोरस, पोटाश, सल्फर या जिंक की कमी रह सकती है। इसी तरह, किसी पोषक तत्व की जरूरत से ज्यादा मात्रा मिट्टी में जमा हो सकती है या दूसरे तत्वों की उपलब्धता को प्रभावित कर सकती है। इससे फसल की बढ़वार और पोषण पर असर पड़ सकता है।
पोषक तत्वों का असंतुलन केवल उपज घटने का मामला नहीं है। अतिरिक्त नाइट्रोजन का कुछ हिस्सा पौधों द्वारा इस्तेमाल नहीं हो पाता और परिस्थितियों के अनुसार वह पानी के साथ नीचे जा सकता है या गैस के रूप में वातावरण में निकल सकता है। इससे उर्वरक की उपयोग क्षमता घटती है और पर्यावरण पर भी असर पड़ सकता है।
इसीलिए खाद की मात्रा तय करते समय मिट्टी की जांच, फसल की जरूरत, पिछली फसल और सिंचाई की स्थिति को ध्यान में रखना चाहिए। केवल इस आधार पर खाद बढ़ा देना कि फसल कमजोर दिखाई दे रही है, सही तरीका नहीं है। कमजोरी का कारण पानी की कमी, जलभराव, जड़ों की समस्या, रोग या कीट भी हो सकते हैं।
मिट्टी का पीएच बदल सकता है
कुछ नाइट्रोजन उर्वरकों का लगातार इस्तेमाल मिट्टी की अम्लता बढ़ा सकता है। इसका प्रभाव विशेष रूप से उन खेतों में महत्वपूर्ण हो सकता है, जहां पहले से मिट्टी का पीएच कम है या लंबे समय से एक ही तरह का उर्वरक इस्तेमाल हो रहा है। मिट्टी अधिक अम्लीय होने पर फास्फोरस और कुछ अन्य पोषक तत्वों की उपलब्धता बदल सकती है। कुछ तत्वों की अधिक उपलब्धता पौधों के लिए विषाक्तता का जोखिम भी बढ़ा सकती है।
दूसरी ओर, भारत के कई क्षेत्रों में मिट्टी की समस्या अम्लता के बजाय क्षारीयता या लवणता भी हो सकती है। इसलिए हर खेत में एक ही समाधान लागू नहीं किया जा सकता। मिट्टी की जांच से पीएच और लवणता की स्थिति पता चलती है। जरूरत के अनुसार कृषि विशेषज्ञ की सलाह से ही सुधारक पदार्थों का इस्तेमाल करना चाहिए।
मिट्टी की सेहत बनाए रखने के लिए क्या करें?
मिट्टी को लंबे समय तक उपजाऊ बनाए रखने के लिए रासायनिक खाद छोड़ना ही एकमात्र उपाय नहीं है। जरूरी है कि उसका इस्तेमाल संतुलित और वैज्ञानिक तरीके से किया जाए। किसान मिट्टी की जांच के आधार पर खाद की मात्रा तय करें और नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश तथा जरूरी सूक्ष्म पोषक तत्वों की जरूरत को समझें।
गोबर की अच्छी तरह सड़ी खाद, कम्पोस्ट और उपयुक्त हरी खाद का उपयोग जैविक पदार्थों की आपूर्ति में मदद कर सकता है। फसल अवशेषों को जलाने के बजाय उनका उचित प्रबंधन भी मिट्टी में कार्बन वापस पहुंचाने का एक रास्ता है। दलहनी फसलों को फसल चक्र में शामिल करने से कुछ परिस्थितियों में नाइट्रोजन प्रबंधन में मदद मिल सकती है। साथ ही, मिट्टी की नमी के अनुसार सिंचाई, जरूरत के मुताबिक जुताई और खेत में कटाव रोकने के उपाय अपनाना उपयोगी है।
जैविक खाद और रासायनिक उर्वरकों की मात्रा भी फसल तथा मिट्टी की जरूरत के अनुसार तय होनी चाहिए। केवल अधिक जैविक खाद डालना भी हर परिस्थिति में संतुलित पोषण की गारंटी नहीं देता। उद्देश्य मिट्टी में पोषक तत्वों की पर्याप्त उपलब्धता, जैविक पदार्थों का संरक्षण और अच्छी संरचना बनाए रखना होना चाहिए।
अंततः, लगातार रासायनिक खाद का इस्तेमाल मिट्टी के लिए अपने आप में न तो हमेशा नुकसानदेह है और न ही मिट्टी की सेहत बनाए रखने के लिए पर्याप्त। असली अंतर इस बात से पड़ता है कि किसान खाद का इस्तेमाल कितनी समझदारी से करते हैं और मिट्टी से निकाले जा रहे पोषक तत्वों तथा जैविक पदार्थों की भरपाई कैसे करते हैं। मिट्टी की जांच, संतुलित उर्वरक प्रबंधन और जैविक पदार्थों की नियमित वापसी को खेती का हिस्सा बनाकर ही लंबे समय तक उत्पादकता और मिट्टी की सेहत के बीच संतुलन कायम रखा जा सकता है।
