पराली से बढ़ेगी किसानों की कमाई! केंद्र सरकार ने बनाया बड़ा प्लान, बिजली, बायो-CNG और खाद बनाने पर जोर

Stubble stubble will increase farmers' income! The central government has made a major plan

Stubble stubble will increase farmers' income! The central government has made a major plan, focusing on electricity, bio-CNG, and fertilizer production.

Stubble stubble will increase farmers' income! The central government has made a major plan, focusing on electricity, bio-CNG, and fertilizer production.

धान की कटाई के बीच पराली जलाने की समस्या से निपटने और किसानों को फसल अवशेषों से अतिरिक्त आय उपलब्ध कराने के लिए केंद्र सरकार ने प्रयास तेज कर दिए हैं। केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान और केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने नई दिल्ली स्थित कृषि भवन में आयोजित उच्चस्तरीय अंतर-मंत्रालयी बैठक में पराली प्रबंधन की स्थिति की समीक्षा की। बैठक में पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश सहित प्रमुख राज्यों के प्रतिनिधियों तथा केंद्र और राज्य सरकारों के वरिष्ठ अधिकारियों ने हिस्सा लिया।

बैठक में केंद्रीय मंत्रियों ने स्पष्ट किया कि धान की कटाई और रबी फसलों की बुवाई के बीच समय बेहद कम है। ऐसे में पराली जलाने की घटनाओं को रोकने के लिए प्रशासन को कागजी कार्रवाई तक सीमित रहने के बजाय खेतों में उतरकर काम करना होगा। जिला प्रशासन को तत्काल बैठकें आयोजित करने, किसानों तक कृषि मशीनरी पहुंचाने और गांव स्तर पर प्रभावी निगरानी व्यवस्था मजबूत करने के निर्देश दिए गए।

केंद्र सरकार का जोर केवल पराली जलाने की घटनाओं को रोकने पर नहीं, बल्कि फसल अवशेषों को किसानों की आय का अतिरिक्त स्रोत बनाने पर भी है। इसके लिए पराली से जैविक खाद, बिजली, कंप्रेस्ड बायो गैस (CBG), बायो-इथेनॉल और पशु चारा तैयार करने जैसे विकल्पों को बढ़ावा देने की रणनीति पर चर्चा की गई।

पराली समस्या नहीं, किसानों की अतिरिक्त आय का जरिया बनेगी

बैठक में केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि किसानों से केवल पराली नहीं जलाने की अपील करना पर्याप्त नहीं है। उन्हें ऐसे विकल्प उपलब्ध कराने होंगे, जो सस्ते, सुलभ और व्यावहारिक हों। किसानों को अगली फसल की बुवाई समय पर करनी होती है, इसलिए पराली प्रबंधन की ऐसी व्यवस्था जरूरी है, जिससे उनका समय और पैसा दोनों बच सकें।

उन्होंने कहा कि पराली जलाने से वायु प्रदूषण बढ़ता है और मिट्टी में मौजूद लाभकारी जीवों तथा पोषक तत्वों को नुकसान पहुंचता है। खेत में फसल अवशेषों का उचित प्रबंधन करने से जैविक खाद तैयार की जा सकती है, जबकि पराली को खेत से बाहर ले जाकर ऊर्जा उत्पादन और अन्य औद्योगिक उपयोगों में लगाया जा सकता है।

कृषि मंत्री ने पराली को किसान की अतिरिक्त कमाई का माध्यम बनाने पर जोर देते हुए कहा कि इसे बिजली, बायो-CNG, बायो-इथेनॉल और पशु चारे के रूप में उपयोग करने की संभावनाओं को मजबूत किया जाना चाहिए।

सरकार की इस रणनीति का उद्देश्य किसानों को पराली के निपटान के लिए आर्थिक रूप से व्यवहार्य विकल्प उपलब्ध कराना है। यदि फसल अवशेषों की खरीद, संग्रहण, परिवहन और प्रसंस्करण की प्रभावी व्यवस्था विकसित होती है, तो किसानों को पराली के प्रबंधन में मदद मिलने के साथ-साथ ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार और नए कृषि व्यवसायों की संभावनाएं भी बढ़ सकती हैं।

हरियाणा में 53.3% और उत्तर प्रदेश में 32% घटीं पराली जलाने की घटनाएं

बैठक में प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार, 15 सितंबर से 12 अक्टूबर 2026 के बीच पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में हरियाणा में पराली जलाने की घटनाओं में 53.3 प्रतिशत और उत्तर प्रदेश में लगभग 32 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई।

पंजाब में भी पिछले वर्ष की तुलना में कुछ गिरावट दर्ज होने की जानकारी दी गई। हालांकि, मध्य प्रदेश और राजस्थान में पराली जलाने की घटनाओं में वृद्धि को लेकर केंद्रीय कृषि मंत्री ने चिंता व्यक्त की।

उन्होंने दोनों राज्यों को प्रभावित जिलों और गांवों की पहचान करके तत्काल विशेष कार्ययोजना लागू करने के निर्देश दिए। साथ ही, जिन राज्यों में पराली जलाने की घटनाएं कम हुई हैं, उन्हें भी सतर्कता बनाए रखने को कहा गया।

यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि धान की कटाई एक साथ सभी क्षेत्रों में पूरी नहीं होती। कई जिलों में कटाई और अगली फसल की बुवाई की गतिविधियां आगे भी जारी रहती हैं। ऐसे में शुरुआती अवधि में दर्ज कमी के आधार पर निगरानी में ढिलाई बरतने से बाद में घटनाएं बढ़ने का जोखिम बना रह सकता है।

सरकार का मानना है कि जिला स्तर पर निगरानी, मशीनों की उपलब्धता और किसानों को समय पर तकनीकी सहायता देने से पराली जलाने की घटनाओं को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है।

3.54 लाख से अधिक कृषि मशीनें उपलब्ध, पुरानी मशीनों की मरम्मत पर जोर

पराली प्रबंधन में कृषि मशीनरी की उपलब्धता महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। किसानों को धान के अवशेषों को खेत में मिलाने, उन्हें काटने, इकट्ठा करने या अन्य उपयोगों के लिए तैयार करने में अलग-अलग मशीनों की जरूरत पड़ सकती है।

बैठक में बताया गया कि केंद्र सरकार द्वारा अब तक राज्यों को 3.54 लाख से अधिक फसल अवशेष प्रबंधन (Crop Residue Management-CRM) मशीनें उपलब्ध कराई जा चुकी हैं। वित्त वर्ष 2026-27 में अब तक 26,109 नई मशीनें भी दी गई हैं।

केंद्रीय कृषि मंत्री ने कहा कि केवल नई मशीनें उपलब्ध कराना ही पर्याप्त नहीं है। पुरानी मशीनों का भी पूरा उपयोग सुनिश्चित किया जाना चाहिए। जो मशीनें खराब होने के कारण बंद पड़ी हैं, उनकी तत्काल मरम्मत कराकर उन्हें दोबारा चालू किया जाए।

उन्होंने स्पष्ट किया कि मशीनें केवल सरकारी रिकॉर्ड में उपलब्ध नहीं दिखनी चाहिए, बल्कि जरूरत के समय खेतों में काम करती हुई दिखाई देनी चाहिए।

इस संबंध में Custom Hiring Centres (CHCs) को सक्रिय करने पर भी जोर दिया गया। ये केंद्र किसानों को किराये पर कृषि मशीनरी उपलब्ध कराने में मदद करते हैं। छोटे और सीमांत किसानों के लिए महंगी मशीन खरीदना हमेशा संभव नहीं होता। ऐसे में रियायती दर पर मशीनें किराये से उपलब्ध होने पर वे भी आधुनिक कृषि तकनीक का लाभ उठा सकते हैं।

पराली प्रबंधन के लिए मशीनों की समय पर उपलब्धता से किसानों को धान की कटाई के बाद खेत तैयार करने और गेहूं की बुवाई में देरी कम करने में मदद मिल सकती है।

पराली प्रबंधन के लिए राज्यों को मिले 4,266 करोड़ रुपये से अधिक

बैठक में केंद्र सरकार की ओर से राज्यों को उपलब्ध कराई गई वित्तीय सहायता की जानकारी भी साझा की गई।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, फसल अवशेष प्रबंधन योजना के तहत वित्त वर्ष 2018-19 से 2025-26 के दौरान राज्यों को कुल 4,266.47 करोड़ रुपये जारी किए गए। इसमें पंजाब को 2,056.50 करोड़ रुपये, हरियाणा को 1,171.71 करोड़ रुपये, उत्तर प्रदेश को 868.67 करोड़ रुपये और मध्य प्रदेश को 59 करोड़ रुपये दिए गए।

वित्त वर्ष 2026-27 के लिए भी 592.57 करोड़ रुपये का आवंटन निर्धारित किया गया है, जिसमें से 430.87 करोड़ रुपये जारी किए जा चुके हैं।

केंद्रीय कृषि मंत्री ने उपलब्ध धनराशि के उपयोग में तेजी लाने की आवश्यकता पर जोर दिया। उनका कहना था कि योजनाओं के लिए आवंटित संसाधनों का लाभ समय पर किसानों तक पहुंचना चाहिए, ताकि पराली प्रबंधन के लिए जरूरी मशीनरी और अन्य सुविधाएं उपलब्ध कराई जा सकें।

बैठक में पंजाब सरकार से पूर्व में जारी राशि का उपयोगिता प्रमाण पत्र (Utilization Certificate-UC) जल्द भेजने का आग्रह किया गया। इससे योजना के तहत अगली किस्त जारी करने की प्रक्रिया में आने वाली बाधाओं को दूर करने में मदद मिलेगी।

केंद्र सरकार ने राज्यों को भरोसा दिया कि पराली प्रबंधन के लिए आवश्यक तकनीकी, प्रशासनिक और आर्थिक सहायता उपलब्ध कराने के प्रयास जारी रहेंगे।

पराली से बिजली, बायो-CNG और बायो-इथेनॉल बनाने की तैयारी

पराली को उपयोगी संसाधन में बदलना केंद्र सरकार की रणनीति का प्रमुख हिस्सा है। इसके लिए कृषि मंत्री ने राज्यों को उद्योगों और किसानों के बीच सीधा संपर्क स्थापित करने पर जोर दिया।

बैठक में थर्मल पावर प्लांटों में पराली से तैयार पेलेट्स के उपयोग, कंप्रेस्ड बायो गैस (CBG) और सेकंड जनरेशन बायो-इथेनॉल संयंत्रों के साथ आपूर्ति व्यवस्था विकसित करने पर चर्चा की गई।

पराली से तैयार पेलेट्स का इस्तेमाल कुछ ताप विद्युत संयंत्रों में कोयले के साथ किया जा सकता है। इससे कृषि अवशेषों के वैकल्पिक उपयोग को बढ़ावा मिल सकता है। इसी तरह, उपयुक्त तकनीक और प्रसंस्करण व्यवस्था के माध्यम से फसल अवशेषों का इस्तेमाल बायो-CNG और बायो-इथेनॉल उत्पादन में किया जा सकता है।

हालांकि, इन विकल्पों की सफलता के लिए पराली की नियमित आपूर्ति, संग्रहण केंद्र, परिवहन व्यवस्था, प्रसंस्करण क्षमता और उद्योगों की मांग के बीच बेहतर तालमेल जरूरी है।

शिवराज सिंह चौहान ने राज्यों से कहा कि पहले से स्वीकृत आपूर्ति परियोजनाओं को बिना अनावश्यक देरी के जमीन पर शुरू कराया जाए। किसानों को उद्योगों से जोड़ने वाली Supply Chain मजबूत होने पर पराली के उपयोग के लिए स्थायी बाजार विकसित करने में मदद मिल सकती है।

यदि किसान को फसल अवशेष बेचने का व्यावहारिक विकल्प मिलता है, तो पराली को बेकार समझकर जलाने की प्रवृत्ति कम करने में सहायता मिल सकती है। इसके लिए खरीद की शर्तों, गुणवत्ता, परिवहन लागत और भुगतान व्यवस्था को भी किसानों के अनुकूल बनाना जरूरी होगा।

सूखे क्षेत्रों में पराली से पशुओं के लिए चारे की व्यवस्था

बैठक में पराली के पशु चारे के रूप में उपयोग की संभावनाओं पर भी जोर दिया गया। केंद्रीय कृषि मंत्री ने निर्देश दिए कि जिन क्षेत्रों में सूखे की स्थिति है, वहां उपयुक्त फसल अवशेषों को सुरक्षित रूप से संग्रहित करके पशुओं के चारे के रूप में उपयोग करने की संभावनाएं तलाश की जाएं।

कई ग्रामीण क्षेत्रों में पशुपालन किसानों की आय का महत्वपूर्ण हिस्सा है। ऐसे में चारे की कमी के दौरान उपलब्ध कृषि अवशेषों का उचित उपयोग मददगार हो सकता है। हालांकि, हर प्रकार की पराली पशुओं के लिए सीधे उपयुक्त नहीं होती। उसकी गुणवत्ता, पोषण स्तर और सुरक्षित उपयोग का ध्यान रखना आवश्यक है।

इसके लिए स्थानीय पशुपालन विभाग और कृषि विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार चारा प्रबंधन की व्यवस्था विकसित की जा सकती है।

सरकार की इस पहल का उद्देश्य फसल अवशेषों को खेत में जलाने के बजाय उनके उपयोग के अलग-अलग रास्ते तैयार करना है, ताकि किसानों और पशुपालकों को संभावित लाभ मिल सके।

पूसा-44 के स्थान पर कम अवधि वाली धान किस्मों को बढ़ावा

धान की कटाई और गेहूं की बुवाई के बीच समय का अंतर पराली प्रबंधन को प्रभावित करने वाला महत्वपूर्ण कारक है। यदि धान की फसल देर से पकती है, तो किसानों के पास खेत से अवशेषों का प्रबंधन करने और अगली फसल बोने के लिए कम समय बचता है।

बैठक में केंद्रीय कृषि मंत्री ने पूसा-44 जैसी अधिक समय लेने वाली धान की किस्मों के स्थान पर कम अवधि वाली उन्नत किस्मों को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर जोर दिया। इस संदर्भ में पूसा 2090 और PR126 जैसी किस्मों का उल्लेख किया गया।

कम अवधि वाली उपयुक्त किस्मों को अपनाने से कुछ कृषि परिस्थितियों में धान की कटाई जल्दी पूरी करने और अगली फसल की बुवाई के लिए अधिक समय उपलब्ध कराने में मदद मिल सकती है।

हालांकि, किसानों को धान की किस्म का चयन केवल उसकी अवधि के आधार पर नहीं करना चाहिए। स्थानीय जलवायु, मिट्टी, सिंचाई की उपलब्धता, उपज क्षमता, बाजार की मांग और संबंधित क्षेत्र के लिए कृषि विश्वविद्यालयों की सिफारिशों को भी ध्यान में रखना चाहिए।

इस दिशा में कृषि विज्ञान केंद्रों (KVKs), कृषि विभागों और कृषि वैज्ञानिकों की भूमिका महत्वपूर्ण होगी, ताकि किसानों तक सही किस्मों और वैज्ञानिक फसल प्रबंधन की जानकारी पहुंच सके।

भूपेंद्र यादव ने सैटेलाइट निगरानी और ग्राउंड पेट्रोलिंग तेज करने को कहा

बैठक की सह-अध्यक्षता कर रहे केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने पराली जलाने की घटनाओं को रोकने के लिए निगरानी और प्रवर्तन व्यवस्था को मजबूत बनाने पर जोर दिया।

उन्होंने पंजाब के संगरूर, तरनतारन, अमृतसर, पटियाला और गुरदासपुर जैसे जिलों तथा हरियाणा के कैथल, करनाल, कुरुक्षेत्र, अंबाला और फतेहाबाद जैसे जिलों में विशेष निगरानी करने की आवश्यकता बताई।

इन क्षेत्रों में फसल कटाई के रुझानों का आकलन करके पराली जलाने की संभावित घटनाओं का पूर्वानुमान लगाने पर जोर दिया गया। इसके लिए सैटेलाइट से मिलने वाले आंकड़ों, जिला प्रशासन की रिपोर्ट और जमीनी निरीक्षण के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करने की जरूरत बताई गई।

भूपेंद्र यादव ने पराली जलाने से जुड़े आंकड़ों को वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के साथ जोड़ने पर भी जोर दिया। इसके साथ ही, मौसम संबंधी परिस्थितियों और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) की वायु गुणवत्ता पर उनके संभावित प्रभाव को ध्यान में रखकर कार्रवाई करने की आवश्यकता बताई गई।

उन्होंने कहा कि निगरानी केवल सैटेलाइट डेटा पर निर्भर नहीं रहनी चाहिए। जिला कलेक्टरों को वास्तविक परिस्थितियों का आकलन करने और जरूरत के अनुसार प्रवर्तन संबंधी कार्रवाई मजबूत करनी चाहिए।

विशेष रूप से दोपहर 3 बजे के बाद सैटेलाइट निगरानी में आने वाले अंतराल के दौरान ग्राउंड पेट्रोलिंग और फ्लाइंग स्क्वॉड के माध्यम से निगरानी रखने के निर्देश दिए गए। इसका उद्देश्य उन संभावित घटनाओं पर भी नजर रखना है, जो सैटेलाइट निगरानी के बीच के समय में हो सकती हैं।

जिला कलेक्टरों को माइक्रो-प्लानिंग के निर्देश

केंद्र सरकार ने पराली प्रबंधन को प्रभावी बनाने के लिए जिला स्तर पर Micro-Planning पर जोर दिया है। इसके तहत प्रत्येक जिले में फसल कटाई की स्थिति, पराली की मात्रा, उपलब्ध मशीनों, किसानों की जरूरतों और नजदीकी प्रसंस्करण इकाइयों का आकलन करके कार्ययोजना तैयार की जा सकती है।

जिला प्रशासन को यह सुनिश्चित करना होगा कि जिन गांवों में धान की कटाई तेजी से हो रही है, वहां किसानों को समय पर मशीनें उपलब्ध हों। साथ ही, कस्टम हायरिंग सेंटर सक्रिय रहें और खराब मशीनों की मरम्मत में देरी न हो।

इसके अलावा, किसानों को पराली प्रबंधन के वैज्ञानिक तरीकों की जानकारी देना भी जरूरी है। केवल निगरानी और कार्रवाई के माध्यम से समस्या का स्थायी समाधान मुश्किल हो सकता है, इसलिए किसानों को सस्ते और व्यावहारिक विकल्प उपलब्ध कराना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

कृषि विभाग, पर्यावरण विभाग, जिला प्रशासन, कृषि विज्ञान केंद्रों और स्थानीय उद्योगों के बीच तालमेल से पराली के संग्रहण और उपयोग की बेहतर व्यवस्था विकसित की जा सकती है।

पराली प्रबंधन से किसानों और पर्यावरण दोनों को लाभ पहुंचाने की कोशिश

केंद्र सरकार की इस समीक्षा बैठक से स्पष्ट है कि पराली प्रबंधन को अब केवल प्रदूषण नियंत्रण के मुद्दे के रूप में नहीं, बल्कि कृषि लागत, मिट्टी की सेहत, ग्रामीण रोजगार और किसानों की अतिरिक्त आय से जोड़कर देखा जा रहा है।

एक ओर सरकार मशीनों की उपलब्धता, पुरानी मशीनों की मरम्मत, रियायती किराये और जिला स्तर पर निगरानी को मजबूत करने पर जोर दे रही है। दूसरी ओर, पराली से बिजली, बायो-CNG, बायो-इथेनॉल, जैविक खाद और चारा तैयार करने के विकल्पों को बढ़ावा देने की योजना पर काम किया जा रहा है।

इस रणनीति का वास्तविक लाभ तभी किसानों तक पहुंचेगा, जब खेतों में समय पर मशीनें उपलब्ध हों, फसल अवशेषों के लिए भरोसेमंद बाजार विकसित हों और किसानों को पराली के प्रबंधन में होने वाले खर्च की तुलना में बेहतर आर्थिक विकल्प मिलें।

कुल मिलाकर, केंद्र सरकार का लक्ष्य पराली को जलाने की समस्या से निकालकर उपयोगी कृषि संसाधन और किसानों की अतिरिक्त आय के माध्यम में बदलना है। इसके लिए केंद्र और राज्यों के बीच बेहतर समन्वय, प्रभावी निगरानी और जमीनी स्तर पर तेजी से क्रियान्वयन आने वाले धान कटाई सीजन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।

 

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