बिहार में ‘सहकार से समृद्धि’ को मिली रफ्तार, सहकारी क्षेत्र में बड़े सुधार से किसानों को फायदा

बिहार में ‘सहकार से समृद्धि’ पहल के तहत सहकारी क्षेत्र को सशक्त बनाने की दिशा में केंद्र सरकार द्वारा कई महत्वपूर्ण कदम उठाए गए हैं। सहकारिता मंत्रालय की ओर से जारी ताजा जानकारी के अनुसार, प्राथमिक स्तर से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक सहकारी संस्थाओं को मजबूत करने के लिए व्यापक सुधार और नई योजनाएं लागू की जा रही हैं, जिनका सीधा लाभ किसानों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मिल रहा है।

इसी कड़ी में सहकारी चीनी मिलों को सशक्त बनाने के लिए शीरा आधारित एथेनॉल संयंत्रों को मल्टी-फीड एथेनॉल संयंत्रों में परिवर्तित करने की पहल की गई है। इस बदलाव के तहत अब मक्का जैसे वैकल्पिक कच्चे माल से भी एथेनॉल उत्पादन संभव होगा, जिससे मिलों की उत्पादन क्षमता सालभर बनी रहेगी। सरकार ने इस उद्देश्य के लिए 5 वर्षों तक 6 प्रतिशत या वास्तविक ब्याज का 50 प्रतिशत (जो भी कम हो) तक ब्याज अनुदान देने की योजना शुरू की है, वहीं तेल विपणन कंपनियों द्वारा भी ऐसी सहकारी मिलों को प्राथमिकता दी जा रही है।

सहकारी क्षेत्र को राहत देते हुए सरकार ने शीरा पर जीएसटी को 28 प्रतिशत से घटाकर 5 प्रतिशत कर दिया है, जिससे चीनी मिलों की आय में वृद्धि होने और किसानों को बेहतर मूल्य मिलने की उम्मीद है। इसके अलावा बंद पड़ी सहकारी चीनी मिलों के पुनरुद्धार की दिशा में भी कदम उठाए गए हैं, जिससे संबंधित क्षेत्रों में रोजगार और आय के नए अवसर पैदा होंगे।

सरकार ने सहकारिता क्षेत्र को राष्ट्रीय स्तर पर विस्तार देने के लिए तीन नई बहुराज्य सहकारी समितियों की स्थापना की है। इनमें भारतीय बीज सहकारी समिति लिमिटेड (BBSSL), राष्ट्रीय सहकारी ऑर्गेनिक्स लिमिटेड (NCOL) और राष्ट्रीय सहकारी निर्यात लिमिटेड (NCEL) शामिल हैं। इन संस्थाओं के माध्यम से बीज उत्पादन, जैविक खेती को बढ़ावा और कृषि उत्पादों के निर्यात को नई गति मिली है। NCEL द्वारा अब तक 29 देशों को हजारों करोड़ रुपये मूल्य के कृषि उत्पादों का निर्यात किया जा चुका है।

कृषि क्षेत्र में नवाचार को बढ़ावा देने के लिए गुजरात के कलोल में अत्याधुनिक बीज अनुसंधान केंद्र की स्थापना की जा रही है। इसके साथ ही केले और आलू के लिए टिश्यू कल्चर सुविधाएं विकसित की जा रही हैं, जिससे किसानों को उच्च गुणवत्ता की रोपण सामग्री उपलब्ध हो सकेगी और उत्पादन में वृद्धि होगी।

सहकारी संस्थाओं के क्षमता निर्माण के लिए “त्रिभुवन सहकारी विश्वविद्यालय” की स्थापना की गई है, जहां सहकारिता, कृषि व्यवसाय और बैंकिंग जैसे क्षेत्रों में नए पाठ्यक्रम शुरू किए गए हैं। इसके अलावा देशभर में लाखों सहकारी सदस्यों और पैक्स से जुड़े लोगों को विभिन्न प्रशिक्षण कार्यक्रमों के माध्यम से प्रशिक्षित किया जा रहा है।

डिजिटल क्षेत्र में भी बड़े बदलाव किए गए हैं। राष्ट्रीय सहकारी डेटाबेस के माध्यम से देशभर की 8.4 लाख से अधिक सहकारी समितियों और 32 करोड़ से अधिक सदस्यों का डेटा एकत्र किया गया है, जिससे नीति निर्माण और पारदर्शिता को मजबूती मिली है।

वित्तीय सशक्तिकरण के तहत राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम (NCDC) द्वारा ऋण वितरण में उल्लेखनीय वृद्धि की गई है। साथ ही फ्लोटिंग ब्याज दर और कोलेटरल फ्री लोन जैसी सुविधाएं भी शुरू की गई हैं, जिससे सहकारी संस्थाओं को सस्ती दरों पर वित्तीय सहायता मिल रही है।

बिहार की बात करें तो राज्य में 8,500 से अधिक कार्यशील पैक्स हैं, जिनसे 1.37 करोड़ से अधिक सदस्य जुड़े हुए हैं। यह आंकड़ा दर्शाता है कि बिहार सहकारिता आंदोलन में तेजी से उभरता हुआ प्रमुख राज्य बन रहा है।

कुल मिलाकर ‘सहकार से समृद्धि’ पहल के तहत किए जा रहे ये प्रयास किसानों की आय बढ़ाने, सहकारी संस्थाओं को आधुनिक बनाने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सशक्त करने की दिशा में महत्वपूर्ण साबित हो रहे हैं।

 

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