भारत के उर्वरक क्षेत्र पर वित्त वर्ष 2026-27 में सब्सिडी का बोझ काफी बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। DAP, सल्फर, प्राकृतिक गैस और आयात लागत में बढ़ोतरी के कारण चालू वित्त वर्ष में सरकार का उर्वरक सब्सिडी बिल करीब ₹3 लाख करोड़ तक पहुंच सकता है। यह अनुमान उस बजट प्रावधान से काफी अधिक है, जिसमें उर्वरक सब्सिडी के लिए करीब ₹1.7 लाख करोड़ का प्रावधान किया गया था।
उर्वरक सब्सिडी में संभावित बढ़ोतरी का सबसे बड़ा असर फॉस्फेटिक और पोटाशिक उर्वरकों की लागत पर पड़ रहा है। DAP की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में तेजी और इसके प्रमुख कच्चे माल में शामिल सल्फर की बढ़ती कीमतों ने कंपनियों की लागत बढ़ाई है। इसके साथ ही प्राकृतिक गैस और आयात से जुड़ी लागत में बदलाव ने भी उर्वरक क्षेत्र पर दबाव बढ़ाया है।
भारत में किसानों को उर्वरक अपेक्षाकृत नियंत्रित कीमतों पर उपलब्ध कराने के लिए सरकार बड़ी मात्रा में सब्सिडी देती है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें बढ़ने पर किसानों पर पूरा बोझ डालने के बजाय सरकार और उर्वरक कंपनियों के बीच लागत का संतुलन सब्सिडी के जरिए किया जाता है। ऐसे में वैश्विक कीमतों में तेज वृद्धि का सीधा असर सरकारी खर्च पर पड़ सकता है।
बजट अनुमान से काफी ज्यादा हो सकता है खर्च
वित्त वर्ष 2026-27 के लिए उर्वरक सब्सिडी का बजट अनुमान करीब ₹1.7 लाख करोड़ रखा गया था। लेकिन मौजूदा लागत दबाव को देखते हुए वास्तविक खर्च इस स्तर से काफी ऊपर जाने की आशंका है।
यदि सब्सिडी बिल करीब ₹3 लाख करोड़ तक पहुंचता है तो यह बजट अनुमान से लगभग ₹1.3 लाख करोड़ अधिक होगा। इसका मतलब है कि सरकार को मौजूदा बजट प्रावधान के मुकाबले अतिरिक्त संसाधनों की जरूरत पड़ सकती है।
उर्वरक सब्सिडी में इतनी बड़ी वृद्धि सरकार के राजकोषीय प्रबंधन के लिए भी चुनौती बन सकती है। एक तरफ किसानों को सस्ती दर पर खाद उपलब्ध कराना जरूरी है, वहीं दूसरी ओर बढ़ते सब्सिडी खर्च का असर सरकारी वित्त पर पड़ता है।
DAP की कीमत बनी बड़ी चिंता
DAP उर्वरक सब्सिडी पर बढ़ते दबाव का एक प्रमुख कारण है। भारत अपनी DAP जरूरत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में DAP की कीमत बढ़ने पर घरेलू आपूर्ति की लागत भी बढ़ जाती है।
यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में DAP महंगा होता है और घरेलू स्तर पर किसानों के लिए इसकी कीमत में उसी अनुपात में बढ़ोतरी नहीं की जाती, तो लागत का बड़ा हिस्सा सब्सिडी व्यवस्था पर आ सकता है।
रबी सीजन से पहले DAP की उपलब्धता को लेकर स्टॉक की स्थिति बेहतर बताई जा रही है, लेकिन कीमतों का दबाव अलग चुनौती है। यानी खाद का भौतिक स्टॉक मजबूत होने के बावजूद उसकी लागत सरकार और कंपनियों के लिए चिंता का विषय बनी हुई है।
सल्फर की कीमत ने बढ़ाया दबाव
DAP और अन्य फॉस्फेटिक उर्वरकों के उत्पादन में सल्फर महत्वपूर्ण कच्चा माल है। ऐसे में सल्फर की कीमत में बढ़ोतरी का असर पूरी उत्पादन लागत पर पड़ता है।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में सल्फर महंगा होने पर उर्वरक कंपनियों की लागत बढ़ती है। यदि तैयार उर्वरक की कीमत किसानों के लिए नियंत्रित रखी जाती है, तो इस अतिरिक्त लागत की भरपाई सब्सिडी व्यवस्था के माध्यम से करनी पड़ सकती है।
यही वजह है कि DAP के साथ सल्फर की कीमतों में तेजी को उर्वरक सब्सिडी पर बढ़ते दबाव के प्रमुख कारणों में गिना जा रहा है।
प्राकृतिक गैस की लागत भी महत्वपूर्ण
उर्वरक क्षेत्र में प्राकृतिक गैस की कीमत भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। खासकर यूरिया उत्पादन की लागत गैस की कीमत से प्रभावित होती है। भारत में बड़ी मात्रा में यूरिया घरेलू उत्पादन के साथ-साथ आयात के जरिए भी उपलब्ध कराया जाता है।
गैस की लागत, उत्पादन लागत और आयात लागत में बदलाव होने पर सरकार के उर्वरक सब्सिडी खर्च पर असर पड़ता है। इसलिए DAP और सल्फर के साथ गैस की कीमतों को भी उर्वरक क्षेत्र की कुल लागत के संदर्भ में देखा जा रहा है।
यदि कई लागत घटक एक साथ महंगे होते हैं, तो सरकार के लिए मौजूदा बजट अनुमान के भीतर उर्वरक सब्सिडी का प्रबंधन करना और मुश्किल हो जाता है।
किसानों पर सीधा बोझ डालना आसान नहीं
भारत में उर्वरक नीति का एक प्रमुख उद्देश्य किसानों को खेती के लिए जरूरी खाद उचित कीमत पर उपलब्ध कराना है। कृषि लागत पहले से ही किसानों की आय और लाभ पर असर डालती है। ऐसे में उर्वरक की कीमत में अचानक बड़ी वृद्धि खेती की लागत को और बढ़ा सकती है।
यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें बढ़ने के बावजूद सरकार किसानों के लिए उर्वरकों की कीमत को नियंत्रित रखने की कोशिश करती है। लेकिन इसका दूसरा पक्ष यह है कि जब वैश्विक कीमत और घरेलू कीमत के बीच अंतर बढ़ता है तो सब्सिडी की जरूरत भी बढ़ जाती है।
इस स्थिति में सरकार के सामने किसानों को राहत देने और सब्सिडी खर्च को नियंत्रित रखने के बीच संतुलन बनाने की चुनौती रहती है।
₹3 लाख करोड़ का बिल क्यों महत्वपूर्ण है?
यदि उर्वरक सब्सिडी बिल वास्तव में ₹3 लाख करोड़ के करीब पहुंचता है तो यह सरकार के लिए सामान्य बजट अनुमान की तुलना में काफी बड़ा अतिरिक्त वित्तीय बोझ होगा।
करीब ₹1.7 लाख करोड़ के बजट अनुमान के मुकाबले ₹3 लाख करोड़ का संभावित खर्च लगभग 1.8 गुना है। इतनी बड़ी वृद्धि का मतलब है कि वैश्विक उर्वरक बाजार में कीमतों का असर भारत के सरकारी वित्त पर भी दिखाई दे रहा है।
हालांकि अंतिम सब्सिडी खर्च कई कारकों पर निर्भर करेगा। अंतरराष्ट्रीय DAP और सल्फर की कीमतें आगे किस दिशा में जाती हैं, आयात लागत कैसी रहती है, प्राकृतिक गैस की कीमतों में क्या बदलाव होता है और घरेलू उर्वरक कंपनियों की लागत किस स्तर पर रहती है—इन सभी का असर अंतिम बिल पर पड़ेगा।
आयात पर निर्भरता भी चुनौती
भारत की उर्वरक जरूरतों को पूरा करने में आयात की महत्वपूर्ण भूमिका है। खासकर फॉस्फेटिक उर्वरकों के मामले में अंतरराष्ट्रीय बाजार की स्थिति घरेलू कीमत और उपलब्धता दोनों को प्रभावित करती है।
जब वैश्विक बाजार में कीमतें बढ़ती हैं, तब भारतीय कंपनियों के लिए आयात महंगा हो जाता है। किसानों के लिए कीमतों को नियंत्रित रखने की स्थिति में अतिरिक्त लागत का दबाव सरकार की सब्सिडी व्यवस्था पर आता है।
इसलिए लंबे समय में घरेलू उत्पादन क्षमता बढ़ाना, कच्चे माल की सुरक्षित आपूर्ति सुनिश्चित करना और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों के उतार-चढ़ाव से जोखिम कम करना महत्वपूर्ण होगा।
सरकार के सामने दोहरी चुनौती
वित्त वर्ष 2026-27 में उर्वरक सब्सिडी का संभावित बढ़ता बोझ सरकार के सामने दोहरी चुनौती खड़ी करता है। पहली चुनौती किसानों को पर्याप्त मात्रा में DAP, यूरिया और अन्य उर्वरक उचित कीमत पर उपलब्ध कराना है। दूसरी चुनौती बढ़ते सब्सिडी खर्च को सरकारी वित्तीय सीमा के भीतर रखना है।
रबी सीजन की शुरुआत में DAP का स्टॉक बेहतर होने से तत्काल उपलब्धता को लेकर राहत जरूर मिली है, लेकिन कीमतों का दबाव बना हुआ है। यदि अंतरराष्ट्रीय कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहती हैं तो सब्सिडी की जरूरत भी बढ़ सकती है।
कुल मिलाकर, DAP और सल्फर की कीमतों में तेजी, प्राकृतिक गैस की लागत तथा आयात खर्च में बढ़ोतरी ने भारत के उर्वरक सब्सिडी बिल पर दबाव बढ़ा दिया है। करीब ₹1.7 लाख करोड़ के बजट अनुमान के मुकाबले खर्च ₹3 लाख करोड़ के आसपास पहुंचने का संभावित जोखिम सरकार के लिए गंभीर वित्तीय चुनौती है।
आने वाले महीनों में अंतरराष्ट्रीय उर्वरक बाजार की दिशा इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण होगी। यदि DAP और कच्चे माल की कीमतों में नरमी आती है तो सब्सिडी दबाव कुछ कम हो सकता है। लेकिन कीमतें ऊंची बनी रहती हैं तो सरकार को अतिरिक्त बजटीय प्रावधान और किसानों के लिए खाद की कीमत तथा उपलब्धता के बीच संतुलन पर ज्यादा ध्यान देना होगा।
