वेस्ट एशिया संकट से यूरिया और DAP की कीमतों में उछाल

वेस्ट एशिया संकट के कारण यूरिया, DAP, अमोनिया और सल्फर की वैश्विक कीमतें बढ़ीं। जानिए कैसे उर्वरक सब्सिडी पर 70,000 करोड़ रुपये से अधिक का बोझ पड़ा।

उर्वरक सब्सिडी पर बढ़ा सरकार का बोझ

वेस्ट एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव और युद्ध का असर अब भारत के उर्वरक (Fertilizer) क्षेत्र पर भी स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है। राज्यसभा में सरकार ने जानकारी दी कि वैश्विक बाजार में उर्वरकों और उनके कच्चे माल की कीमतों में तेज़ बढ़ोतरी के कारण चालू वित्त वर्ष (FY27) में अब तक 70,000 करोड़ रुपये से अधिक की उर्वरक सब्सिडी जारी की जा चुकी है। यह राशि चालू वर्ष के 1.77 लाख करोड़ रुपये के बजट अनुमान का लगभग 40 प्रतिशत है।

सरकार का कहना है कि किसानों को यूरिया और डीएपी (DAP) जैसी प्रमुख खादें निर्धारित रियायती दरों पर उपलब्ध कराने के लिए सब्सिडी जारी रखी जा रही है, भले ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में इनके दाम कई गुना बढ़ गए हों। इससे सरकारी वित्त पर अतिरिक्त दबाव बढ़ने की संभावना है।

पिछले वर्ष से भी अधिक हो सकता है सब्सिडी खर्च

सूत्रों के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 (FY26) में उर्वरक सब्सिडी का संशोधित अनुमान (RE) 1.86 लाख करोड़ रुपये रखा गया था, जबकि वास्तविक खर्च बढ़कर 2.17 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया। अब मौजूदा वित्त वर्ष में भी वैश्विक कीमतों में लगातार तेजी के कारण सब्सिडी खर्च पिछले वर्ष से अधिक रहने की आशंका जताई जा रही है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में यूरिया, डीएपी, अमोनिया और सल्फर जैसी प्रमुख उर्वरक सामग्री की कीमतें ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं, तो सरकार को अतिरिक्त बजटीय प्रावधान करना पड़ सकता है।

यूरिया की वैश्विक कीमतों में 45 प्रतिशत की बढ़ोतरी

उर्वरक विभाग के अनुसार, जून 2026 में वैश्विक बाजार में यूरिया की कीमत 572 डॉलर प्रति टन तक पहुंच गई, जो पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 45 प्रतिशत अधिक है। इससे पहले मई 2026 में यूरिया की कीमतें बढ़कर 947 डॉलर प्रति टन तक पहुंच गई थीं। बाद में कुछ नरमी आई, लेकिन कीमतें अभी भी सामान्य स्तर से काफी ऊपर बनी हुई हैं।

भारत में यूरिया किसानों को अभी भी 266.50 रुपये प्रति 45 किलोग्राम बैग की नियंत्रित कीमत पर उपलब्ध कराया जा रहा है। जबकि अंतरराष्ट्रीय बाजार की कीमतों के आधार पर इसकी वास्तविक लागत 4,000 रुपये प्रति बैग से अधिक बैठती है। उल्लेखनीय है कि किसानों के लिए यूरिया का अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) मार्च 2018 से अपरिवर्तित है।

खरीफ सीजन के लिए 4.27 मिलियन टन यूरिया की व्यवस्था

राज्यसभा में सरकार ने बताया कि वेस्ट एशिया संकट के बावजूद खरीफ मौसम में किसानों को उर्वरकों की कमी न हो, इसके लिए सरकारी एजेंसियों ने वैश्विक निविदाओं (Global Tender) के माध्यम से 4.27 मिलियन टन (MT) यूरिया की आपूर्ति सुनिश्चित की है।

इसके अलावा भारत ने ओमान के साथ एक दीर्घकालिक समझौता भी किया है, जिसके तहत अगले पांच वर्षों तक 4.5 मिलियन टन यूरिया की नियमित आपूर्ति सुनिश्चित की जाएगी। यह समझौता भविष्य में वैश्विक आपूर्ति संकट के जोखिम को कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

भारत की आयात निर्भरता बनी चिंता

भारत उर्वरकों के मामले में अभी भी आयात पर काफी हद तक निर्भर है। देश अपनी कुल उर्वरक एवं कच्चे माल की आवश्यकता का लगभग 70 प्रतिशत आयात करता है।

वित्त वर्ष 2025-26 में देश में करीब 40 मिलियन टन यूरिया की मांग रही, जिसमें से लगभग 10 मिलियन टन यूरिया आयात करना पड़ा। वहीं घरेलू उत्पादन का बड़ा हिस्सा प्राकृतिक गैस (LNG) पर आधारित है। यदि एलएनजी की कीमतें बढ़ती हैं, तो घरेलू उत्पादन लागत भी स्वतः बढ़ जाती है।

यही कारण है कि वैश्विक ऊर्जा बाजार में अस्थिरता का सीधा असर भारत के उर्वरक क्षेत्र पर पड़ता है।

होर्मुज जलडमरूमध्य संकट से बढ़ी सप्लाई की चुनौती

फरवरी 2026 से होर्मुज जलडमरूमध्य (Hormuz Strait) में उत्पन्न संकट के कारण उर्वरक उद्योग को कच्चे माल की आपूर्ति में गंभीर बाधाओं का सामना करना पड़ा। एलएनजी, अमोनिया, सल्फर और अन्य महत्वपूर्ण कच्चे माल की आवाजाही प्रभावित हुई, जिससे भारत को वैकल्पिक देशों से आपूर्ति की व्यवस्था करनी पड़ी।

सरकार को कई मामलों में स्पॉट मार्केट से महंगे दामों पर उर्वरकों की खरीद करनी पड़ी। इससे आयात लागत और सब्सिडी दोनों में वृद्धि हुई।

डीएपी की कीमतें भी रिकॉर्ड स्तर पर

यूरिया के बाद भारत में सबसे अधिक उपयोग होने वाला फॉस्फेटिक उर्वरक डीएपी (Di-Ammonium Phosphate) भी अंतरराष्ट्रीय बाजार में महंगा हो गया है।

जून 2026 में डीएपी की वैश्विक कीमत 933 डॉलर प्रति टन तक पहुंच गई, जो पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 21 प्रतिशत अधिक है।

इसके बावजूद किसानों को डीएपी अभी भी 1,350 रुपये प्रति 50 किलोग्राम बैग की निर्धारित कीमत पर उपलब्ध कराया जा रहा है। सरकार बढ़ी हुई लागत और नियंत्रित खुदरा मूल्य के बीच का अंतर सब्सिडी के माध्यम से वहन कर रही है।

अमोनिया और सल्फर की कीमतों में भारी उछाल

एनपीके (NPK) कॉम्प्लेक्स उर्वरकों के निर्माण में प्रयुक्त अमोनिया और सल्फर की कीमतों में भी अभूतपूर्व वृद्धि दर्ज की गई है।

उर्वरक विभाग के अनुसार—

इन दोनों कच्चे माल का बड़ा हिस्सा बहरीन, कुवैत और सऊदी अरब जैसे पश्चिम एशियाई देशों से आयात किया जाता है। क्षेत्रीय तनाव के कारण इनकी आपूर्ति और परिवहन दोनों महंगे हुए हैं।

पोटाश पर भी परिवहन लागत का असर

रूस से आयात होने वाले पोटाश पर भी परिवहन लागत बढ़ने का प्रभाव दिखाई दिया है। जून 2026 में पोटाश की कीमत बढ़कर 383 डॉलर प्रति टन पहुंच गई, जो पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 9 प्रतिशत अधिक है।

हालांकि यह वृद्धि यूरिया और अमोनिया जितनी तेज़ नहीं है, लेकिन परिवहन लागत में बढ़ोतरी ने आयात बिल को प्रभावित किया है।

दीर्घकालिक आपूर्ति समझौते बने राहत का आधार

वैश्विक अनिश्चितता के बीच भारत ने कई देशों के साथ दीर्घकालिक आपूर्ति समझौते किए हैं। इनमें ओमान के साथ यूरिया तथा सऊदी अरब के साथ डीएपी की आपूर्ति के अनुबंध महत्वपूर्ण हैं।

सऊदी अरब के साथ हुए समझौते के तहत भारत को अगले पांच वर्षों तक प्रतिवर्ष 3.1 मिलियन टन डीएपी की आपूर्ति सुनिश्चित की जाएगी। इसके अलावा रूस और मोरक्को से भी वैकल्पिक समुद्री मार्गों के जरिए यूरिया और डीएपी की आपूर्ति जारी है।

विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे लॉन्ग-टर्म कॉन्ट्रैक्ट भविष्य में कीमतों के जोखिम को कुछ हद तक कम कर सकते हैं।

किसानों पर फिलहाल नहीं पड़ेगा सीधा असर

वैश्विक बाजार में उर्वरकों की कीमतों में भारी उछाल के बावजूद किसानों को तत्काल किसी मूल्य वृद्धि का सामना नहीं करना पड़ेगा। सरकार ने स्पष्ट किया है कि किसानों को नियंत्रित दरों पर यूरिया और डीएपी उपलब्ध कराना उसकी प्राथमिकता है।

हालांकि इसका सीधा अर्थ यह है कि अंतरराष्ट्रीय कीमतों और घरेलू बिक्री मूल्य के बीच का अंतर सरकार को सब्सिडी के रूप में वहन करना होगा। यदि वैश्विक कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं, तो उर्वरक सब्सिडी का बोझ और बढ़ सकता है।

निष्कर्ष

वेस्ट एशिया संकट ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि भारत का उर्वरक क्षेत्र वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला और आयातित कच्चे माल पर काफी निर्भर है। यूरिया, डीएपी, अमोनिया, सल्फर और पोटाश जैसी प्रमुख सामग्रियों की कीमतों में तेज़ बढ़ोतरी ने सरकार की सब्सिडी व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव डाल दिया है। किसानों को फिलहाल रियायती दरों पर उर्वरक उपलब्ध कराए जा रहे हैं, लेकिन इसके लिए सरकार को भारी वित्तीय बोझ उठाना पड़ रहा है।

दीर्घकालिक समाधान के रूप में घरेलू उर्वरक उत्पादन क्षमता बढ़ाना, हरित अमोनिया (Green Ammonia) जैसी वैकल्पिक तकनीकों को बढ़ावा देना, आयात स्रोतों में विविधता लाना तथा पोषक तत्वों के संतुलित उपयोग को प्रोत्साहित करना भविष्य की रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा होगा। इससे न केवल आयात निर्भरता कम होगी, बल्कि वैश्विक संकटों के दौरान भारतीय कृषि और खाद्य सुरक्षा भी अधिक मजबूत बन सकेगी।

 

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