उर्वरक सब्सिडी में बदलाव की सिफारिश, किसानों को सीधे मदद पर जोर

ICRIER के नीति-पत्रों में उर्वरक सब्सिडी के बजाय किसानों को सीधे आर्थिक सहायता देने की सिफारिश की गई है। जानिए प्रस्ताव के फायदे और चुनौतियां।

उर्वरक सब्सिडी में बदलाव और किसानों को सीधे आर्थिक सहायता देने का प्रस्ताव

भारत में उर्वरक सब्सिडी की मौजूदा व्यवस्था में बदलाव को लेकर नीतिगत चर्चा तेज हो रही है। भारतीय अंतरराष्ट्रीय आर्थिक संबंध अनुसंधान परिषद (ICRIER) के नीति-पत्रों में उर्वरक कंपनियों को उत्पाद के आधार पर दी जाने वाली सब्सिडी से धीरे-धीरे किसानों को सीधे आर्थिक सहायता देने की दिशा में आगे बढ़ने की सिफारिश की गई है। इस प्रस्ताव में खेती के रकबे, फसल की जरूरत और किसानों की वास्तविक कृषि आवश्यकताओं को ध्यान में रखने पर जोर दिया गया है। इसका उद्देश्य उर्वरक सब्सिडी को अधिक प्रभावी बनाना, सरकारी खर्च का बेहतर इस्तेमाल करना और खेती में पोषक तत्वों के संतुलित उपयोग को प्रोत्साहित करना है।

हालांकि, यह स्पष्ट करना जरूरी है कि किसानों को सीधे आर्थिक सहायता देने का सुझाव एक नीतिगत सिफारिश है, लागू हो चुकी सरकारी नीति नहीं। इसे अमल में लाने के लिए सरकार को वित्तीय व्यवस्था, लाभार्थियों की पहचान, सहायता की राशि तय करने और किसानों तक भुगतान पहुंचाने जैसे कई पहलुओं पर निर्णय लेना होगा।

भारत में उर्वरक सब्सिडी कृषि उत्पादन और किसानों की लागत के लिहाज से महत्वपूर्ण है। यूरिया जैसे प्रमुख उर्वरकों की कीमत किसानों के लिए नियंत्रित रखी जाती है, जबकि सरकार निर्धारित व्यवस्था के तहत लागत का एक बड़ा हिस्सा वहन करती है। इस प्रणाली ने किसानों को अपेक्षाकृत कम कीमत पर उर्वरक उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। लेकिन बढ़ते सब्सिडी खर्च, उर्वरकों के असंतुलित इस्तेमाल और वितरण व्यवस्था से जुड़ी चुनौतियों के कारण मौजूदा मॉडल की समीक्षा की मांग भी उठती रही है।

मौजूदा सब्सिडी व्यवस्था में क्या बदलाव सुझाए गए हैं?

ICRIER के अक्टूबर 2026 में जारी दो नीति-पत्रों में उर्वरक सब्सिडी को अधिक लक्षित और प्रभावी बनाने के विकल्पों पर चर्चा की गई है। इनमें उर्वरक की खरीद के आधार पर मिलने वाले लाभ के बजाय किसानों को सीधे आर्थिक सहायता देने की दिशा में धीरे-धीरे बढ़ने का सुझाव शामिल है। साथ ही, यूरिया को पोषक तत्व आधारित सब्सिडी (NBS) व्यवस्था के दायरे में लाने को एक अंतरिम विकल्प के रूप में भी देखा गया है।

मौजूदा व्यवस्था में यूरिया की खुदरा कीमत सरकार नियंत्रित करती है, जबकि डीएपी और पोटाश जैसे दूसरे उर्वरकों पर सब्सिडी की व्यवस्था अलग है। कीमतों के इस अंतर से किसानों के लिए यूरिया का इस्तेमाल अपेक्षाकृत सस्ता पड़ता है। नतीजतन, कुछ परिस्थितियों में किसान जरूरत से अधिक नाइट्रोजन का इस्तेमाल कर सकते हैं, जबकि फसल की आवश्यकता के अनुसार फास्फोरस और पोटाश का उपयोग पर्याप्त नहीं हो पाता।

नीति-पत्रों में इस अंतर को कम करने और उर्वरकों के संतुलित इस्तेमाल को बढ़ावा देने पर जोर दिया गया है। प्रस्तावित बदलाव का उद्देश्य किसानों की सहायता समाप्त करना नहीं, बल्कि सहायता देने के तरीके को इस तरह तैयार करना है कि उसका लाभ खेती की वास्तविक जरूरतों के अनुरूप मिले।

खेती के रकबे और फसल की जरूरत के आधार पर सहायता

प्रस्तावित व्यवस्था का एक प्रमुख पहलू यह है कि किसान को मिलने वाली आर्थिक सहायता उसकी वास्तविक खेती से जुड़ी हो। इसके लिए खेती का रकबा, बोई गई फसल, मिट्टी की स्थिति और सिंचाई की उपलब्धता जैसे कारकों को ध्यान में रखने का सुझाव दिया गया है।

उदाहरण के लिए, धान, गेहूं, दलहन और तिलहन की पोषक तत्व संबंधी जरूरतें एक जैसी नहीं होतीं। इसी तरह, सिंचित और वर्षा आधारित खेती में भी उर्वरक प्रबंधन की जरूरत अलग हो सकती है। यदि सहायता तय करते समय इन अंतर को ध्यान में रखा जाए, तो किसानों को उनकी कृषि परिस्थितियों के अनुरूप मदद देने की बेहतर संभावना बन सकती है।

हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि हर फसल या हर किसान के लिए सहायता की राशि पहले से तय हो गई है। यह नीति-निर्माण के लिए सुझाया गया तरीका है। सहायता की वास्तविक राशि, पात्रता के नियम और भुगतान की समय-सारणी तय करना सरकार का काम होगा।

एग्रीस्टैक और डिजिटल रिकॉर्ड की भूमिका

किसानों तक सहायता पहुंचाने के लिए ICRIER के नीति-पत्रों में एग्रीस्टैक जैसे डिजिटल कृषि प्लेटफॉर्म की संभावनाओं पर भी चर्चा की गई है। किसान पहचान, भूमि रिकॉर्ड और फसल संबंधी जानकारी को जोड़कर खेती की वास्तविक जरूरत का बेहतर आकलन किया जा सकता है। इससे यह तय करने में मदद मिल सकती है कि किस किसान ने कितने क्षेत्र में कौन-सी फसल उगाई है और उसे किस प्रकार की सहायता की जरूरत है।

लेकिन डिजिटल रिकॉर्ड की उपलब्धता ही पर्याप्त नहीं होगी। कई जगह भूमि का मालिक और खेती करने वाला व्यक्ति अलग-अलग होते हैं। बटाईदार, पट्टे पर खेती करने वाले किसान और ऐसे कृषक जिनके नाम पर भूमि दर्ज नहीं है, उन्हें लाभार्थी के रूप में पहचानना बड़ी चुनौती हो सकती है।

यदि सहायता केवल भूमि के स्वामित्व के आधार पर तय की गई, तो वास्तविक खेती करने वाले कुछ किसान इससे बाहर रह सकते हैं। इसलिए नीति-पत्रों में वास्तविक कृषक की पहचान, रिकॉर्ड की शुद्धता, आंकड़ों की सुरक्षा और शिकायतों के समाधान के लिए मजबूत व्यवस्था तैयार करने की जरूरत पर जोर दिया गया है।

सरकारी खर्च और उर्वरक बाजार पर संभावित असर

उर्वरक सब्सिडी सरकार के बड़े खर्चों में शामिल है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में उर्वरकों और ऊर्जा की कीमतों में बदलाव, आयात लागत और आपूर्ति में व्यवधान का असर सरकारी बजट पर पड़ता है। ऐसे में सब्सिडी व्यवस्था की समीक्षा का एक उद्देश्य सीमित सार्वजनिक संसाधनों का अधिक प्रभावी इस्तेमाल करना भी है।

ICRIER के अक्टूबर 2026 के नीति-पत्रों पर आधारित रिपोर्टों के अनुसार, वित्त वर्ष 2026-27 के केंद्रीय बजट में उर्वरक सब्सिडी के लिए लगभग 1.71 लाख करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया था। पश्चिम एशिया में आपूर्ति संबंधी व्यवधानों के बीच इस खर्च के बढ़कर 2.42 लाख करोड़ से 3.32 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचने के परिदृश्य का अनुमान भी सामने आया है। यह अनुमान है, अंतिम वास्तविक खर्च नहीं।

सीधे आर्थिक सहायता की व्यवस्था लागू होने पर किसानों को सहायता मिलने और उर्वरक की कीमत तय होने का तरीका बदल सकता है। यदि सब्सिडी का लाभ किसी विशेष उत्पाद की कम कीमत के बजाय किसान को दिया जाए, तो अलग-अलग पोषक तत्वों के इस्तेमाल से जुड़े आर्थिक फैसलों पर असर पड़ सकता है। इससे यूरिया पर अत्यधिक निर्भरता कम करने और दूसरे जरूरी पोषक तत्वों के संतुलित इस्तेमाल को बढ़ावा देने की संभावना है।

हालांकि, किसी भी सुधार से होने वाली बचत का वास्तविक आकलन व्यवस्था लागू करने के बाद ही किया जा सकेगा। इसके लिए किसानों की प्रतिक्रिया, बाजार की कीमतों, आपूर्ति और फसल उत्पादन पर पड़ने वाले प्रभावों का मूल्यांकन जरूरी होगा।

किसानों के सामने क्या होंगी चुनौतियां?

सब्सिडी की मौजूदा व्यवस्था में किसान को यूरिया नियंत्रित कीमत पर मिलता है। यदि भविष्य में आर्थिक सहायता सीधे किसान के खाते में दी जाती है और उर्वरकों की कीमतों में बदलाव होता है, तो किसानों को खाद खरीदने के समय अधिक रकम की जरूरत पड़ सकती है। इसलिए सहायता की राशि और भुगतान का समय बेहद महत्वपूर्ण होगा।

बुवाई के समय किसानों को बीज, खाद, डीजल, सिंचाई और मजदूरी के लिए एक साथ खर्च करना पड़ता है। यदि आर्थिक सहायता देर से मिले, तो छोटे और सीमांत किसानों के लिए खाद खरीदना मुश्किल हो सकता है। इसलिए नीति में यह सुनिश्चित करना जरूरी होगा कि सहायता फसल के मौसम से पहले या जरूरत के समय उपलब्ध हो।

इसके अलावा, भूमि रिकॉर्ड में त्रुटियां, बैंक खातों से जुड़ी समस्याएं और डिजिटल सुविधाओं तक सीमित पहुंच भी किसानों को प्रभावित कर सकती हैं। किसी किसान का नाम रिकॉर्ड में न होने या फसल की जानकारी गलत दर्ज होने पर उसे सहायता से वंचित नहीं होना चाहिए। इसके लिए स्थानीय स्तर पर सत्यापन और शिकायत निवारण की प्रभावी व्यवस्था आवश्यक होगी।

बदलाव लागू करने से पहले जरूरी तैयारी

ICRIER की सिफारिशों को देखते हुए उर्वरक सब्सिडी में सुधार के लिए चरणबद्ध दृष्टिकोण महत्वपूर्ण हो सकता है। पहले भूमि और फसल रिकॉर्ड की विश्वसनीयता बढ़ाना, वास्तविक किसानों की पहचान करना और अलग-अलग कृषि परिस्थितियों के अनुसार सहायता की जरूरत का आकलन करना जरूरी होगा।

इसके बाद सीमित स्तर पर परीक्षण करके यह देखा जा सकता है कि प्रस्तावित व्यवस्था किसानों की लागत, उर्वरक की उपलब्धता और पोषक तत्वों के संतुलित इस्तेमाल को किस तरह प्रभावित करती है। ऐसे परीक्षणों के परिणामों के आधार पर ही व्यापक बदलाव के बारे में निर्णय लेना अधिक व्यावहारिक होगा।

साथ ही, किसानों को मिट्टी की जांच, फसल आधारित उर्वरक सिफारिशों और पोषक तत्वों के संतुलित उपयोग के बारे में जानकारी देना भी जरूरी है। केवल सब्सिडी देने का तरीका बदलने से मिट्टी के स्वास्थ्य में सुधार सुनिश्चित नहीं होगा। इसके लिए कृषि विस्तार सेवाओं, वैज्ञानिक सलाह और समय पर उर्वरक उपलब्धता की भी भूमिका होगी।

निष्कर्ष

ICRIER के नीति-पत्रों में उर्वरक सब्सिडी को उत्पाद केंद्रित व्यवस्था से किसान केंद्रित आर्थिक सहायता की ओर ले जाने का सुझाव कृषि नीति में संभावित बदलाव की महत्वपूर्ण चर्चा है। खेती के रकबे, फसल की जरूरत और वास्तविक कृषक की पहचान को महत्व देने से सरकारी सहायता को अधिक लक्षित बनाने की संभावना है। वहीं, डिजिटल रिकॉर्ड की कमियां, छोटे किसानों की नकदी संबंधी जरूरतें और भुगतान में देरी जैसे जोखिमों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

फिलहाल यह सिफारिश है, लागू सरकारी नीति नहीं। इसका उद्देश्य किसानों को मिलने वाली सहायता समाप्त करना नहीं, बल्कि उर्वरक सब्सिडी को अधिक प्रभावी, पारदर्शी और कृषि की वास्तविक जरूरतों के अनुरूप बनाने के विकल्प तलाशना है। किसी भी बदलाव की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि किसानों की आर्थिक सुरक्षा बनाए रखते हुए उर्वरकों के संतुलित इस्तेमाल और सरकारी खर्च के बेहतर प्रबंधन के बीच कितना प्रभावी संतुलन स्थापित किया जाता है।

 

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