5346 किसान किस्मों का पंजीकरण, 1 लाख से अधिक देशी किस्में राष्ट्रीय जीन बैंक में संरक्षित, ‘श्री अन्न’ और GI उत्पादों को भी मिलेगा बढ़ावा

5346 farmer varieties registered, over 1 lakh indigenous varieties preserved in National Gene Bank, 'Shri Anna' and GI products to get a boost

Registration of 5346 farmer varieties,

Registration of 5346 farmer varieties,

देश की पारंपरिक कृषि विरासत, देशी बीजों और स्थानीय फसल किस्मों के संरक्षण एवं संवर्धन को मजबूत बनाने के लिए केंद्र सरकार ने कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। सरकार ने स्पष्ट किया है कि पारंपरिक कृषि उत्पादों के संरक्षण, अनुसंधान, बीज उत्पादन, मूल्य संवर्धन, ब्रांडिंग और विपणन को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न मंत्रालयों और संस्थानों के माध्यम से व्यापक स्तर पर योजनाएं संचालित की जा रही हैं।

लोकसभा में एक प्रश्न के लिखित उत्तर में कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री श्री रामनाथ ठाकुर ने बताया कि सरकार भारतीय कृषि की जैव विविधता को सुरक्षित रखने और किसानों की पारंपरिक किस्मों को राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने के लिए लगातार प्रयासरत है।

देशी बीजों के संरक्षण में आईसीएआर की अहम भूमिका

सरकार ने बताया कि भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के अंतर्गत राष्ट्रीय पादप आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो (NBPGR) देशभर में देशी जर्मप्लाज्म, स्थानीय बीजों और पारंपरिक फसल किस्मों का संग्रह, संरक्षण, मूल्यांकन और अभिलेखीकरण कर रहा है। वर्तमान में राष्ट्रीय जीन बैंक में 1 लाख से अधिक देशी एवं पारंपरिक किस्मों का संरक्षण किया जा चुका है, जिससे भविष्य में जलवायु परिवर्तन और नई चुनौतियों के अनुरूप बेहतर किस्मों के विकास में मदद मिलेगी।

5,346 किसान किस्मों को मिला कानूनी संरक्षण

सरकार ने बताया कि पौध किस्म एवं कृषक अधिकार संरक्षण (PPV&FR) अधिनियम, 2001 के तहत किसानों द्वारा विकसित पारंपरिक एवं स्थानीय किस्मों को कानूनी संरक्षण प्रदान किया जा रहा है। 15 जुलाई 2026 तक 5,346 किसान किस्मों का पंजीकरण किया जा चुका है। इसके साथ ही किसानों और समुदायों को उनके योगदान के लिए 45 सामुदायिक पुरस्कार, 69 किसान पुरस्कार और 88 किसान सम्मान भी प्रदान किए गए हैं।

पारंपरिक बीजों के उत्पादन पर मिलेगी आर्थिक सहायता

सरकार ने राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा एवं पोषण मिशन (NFSNM) के अंतर्गत “परंपरागत किस्मों के बीज उत्पादन संवर्धन” नाम से विशेष उप-घटक शुरू किया है। इसके तहत किसानों को पारंपरिक बीजों के उत्पादन, वितरण, क्षमता निर्माण और सामुदायिक बीज बैंक स्थापित करने के लिए वित्तीय सहायता उपलब्ध कराई जा रही है।

‘वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट’ से स्थानीय उत्पादों को नई पहचान

सरकार की प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य उद्योग उन्नयन योजना (PMFME) के अंतर्गत एक जिला-एक उत्पाद (ODOP) मॉडल के जरिए देशभर के 726 जिलों में स्थानीय और पारंपरिक कृषि उत्पादों को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसमें मखाना, शाही लीची, जर्दालू आम सहित अनेक पारंपरिक उत्पाद शामिल हैं। योजना के माध्यम से प्रसंस्करण, पैकेजिंग, ब्रांडिंग और विपणन के लिए वित्तीय एवं तकनीकी सहायता उपलब्ध कराई जा रही है।

GI टैग और राष्ट्रीय मखाना बोर्ड से बढ़ेगा बाजार

सरकार ने बताया कि भौगोलिक संकेतक (GI) वाले पारंपरिक कृषि उत्पादों को कानूनी संरक्षण देकर उनकी ब्रांडिंग और बाजार मूल्य बढ़ाया जा रहा है। इसी दिशा में हाल ही में राष्ट्रीय मखाना बोर्ड की स्थापना की गई है, जो मखाना उत्पादन, प्रसंस्करण, मूल्य संवर्धन और विपणन को नई गति देगा।

‘श्री अन्न’ पर विशेष फोकस

संयुक्त राष्ट्र द्वारा 2023 को अंतरराष्ट्रीय मिलेट वर्ष घोषित किए जाने के बाद सरकार ने मोटे अनाज यानी ‘श्री अन्न’ को विशेष प्राथमिकता दी है। हैदराबाद स्थित आईसीएआर-भारतीय मिलेट अनुसंधान संस्थान (IIMR) को मिलेट अनुसंधान का वैश्विक उत्कृष्टता केंद्र बनाया गया है। इसके अलावा उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना (PLISFPI) में भी मिलेट आधारित उत्पादों के लिए अलग प्रावधान किया गया है ताकि इनके मूल्य संवर्धन और व्यावसायीकरण को बढ़ावा मिल सके।

आधुनिक शोध से बेहतर देशी किस्मों का विकास

सरकार ने बताया कि आईसीएआर, डीबीटी और डीएसटी के सहयोग से गेहूं, धान, मक्का, तिल, मसूर, टमाटर और खीरा जैसी फसलों की देशी किस्मों पर 13 प्रमुख अनुसंधान परियोजनाएं संचालित की जा रही हैं। इनका उद्देश्य जलवायु सहनशील, रोग प्रतिरोधी और अधिक उत्पादन देने वाली नई किस्में विकसित करना है।

इसी शोध के परिणामस्वरूप पूसा बासमती की उन्नत किस्में विकसित हुई हैं, जिनका भारत के बासमती चावल निर्यात में महत्वपूर्ण योगदान है। वहीं पूर्वी उत्तर प्रदेश की प्रसिद्ध कालानमक धान की बेहतर उत्पादक किस्में पूसा नरेंद्र KN-1 और पूसा CRD KN-2 भी विकसित की गई हैं।

सामुदायिक बीज बैंक और पारंपरिक किस्मों का दस्तावेजीकरण

सरकार ने जानकारी दी कि आईसीएआर के सहयोग से 11 राज्यों में 5,000 से अधिक देशी किस्मों का मूल्यांकन किया गया है, जिनमें से लगभग 300 उत्कृष्ट पारंपरिक किस्मों की पहचान बड़े स्तर पर खेती के लिए की गई है। इसके अलावा देशभर में 50 सामुदायिक बीज बैंक स्थापित किए गए हैं, जहां 25 से अधिक फसलों की 4,000 से अधिक पारंपरिक किस्मों का संरक्षण किया जा रहा है।

साथ ही नेटिव बास्केट, माउंटेन ग्रेन्स और धरती नेचुरल्स जैसे ब्रांडों के माध्यम से इन उत्पादों की ब्रांडिंग और बाजार से जोड़ने के प्रयास किए जा रहे हैं।

खाद्य प्रसंस्करण में भी बढ़ रहा शोध

खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्रालय की अनुसंधान एवं विकास योजना के तहत अब तक 257 शोध परियोजनाओं को मंजूरी दी गई है। इनमें मिलेट आधारित उत्पादों, महुआ, सहजन तथा अन्य पारंपरिक कृषि उत्पादों पर अनुसंधान और मूल्य संवर्धन संबंधी परियोजनाएं शामिल हैं।

किसानों की आय बढ़ाने की दिशा में बड़ा कदम

सरकार का मानना है कि देशी बीजों का संरक्षण, पारंपरिक कृषि उत्पादों की वैज्ञानिक पहचान, आधुनिक शोध, सामुदायिक बीज बैंक, GI टैग, मूल्य संवर्धन और ब्रांडिंग जैसे कदम किसानों की आय बढ़ाने के साथ-साथ भारत की कृषि जैव विविधता को सुरक्षित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। साथ ही, यह पहल स्थानीय उत्पादों को राष्ट्रीय और वैश्विक बाजार में नई पहचान दिलाने में भी सहायक सिद्ध होगी।

 

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