सूखा प्रभावित खेती को मिलेगी नई ताकत, किसानों को सिखाई गई जलवायु अनुकूल कृषि तकनीकें

Drought-affected agriculture will get new strength,

किसानों ने वैज्ञानिकों से पूछे सवाल

किसानों ने वैज्ञानिकों से पूछे सवाल

बदलती जलवायु, अनियमित वर्षा और सूखे जैसी चुनौतियों के बीच किसानों को वैज्ञानिक समाधान उपलब्ध कराने के उद्देश्य से आईसीएआर–केंद्रीय शुष्कभूमि कृषि अनुसंधान संस्थान (ICAR-CRIDA), हैदराबाद ने विभिन्न जागरूकता एवं किसान-केंद्रित कार्यक्रमों का आयोजन किया। इस अवसर पर संस्थान में राष्ट्रीय स्तर के कार्यक्रम का लाइव वेबकास्ट, ‘एक पेड़ मां के नाम’ अभियान के तहत पौधरोपण तथा किसान–वैज्ञानिक संवाद आयोजित किया गया। इन कार्यक्रमों का उद्देश्य जलवायु परिवर्तन के प्रति किसानों को जागरूक करना, पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देना तथा वैज्ञानिक खेती को गांव-गांव तक पहुंचाना रहा।

कार्यक्रम में वैज्ञानिकों, कृषि विशेषज्ञों, कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) के अधिकारियों, प्रशासनिक कर्मचारियों, ग्रामीण कृषि कार्य अनुभव (RAWEP) कार्यक्रम के विद्यार्थियों और बड़ी संख्या में किसानों ने भाग लिया।

कृषि अनुसंधान ने बदली भारत की तस्वीर

कार्यक्रम के दौरान नई दिल्ली में आयोजित आईसीएआर के राष्ट्रीय समारोह का सीधा प्रसारण संस्थान में दिखाया गया। इस अवसर पर केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण तथा ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) भारत की कृषि क्रांति की आधारशिला रही है।

उन्होंने कहा कि देश ने खाद्यान्न, बागवानी, दुग्ध उत्पादन और मत्स्य पालन के क्षेत्र में जो ऐतिहासिक उपलब्धियां हासिल की हैं, उनमें आईसीएआर के वैज्ञानिक अनुसंधान और तकनीकी नवाचारों का सबसे बड़ा योगदान है। उन्होंने वैज्ञानिकों से आह्वान किया कि प्रयोगशालाओं में विकसित तकनीकों को समय पर किसानों के खेतों तक पहुंचाया जाए, ताकि अनुसंधान का सीधा लाभ किसानों को मिल सके।

वैज्ञानिक अनुसंधान से बदल रही भारतीय कृषि

राष्ट्रीय समारोह में डीएआरई (DARE) के सचिव एवं आईसीएआर के महानिदेशक डॉ. एम.एल. जाट ने कहा कि विज्ञान आधारित अनुसंधान और नवाचार भारत की कृषि को नई दिशा दे रहे हैं।

उन्होंने जानकारी दी कि पिछले एक वर्ष में आईसीएआर ने 386 उन्नत फसल किस्में विकसित की हैं, जिनमें 94 प्रतिशत जलवायु सहनशील (Climate-Tolerant) हैं। इसके अलावा 117 नई बागवानी फसल किस्में भी विकसित की गई हैं। पशु स्वास्थ्य, मत्स्य पालन, प्राकृतिक खेती, कृषि मशीनीकरण और जलवायु अनुकूल कृषि के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल की गई हैं।

उन्होंने कहा कि आईसीएआर का लक्ष्य वैज्ञानिक अनुसंधान के माध्यम से समृद्ध किसान, स्वस्थ समाज, स्वच्छ पर्यावरण और आत्मनिर्भर भारत का निर्माण करना है।

‘एक पेड़ मां के नाम’ अभियान के तहत हुआ पौधरोपण

कार्यक्रम के तहत कृषि विज्ञान केंद्र (KVK), आईसीएआर-क्रिडा द्वारा भुवन अनुसंधान फार्म (Bhuvan Research Farm) में ‘एक पेड़ मां के नाम’ अभियान के अंतर्गत पौधरोपण किया गया।

इस दौरान कुल 36 पौधे लगाए गए। इस अभियान का उद्देश्य हरित क्षेत्र का विस्तार करना, पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देना तथा कर्मचारियों और किसानों के बीच पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी की भावना विकसित करना था।

पौधरोपण कार्यक्रम में विषय विशेषज्ञ, तकनीकी अधिकारी, प्रशासनिक कर्मचारी, भुवन अनुसंधान फार्म के कर्मचारी तथा ग्रामीण कृषि कार्य अनुभव (RAWEP) कार्यक्रम के विद्यार्थियों ने सक्रिय भागीदारी निभाई।

वैज्ञानिकों ने बताया कि वृक्षारोपण केवल पर्यावरण संरक्षण का माध्यम नहीं है, बल्कि यह जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने, कार्बन अवशोषण बढ़ाने तथा प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

किसान–वैज्ञानिक संवाद में जलवायु परिवर्तन पर विशेष चर्चा

पौधरोपण के बाद मंचल मंडल के अरुटला गांव में किसान–वैज्ञानिक संवाद कार्यक्रम आयोजित किया गया। इसमें किसानों को आईसीएआर के इतिहास, उपलब्धियों और कृषि अनुसंधान के क्षेत्र में किए गए योगदान की जानकारी दी गई।

वैज्ञानिकों ने किसानों को बदलती जलवायु परिस्थितियों के बीच खेती को अधिक सुरक्षित और लाभकारी बनाने के उपाय बताए। विशेष रूप से अल नीनो (El Niño) जैसी वैश्विक जलवायु घटना पर विस्तार से चर्चा की गई।

विशेषज्ञों ने बताया कि अल नीनो के कारण वर्षा के पैटर्न में बदलाव आ सकता है, जिससे फसल उत्पादन और सिंचाई के लिए जल उपलब्धता प्रभावित होती है। किसानों को ऐसे हालात में खेती की वैज्ञानिक योजना बनाने और जोखिम कम करने के उपायों की जानकारी दी गई।

किसानों को सिखाई गई जलवायु अनुकूल खेती

कार्यक्रम के दौरान कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों को जलवायु अनुकूल कृषि (Climate-Resilient Agriculture) अपनाने के लिए कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए।

उन्होंने वर्षा आधारित खेती के लिए उपयुक्त फसल चयन, जल संरक्षण, सूखा सहनशील किस्मों का उपयोग, फसल विविधीकरण, मिट्टी की नमी संरक्षण, संतुलित उर्वरक प्रबंधन तथा मौसम आधारित कृषि सलाह को अपनाने पर जोर दिया।

विशेषज्ञों ने बताया कि जलवायु परिवर्तन की बढ़ती चुनौतियों को देखते हुए किसानों को वैज्ञानिक खेती अपनानी होगी। इससे उत्पादन में स्थिरता बनी रहेगी और प्राकृतिक आपदाओं से होने वाले नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकेगा।

किसानों ने वैज्ञानिकों से पूछे सवाल

कार्यक्रम के दौरान आयोजित संवाद सत्र में किसानों ने वर्षा की अनिश्चितता, सूखे की स्थिति, फसल चयन, सिंचाई प्रबंधन और मौसम आधारित खेती से जुड़े कई प्रश्न पूछे।

वैज्ञानिकों ने किसानों की स्थानीय परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए व्यावहारिक समाधान प्रस्तुत किए और बताया कि यदि वैज्ञानिक तकनीकों को समय पर अपनाया जाए तो कम वर्षा वाले क्षेत्रों में भी अच्छी पैदावार प्राप्त की जा सकती है।

इस कार्यक्रम में अरुटला गांव के 46 किसानों, जिनमें 31 पुरुष और 15 महिला किसान शामिल थीं, ने सक्रिय भागीदारी की।

शुष्कभूमि कृषि के लिए अनुसंधान की बढ़ती भूमिका

आईसीएआर-क्रिडा लंबे समय से शुष्क और वर्षा आधारित कृषि क्षेत्रों के लिए आधुनिक तकनीकों के विकास पर कार्य कर रहा है। संस्थान द्वारा विकसित तकनीकों का उद्देश्य कम पानी में अधिक उत्पादन, प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण और किसानों की आय बढ़ाना है।

विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में जलवायु परिवर्तन का सबसे अधिक प्रभाव वर्षा आधारित खेती वाले क्षेत्रों पर पड़ेगा। ऐसे में आईसीएआर-क्रिडा जैसे संस्थानों द्वारा विकसित तकनीकें किसानों के लिए अत्यंत उपयोगी साबित होंगी।

टिकाऊ कृषि और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में मजबूत पहल

कार्यक्रम के समापन पर वैज्ञानिकों और किसानों ने जलवायु स्मार्ट कृषि, पर्यावरण संरक्षण और वैज्ञानिक तकनीकों के व्यापक प्रसार का संकल्प लिया। विशेषज्ञों ने कहा कि कृषि अनुसंधान, किसानों की सहभागिता और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के समन्वय से ही भारत की कृषि को भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार किया जा सकता है।

आईसीएआर-क्रिडा की यह पहल इस बात का उदाहरण है कि वैज्ञानिक संस्थान केवल नई तकनीकों का विकास ही नहीं कर रहे, बल्कि उन्हें किसानों तक पहुंचाकर खेती को अधिक टिकाऊ, लाभकारी और जलवायु अनुकूल बनाने की दिशा में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। इससे न केवल किसानों की आय में वृद्धि होगी, बल्कि ‘विकसित भारत @2047′, खाद्य सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण के राष्ट्रीय लक्ष्यों को भी नई मजबूती मिलेगी।

 

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