भारत 2026-27 उर्वरक आयात रणनीति को कर रहा मजबूत, खरीफ और रबी सीजन की तैयारियां तेज

उर्वरक आयात भारत के लिए अब भी बड़ी चुनौती, वैकल्पिक स्रोतों और रणनीतिक खरीद पर सरकार का बढ़ा फोकस

वैश्विक आपूर्ति जोखिम के बीच भारत उर्वरक आयात के लिए वैकल्पिक स्रोतों और रणनीतिक खरीद पर जोर दे रहा

भारत उर्वरक आयात रणनीति को मजबूत करने की दिशा में लगातार काम कर रहा है। हम सभी जानते है कि भारत दुनिया के सबसे बड़े कृषि प्रधान देशों में से एक है और यहां हर वर्ष करोड़ों किसान अपनी फसलों के लिए उर्वरकों पर निर्भर रहते हैं। हालांकि देश ने पिछले कुछ वर्षों में घरेलू उर्वरक उत्पादन बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति की है, फिर भी यूरिया, डाय-अमोनियम फॉस्फेट (DAP), पोटाश (MOP) तथा कई अन्य उर्वरकों और उनके कच्चे माल के लिए आयात पर निर्भरता पूरी तरह समाप्त नहीं हो पाई है। ऐसे में वैश्विक बाजार में बढ़ती अनिश्चितता, भू-राजनीतिक तनाव और आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) से जुड़े जोखिम भारत के लिए बड़ी चुनौती बने हुए हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि पश्चिम एशिया, रूस-यूक्रेन क्षेत्र और अन्य प्रमुख निर्यातक देशों में किसी भी प्रकार की अस्थिरता का सीधा असर भारत की उर्वरक आपूर्ति और आयात लागत पर पड़ सकता है। इसी कारण केंद्र सरकार अब वैकल्पिक स्रोतों (Alternative Sources), दीर्घकालिक आयात समझौतों (Long-Term Contracts) और रणनीतिक खरीद (Strategic Procurement) पर विशेष ध्यान दे रही है, ताकि खरीफ और रबी दोनों मौसमों में किसानों को उर्वरकों की कमी का सामना न करना पड़े।

भारत की उर्वरक आयात पर निर्भरता

भारत में यूरिया का बड़ा हिस्सा घरेलू संयंत्रों में तैयार होता है, लेकिन कुल मांग को पूरा करने के लिए हर वर्ष कुछ मात्रा में यूरिया का आयात भी करना पड़ता है। वहीं डीएपी, म्यूरेट ऑफ पोटाश (MOP) और फॉस्फेट आधारित उर्वरकों के मामले में आयात पर निर्भरता कहीं अधिक है।

भारत कई देशों से तैयार उर्वरक और कच्चा माल खरीदता है। इनमें मोरक्को, सऊदी अरब, ओमान, जॉर्डन, रूस, कनाडा, इज़राइल और अन्य देश प्रमुख हैं। यदि इनमें से किसी भी क्षेत्र में उत्पादन या निर्यात प्रभावित होता है, तो भारत के लिए समय पर पर्याप्त मात्रा में उर्वरक उपलब्ध कराना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

वैश्विक आपूर्ति जोखिम क्यों बढ़ रहे हैं?

पिछले कुछ वर्षों में दुनिया ने कई ऐसी घटनाएं देखी हैं, जिन्होंने उर्वरक बाजार को प्रभावित किया है। इनमें प्रमुख हैं—

इन कारणों से अंतरराष्ट्रीय बाजार में उर्वरकों की उपलब्धता और कीमतें दोनों प्रभावित होती हैं। भारत जैसे बड़े आयातक देश के लिए यह स्थिति विशेष चिंता का विषय है।

रणनीतिक खरीद पर सरकार का जोर

सरकार ने हाल के वर्षों में उर्वरकों की खरीद के तरीके में भी बदलाव किया है। अब केवल तत्काल आवश्यकता पूरी करने के बजाय दीर्घकालिक रणनीति अपनाई जा रही है।

इसके तहत—

इस रणनीति का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में अचानक संकट आने पर भी भारत के पास पर्याप्त स्टॉक उपलब्ध रहे।

वैकल्पिक स्रोतों की तलाश

भारत अब उर्वरकों के आयात के लिए नए व्यापारिक साझेदारों की भी तलाश कर रहा है। सरकार और सार्वजनिक क्षेत्र की उर्वरक कंपनियां ऐसे देशों के साथ सहयोग बढ़ा रही हैं जहां से दीर्घकाल तक स्थिर आपूर्ति सुनिश्चित की जा सके।

इसके अलावा फॉस्फेट रॉक, पोटाश और अमोनिया जैसे कच्चे माल के लिए भी नए स्रोत विकसित करने पर काम किया जा रहा है। इससे भविष्य में किसी एक क्षेत्र में संकट आने पर दूसरे स्रोतों से आपूर्ति जारी रखी जा सकेगी।

घरेलू उत्पादन बढ़ाने की दिशा में प्रयास

आयात पर निर्भरता कम करने के लिए भारत घरेलू उत्पादन क्षमता बढ़ाने पर भी लगातार निवेश कर रहा है। पिछले कुछ वर्षों में कई पुराने यूरिया संयंत्रों का पुनरुद्धार किया गया है और नई उत्पादन इकाइयों को भी प्रोत्साहन मिला है।

सरकार की दीर्घकालिक योजना में शामिल हैं—

खरीफ और रबी सीजन की तैयारियां

भारत में खरीफ और रबी दोनों मौसमों में उर्वरकों की मांग काफी अधिक रहती है। इसलिए सरकार मौसम शुरू होने से पहले ही राज्यों में पर्याप्त स्टॉक उपलब्ध कराने की योजना बनाती है।

उर्वरक मंत्रालय, कृषि मंत्रालय, सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां और राज्य सरकारें मिलकर मांग और आपूर्ति की नियमित समीक्षा करती हैं। आवश्यकता पड़ने पर अतिरिक्त आवंटन भी किया जाता है ताकि किसी क्षेत्र में कमी की स्थिति न बने।

किसानों पर क्या होगा प्रभाव?

यदि वैश्विक बाजार में आपूर्ति बाधित होती है, तो उसका असर सबसे पहले आयात लागत पर पड़ता है। हालांकि भारत में किसानों को सब्सिडी के कारण यूरिया और कई अन्य उर्वरक नियंत्रित कीमतों पर उपलब्ध कराए जाते हैं।

इसलिए अंतरराष्ट्रीय कीमतों में वृद्धि का सीधा असर किसानों की जेब पर सीमित रहता है, लेकिन सरकार पर सब्सिडी का वित्तीय बोझ बढ़ सकता है। यही कारण है कि सरकार आपूर्ति सुरक्षा और रणनीतिक खरीद दोनों पर समान रूप से ध्यान दे रही है।

विशेषज्ञों की राय

कृषि और उर्वरक क्षेत्र के विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले वर्षों में केवल आयात पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं होगा। भारत को घरेलू उत्पादन क्षमता, वैकल्पिक आयात स्रोतों, लॉन्ग-टर्म सप्लाई एग्रीमेंट और ग्रीन फर्टिलाइजर तकनीकों में निवेश बढ़ाना होगा।

विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि डिजिटल सप्लाई चेन, बेहतर लॉजिस्टिक्स और उर्वरकों के संतुलित उपयोग से आयात पर दबाव कम किया जा सकता है।

निष्कर्ष

वैश्विक बाजार में बढ़ते आपूर्ति जोखिमों के बीच भारत के लिए उर्वरक आयात अब भी एक बड़ी रणनीतिक चुनौती बना हुआ है। हालांकि केंद्र सरकार ने वैकल्पिक स्रोतों की तलाश, रणनीतिक खरीद, अग्रिम आयात, घरेलू उत्पादन क्षमता बढ़ाने और ग्रीन उर्वरक तकनीकों को बढ़ावा देने जैसे कई कदम उठाए हैं। इन प्रयासों का उद्देश्य केवल वर्तमान जरूरतों को पूरा करना नहीं, बल्कि भविष्य में भी खरीफ और रबी सीजन के दौरान किसानों को उर्वरकों की निर्बाध उपलब्धता सुनिश्चित करना है। यदि यही रणनीति लगातार जारी रहती है, तो भारत वैश्विक आपूर्ति संकटों का बेहतर ढंग से सामना करते हुए अपनी कृषि और खाद्य सुरक्षा को और अधिक मजबूत बना सकेगा।

Exit mobile version