World Food Day 2026: अब सिर्फ पेट भरना नहीं, हर थाली में पोषण जरूरी!

World Food Day 2026: It’s no longer just about filling stomachs—nutrition on every plate is essential!

World Food Day 2026

World Food Day 2026

World Food Day 2026: दुनिया में अनाज का उत्पादन बढ़ने के बावजूद करोड़ों लोग आज भी भूख और कुपोषण से जूझ रहे हैं। कहीं बच्चों को पर्याप्त पौष्टिक भोजन नहीं मिल रहा, तो कहीं किसानों की मेहनत मौसम की मार, बढ़ती लागत और बाजार की अनिश्चितता के बीच फंस जाती है। ऐसे समय में 16 अक्टूबर को मनाया जा रहा विश्व खाद्य दिवस एक बड़ा सवाल सामने रखता है। आखिर जब खेती में इतनी तरक्की हो चुकी है, तो हर इंसान तक पर्याप्त और पौष्टिक भोजन क्यों नहीं पहुंच पा रहा?

इस साल विश्व खाद्य दिवस की चर्चा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि खाद्य सुरक्षा को अब केवल गेहूं और चावल की उपलब्धता तक सीमित नहीं रखा जा सकता। अच्छी सेहत के लिए दालें, सब्जियां, फल, दूध और दूसरे पौष्टिक खाद्य पदार्थ भी जरूरी हैं। दूसरी तरफ खेती में डिजिटल तकनीक, मौसम की सटीक जानकारी, बेहतर बीज और कम पानी में ज्यादा उत्पादन जैसे उपाय भविष्य की खाद्य व्यवस्था को बदल सकते हैं।

संयुक्त राष्ट्र की 2026 की नई रिपोर्ट में भूख से प्रभावित लोगों की संख्या में कुछ कमी जरूर दर्ज की गई है, लेकिन स्वस्थ भोजन की बढ़ती कीमत अब भी एक बड़ी चुनौती है। भारत में भी इस साल कृषि और स्वास्थ्य को जोड़ने वाली नई पहल शुरू हुई है, जबकि डिजिटल खेती से जुड़े कई कार्यक्रमों का दायरा तेजी से बढ़ा है।

World Food Day 2026 की थीम क्या है और इस बार क्या खास है?

संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) ने World Food Day 2026 की आधिकारिक थीम “Innovate today. Nourish tomorrow.” रखी है। हिंदी में इसका अर्थ है, आज नवाचार करें, कल बेहतर पोषण सुनिश्चित करें।इस थीम का संदेश केवल आधुनिक मशीनों और नई तकनीक तक सीमित नहीं है। इसमें किसानों के पारंपरिक अनुभव, स्थानीय खाद्य संस्कृति, वैज्ञानिक अनुसंधान और समाज के सभी वर्गों की भागीदारी को भी महत्व दिया गया है।FAO का मानना है कि नई सोच और पुराने ज्ञान को साथ लेकर ऐसी खाद्य व्यवस्था बनाई जा सकती है, जिसमें लोगों को सुरक्षित और पौष्टिक भोजन मिले और प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण भी हो।इस वर्ष इटली की राजधानी रोम स्थित FAO मुख्यालय में 16 अक्टूबर को वैश्विक समारोह आयोजित किया जा रहा है। दुनियाभर के करीब 150 देशों में विभिन्न कार्यक्रमों के माध्यम से खाद्य सुरक्षा, किसानों के योगदान और टिकाऊ खेती को लेकर जागरूकता बढ़ाई जा रही है। इस थीम का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि अब दुनिया को केवल अधिक भोजन पैदा करने पर नहीं, बल्कि सही भोजन को सही व्यक्ति तक उचित कीमत पर पहुंचाने पर भी ध्यान देना होगा।

विश्व खाद्य दिवस क्यों मनाया जाता है?

हर साल 16 अक्टूबर को विश्व खाद्य दिवस मनाया जाता है। इसी तारीख को वर्ष 1945 में संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन की स्थापना हुई थी। बाद में वर्ष 1979 में इस दिवस को मनाने का निर्णय लिया गया और 1981 से इसे व्यापक स्तर पर मनाया जाने लगा। इस दिन का उद्देश्य भूख, कुपोषण, खाद्य असमानता और कृषि से जुड़ी समस्याओं के प्रति जागरूकता बढ़ाना है।

दुनिया के कई हिस्सों में किसान पर्याप्त फसल उगाते हैं, लेकिन उसके बाद भी गरीब परिवारों के लिए अच्छा भोजन खरीदना मुश्किल होता है। कहीं रोजगार और आय की कमी बाधा बनती है, तो कहीं परिवहन, भंडारण और वितरण की कमजोर व्यवस्था के कारण अनाज तथा अन्य खाद्य पदार्थ जरूरतमंदों तक नहीं पहुंच पाते। इसलिए विश्व खाद्य दिवस हमें याद दिलाता है कि भोजन केवल बाजार में बिकने वाली वस्तु नहीं, बल्कि हर इंसान के सम्मान और स्वस्थ जीवन से जुड़ी बुनियादी आवश्यकता है।

2026 की नई रिपोर्ट में क्या सामने आया? भूख घटी, लेकिन संकट खत्म नहीं हुआ

जुलाई 2026 में संयुक्त राष्ट्र की पांच एजेंसियों ने The State of Food Security and Nutrition in the World 2026 रिपोर्ट जारी की। इस रिपोर्ट ने वैश्विक खाद्य सुरक्षा की स्थिति को लेकर कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने रखे हैं। रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2024 में दुनिया की 8.1 प्रतिशत आबादी भूख से प्रभावित थी, जो 2025 में घटकर 7.8 प्रतिशत रह गई। वर्ष 2022 के मुकाबले करीब 4.3 करोड़ लोगों की स्थिति में सुधार दर्ज किया गया। यह एक सकारात्मक संकेत है, लेकिन तस्वीर का दूसरा पक्ष भी चिंताजनक है।

अफ्रीका में लगभग 30.9 करोड़ लोग भूख से प्रभावित थे, जबकि एशिया में यह संख्या करीब 29.2 करोड़ रही। इससे साफ होता है कि अलग-अलग क्षेत्रों में खाद्य सुरक्षा की स्थिति एक जैसी नहीं है।  दुनिया में भूख से प्रभावित आबादी कुल वैश्विक आबादी का प्रतिशत; SOFI 2026 के अनुसार

इस रिपोर्ट की एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि भूख घटने के बावजूद पौष्टिक भोजन आम लोगों की पहुंच से दूर होता जा रहा है। वर्ष 2025 में दुनिया की लगभग एक-तिहाई आबादी स्वस्थ आहार का खर्च उठाने में असमर्थ थी।यानी चुनौती केवल भोजन उपलब्ध कराने की नहीं, बल्कि ऐसा भोजन उपलब्ध कराने की है जो शरीर को जरूरी पोषक तत्व भी दे सके।

स्वस्थ भोजन महंगा क्यों हो रहा है?

आज बाजार में खाने-पीने की चीजें उपलब्ध होने का मतलब यह नहीं कि हर परिवार उन्हें खरीद भी सकता है। खासकर कम आय वाले परिवारों के लिए रोजाना फल, सब्जियां, दूध, दालें और दूसरे पौष्टिक खाद्य पदार्थ खरीदना आर्थिक चुनौती बन सकता है।

SOFI 2026 रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2025 में स्वस्थ आहार की औसत वैश्विक लागत बढ़कर प्रतिदिन प्रति व्यक्ति 4.28 अंतरराष्ट्रीय क्रय शक्ति समता (PPP) डॉलर तक पहुंच गई। यह वर्ष 2021 में 3.44 PPP डॉलर थी।यह आंकड़ा वास्तविक अमेरिकी डॉलर में रोज होने वाला खर्च नहीं बताता, बल्कि देशों के बीच खाद्य पदार्थों की कीमत और क्रय शक्ति की तुलना करने का एक तरीका है।

खाद्य पदार्थों की कीमत बढ़ने के पीछे कई कारण हैं। फसल उत्पादन में आने वाला खर्च, परिवहन का किराया, बिजली, ईंधन, भंडारण, पैकेजिंग और बाजार तक पहुंचने की लागत अंतिम कीमत पर असर डालती है।

संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार, उपभोक्ताओं द्वारा चुकाई जाने वाली खाद्य कीमत में खेती के बाद की गतिविधियों का हिस्सा लगभग 70 से 75 प्रतिशत तक हो सकता है। इससे पता चलता है कि केवल फसल की पैदावार बढ़ाकर भोजन को सस्ता बनाना आसान नहीं है। इसके लिए गांवों में कोल्ड स्टोरेज, बेहतर सड़कें, स्थानीय प्रसंस्करण इकाइयां और किसानों को सीधे बाजार से जोड़ने वाली व्यवस्थाएं भी जरूरी हैं।

World Food Day 2026 पर भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती क्या है?

भारत दुनिया के प्रमुख कृषि उत्पादक देशों में शामिल है। देश में गेहूं, चावल, दालों, दूध, फल और सब्जियों का बड़े पैमाने पर उत्पादन होता है। इसके बावजूद पोषण संबंधी समस्याओं को पूरी तरह दूर नहीं किया जा सका है। इसके पीछे एक महत्वपूर्ण कारण यह है कि पर्याप्त भोजन और संतुलित भोजन में अंतर होता है।

एक परिवार में सभी सदस्यों को भरपेट रोटी या चावल मिल सकता है, लेकिन यदि भोजन में प्रोटीन, आयरन, कैल्शियम, विटामिन और अन्य जरूरी पोषक तत्वों की कमी है, तो स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां बनी रह सकती हैं। विशेष रूप से बच्चों, गर्भवती महिलाओं और किशोरियों के लिए विविधतापूर्ण आहार महत्वपूर्ण है। भारत में खाद्य सुरक्षा के लिए सार्वजनिक वितरण प्रणाली, प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना, आंगनवाड़ी सेवाएं और पीएम पोषण जैसे कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं।

इन कार्यक्रमों की भूमिका अलग-अलग है। राशन वितरण व्यवस्था का उद्देश्य पात्र परिवारों तक अनाज पहुंचाना है, जबकि पोषण से जुड़े कार्यक्रम बच्चों और महिलाओं की आहार संबंधी जरूरतों को पूरा करने में मदद करते हैं। आने वाले समय में इन व्यवस्थाओं की सफलता केवल लाभार्थियों की संख्या से नहीं, बल्कि भोजन की गुणवत्ता, नियमित उपलब्धता और पोषण परिणामों में सुधार से भी मापनी होगी।

2026 में भारत की नई पहल: कृषि और स्वास्थ्य को जोड़ने वाला SEHAT मिशन

इस वर्ष भारत में पोषण सुरक्षा को लेकर एक महत्वपूर्ण कदम उठाया गया है। 11 मई 2026 को भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) और भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) की संयुक्त पहल के रूप में SEHAT मिशन शुरू किया गया। SEHAT का पूरा नाम Science Excellence for Health through Agricultural Transformation है। इस मिशन का उद्देश्य कृषि विज्ञान और स्वास्थ्य अनुसंधान को एक साथ लाना है, ताकि कुपोषण, सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी और पोषण असुरक्षा जैसी समस्याओं का वैज्ञानिक समाधान खोजा जा सके।

यह पहल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि लंबे समय तक खेती की सफलता को मुख्य रूप से पैदावार के आधार पर देखा जाता रहा है।अब सवाल यह भी है कि किसान ऐसी फसलें कैसे उगाएं जो बाजार में अच्छी कीमत देने के साथ लोगों के पोषण में भी सुधार कर सकें।उदाहरण के लिए, स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार पोषणयुक्त किस्मों का विकास, दालों की खेती को बढ़ावा, फल-सब्जियों की उपलब्धता और खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता पर अनुसंधान उपयोगी साबित हो सकता है।हालांकि SEHAT अभी नई पहल है। इससे कुपोषण में कितना वास्तविक सुधार होगा, इसका आकलन भविष्य में इसके परिणामों के आधार पर ही किया जा सकेगा।

डिजिटल खेती में भारत की नई प्रगति: 10 करोड़ से अधिक किसानों की डिजिटल पहचान

World Food Day 2026 के अवसर पर भारत में खेती के डिजिटल बदलाव को भी समझना जरूरी है।केंद्र सरकार के अगस्त 2026 में उपलब्ध कराए गए आंकड़ों के अनुसार, देश में 3 अगस्त तक 10.31 करोड़ से अधिक किसान आईडी बनाई जा चुकी थीं।इसी तरह रबी 2025-26 के दौरान 648 जिलों में 31.3 करोड़ से अधिक भूखंडों का डिजिटल फसल सर्वेक्षण किया गया।ये आंकड़े बताते हैं कि भारत में खेती से जुड़ी जानकारी को व्यवस्थित करने और कृषि सेवाओं को डिजिटल बनाने का काम बड़े स्तर पर आगे बढ़ रहा है।

डिजिटल एग्रीकल्चर मिशन के तहत AgriStack जैसी व्यवस्था विकसित की जा रही है। इसमें किसान की पहचान, खेती से संबंधित जानकारी और फसलों के रिकॉर्ड को जोड़कर सरकारी सेवाओं की पहुंच आसान बनाने का लक्ष्य रखा गया है।इससे फसल बीमा, कृषि ऋण, सरकारी योजनाओं और मौसम से जुड़ी सलाह जैसी सुविधाएं किसानों तक बेहतर ढंग से पहुंचाने में मदद मिल सकती है।हालांकि डिजिटल सुविधा का वास्तविक फायदा तभी मिलेगा जब छोटे किसानों के पास इंटरनेट, जरूरी जानकारी और तकनीकी सहायता भी उपलब्ध होगी।कृषि रिकॉर्ड में गलतियों को ठीक करने की सरल व्यवस्था और किसानों के निजी डेटा की सुरक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।

खेतों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस कैसे बदल रहा है खेती का तरीका?

आज नई तकनीक के माध्यम से किसान फसल की स्थिति, मौसम और कीटों के खतरे से जुड़ी जानकारी पहले की तुलना में जल्दी प्राप्त कर सकते हैं।भारत में नेशनल पेस्ट सर्विलांस सिस्टम (NPSS) इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है।जुलाई 2026 तक के सरकारी आंकड़ों के अनुसार, यह व्यवस्था 73 फसलों और 436 प्रकार के कीटों से जुड़ी निगरानी तथा सलाह के लिए 10 हजार से अधिक कृषि विस्तार कर्मचारियों द्वारा इस्तेमाल की जा रही थी।इसके अलावा BharatVistaar मंच ने जुलाई 2026 तक तीन लाख से अधिक किसानों को सेवाएं दी थीं और 72 लाख से ज्यादा प्रश्नों का समाधान उपलब्ध कराया था।

 

इन सुविधाओं का उद्देश्य किसानों को खेती से जुड़े निर्णय लेने में मदद करना है।मान लीजिए किसी गांव में धान की फसल पर कीट का खतरा बढ़ रहा है। समय पर चेतावनी मिलने से किसान कृषि विशेषज्ञ की सलाह लेकर उचित कदम उठा सकते हैं। इससे संभावित नुकसान कम करने का अवसर मिलता है।इसी तरह मौसम की जानकारी बुवाई की योजना बनाने और सिंचाई के निर्णयों में सहायक हो सकती है।लेकिन तकनीक हर समस्या का अंतिम समाधान नहीं है। गलत डेटा या स्थानीय परिस्थितियों से मेल न खाने वाली सलाह नुकसान भी पहुंचा सकती है। इसलिए वैज्ञानिक जानकारी के साथ स्थानीय अनुभव और कृषि विशेषज्ञों की भूमिका बनी रहनी चाहिए।

जलवायु परिवर्तन के बीच खाद्य सुरक्षा कैसे सुनिश्चित होगी?

खेती का भविष्य मौसम से गहराई से जुड़ा है।अनियमित बारिश, लंबे सूखे, अत्यधिक गर्मी और अचानक आने वाली बाढ़ जैसी स्थितियां फसलों को प्रभावित कर सकती हैं। जब किसी क्षेत्र में उत्पादन घटता है, तो उसका असर किसानों की कमाई के साथ खाद्य आपूर्ति और बाजार की कीमतों पर भी पड़ सकता है।छोटे और सीमांत किसानों के लिए यह चुनौती अधिक गंभीर हो सकती है, क्योंकि उनके पास नुकसान सहने के लिए सीमित आर्थिक संसाधन होते हैं।ऐसे में जलवायु के अनुकूल खेती जरूरी होती जा रही है।कम पानी की जरूरत वाली फसलें, स्थानीय मौसम के अनुसार बीजों का चयन, मिट्टी में जैविक पदार्थों का संरक्षण, सूक्ष्म सिंचाई और वर्षा जल संचयन जैसे उपाय खेती को ज्यादा टिकाऊ बनाने में मदद कर सकते हैं।इसके साथ ही एक ही फसल पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग फसलों की खेती किसानों के जोखिम को कम कर सकती है।विश्व खाद्य दिवस का संदेश भी यही है कि आज खेतों में लिए गए फैसले आने वाली पीढ़ियों की भोजन व्यवस्था को प्रभावित करेंगे।

मोटा अनाज और पारंपरिक भोजन फिर क्यों बन रहे हैं महत्वपूर्ण?

भारत में ज्वार, बाजरा, रागी, कोदो, कुटकी और कई अन्य मोटे अनाज लंबे समय से भोजन का हिस्सा रहे हैं।समय के साथ अनेक क्षेत्रों में इनका उपयोग कम हुआ, लेकिन अब पोषण और खेती की विविधता के संदर्भ में इनकी उपयोगिता पर फिर ध्यान दिया जा रहा है।मोटे अनाजों की अलग-अलग किस्मों में फाइबर, खनिज और दूसरे पोषक तत्व पाए जाते हैं। कुछ फसलें अपेक्षाकृत कम पानी वाले क्षेत्रों में भी अच्छी तरह उगाई जा सकती हैं, हालांकि उनकी जरूरतें किस्म और मौसम के अनुसार बदलती हैं।इन अनाजों का सबसे बड़ा फायदा तब मिलता है जब इन्हें संतुलित आहार के हिस्से के रूप में शामिल किया जाए।उदाहरण के लिए, बाजरे की रोटी के साथ दाल और मौसमी सब्जी, रागी से बने व्यंजनों के साथ दूसरे पौष्टिक खाद्य पदार्थ या ज्वार की रोटी के साथ स्थानीय साग भोजन में विविधता ला सकते हैं।यह जरूरी नहीं कि हर परिवार महंगे या विशेष रूप से प्रचारित खाद्य पदार्थों पर निर्भर रहे। कई बार स्थानीय बाजार में मिलने वाली मौसमी चीजें भी पौष्टिक भोजन तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।हालांकि किसी एक अनाज को संपूर्ण पोषण का विकल्प मानना सही नहीं होगा। स्वस्थ भोजन के लिए अलग-अलग खाद्य समूहों का संतुलन जरूरी है।

स्कूलों में पोषण की नई सोच: स्थानीय भोजन पर बढ़ता जोर

बच्चों को अच्छा भोजन उपलब्ध कराना केवल स्वास्थ्य से जुड़ा विषय नहीं है। इसका संबंध उनकी पढ़ाई, एकाग्रता और नियमित स्कूल उपस्थिति से भी है।भारत में पीएम पोषण योजना के अंतर्गत पात्र सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त विद्यालयों में बाल वाटिका तथा कक्षा पहली से आठवीं तक के बच्चों को स्कूल के कार्यदिवसों में पका हुआ भोजन देने की व्यवस्था है। 3 अगस्त 2026 को शिक्षा मंत्रालय की ओर से जारी जानकारी में बताया गया कि राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को निर्धारित पोषण मानकों के भीतर स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार भोजन का मेन्यू तय करने तथा स्थानीय स्तर पर उगाए गए मोटे अनाज, सब्जियों और अन्य खाद्य सामग्री का उपयोग करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।

इससे एक महत्वपूर्ण संभावना बनती है।यदि स्कूलों के भोजन में स्थानीय स्तर पर उपलब्ध पौष्टिक फसलों का सही इस्तेमाल बढ़े, तो बच्चों को विविध भोजन मिलने के साथ क्षेत्रीय किसानों के लिए भी अवसर पैदा हो सकते हैं।

स्कूलों में पोषण शिक्षा, रसोई की स्वच्छता और सुरक्षित पेयजल की उपलब्धता पर भी ध्यान देना जरूरी है।कुछ स्थानों पर विकसित किए जा रहे स्कूल किचन गार्डन बच्चों को सब्जियों, मिट्टी, बीज और भोजन के महत्व को व्यावहारिक रूप से समझाने का माध्यम बन सकते हैं।

2026 में फोर्टिफाइड चावल पर बड़ा फैसला, पोषण नीति में क्या बदला?

भारत में फरवरी 2026 के दौरान पोषण से जुड़ा एक और महत्वपूर्ण निर्णय सामने आया।27 फरवरी 2026 को केंद्र सरकार ने प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना और संबंधित कल्याणकारी योजनाओं के अंतर्गत चावल के फोर्टिफिकेशन की प्रक्रिया अस्थायी रूप से बंद करने का निर्णय लिया।सरकार के मुताबिक, यह निर्णय पोषक तत्वों की आपूर्ति के लिए अधिक प्रभावी व्यवस्था तलाशने तक लागू रखने के उद्देश्य से लिया गया।इससे पहले आईआईटी खड़गपुर को फोर्टिफाइड चावल और उसमें मिलाए जाने वाले पोषणयुक्त चावल के दानों की भंडारण अवधि का अध्ययन सौंपा गया था।अध्ययन में पाया गया कि नमी, तापमान, पैकेजिंग और लंबे समय तक भंडारण जैसी स्थितियां इनमें मौजूद पोषक तत्वों की स्थिरता को प्रभावित कर सकती हैं।यह फैसला इसलिए चर्चा में है क्योंकि इससे भोजन में पोषण बढ़ाने की योजनाओं के साथ-साथ उनकी गुणवत्ता, भंडारण और वास्तविक प्रभाव की निगरानी का महत्व भी सामने आता है।

इसका अर्थ यह नहीं कि फूड फोर्टिफिकेशन की पूरी अवधारणा गलत है। बल्कि यह बताता है कि किसी भी पोषण कार्यक्रम की सफलता के लिए सही तकनीक, मजबूत वितरण व्यवस्था और वैज्ञानिक मूल्यांकन आवश्यक हैं।

दुनिया में हर दिन बर्बाद होता है भारी मात्रा में भोजन

World Food Day 2026 की चर्चा भोजन की बर्बादी के बिना अधूरी है।संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) की Food Waste Index Report 2024 के अनुसार, वर्ष 2022 में दुनिया में लगभग 1.05 अरब टन भोजन बर्बाद हुआ था।रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि उपभोक्ताओं के लिए उपलब्ध भोजन का लगभग 19 प्रतिशत हिस्सा घरों, रेस्तरां और खुदरा दुकानों के स्तर पर बर्बाद हुआ।इस बर्बादी में सबसे अधिक हिस्सा घरों का था। भोजन बर्बाद होने का नुकसान केवल पैसे तक सीमित नहीं रहता। इसे उगाने में पानी, जमीन, ऊर्जा और श्रम का इस्तेमाल भी होता है।जब भोजन बिना उपयोग के फेंक दिया जाता है, तो इन संसाधनों का एक हिस्सा भी व्यर्थ चला जाता है।

भारत जैसे देश में फसल कटाई के बाद होने वाले नुकसान को कम करना भी आवश्यक है। उचित भंडारण, बेहतर परिवहन, फल-सब्जियों की प्रोसेसिंग और स्थानीय बाजारों से जुड़ाव इस दिशा में उपयोगी हो सकते हैं।घरों में जरूरत के अनुसार खरीदारी करना, बचा हुआ सुरक्षित भोजन इस्तेमाल करना और खाने की सही मात्रा तैयार करना छोटे लेकिन महत्वपूर्ण कदम हैं।

किसानों की आमदनी बढ़े बिना खाद्य सुरक्षा मजबूत नहीं होगी

भोजन की पूरी व्यवस्था की शुरुआत खेत से होती है। इसलिए खेती को टिकाऊ बनाने के साथ किसानों की आर्थिक स्थिति सुधारना भी जरूरी है।किसान केवल फसल पैदा नहीं करता, बल्कि मौसम, बाजार और उत्पादन लागत से जुड़े जोखिम भी उठाता है।कई बार अच्छी पैदावार होने के बावजूद बाजार में कम कीमत मिलने से किसान की आय प्रभावित होती है।विशेष रूप से जल्दी खराब होने वाले फल और सब्जियों के मामले में समय पर बिक्री जरूरी होती है।ऐसे में किसान उत्पादक संगठन (FPO), स्थानीय भंडारण केंद्र, कृषि प्रसंस्करण इकाइयां और बेहतर बाजार जानकारी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।किसानों को फसल की गुणवत्ता के अनुसार उचित कीमत मिले और उपभोक्ताओं तक भोजन वाजिब दाम में पहुंचे, इसके लिए उत्पादन से लेकर बिक्री तक की व्यवस्था पर एक साथ काम करना होगा।महिला किसानों की भूमिका को पहचानना भी जरूरी है। वे बीज संरक्षण, खेतों के काम, पशुपालन, खाद्य प्रसंस्करण और परिवार के पोषण में महत्वपूर्ण योगदान देती हैं।यदि प्रशिक्षण, ऋण, तकनीक और बाजार तक उनकी पहुंच बेहतर होती है, तो इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था और खाद्य सुरक्षा दोनों को लाभ मिल सकता है।

2030 तक भुखमरी समाप्त करने का लक्ष्य कितना मुश्किल?

संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों में SDG 2 का उद्देश्य वर्ष 2030 तक भुखमरी समाप्त करना और सभी के लिए खाद्य सुरक्षा तथा बेहतर पोषण सुनिश्चित करना है।लेकिन 2026 की रिपोर्ट बताती है कि दुनिया अभी इस लक्ष्य से काफी दूर है।संयुक्त राष्ट्र के अनुमान के अनुसार, मौजूदा चुनौतियों के बीच वर्ष 2030 में भी लगभग 51 से 52 करोड़ लोग भूख से प्रभावित रह सकते हैं।युद्ध और क्षेत्रीय तनाव, खाद्य महंगाई, उर्वरकों की कीमतें, मौसम की चरम घटनाएं और मानवीय सहायता में कमी जैसी परिस्थितियां इस चुनौती को और कठिन बना सकती हैं।

 

इसलिए अब खाद्य सुरक्षा के लिए सिर्फ उत्पादन बढ़ाने का लक्ष्य पर्याप्त नहीं माना जा सकता।जरूरत ऐसी व्यवस्था बनाने की है जिसमें गरीब परिवारों की क्रय शक्ति बढ़े, किसानों को जोखिम से सुरक्षा मिले, पौष्टिक खाद्य पदार्थों की आपूर्ति मजबूत हो और बच्चों तथा महिलाओं को जरूरी पोषण सेवाएं समय पर मिलें।वर्ष 2030 का लक्ष्य हासिल करना कठिन जरूर है, लेकिन वैश्विक भूख में पिछले तीन वर्षों के दौरान दर्ज कमी यह भी बताती है कि लगातार प्रयासों से सुधार संभव है।

World Food Day 2026 पर आम नागरिक क्या कर सकते हैं?

विश्व खाद्य दिवस केवल सरकारों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों की जिम्मेदारी याद दिलाने का अवसर नहीं है। इसमें आम नागरिकों की भी भूमिका हो सकती है।घरों में भोजन की बर्बादी कम करना, स्थानीय किसानों से मौसमी खाद्य पदार्थ खरीदना और दैनिक आहार में विविधता रखना उपयोगी कदम हैं।स्कूलों और कॉलेजों में पोषण, खेती तथा खाद्य बर्बादी पर चर्चा आयोजित की जा सकती है। बच्चों को यह समझाना भी जरूरी है कि भोजन तैयार होने से पहले किसान, मजदूर, परिवहन कर्मचारी और कई दूसरे लोग मेहनत करते हैं।सामुदायिक स्तर पर सुरक्षित तरीके से अतिरिक्त भोजन का वितरण, जरूरतमंद परिवारों की सहायता और स्थानीय किचन गार्डन जैसी पहल सकारात्मक बदलाव ला सकती हैं।FAO ने इस वर्ष बच्चों और युवाओं के लिए पोस्टर प्रतियोगिता भी आयोजित की है। इसमें 5 से 19 वर्ष के प्रतिभागी बेहतर खाद्य भविष्य के बारे में अपने विचार प्रस्तुत कर सकते हैं। प्रतियोगिता के लिए प्रविष्टियां भेजने की अंतिम तारीख 6 नवंबर 2026 निर्धारित है। इस तरह युवा पीढ़ी भी खाद्य सुरक्षा के मुद्दे को केवल किताबों तक सीमित रखने के बजाय रचनात्मक गतिविधियों के माध्यम से समझ सकती है।

खेत से थाली तक बदलाव लाने का समय

World Food Day 2026 का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यह है कि दुनिया को अब भोजन की मात्रा के साथ उसकी गुणवत्ता और उपलब्धता पर भी बराबर ध्यान देना होगा।एक तरफ नई तकनीक खेती को अधिक जानकारी आधारित और बेहतर बनाने की संभावना पैदा कर रही है। दूसरी तरफ स्वस्थ आहार की बढ़ती कीमतें, जलवायु परिवर्तन और खाद्य बर्बादी जैसी समस्याएं नई चुनौतियां खड़ी कर रही हैं।

भारत में SEHAT मिशन, डिजिटल एग्रीकल्चर मिशन और स्थानीय पोषण पर बढ़ता जोर इस दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास हैं। हालांकि इन पहलों की वास्तविक सफलता इस बात से तय होगी कि इनका लाभ कितने किसानों, बच्चों और जरूरतमंद परिवारों तक पहुंचता है।

आने वाले वर्षों में भारत के लिए सबसे बड़ी उपलब्धि केवल अनाज उत्पादन के नए रिकॉर्ड बनाना नहीं होगी। असली सफलता तब होगी जब किसानों को उनकी मेहनत का उचित मूल्य मिले, बच्चों को संतुलित भोजन उपलब्ध हो और आर्थिक स्थिति किसी परिवार के पौष्टिक आहार की राह में बाधा न बने। विश्व खाद्य दिवस 2026 हमें याद दिलाता है कि मजबूत खाद्य व्यवस्था की शुरुआत खेत से होती है, लेकिन उसका असली उद्देश्य हर व्यक्ति की थाली तक सम्मानजनक, सुरक्षित और पौष्टिक भोजन पहुंचाना है।

 

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