रबी सीजन 2026-27 की तैयारियों को लेकर केंद्र और राज्यों के बीच समन्वय मजबूत करने की दिशा में कई महत्वपूर्ण फैसले सामने आए हैं। नई दिल्ली में आयोजित राष्ट्रीय कृषि सम्मेलन–रबी अभियान 2026 के दूसरे दिन केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण तथा ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान की अध्यक्षता में राज्यों के कृषि मंत्रियों और वरिष्ठ अधिकारियों ने कृषि क्षेत्र की प्राथमिकताओं पर चर्चा की।
बैठक में रबी फसलों की तैयारी के साथ-साथ मिट्टी की सेहत, गुणवत्तापूर्ण बीज और उर्वरक, नकली कृषि inputs पर कार्रवाई, फसल विविधीकरण, प्राकृतिक खेती, integrated farming, post-harvest management, सरकारी खरीद और कृषि निर्यात जैसे विषयों पर जोर दिया गया।
सम्मेलन में प्रधानमंत्री राष्ट्रीय कृषि विकास योजना यानी PM-RKVY के तहत 10 राज्यों को कुल 1,200 करोड़ रुपये से अधिक के स्वीकृति पत्र भी सौंपे गए। सरकार का कहना है कि राज्यों को समय पर वित्तीय संसाधन उपलब्ध कराने से कृषि योजनाओं को जमीनी स्तर पर तेजी से लागू करने में मदद मिलेगी।
केंद्र और राज्यों के बीच बनेगा नियमित कृषि समन्वय
कृषि क्षेत्र में योजनाओं के बेहतर implementation के लिए केंद्र और राज्यों के बीच नियमित संवाद की व्यवस्था को मजबूत करने की घोषणा की गई। प्रस्तावित व्यवस्था में केंद्र स्तर पर होने वाली कृषि समीक्षा के साथ राज्यों के साथ हर महीने virtual meetings आयोजित करने पर जोर रहेगा।
राज्य स्तर पर कृषि विभाग के साथ कृषि विश्वविद्यालयों, ICAR संस्थानों, KVK, ATMA, FPO, किसानों, processors और exporters को जोड़कर एक व्यापक कृषि टीम बनाने की बात कही गई है। वहीं जिला स्तर पर भी कृषि अधिकारियों, वैज्ञानिकों, बैंकों और किसानों के साथ नियमित बैठकें आयोजित करने पर जोर दिया गया है।
इस व्यवस्था का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कृषि योजनाओं से जुड़े निर्णय केवल सरकारी स्तर पर न रहें, बल्कि उनकी प्रगति की लगातार field-level monitoring भी हो।
खरीफ और रबी की तैयारियों के लिए पहले से तय होगा कैलेंडर
कृषि अभियानों की तैयारी समय पर पूरी करने के लिए जिला और राज्य स्तर पर meetings का annual calendar तैयार करने का प्रस्ताव रखा गया है।
खरीफ सीजन की तैयारी के लिए हर वर्ष 10 मई को जिला स्तर और 17 मई को राज्य स्तर पर बैठक आयोजित करने की व्यवस्था बताई गई है। इसी तरह रबी सीजन की तैयारी के लिए 10 सितंबर को जिला स्तर और 17 सितंबर को राज्य स्तर पर बैठक करने का लक्ष्य रखा गया है।
इस तरह बुवाई का सीजन शुरू होने से पहले ही बीज, खाद, पानी, credit, crop planning और अन्य जरूरी inputs की स्थिति की समीक्षा की जा सकेगी।
10 राज्यों को PM-RKVY के तहत 1,200 करोड़ रुपये से ज्यादा
सम्मेलन में PM-RKVY के अंतर्गत 10 राज्यों के लिए वित्तीय स्वीकृतियां दी गईं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार राशि का राज्यवार विवरण इस प्रकार है:
- पश्चिम बंगाल: 290 करोड़ रुपये
- हरियाणा: 198 करोड़ रुपये
- छत्तीसगढ़: 181 करोड़ रुपये
- अरुणाचल प्रदेश: 154 करोड़ रुपये
- बिहार: 114 करोड़ रुपये
- कर्नाटक: 104 करोड़ रुपये
- मिजोरम: 75 करोड़ रुपये
- हिमाचल प्रदेश: 64 करोड़ रुपये
- झारखंड: 58 करोड़ रुपये
- पंजाब: 43 करोड़ रुपये
इन स्वीकृतियों का उद्देश्य राज्यों में कृषि विकास से जुड़ी योजनाओं को वित्तीय समर्थन देना और implementation को गति देना है।
कृषि उत्पादन बढ़ने का दावा, राज्यों और किसानों की भूमिका अहम
सम्मेलन में देश के कृषि उत्पादन में हाल के वर्षों में हुए बदलाव का भी उल्लेख किया गया। सरकार की ओर से प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2015 के बाद कृषि विकास दर करीब 3 प्रतिशत से बढ़कर 4.5 प्रतिशत तक पहुंची है।
वार्षिक खाद्यान्न उत्पादन में औसत बढ़ोतरी को भी पहले के करीब 40 लाख टन की तुलना में बढ़कर लगभग 84 लाख टन प्रति वर्ष बताया गया।
इसी तरह 2023-24 से 2025-26 के बीच रबी खाद्यान्न उत्पादन में करीब 205 लाख टन की वृद्धि होने की जानकारी दी गई।
इन उपलब्धियों के पीछे किसानों के साथ-साथ राज्य कृषि विभागों, कृषि वैज्ञानिकों और कृषि संस्थानों के योगदान को महत्वपूर्ण बताया गया।
‘खेत बचाओ अभियान’ में मिट्टी की सेहत पर रहेगा फोकस
रबी सीजन के दौरान soil health और balanced fertilizer use को लेकर देशव्यापी अभियान चलाने की तैयारी है। 22 अक्टूबर से 30 नवंबर 2026 तक प्रस्तावित ‘खेत बचाओ अभियान’ में किसानों को Soil Health Card के आधार पर fertilizer application की सलाह देने पर जोर रहेगा।
अभियान का उद्देश्य खेती में आवश्यकता से अधिक chemical fertilizer के इस्तेमाल को कम करना और जमीन की उत्पादकता को लंबे समय तक बनाए रखना है।
इस दौरान कृषि वैज्ञानिक, KVK, कृषि विभाग और अन्य stakeholders किसानों के बीच पहुंचकर मिट्टी की स्थिति के अनुसार fertilizer management और crop planning को लेकर जानकारी देंगे।
धान कटने के बाद खाली खेतों में दलहन की खेती पर जोर
पूर्वी भारत के राज्यों में crop diversification को बढ़ावा देने की योजना भी सामने आई है। बिहार, झारखंड, ओडिशा और पश्चिम बंगाल में धान की कटाई के बाद खाली रहने वाले खेतों में दलहन की खेती को प्रोत्साहित करने पर जोर दिया जाएगा।
इससे एक ही खेत से एक से अधिक फसल लेने की संभावना बढ़ेगी। साथ ही दलहन का production बढ़ाने और किसानों की आय में अतिरिक्त अवसर पैदा करने में मदद मिल सकती है।
धान की कटाई और अगली फसल के बीच उपलब्ध समय का बेहतर इस्तेमाल करने के लिए short-duration pulses को बढ़ावा देना इस strategy का महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकता है।
पानी और मिट्टी की स्थिति देखकर होगा फसल का चयन
रबी फसलों की बुवाई के दौरान केवल परंपरागत crop pattern के बजाय स्थानीय परिस्थितियों को ध्यान में रखने पर जोर दिया गया है।
जिन क्षेत्रों में soil moisture पर्याप्त है और irrigation facilities उपलब्ध हैं, वहां अलग-अलग फसलों की संभावनाओं का आकलन किया जाएगा। वहीं पानी की कमी वाले क्षेत्रों में कम पानी में तैयार होने वाली crops को प्राथमिकता देने की सलाह दी गई है।
इसके लिए किसानों को क्षेत्र विशेष के हिसाब से improved varieties और उचित crop selection की जानकारी देने पर जोर रहेगा।
नकली खाद और घटिया बीज पर सख्ती
किसानों के लिए गुणवत्तापूर्ण agricultural inputs की उपलब्धता को लेकर भी सरकार ने राज्यों को कार्रवाई तेज करने का निर्देश दिया है।
नकली खाद, नकली बीज और अमानक pesticides की बिक्री को रोकने के लिए monitoring और legal action मजबूत करने पर जोर दिया गया है। इसके साथ ही कृषि inputs की जबरन tagging जैसी शिकायतों पर भी रोक लगाने की बात कही गई।
किसानों द्वारा खरीदे जाने वाले बीज, खाद और pesticides की quality सीधे production और खेती की लागत से जुड़ी होती है। ऐसे में input quality की निगरानी रबी सीजन में महत्वपूर्ण मुद्दा रहेगी।
प्राकृतिक खेती और Integrated Farming को बढ़ावा
कृषि को अधिक टिकाऊ बनाने के लिए Natural Farming, Integrated Farming और Crop Diversification को बढ़ावा देने पर जोर दिया गया है।
Integrated Farming में crop production के साथ पशुपालन, horticulture, fisheries या अन्य कृषि गतिविधियों को जोड़ा जा सकता है। इससे किसानों को एक ही farming activity पर निर्भर रहने के बजाय income के कई स्रोत विकसित करने का अवसर मिल सकता है।
Natural farming को बढ़ावा देने के साथ soil health, input cost और स्थानीय संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल पर भी ध्यान दिया जा रहा है।
तुअर, उड़द और मसूर की MSP पर खरीद पर जोर
दलहन किसानों के लिए market support को मजबूत करने की योजना भी सम्मेलन में प्रमुख विषय रही। सरकार ने तुअर, उड़द और मसूर की MSP पर 100 प्रतिशत सरकारी खरीद सुनिश्चित करने की बात कही है।
इसके साथ खरीद के बाद किसानों को भुगतान में देरी न हो, इसके लिए 48 घंटे के भीतर payment की व्यवस्था पर जोर दिया गया है।
दलहन उत्पादन बढ़ाने के लिए यह व्यवस्था महत्वपूर्ण हो सकती है, क्योंकि बाजार कीमत और MSP के बीच अंतर होने पर किसानों के सामने अपनी उपज बेचने का जोखिम रहता है।
सरकारी procurement व्यवस्था का प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि खरीद केंद्र समय पर खुलें, किसानों का registration सुचारू रहे और payment process तेजी से पूरा हो।
Post-Harvest Management से लेकर Warehousing तक रणनीति
कृषि उत्पादन बढ़ने के बाद किसान को बेहतर कीमत मिले, इसके लिए केवल खेत में productivity बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। उत्पादन के बाद storage, grading, processing और marketing की व्यवस्था भी मजबूत करनी होगी।
इसी को ध्यान में रखते हुए post-harvest management और scientific warehousing पर जोर दिया गया है।
बेहतर storage facilities से किसानों को harvesting के तुरंत बाद कम कीमत पर उपज बेचने की मजबूरी से बचने में मदद मिल सकती है। वहीं processing और value addition से कृषि उत्पादों की market value बढ़ाने की संभावना रहती है।
भारतीय कृषि उत्पादों को वैश्विक बाजार से जोड़ने की तैयारी
कृषि क्षेत्र में export को बढ़ाने के लिए international trade agreements और नए बाजारों पर भी ध्यान दिया जा रहा है।
Free Trade Agreements यानी FTA के जरिए भारतीय कृषि उत्पादों के लिए विदेशी बाजारों में उपलब्ध अवसरों का इस्तेमाल करने की बात कही गई है। इसमें फल, सब्जियां, अनाज और अन्य agricultural commodities शामिल हैं।
हालांकि international market में export बढ़ाने के लिए quality standards, food safety, traceability, packaging और supply chain को मजबूत करना भी जरूरी होगा।
यदि इन क्षेत्रों में किसानों और FPO को पर्याप्त support मिलता है तो भारतीय कृषि उत्पादों के लिए नए export opportunities विकसित हो सकते हैं।
‘Team Agriculture’ के जरिए कृषि व्यवस्था में समन्वय
सम्मेलन में केंद्र और राज्यों के बीच बेहतर coordination को कृषि क्षेत्र की अगली रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया गया है।
कृषि से जुड़े अलग-अलग stakeholders—सरकारी विभाग, कृषि विश्वविद्यालय, ICAR संस्थान, वैज्ञानिक, KVK, बैंक, FPO, processors, exporters और किसान—एक साथ काम करें, इस approach को आगे बढ़ाने पर जोर दिया गया है।
इसका मकसद कृषि योजनाओं को अलग-अलग विभागों तक सीमित रखने के बजाय एक integrated system के रूप में लागू करना है।
रबी सीजन में किन मुद्दों पर रहेगी नजर?
रबी 2026-27 के दौरान किसानों और कृषि व्यवस्था के सामने कई महत्वपूर्ण मुद्दे रहेंगे। इनमें पर्याप्त fertilizer supply, certified seed availability, irrigation और soil moisture, crop disease management, institutional credit, crop insurance, MSP procurement तथा post-harvest storage प्रमुख हैं।
सरकार की ओर से बनाई जा रही व्यवस्था में इन सभी क्षेत्रों को एक साथ जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है।
खासकर climate variability को देखते हुए ऐसी crop planning की जरूरत बढ़ रही है जिसमें किसान को मौसम में बदलाव की स्थिति में वैकल्पिक विकल्प भी उपलब्ध हों।
कृषि क्षेत्र के लिए समन्वित रणनीति की जरूरत
राष्ट्रीय कृषि सम्मेलन–रबी अभियान 2026 में सामने आई योजनाओं से यह संकेत मिलता है कि आगामी रबी सीजन में सरकार का ध्यान केवल उत्पादन लक्ष्य तक सीमित नहीं रहेगा। Input quality, soil health, crop diversification, procurement, storage, digital agriculture और export जैसे मुद्दों को भी कृषि नीति के साथ जोड़ा जा रहा है।
किसानों के लिए किसी भी कृषि योजना का वास्तविक प्रभाव तभी दिखाई देता है जब उसका लाभ समय पर खेत तक पहुंचे। इसलिए केंद्र और राज्यों के बीच नियमित समीक्षा, जिला स्तर पर monitoring और किसानों के साथ सीधा संवाद इस पूरी व्यवस्था की अहम कड़ी होगी।
रबी सीजन 2026-27 में यदि बीज और खाद की समय पर उपलब्धता, वैज्ञानिक crop planning, MSP procurement, बेहतर storage और कृषि बाजारों तक पहुंच को प्रभावी तरीके से लागू किया जाता है, तो इससे किसानों के लिए production के साथ-साथ marketing और value addition के अवसर भी बढ़ सकते हैं।
इस सम्मेलन में घोषित कार्ययोजना का अगला महत्वपूर्ण चरण अब जमीनी क्रियान्वयन होगा। राज्यों, कृषि विभागों, वैज्ञानिक संस्थानों और किसानों के बीच बेहतर तालमेल ही तय करेगा कि रबी अभियान की योजनाएं कितनी प्रभावी ढंग से खेतों तक पहुंचती हैं।
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