रोजगार देने से पहले रोजगार के गुण सिखा रहे हैं डॉ. हरि चरण बेहरा, कौशल आधारित ग्रामीण विकास का बन रहे उदाहरण

भारतीय सांख्यिकी संस्थान के वरिष्ठ शोधकर्ता डॉ. हरि चरण बेहरा ग्रामीण विकास, कृषि, कौशल विकास और प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन के माध्यम से हजारों ग्रामीणों को आत्मनिर्भर बनाने का कार्य कर रहे हैं।

“यदि किसी व्यक्ति का एक दिन का पेट भरना है तो उसे मछली दे दीजिए, लेकिन यदि पूरी जिंदगी की भूख मिटानी है तो उसे मछली पकड़ना सिखाइए।” यह प्रसिद्ध विचार केवल एक कहावत नहीं, बल्कि भारतीय सांख्यिकी संस्थान (आईएसआई) के गिरिडीह केंद्र में कार्यरत वरिष्ठ शोधकर्ता और शिक्षक डॉ. हरि चरण बेहरा के ग्रामीण विकास मॉडल की मूल सोच है। उनका मानना है कि ग्रामीण भारत को केवल रोजगार देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि लोगों को ऐसा कौशल सिखाना अधिक जरूरी है जिससे वे स्वयं रोजगार के अवसर पैदा कर सकें और आत्मनिर्भर बन सकें।

इसी सोच के साथ डॉ. बेहरा कई वर्षों से झारखंड सहित देश के विभिन्न राज्यों में कृषि, ग्रामीण आजीविका, भूमि प्रबंधन, प्राकृतिक संसाधन संरक्षण, उद्यमिता और कौशल विकास के क्षेत्र में लगातार कार्य कर रहे हैं। उनका प्रयास केवल शोध पत्र प्रकाशित करना नहीं, बल्कि शोध को गांवों की वास्तविक जरूरतों से जोड़कर लोगों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाना है।

शोध के साथ गांवों में भी सक्रिय भूमिका

डॉ. हरि चरण बेहरा का कार्य केवल विश्वविद्यालय और शोध संस्थानों तक सीमित नहीं है। वे नियमित रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में जाकर युवाओं, महिलाओं, किसान समूहों और स्वयं सहायता समूहों के बीच प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करते हैं।

अब तक वे 1,000 से अधिक ग्रामीणों को कृषि आधारित उद्यम, लघु व्यवसाय, वित्तीय समावेशन, प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और स्थानीय संसाधनों के बेहतर उपयोग का प्रशिक्षण दे चुके हैं। उनका मानना है कि यदि गांवों में उपलब्ध संसाधनों का वैज्ञानिक और व्यावसायिक उपयोग किया जाए तो ग्रामीणों को रोजगार के लिए शहरों की ओर पलायन करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।

किसानों की समस्याओं पर किया गहन अध्ययन

डॉ. बेहरा ने पश्चिम बंगाल के बांकुरा और बर्धमान जिलों के 327 आलू उत्पादक परिवारों पर विस्तृत अध्ययन किया। इस शोध में उन्होंने पाया कि गुणवत्तापूर्ण बीजों की कमी, बाजार में मूल्य अस्थिरता और सामाजिक-आर्थिक चुनौतियां किसानों की आय को सीधे प्रभावित करती हैं।

उनके अध्ययन के अनुसार राज्य के लगभग 95 प्रतिशत किसान लघु और सीमांत श्रेणी के हैं, जिनके पास दो हेक्टेयर से कम भूमि है। ऐसे किसानों के लिए आधुनिक तकनीक, गुणवत्तापूर्ण बीज, कृषि मशीनरी और बाजार तक पहुंच आज भी बड़ी चुनौती बनी हुई है।

यह शोध नीति निर्माताओं के लिए भी उपयोगी माना गया क्योंकि इससे किसानों की वास्तविक समस्याओं को समझने में मदद मिली।

सतत मानव आवास परियोजना पर कर रहे हैं कार्य

वर्तमान में डॉ. बेहरा झारखंड में “सतत मानव आवास” से जुड़ी एक महत्वपूर्ण बेसलाइन सर्वे परियोजना का नेतृत्व कर रहे हैं। इस परियोजना के तहत ग्रामीण परिवारों को कृषि उत्पादों के मूल्य संवर्धन, स्थानीय संसाधनों के उपयोग और कौशल विकास का प्रशिक्षण दिया जा रहा है।

इस पहल का उद्देश्य किसानों को केवल उत्पादन तक सीमित न रखकर उनके उत्पादों का प्रसंस्करण, पैकेजिंग और विपणन सिखाना है, ताकि उन्हें बेहतर आय प्राप्त हो सके।

भूमि सुधार और डिजिटल रिकॉर्ड पर महत्वपूर्ण योगदान

डॉ. हरि चरण बेहरा ने भूमि सुधार के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय कार्य किया है। गुजरात की ई-धरा भूमि अभिलेख कंप्यूटरीकरण परियोजना के अध्ययन के दौरान उन्होंने अमरेली, नवसारी, पाटन और वडोदरा जिलों का विस्तृत दौरा किया।

उनके अध्ययन में यह सामने आया कि डिजिटल भूमि अभिलेख प्रणाली लागू होने के बाद किसानों को भूमि रिकॉर्ड, नामांतरण और पंजीकरण जैसी सेवाएं पहले की तुलना में अधिक पारदर्शी, तेज और कम खर्च में मिलने लगीं।

भूमि प्रबंधन और भूमि अभिलेख सुधार पर उनके अध्ययन झारखंड, ओडिशा, पश्चिम बंगाल और गुजरात जैसे राज्यों में प्रशासनिक सुधारों के लिए भी उपयोगी साबित हुए हैं।

जल संरक्षण से नीति निर्माण तक

डॉ. बेहरा ने देशभर में संचालित 50 से अधिक वाटरशेड विकास परियोजनाओं का विश्लेषण किया। उनके शोध के निष्कर्ष संसद की स्थायी समिति के समक्ष भी प्रस्तुत किए गए।

वे मानते हैं कि वैज्ञानिक शोध तभी सफल माना जाएगा जब उसके परिणाम सीधे सरकारी नीतियों और आम लोगों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाएं। यही कारण है कि उनके कई अध्ययन नीति निर्माण की प्रक्रिया का हिस्सा बने हैं।

पारंपरिक ज्ञान और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण पर जोर

ग्रामीण समाज में पारंपरिक ज्ञान और सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने के उद्देश्य से डॉ. बेहरा झारखंड में “द सेक्रेड हिल्स एंड ग्रोव्स” परियोजना का नेतृत्व भी कर रहे हैं।

इस परियोजना के माध्यम से यह समझने का प्रयास किया जा रहा है कि किस प्रकार धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराएं प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।

उनका मानना है कि आधुनिक विज्ञान और पारंपरिक ज्ञान का संतुलित समन्वय ही सतत विकास का आधार बन सकता है।

स्थानीय उद्यमिता को दे रहे बढ़ावा

हाल के महीनों में डॉ. बेहरा ने लगभग 200 ग्रामीणों को व्यवसाय, वित्तीय साक्षरता और स्थानीय उद्यमिता का प्रशिक्षण दिया है। इसके साथ ही वे कोदो, मक्का और बाजरा जैसी पारंपरिक एवं पोषक फसलों की खेती को भी बढ़ावा दे रहे हैं।

उनका कहना है कि कम लागत वाली इन फसलों के माध्यम से किसान बेहतर आय प्राप्त कर सकते हैं और जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियों का भी प्रभावी ढंग से सामना कर सकते हैं।

गांवों को आत्मनिर्भर बनाने पर जोर

डॉ. बेहरा का मानना है कि ग्रामीण भारत प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध है। समस्या संसाधनों की कमी नहीं, बल्कि उनके वैज्ञानिक उपयोग और मूल्य संवर्धन की है।

यदि गांवों में तैयार होने वाले कच्चे उत्पादों को स्थानीय स्तर पर प्रसंस्कृत कर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंचाया जाए, तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत होगी, रोजगार बढ़ेगा और किसानों की आय में भी उल्लेखनीय वृद्धि होगी।

वे सामाजिक पूंजी और सामुदायिक सहयोग को भी ग्रामीण विकास का महत्वपूर्ण आधार मानते हैं। उनका विश्वास है कि जब परिवार, समाज और स्थानीय समुदाय एक-दूसरे को आगे बढ़ाने का प्रयास करेंगे, तभी आत्मनिर्भर गांव और मजबूत भारत का निर्माण संभव होगा।

डॉ. हरि चरण बेहरा का कार्य यह संदेश देता है कि ग्रामीण विकास केवल सरकारी योजनाओं और अनुदानों तक सीमित नहीं है। वास्तविक विकास तब संभव है जब गांवों के लोगों को कौशल, ज्ञान और उद्यमिता से जोड़ा जाए। कृषि, प्राकृतिक संसाधन, स्थानीय उत्पाद, मूल्य संवर्धन और प्रशिक्षण को केंद्र में रखकर उन्होंने ग्रामीण आजीविका का ऐसा मॉडल प्रस्तुत किया है जो रोजगार मांगने वालों की बजाय रोजगार सृजित करने वाले युवाओं को तैयार करता है।

आज जब देश आत्मनिर्भर भारत और सतत विकास की दिशा में आगे बढ़ रहा है, तब डॉ. हरि चरण बेहरा जैसे शोधकर्ता यह साबित कर रहे हैं कि सही प्रशिक्षण, वैज्ञानिक सोच और स्थानीय संसाधनों का बेहतर उपयोग ग्रामीण भारत की तस्वीर बदल सकता है।

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