देश में कृषि शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने, किसानों की आय बढ़ाने और भारतीय कृषि को वैश्विक स्तर पर मजबूत बनाने के लिए केंद्र सरकार कई महत्वपूर्ण कदम उठाने की तैयारी कर रही है। केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण तथा ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने दिल्ली के पूसा स्थित परिसर में आयोजित एग्रीविज़न के 10वें राष्ट्रीय अधिवेशन को संबोधित करते हुए कृषि शिक्षा के नियमन, फर्जी कृषि कॉलेजों पर कार्रवाई, छोटे किसानों के लिए Integrated Farming और खेती में आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल को लेकर सरकार की प्राथमिकताएं सामने रखीं।
केंद्रीय मंत्री ने स्पष्ट कहा कि देश में बिना आवश्यक मानकों के चल रहे निजी कृषि कॉलेजों और केवल फीस लेकर डिग्रियां बांटने वाली संस्थाओं पर लगाम लगाई जाएगी। इसके लिए जल्द Agriculture Council यानी एग्रीकल्चर काउंसिल के गठन की दिशा में काम किया जाएगा। इसका उद्देश्य कृषि शिक्षा में गुणवत्ता, जवाबदेही और मानकों को मजबूत करना है, ताकि कृषि क्षेत्र में पढ़ाई करने वाले युवाओं की डिग्रियों का महत्व बना रहे और उन्हें रोजगार, शोध तथा कृषि व्यवसाय में बेहतर अवसर मिल सकें।
श्री चौहान ने कहा कि कृषि शिक्षा प्राप्त करने वाले युवाओं का भविष्य सुरक्षित करना सरकार की प्राथमिकता है। उन्होंने कृषि वैज्ञानिकों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों से आह्वान किया कि वे राष्ट्रीय अधिवेशन में कृषि क्षेत्र की चुनौतियों पर गंभीर मंथन करें और ऐसे सुझाव दें, जिन्हें सरकार व्यावहारिक नीतियों में बदल सके। उन्होंने भरोसा दिलाया कि सम्मेलन से निकलने वाले महत्वपूर्ण सुझावों पर चर्चा के लिए अगले 15 दिनों से एक महीने के भीतर प्रतिनिधियों के साथ दोबारा बैठक की जाएगी। इसमें Short-Term और Long-Term Roadmap तैयार करने पर काम होगा।
10 वर्षों में 49 प्रतिशत बढ़ा खाद्यान्न उत्पादन
केंद्रीय कृषि मंत्री ने भारत की कृषि यात्रा का उल्लेख करते हुए कहा कि देश ने खाद्यान्न की कमी और आयात पर निर्भरता के दौर से निकलकर आत्मनिर्भरता तथा रिकॉर्ड उत्पादन तक का सफर तय किया है। उन्होंने याद दिलाया कि एक समय भारत को अपनी खाद्यान्न आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए विदेशों से अनाज आयात करना पड़ता था। पीएल-480 कार्यक्रम के तहत अमेरिका से गेहूं आयात करना उस दौर की खाद्य सुरक्षा संबंधी चुनौतियों को दर्शाता था।
आज स्थिति काफी बदल चुकी है। भारतीय किसानों की मेहनत, कृषि वैज्ञानिकों के शोध, बेहतर बीजों, सिंचाई सुविधाओं, कृषि तकनीक और सरकारी नीतियों ने देश की खाद्यान्न उत्पादन क्षमता को मजबूत किया है। मंत्री के अनुसार, वर्ष 2014 से 2024 के बीच भारत का कुल कृषि उत्पादन 49 प्रतिशत बढ़ा है। उन्होंने कहा कि भारत चावल उत्पादन और निर्यात में दुनिया में पहले स्थान पर है, जबकि गेहूं उत्पादन में दूसरे स्थान पर है।
यह उपलब्धि केवल कृषि उत्पादन में बढ़ोतरी का संकेत नहीं है, बल्कि देश की Food Security और किसानों की क्षमता को भी दर्शाती है। बढ़ती आबादी, बदलती खाद्य आवश्यकताओं और जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों के बीच खाद्यान्न की पर्याप्त उपलब्धता भारत के लिए महत्वपूर्ण है।
हालांकि, केंद्रीय मंत्री ने यह भी संकेत दिया कि अब कृषि क्षेत्र की चुनौती केवल अधिक उत्पादन करना नहीं है। देश को उपज के वैज्ञानिक भंडारण, बेहतर प्रबंधन, प्रसंस्करण, मूल्य संवर्धन और अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंच बढ़ाने पर भी ध्यान देना होगा।
भारत में कई बार पर्याप्त उत्पादन होने के बावजूद भंडारण की कमी, फसल कटाई के बाद होने वाले नुकसान, बाजार में कीमतों के उतार-चढ़ाव और कमजोर सप्लाई चेन के कारण किसानों को अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाता। ऐसे में कृषि क्षेत्र को उत्पादन केंद्रित मॉडल से आगे बढ़ाकर पूरी Value Chain को मजबूत करने की जरूरत है।
भारत को दुनिया का ‘फूड बास्केट‘ बनाने का लक्ष्य
श्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि भारत अब केवल अपनी खाद्य जरूरतें पूरी करने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि आने वाले समय में दुनिया का Food Basket बनने की क्षमता रखता है। इसका अर्थ है कि भारत घरेलू खाद्य सुरक्षा बनाए रखने के साथ-साथ वैश्विक बाजारों में कृषि उत्पादों की भरोसेमंद आपूर्ति करने वाला प्रमुख देश बन सकता है।
इसके लिए किसानों की उत्पादकता बढ़ाने के साथ कृषि उत्पादों की गुणवत्ता, प्रसंस्करण, भंडारण, पैकेजिंग और निर्यात व्यवस्था को मजबूत करना आवश्यक होगा। वैश्विक बाजारों में प्रतिस्पर्धा के लिए भारतीय कृषि उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय गुणवत्ता मानकों के अनुरूप तैयार करना भी महत्वपूर्ण है।
भारत चावल, गेहूं, मसाले, फल, सब्जियां और कई अन्य कृषि उत्पादों के उत्पादन में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। लेकिन वैश्विक स्तर पर अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए केवल अधिक उपज पर्याप्त नहीं होगी। उत्पादों की एकरूप गुणवत्ता, Traceability, समय पर आपूर्ति और बाजार की मांग के अनुसार उत्पादन पर भी ध्यान देना होगा।
इस दिशा में Farmer Producer Organizations (FPOs), कृषि सहकारी समितियों, किसान समूहों, खाद्य प्रसंस्करण इकाइयों और निर्यातकों की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। छोटे किसानों को सामूहिक रूप से बाजार से जोड़ने पर उनकी सौदेबाजी की क्षमता बढ़ सकती है और उन्हें बेहतर कीमत मिलने की संभावनाएं मजबूत हो सकती हैं।
हालांकि, वैश्विक निर्यात बढ़ाने के साथ घरेलू बाजार में खाद्यान्न की उपलब्धता और कीमतों को संतुलित रखना भी जरूरी होगा। किसानों को बेहतर बाजार मिलने के साथ उपभोक्ताओं के लिए खाद्य पदार्थों की उपलब्धता सुनिश्चित करना कृषि नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा रहेगा।
फर्जी कृषि कॉलेजों पर कार्रवाई की तैयारी
अधिवेशन में कृषि शिक्षा की गुणवत्ता का मुद्दा प्रमुखता से उठा। केंद्रीय मंत्री ने कहा कि देश में ऐसे संस्थानों को मनमाने तरीके से संचालित नहीं होने दिया जाएगा, जो आवश्यक मानकों का पालन किए बिना कृषि शिक्षा प्रदान कर रहे हैं।
कृषि शिक्षा केवल एक सामान्य डिग्री प्राप्त करने का माध्यम नहीं है। यह फसल उत्पादन, मृदा विज्ञान, कृषि अर्थशास्त्र, पौध संरक्षण, बीज तकनीक, कृषि इंजीनियरिंग और ग्रामीण विकास जैसे विषयों में विशेषज्ञ तैयार करती है। इन क्षेत्रों में प्रशिक्षित युवाओं की भूमिका किसानों तक वैज्ञानिक जानकारी पहुंचाने, कृषि अनुसंधान को आगे बढ़ाने और नई तकनीकों को खेतों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण होती है।
यदि किसी संस्थान में पर्याप्त प्रयोगशालाएं, कृषि फार्म, प्रशिक्षित शिक्षक, व्यावहारिक प्रशिक्षण और आवश्यक शैक्षणिक सुविधाएं नहीं हैं, तो विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा नहीं मिल पाती। इसका असर उनके रोजगार, प्रतियोगी परीक्षाओं, उच्च शिक्षा और कृषि क्षेत्र में करियर बनाने की संभावनाओं पर पड़ सकता है।
इसी संदर्भ में Agriculture Council के गठन की घोषणा को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। प्रस्तावित व्यवस्था का उद्देश्य कृषि शिक्षा के क्षेत्र में मानकों और नियमन को मजबूत करना है। हालांकि, काउंसिल की संरचना, अधिकार क्षेत्र, गठन की समयसीमा और नियामक व्यवस्था से जुड़े विस्तृत प्रावधानों का औपचारिक विवरण अभी सामने आना बाकी है।
यदि नियमन प्रभावी तरीके से लागू होता है, तो कृषि कॉलेजों में शिक्षा की गुणवत्ता की निगरानी, संस्थानों की जवाबदेही और विद्यार्थियों के हितों की सुरक्षा को मजबूती मिल सकती है।
कृषि छात्रों की डिग्री बेकार नहीं जाने देंगे
केंद्रीय मंत्री ने कृषि विद्यार्थियों को आश्वस्त किया कि सरकार उनकी मेहनत और शिक्षा को व्यर्थ नहीं जाने देगी। उन्होंने B.Sc. Agriculture और M.Sc. Agriculture जैसी तकनीकी डिग्रियों की उपयोगिता और सम्मान बनाए रखने पर जोर दिया।
देश में कृषि क्षेत्र तेजी से बदल रहा है। पारंपरिक खेती के साथ अब Precision Farming, कृषि ड्रोन, डिजिटल एग्रीकल्चर, मृदा परीक्षण, जल प्रबंधन, जैविक एवं प्राकृतिक खेती, कृषि प्रसंस्करण और Agri Business जैसे क्षेत्रों में भी विशेषज्ञों की जरूरत बढ़ रही है।
ऐसे में कृषि स्नातकों के लिए करियर के अवसर केवल सरकारी नौकरियों तक सीमित नहीं हैं। वे कृषि इनपुट कंपनियों, बीज एवं उर्वरक उद्योग, कृषि मशीनरी कंपनियों, खाद्य प्रसंस्करण, कृषि सलाहकार सेवाओं, कृषि स्टार्टअप, अनुसंधान संस्थानों और किसान उत्पादक संगठनों के साथ काम कर सकते हैं।
इसके बावजूद गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और व्यावहारिक प्रशिक्षण का अभाव युवाओं के लिए चुनौती बन सकता है। उद्योग की जरूरतों के अनुरूप पाठ्यक्रम, आधुनिक प्रयोगशालाएं, खेतों में प्रशिक्षण और संस्थानों तथा कंपनियों के बीच सहयोग कृषि शिक्षा को अधिक रोजगारोन्मुख बना सकते हैं।
कृषि शिक्षा में सुधार का लाभ तभी व्यापक होगा, जब विद्यार्थियों को पढ़ाई के साथ वास्तविक कृषि परिस्थितियों का अनुभव मिले। इसके लिए Internship, Field Training, Research Projects और उद्योग आधारित प्रशिक्षण को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है।
छोटे किसानों की आय बढ़ाने के लिए Integrated Farming पर जोर
केंद्रीय मंत्री ने छोटे और सीमांत किसानों की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए Integrated Farming System को महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि भारत में औसत कृषि जोत का आकार लगभग 0.96 हेक्टेयर होने के कारण केवल एक फसल पर निर्भर रहकर किसानों की आय बढ़ाना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
छोटी जोत पर खेती करने वाले किसानों के सामने उत्पादन लागत, सिंचाई, मौसम की अनिश्चितता, बाजार भाव और सीमित संसाधनों जैसी कई समस्याएं रहती हैं। यदि किसान की पूरी आय केवल एक फसल पर निर्भर हो, तो फसल खराब होने या कीमत गिरने की स्थिति में परिवार की आर्थिक स्थिति प्रभावित हो सकती है।
Integrated Farming ऐसा मॉडल है, जिसमें एक ही कृषि व्यवस्था के भीतर अलग-अलग गतिविधियों को जोड़ा जाता है। इसमें अनाज उत्पादन के साथ फल एवं सब्जियों की खेती, पशुपालन, डेयरी, मत्स्य पालन, मधुमक्खी पालन, औषधीय पौधों की खेती और अन्य उपयुक्त गतिविधियां शामिल की जा सकती हैं।
इस मॉडल का उद्देश्य उपलब्ध जमीन, पानी, श्रम और अन्य संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल करना है। उदाहरण के लिए, फसल के अवशेषों का उपयोग पशुओं के चारे या कंपोस्ट बनाने में किया जा सकता है। पशुपालन से मिलने वाले गोबर को खाद के रूप में इस्तेमाल करने से कुछ परिस्थितियों में रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता घटाने में मदद मिल सकती है। वहीं, डेयरी और सब्जियों जैसी गतिविधियों से किसानों को अलग-अलग समय पर आय प्राप्त होने की संभावना रहती है।
हालांकि, Integrated Farming का मॉडल हर किसान के लिए एक जैसा नहीं हो सकता। इसे स्थानीय जलवायु, जमीन के आकार, पानी की उपलब्धता, बाजार की मांग, पूंजी और परिवार की श्रम क्षमता के अनुसार तैयार करना होगा।
किसानों को ऐसी व्यवस्था अपनाने से पहले तकनीकी सलाह, बाजार की जानकारी और लागत-लाभ का आकलन करना चाहिए। पशुपालन या मत्स्य पालन जैसी गतिविधियां शुरू करने के लिए आवश्यक प्रशिक्षण और आधारभूत सुविधाएं भी जरूरी हैं।
फसल विविधीकरण से घट सकता है जोखिम
केंद्रीय मंत्री ने कृषि में Diversification यानी फसल विविधीकरण की आवश्यकता पर भी जोर दिया। पारंपरिक रूप से कई क्षेत्रों में किसान सीमित फसलों पर निर्भर रहते हैं। इससे मिट्टी के स्वास्थ्य, भूजल संसाधनों और किसानों की आय पर दबाव बढ़ सकता है।
फसल विविधीकरण के अंतर्गत किसान स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार दलहन, तिलहन, फल, सब्जियां, मोटे अनाज और अन्य लाभकारी फसलों को शामिल कर सकते हैं। इससे कृषि प्रणाली में संतुलन बनाने और एक ही फसल पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है।
उदाहरण के लिए, जहां जलवायु और बाजार अनुकूल हों, वहां किसान गेहूं और धान के साथ दलहन या तिलहन की खेती पर विचार कर सकते हैं। सब्जियों और बागवानी फसलों से बेहतर आमदनी की संभावना हो सकती है, लेकिन इनके साथ कीमतों में उतार-चढ़ाव, जल्दी खराब होने और भंडारण की समस्याएं भी जुड़ी रहती हैं।
इसलिए फसल बदलने से पहले किसानों को स्थानीय बाजार, उपलब्ध खरीदारों, भंडारण और परिवहन की सुविधाओं का आकलन करना चाहिए। केवल अधिक कीमत मिलने की संभावना के आधार पर बड़े पैमाने पर नई फसल अपनाना जोखिमपूर्ण हो सकता है।
कृषि विभाग, कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) और वैज्ञानिक संस्थान किसानों को स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार उपयुक्त फसल प्रणाली चुनने में मदद कर सकते हैं। इससे Diversification को अधिक व्यावहारिक और टिकाऊ बनाया जा सकता है।
खेती में AI, मशीन लर्निंग और रोबोटिक्स की बढ़ेगी भूमिका
श्री चौहान ने कृषि क्षेत्र में आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल की आवश्यकता पर भी जोर दिया। उन्होंने Artificial Intelligence (AI), Machine Learning और Robotics जैसी तकनीकों को खेती से जोड़ने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ने की बात कही।
आज कृषि क्षेत्र में तकनीक का उपयोग मौसम की जानकारी, कीट एवं रोगों की पहचान, सिंचाई प्रबंधन, मिट्टी के विश्लेषण, फसल निगरानी और उपज के अनुमान जैसे कार्यों में किया जा सकता है। डिजिटल टूल्स की मदद से किसानों को समय पर जानकारी मिलने पर वे खेती से जुड़े निर्णय अधिक बेहतर तरीके से ले सकते हैं।
उदाहरण के तौर पर, मौसम संबंधी पूर्वानुमान किसानों को बुवाई, सिंचाई और फसल कटाई की योजना बनाने में मदद कर सकता है। AI आधारित Image Recognition सिस्टम कुछ परिस्थितियों में पत्तियों पर दिखाई देने वाले रोगों या कीटों के लक्षणों की पहचान करने में उपयोगी हो सकते हैं। सेंसर आधारित सिंचाई व्यवस्था से पानी का उपयोग अधिक सटीक तरीके से किया जा सकता है।
कृषि ड्रोन का इस्तेमाल फसल निगरानी, खेतों की मैपिंग और निर्धारित मानकों के तहत छिड़काव जैसे कार्यों में किया जा सकता है। वहीं, Robotics और Automation भविष्य में श्रम की कमी से प्रभावित कृषि कार्यों में सहायक हो सकते हैं।
लेकिन तकनीक का लाभ सभी किसानों तक पहुंचाने के लिए कुछ चुनौतियों का समाधान भी जरूरी है। महंगे उपकरण, डिजिटल साक्षरता की कमी, इंटरनेट कनेक्टिविटी, तकनीकी प्रशिक्षण और छोटे खेतों में मशीनों के किफायती इस्तेमाल जैसे मुद्दे महत्वपूर्ण हैं।
Custom Hiring Centres, किसान उत्पादक संगठन और सहकारी मॉडल के माध्यम से छोटे किसानों को आधुनिक मशीनों तक पहुंच उपलब्ध कराई जा सकती है। इससे हर किसान को महंगे उपकरण खरीदने की जरूरत नहीं होगी और तकनीक की लागत साझा करने का अवसर मिलेगा।
प्राकृतिक खेती और सहायक कृषि गतिविधियों की अहमियत
केंद्रीय मंत्री ने किसानों की आजीविका को मजबूत करने के लिए प्राकृतिक खेती और विभिन्न कृषि आधारित गतिविधियों को जोड़ने पर भी जोर दिया। प्राकृतिक खेती में स्थानीय संसाधनों के उपयोग, मिट्टी की जैविक गतिविधियों को बढ़ावा देने और कृषि प्रणाली को अधिक टिकाऊ बनाने पर ध्यान दिया जाता है।
हालांकि, प्राकृतिक खेती या किसी अन्य वैकल्पिक कृषि पद्धति को अपनाते समय किसानों को स्थानीय परिस्थितियों, फसल की जरूरतों और उत्पादन लागत का ध्यान रखना चाहिए। शुरुआती चरण में प्रशिक्षण, खेत स्तर पर प्रयोग और वैज्ञानिक सलाह महत्वपूर्ण हो सकती है।
मधुमक्खी पालन, मत्स्य पालन, डेयरी और औषधीय पौधों की खेती जैसी गतिविधियां भी किसानों के लिए अतिरिक्त आय के अवसर पैदा कर सकती हैं। मधुमक्खी पालन से शहद और अन्य उत्पादों की बिक्री के साथ परागण में मदद मिल सकती है। मत्स्य पालन उन क्षेत्रों में उपयोगी हो सकता है, जहां पानी और बाजार की उपयुक्त व्यवस्था उपलब्ध हो। इसी तरह डेयरी किसानों को नियमित आय का स्रोत उपलब्ध करा सकती है।
इन गतिविधियों की सफलता के लिए केवल उत्पादन बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। प्रशिक्षण, पशु स्वास्थ्य सेवाएं, गुणवत्तापूर्ण इनपुट, ऋण, बीमा, प्रसंस्करण और बाजार तक पहुंच भी आवश्यक हैं। किसानों को उत्पादों की बिक्री के लिए संगठित बाजार उपलब्ध कराने पर विशेष ध्यान देना होगा।
‘आप मंथन से अमृत निकालिए, हम लागू करेंगे‘
एग्रीविज़न के 10वें राष्ट्रीय अधिवेशन में केंद्रीय मंत्री ने कृषि क्षेत्र की नीतियों के निर्माण में विद्यार्थियों, वैज्ञानिकों और किसान संगठनों की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने प्रतिभागियों से कहा कि वे राष्ट्रीय अधिवेशन में गहन मंथन करें और ऐसे निष्कर्ष सामने लाएं, जिन्हें देशहित में लागू किया जा सके।
उन्होंने भरोसा दिलाया कि सरकार सम्मेलन में सामने आने वाले सुझावों पर गंभीरता से विचार करेगी। इसके लिए अगले 15 दिनों से एक महीने के भीतर संबंधित प्रतिनिधियों के साथ दोबारा बैठक करने और Short-Term तथा Long-Term योजनाओं पर काम करने की बात कही।
यह पहल कृषि क्षेत्र की नीतियों को जमीनी जरूरतों से जोड़ने के लिहाज से महत्वपूर्ण हो सकती है। कृषि से जुड़े मुद्दे अलग-अलग राज्यों, जलवायु क्षेत्रों और किसानों की आर्थिक परिस्थितियों के अनुसार बदलते हैं। इसलिए नीति निर्माण में स्थानीय अनुभवों, वैज्ञानिक शोध और किसानों की समस्याओं को शामिल करना आवश्यक है।
शॉर्ट टर्म योजनाओं के अंतर्गत तत्काल समाधान योग्य समस्याओं, कृषि शिक्षा के नियमन, प्रशिक्षण और तकनीकी जानकारी की उपलब्धता जैसे मुद्दों पर काम किया जा सकता है। वहीं, लॉन्ग टर्म रणनीति में कृषि अनुसंधान, जलवायु अनुकूल खेती, भंडारण, प्रसंस्करण, निर्यात और कृषि शिक्षा के संस्थागत विकास जैसे विषय महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
हालांकि, इन क्षेत्रों में ठोस बदलाव के लिए स्पष्ट लक्ष्य, समयसीमा, जिम्मेदार संस्थाएं और नियमित समीक्षा की व्यवस्था जरूरी होगी। सम्मेलन से निकलने वाले सुझावों को प्रभावी परिणामों में बदलने के लिए उनके क्रियान्वयन की निगरानी भी महत्वपूर्ण रहेगी।
एग्रीविज़न के 10 वर्षों के सफर पर विशेष पुस्तिका का विमोचन
कार्यक्रम के दौरान केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने एग्रीविज़न के दस वर्षों के सफर पर आधारित विशेष पुस्तिका का विमोचन भी किया। राष्ट्रीय अधिवेशन में देश के विभिन्न हिस्सों से आए कृषि वैज्ञानिकों, शोधार्थियों और छात्र-छात्राओं ने भाग लिया।
कृषि शिक्षा, शोध और किसानों की आजीविका से जुड़े विषयों पर आयोजित इस सम्मेलन में कृषि क्षेत्र के भविष्य को लेकर विचार-विमर्श किया गया। कृषि शिक्षा की गुणवत्ता, छोटे किसानों की आर्थिक स्थिति, तकनीकी नवाचार और भारत की वैश्विक कृषि भूमिका जैसे मुद्दे इस चर्चा के केंद्र में रहे।
भारत के कृषि क्षेत्र के सामने एक ओर बढ़ती खाद्य मांग को पूरा करने की जिम्मेदारी है, तो दूसरी ओर किसानों की आय, प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियां भी हैं। ऐसे में कृषि उत्पादन में बढ़ोतरी के साथ-साथ किसानों को बाजार से जोड़ना, शिक्षा की गुणवत्ता सुधारना और तकनीक को खेतों तक पहुंचाना जरूरी है।
केंद्रीय मंत्री के संबोधन से यह स्पष्ट हुआ कि सरकार कृषि क्षेत्र को केवल उत्पादन बढ़ाने के नजरिए से नहीं, बल्कि शिक्षा, रोजगार, तकनीक, किसान आय और वैश्विक प्रतिस्पर्धा से जोड़कर आगे बढ़ाने पर जोर दे रही है।
किसानों और कृषि युवाओं के लिए क्या हैं इसके मायने?
एग्रीविज़न के राष्ट्रीय अधिवेशन में सामने आए मुद्दों का महत्व कृषि विद्यार्थियों और किसानों, दोनों के लिए है। कृषि शिक्षा में बेहतर नियमन लागू होने से विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिलने की संभावनाएं मजबूत हो सकती हैं। वहीं, कृषि तकनीक और Integrated Farming पर जोर छोटे किसानों को आय के नए स्रोत तलाशने के लिए प्रेरित कर सकता है।
किसानों के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि खेती की योजना स्थानीय संसाधनों और बाजार की वास्तविक परिस्थितियों के आधार पर बनाई जाए। फसल विविधीकरण, पशुपालन, मधुमक्खी पालन या मत्स्य पालन जैसी गतिविधियां अपनाने से पहले उनकी लागत, संभावित आय और जोखिम का आकलन जरूरी है।
दूसरी ओर, कृषि स्नातकों के लिए उभरती तकनीकों और कृषि व्यवसाय से जुड़े कौशल विकसित करना उपयोगी हो सकता है। AI, डिजिटल कृषि, कृषि मशीनरी, खाद्य प्रसंस्करण और Supply Chain Management जैसे क्षेत्रों में प्रशिक्षण से नए अवसरों के रास्ते खुल सकते हैं।
कुल मिलाकर, भारत को दुनिया का Food Basket बनाने का लक्ष्य तभी टिकाऊ साबित होगा, जब कृषि उत्पादन में बढ़ोतरी का लाभ किसानों तक पहुंचे, कृषि शिक्षा की गुणवत्ता सुनिश्चित हो और आधुनिक तकनीक छोटे तथा सीमांत किसानों के लिए भी सुलभ बने। एग्रीविज़न के 10वें राष्ट्रीय अधिवेशन में केंद्रीय मंत्री द्वारा दिए गए संदेश का मुख्य सार यही है कि कृषि का भविष्य उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ किसानों की आय, युवाओं के रोजगार और कृषि व्यवस्था की दीर्घकालिक मजबूती से जुड़ा है।
