उत्तराखंड का नैनीताल जिला अपनी प्राकृतिक सुंदरता और धार्मिक स्थलों के लिए जाना जाता है। इसी जिले के छोटा कैलाश क्षेत्र में रहने वाले किसान श्री शंकर दत्त ने पारंपरिक कृषि और पशुपालन से आगे बढ़कर scientific farming, training और expert guidance को अपनाया। इसका असर उनकी खेती, पशुपालन और आय—तीनों पर दिखाई दिया।
बचपन से ही कृषि और पशुपालन से जुड़े श्री दत्त ने लंबे समय तक वही पारंपरिक तरीके अपनाए, जो उन्होंने अपने परिवार के बुजुर्गों से सीखे थे। मेहनत लगातार होती रही, लेकिन उत्पादन और आमदनी में अपेक्षित वृद्धि नहीं हो पा रही थी। ऐसे समय में कृषि प्रशिक्षण उनके लिए बदलाव का माध्यम बना।
बचपन से ही कृषि और पशुपालन से जुड़ाव
श्री शंकर दत्त का बचपन खेतों और पशुओं के बीच बीता। उनके परिवार में कृषि आजीविका का प्रमुख आधार थी। उन्होंने बचपन से ही परिवार के सदस्यों को खेतों में काम करते, पशुओं की देखभाल करते और पारंपरिक कृषि पद्धतियों से फसल उत्पादन करते देखा।
शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने भी कृषि एवं पशुपालन को व्यवसाय के रूप में अपनाया। शुरुआत में वे पारंपरिक तरीकों पर ही निर्भर रहे। खेती में मेहनत और समय दोनों पर्याप्त लगते थे, लेकिन उपलब्ध संसाधनों के मुकाबले आमदनी सीमित थी।
पशुपालन की स्थिति भी कुछ ऐसी ही थी। वैज्ञानिक पशु प्रबंधन, पोषण और दुग्ध उत्पादन से जुड़ी जानकारी सीमित होने के कारण उन्हें अपेक्षित लाभ नहीं मिल पा रहा था।
इसी अनुभव ने उनके मन में एक महत्वपूर्ण सवाल पैदा किया—क्या खेती और पशुपालन को वैज्ञानिक तरीके से करके कम संसाधनों में बेहतर परिणाम हासिल किए जा सकते हैं?
यही सवाल आगे चलकर उनकी कृषि यात्रा में परिवर्तन का आधार बना।
प्रगतिशील किसानों से मिली नई दिशा
कृषि कार्य के दौरान श्री दत्त की मुलाकात आसपास के कुछ प्रगतिशील किसानों से हुई। बातचीत के दौरान उन्हें पता चला कि कई किसान नई agricultural technologies, improved farming practices और training programmes को अपनाकर अपनी खेती में बदलाव कर रहे हैं।
इसी दौरान उन्हें पंतनगर में आयोजित होने वाले कृषि एवं पशुपालन संबंधी प्रशिक्षण कार्यक्रमों की जानकारी मिली। उन्होंने इसे अपनी कृषि व्यवस्था में सुधार का अवसर माना और संबंधित विभाग से संपर्क किया।
उनका यह निर्णय आगे चलकर उनके लिए महत्वपूर्ण साबित हुआ।
प्रशिक्षण बना कृषि में बदलाव की शुरुआत
श्री दत्त ने विभाग के माध्यम से विभिन्न training programmes में हिस्सा लिया। इन प्रशिक्षणों में उन्हें उन्नत फसल उत्पादन, पशुपालन और बेहतर दुग्ध उत्पादन सहित कई महत्वपूर्ण विषयों की जानकारी मिली।
इन प्रशिक्षणों ने उन्हें केवल नई तकनीकें ही नहीं सिखाईं, बल्कि खेती को देखने का उनका नजरिया भी बदला।
उन्होंने समझा कि कृषि में सफलता केवल अधिक मेहनत करने से नहीं मिलती। Right technology, quality inputs, scientific management, crop diversification और timely expert advice भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।
प्रशिक्षण में प्राप्त जानकारी को उन्होंने अपने खेत तक पहुंचाया और सीखी गई तकनीकों का practical application शुरू किया।
प्रशिक्षण के ज्ञान को खेत में किया लागू
प्रशिक्षण के बाद श्री दत्त ने अपने खेत में विभिन्न उन्नत कृषि तकनीकों को अपनाना शुरू किया। उन्होंने पारंपरिक अनुभव को वैज्ञानिक जानकारी के साथ जोड़ने का प्रयास किया।
उन्होंने उपलब्ध संसाधनों का बेहतर उपयोग किया और फसल प्रबंधन में आवश्यक बदलाव किए। इसी क्रम में उन्होंने अपने खेत में मटर की खेती भी की, जिससे उन्हें अतिरिक्त आमदनी प्राप्त हुई।
फसल diversification ने उनकी कृषि व्यवस्था को अधिक व्यवस्थित बनाने में मदद की। अलग-अलग फसलों के माध्यम से उन्होंने अपनी आय के स्रोतों को बढ़ाने का प्रयास किया।
मटर की खेती का अनुभव उनके लिए महत्वपूर्ण रहा। इससे उन्हें यह भरोसा हुआ कि सीमित भूमि और संसाधनों के बावजूद सही तकनीक तथा बेहतर management के माध्यम से किसान अपनी कृषि आय में सुधार कर सकता है।
पशुपालन को भी बनाया आय का मजबूत आधार
श्री दत्त ने केवल फसल उत्पादन पर ही ध्यान नहीं दिया। उन्होंने पशुपालन और milk production में भी प्रशिक्षण से मिली जानकारी को अपनाया।
पशुओं के बेहतर management, nutrition, cleanliness और स्वास्थ्य संबंधी वैज्ञानिक जानकारी को उन्होंने अपने पशुपालन कार्य में शामिल किया।
उनके लिए पशुपालन अब केवल पारिवारिक परंपरा नहीं रहा, बल्कि household income को मजबूत करने वाली महत्वपूर्ण गतिविधि बन गया।
श्री दत्त के अनुभव के अनुसार, पशुओं को संतुलित पोषण देना, उनकी स्वच्छता का ध्यान रखना और वैज्ञानिक तरीके से देखभाल करना सीधे तौर पर उनके स्वास्थ्य और दुग्ध उत्पादन से जुड़ा है।
इस तरह खेती और पशुपालन दोनों को एक-दूसरे के पूरक के रूप में विकसित करने की दिशा में उन्होंने कदम बढ़ाया।
वैज्ञानिक खेती से बढ़ी आमदनी
प्रशिक्षण और वैज्ञानिक तकनीकों को अपनाने का सबसे स्पष्ट प्रभाव श्री दत्त की आय में दिखाई दिया।
उनके अनुसार, पहले खेती और दुग्ध उत्पादन से उन्हें लगभग 80,000 से 1,00,000 रुपये वार्षिक आय प्राप्त होती थी। प्रशिक्षण प्राप्त करने और नई तकनीकों को अपनाने के बाद उनकी कृषि एवं पशुपालन गतिविधियों में सुधार हुआ और वर्तमान में उनकी वार्षिक आय लगभग 1,00,000 से 2,00,000 रुपये तक पहुंच गई है।
यह बदलाव उनके लिए केवल आर्थिक उपलब्धि नहीं है। यह इस बात का उदाहरण भी है कि किसान की पारंपरिक मेहनत जब वैज्ञानिक ज्ञान और सही guidance से जुड़ती है, तो उपलब्ध संसाधनों से बेहतर परिणाम हासिल किए जा सकते हैं।
प्रशिक्षण ने बढ़ाया सीखने और अनुभव साझा करने का दायरा
पंतनगर में आयोजित प्रशिक्षण कार्यक्रमों ने श्री दत्त को नई तकनीकों की जानकारी देने के साथ-साथ दूसरे किसानों से सीखने का अवसर भी दिया।
उत्तराखंड के विभिन्न जिलों से आने वाले किसानों के साथ बातचीत के दौरान उन्होंने अलग-अलग क्षेत्रों की farming practices, crop management techniques और किसानों के अनुभवों को समझा।
उनका मानना है कि किसानों के बीच knowledge sharing भी किसी training programme का महत्वपूर्ण हिस्सा है। दूसरे किसानों की सफलताओं और उनके सामने आने वाली चुनौतियों से सीखकर अपने खेत में नए प्रयोग करने की प्रेरणा मिलती है।
इस तरह प्रशिक्षण उनके लिए classroom learning तक सीमित नहीं रहा, बल्कि किसानों के आपसी अनुभवों से सीखने का माध्यम भी बना।
पंतनगर के वैज्ञानिकों से मिला तकनीकी मार्गदर्शन
श्री दत्त की कृषि यात्रा में गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, पंतनगर के वैज्ञानिकों का तकनीकी मार्गदर्शन भी महत्वपूर्ण रहा।
खेती या पशुपालन से जुड़ी किसी समस्या के सामने आने पर वे विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों से फोन के माध्यम से सलाह लेते हैं। विशेषज्ञों से समय पर मिलने वाली जानकारी उन्हें समस्या को समझने और उचित निर्णय लेने में सहायता करती है।
किसानों के लिए यह expert connectivity विशेष रूप से उपयोगी हो सकती है, क्योंकि खेत में आने वाली हर समस्या का समाधान केवल अनुभव के आधार पर करना संभव नहीं होता।
श्री दत्त ने इस बात को समझा कि आवश्यकता पड़ने पर विशेषज्ञों की सलाह लेना भी वैज्ञानिक खेती का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
प्रगतिशील किसान के रूप में मिली पहचान
श्री शंकर दत्त की मेहनत, सीखने की इच्छा और कृषि में किए गए प्रयासों को विभिन्न स्तरों पर पहचान भी मिली।
उन्हें ATMA योजना के अंतर्गत वर्ष 2025–26 में जनपद स्तर पर ‘सर्वश्रेष्ठ कृषक–किसान श्री’ पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
इसके अलावा किसान दिवस के अवसर पर उन्हें प्रगतिशील किसान के रूप में जिलाधिकारी, नैनीताल द्वारा प्रशस्ति-पत्र प्रदान कर सम्मानित किया गया।
इन सम्मानों ने उनके आत्मविश्वास को बढ़ाया और कृषि क्षेत्र में लगातार सीखने तथा नए प्रयोग करने की उनकी इच्छा को और मजबूत किया।
खेती अब सिर्फ मेहनत नहीं, वैज्ञानिक प्रबंधन भी है
श्री दत्त का अनुभव बताता है कि किसान की पारंपरिक समझ और आधुनिक scientific knowledge एक-दूसरे के पूरक हो सकते हैं।
पहले कृषि और पशुपालन उनके लिए मुख्य रूप से पारिवारिक परंपरा और आजीविका का साधन थे। प्रशिक्षण के बाद उन्होंने खेती को अधिक scientific और systematic तरीके से देखने की शुरुआत की।
अब वे समस्या आने पर विशेषज्ञों से सलाह लेते हैं, नई तकनीकों को समझते हैं और प्रशिक्षण में मिली जानकारी को खेत में लागू करने का प्रयास करते हैं।
उनकी यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है कि उन्होंने सीखने की प्रक्रिया को लगातार जारी रखा।
दूसरे किसानों के लिए क्या है संदेश?
श्री शंकर दत्त की कहानी उन किसानों के लिए महत्वपूर्ण संदेश देती है, जो आज भी केवल पारंपरिक तरीकों पर निर्भर हैं और अधिक मेहनत करने के बावजूद अपेक्षित आय हासिल नहीं कर पा रहे हैं।
कृषि में बदलाव की शुरुआत learning और सही information से हो सकती है। किसान कृषि विभाग, ATMA, SAMETI और कृषि विश्वविद्यालयों द्वारा आयोजित training programmes से जुड़कर नई तकनीकों की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
इसके साथ ही वैज्ञानिकों और कृषि विशेषज्ञों से technical guidance लेकर अपनी स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार तकनीकों को अपनाया जा सकता है।
हालांकि हर किसान की भूमि, जलवायु, संसाधन और बाजार की परिस्थितियां अलग होती हैं। इसलिए किसी भी नई तकनीक को अपनाने से पहले स्थानीय कृषि विशेषज्ञों की सलाह और अपने क्षेत्र की परिस्थितियों को ध्यान में रखना जरूरी है।
सहयोगी संस्थानों के प्रति आभार
श्री शंकर दत्त अपनी कृषि यात्रा में सहयोग देने वाले संस्थानों और अधिकारियों के प्रति आभार व्यक्त करते हैं।
वे उत्तराखंड सरकार, कृषि विभाग, ATMA योजना, SAMETI पंतनगर तथा गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, पंतनगर के वैज्ञानिकों और अधिकारियों का धन्यवाद करते हैं, जिन्होंने उन्हें training, technical guidance और कृषि क्षेत्र में आगे बढ़ने के अवसर उपलब्ध कराए।
आज श्री शंकर दत्त केवल खेती करने वाले किसान नहीं हैं, बल्कि सीखने, प्रयोग करने और वैज्ञानिक तकनीकों को अपनाने वाले प्रगतिशील कृषक के रूप में अपनी पहचान बना चुके हैं।
शंकर दत्त की कहानी से मिलती है सीख
श्री शंकर दत्त की कृषि यात्रा यह दिखाती है कि किसान की मेहनत को यदि वैज्ञानिक ज्ञान, प्रशिक्षण और समय पर विशेषज्ञ मार्गदर्शन का साथ मिल जाए, तो खेती और पशुपालन में बेहतर परिणाम हासिल किए जा सकते हैं।
उनका अनुभव यह भी बताता है कि कृषि में बदलाव हमेशा बड़े निवेश से ही शुरू नहीं होता। कई बार बदलाव की पहली सीढ़ी सही जानकारी प्राप्त करना, प्रशिक्षण में भाग लेना और सीखी गई तकनीक को अपने खेत की परिस्थितियों के अनुसार लागू करना होती है।
पारंपरिक अनुभव किसानों की बड़ी ताकत है, लेकिन उसके साथ scientific farming practices, crop diversification, बेहतर पशु प्रबंधन और expert advice को जोड़कर कृषि को अधिक व्यवस्थित और लाभकारी बनाने की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है।
श्री शंकर दत्त की कहानी इसी सीख को सामने रखती है—किसान की मेहनत में जब ज्ञान, प्रशिक्षण और वैज्ञानिक सोच जुड़ती है, तो वही मेहनत बेहतर परिणाम और नई संभावनाओं का आधार बन सकती है।
