वैश्विक बाजार में उर्वरकों और तरलीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) की ऊंची कीमतों का असर भारत के उर्वरक सब्सिडी बजट पर दिखाई देने लगा है। चालू वित्त वर्ष में सरकार अब तक उर्वरक सब्सिडी पर 1.32 लाख करोड़ रुपये से अधिक खर्च कर चुकी है। यह पूरे वित्त वर्ष के लिए निर्धारित 1.71 लाख करोड़ रुपये के बजट का लगभग 77 प्रतिशत है। वित्त वर्ष समाप्त होने में अभी समय बाकी है, ऐसे में सब्सिडी का कुल खर्च बजट अनुमान से काफी अधिक होने की आशंका है।
उर्वरक मंत्रालय के पुनर्विनियोजन आदेश के बाद चालू वित्त वर्ष के लिए सब्सिडी की अनुमानित जरूरत बढ़कर 1.94 लाख करोड़ रुपये हो गई है। हालांकि, उपलब्ध आकलन के मुताबिक यह राशि भी आगे बढ़ सकती है। अधिकारियों और मामले से जुड़े सूत्रों के अनुसार, उर्वरक सब्सिडी पर कुल खर्च वित्त वर्ष 2022-23 के 2.52 लाख करोड़ रुपये के रिकॉर्ड स्तर को भी पार कर सकता है।
यूरिया पर सबसे ज्यादा खर्च
भारत में यूरिया सबसे अधिक इस्तेमाल किया जाने वाला रासायनिक उर्वरक है। इसलिए इसकी घरेलू उत्पादन लागत और आयात कीमतों में होने वाले बदलाव का सीधा असर सरकार के सब्सिडी खर्च पर पड़ता है।
चालू वित्त वर्ष में अब तक किए गए कुल उर्वरक सब्सिडी खर्च में से 92,251 करोड़ रुपये यूरिया के आयात और घरेलू उत्पादन पर खर्च किए गए हैं। इसके अलावा, डाई-अमोनियम फॉस्फेट (DAP), म्यूरेट ऑफ पोटाश (MoP) और एनपीके जैसे उर्वरकों के आयात तथा घरेलू उत्पादन के लिए करीब 36,000 करोड़ रुपये की सब्सिडी दी गई है। राज्यों के प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) संबंधी दावों के लिए भी विभाग ने 6,200 करोड़ रुपये मंजूर किए हैं।
वित्त वर्ष 2026-27 की पहली छमाही में सब्सिडी खर्च का बड़ा हिस्सा सामने आया। अप्रैल से जून के दौरान सरकार ने 66,634 करोड़ रुपये खर्च किए, जबकि जुलाई से सितंबर के बीच 59,200 करोड़ रुपये की सब्सिडी का खर्च दर्ज किया गया। इन दोनों तिमाहियों का कुल खर्च 1,25,834 करोड़ रुपये रहा।
यूरिया की वैश्विक कीमतों में आई गिरावट
अंतरराष्ट्रीय बाजार में यूरिया की कीमतों में मई 2026 के उच्च स्तर के बाद गिरावट दर्ज की गई है। आपूर्ति में सुधार और आयात के स्रोतों में विविधता आने से यूरिया की भारत में पहुंच लागत घटकर सितंबर में लगभग 392 डॉलर प्रति टन रह गई। मई में यह कीमत 947 डॉलर प्रति टन के शिखर पर पहुंच गई थी।
इस तरह मई के उच्च स्तर की तुलना में यूरिया की पहुंच लागत में लगभग 59 प्रतिशत की कमी आई है। उर्वरक विभाग के आंकड़ों के अनुसार, सितंबर में यूरिया की वैश्विक कीमत पिछले वर्ष के इसी महीने की तुलना में 15 प्रतिशत से अधिक नीचे रही।
हालांकि, अंतरराष्ट्रीय कीमतों में गिरावट से सरकार को कुछ राहत मिल सकती है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि सब्सिडी का कुल खर्च भी उसी अनुपात में घट जाएगा। यूरिया की घरेलू मांग, आयात की मात्रा, उत्पादन लागत और प्राकृतिक गैस की कीमतें भी सब्सिडी की जरूरत को प्रभावित करती हैं।
DAP और पोटाश की कीमतें अब भी चिंता का विषय
यूरिया की कीमतों में गिरावट के विपरीत, डीएपी की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में तेजी देखी गई है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, डीएपी की कीमत अप्रैल 2026 में 853 डॉलर प्रति टन थी, जो सितंबर में बढ़कर 906 डॉलर प्रति टन हो गई। व्यापारिक सूत्रों के मुताबिक, सितंबर 2025 के 799 डॉलर प्रति टन के स्तर से तुलना करने पर इसमें लगभग 13 प्रतिशत की वृद्धि हुई।
पश्चिम एशिया में संघर्ष और माल ढुलाई की लागत बढ़ने से डीएपी की अंतरराष्ट्रीय कीमतों पर दबाव पड़ा है। भारत अपनी उर्वरक जरूरतों और कच्चे माल का बड़ा हिस्सा आयात करता है। इसलिए वैश्विक बाजार में कीमतों और परिवहन लागत में होने वाले बदलाव का असर देश की उर्वरक आपूर्ति और सरकारी सब्सिडी पर पड़ता है।
सल्फर की कीमतों में भी भारी उछाल दर्ज किया गया है। डीएपी और सिंगल सुपर फॉस्फेट (SSP) सहित कई उर्वरकों के निर्माण में सल्फर का इस्तेमाल होता है। सितंबर में इसकी वैश्विक कीमत बढ़कर 1,030 डॉलर प्रति टन पहुंच गई, जो पिछले वर्ष के इसी महीने की तुलना में 213 प्रतिशत अधिक थी। वैश्विक संघर्षों और आपूर्ति संबंधी समस्याओं ने इसकी कीमतों में तेजी को बढ़ावा दिया।
इसी अवधि में म्यूरेट ऑफ पोटाश की कीमत भी सालाना आधार पर 9 प्रतिशत बढ़कर 383 डॉलर प्रति टन हो गई। इन कीमतों से स्पष्ट है कि उर्वरक बाजार में सभी उत्पादों की स्थिति एक जैसी नहीं है। यूरिया सस्ता हुआ है, लेकिन डीएपी, पोटाश और सल्फर की ऊंची कीमतें सब्सिडी के बोझ को बनाए रख सकती हैं।
पिछले वित्त वर्ष में भी बढ़ा था खर्च
वित्त वर्ष 2025-26 में केंद्र सरकार का उर्वरक सब्सिडी खर्च 2.17 लाख करोड़ रुपये रहा। इसमें यूरिया सब्सिडी के रूप में 1.42 लाख करोड़ रुपये और पोषक तत्व आधारित सब्सिडी (NBS) के तहत 74,999 करोड़ रुपये खर्च किए गए।
यह राशि 1.86 लाख करोड़ रुपये के संशोधित अनुमान से लगभग 17 प्रतिशत अधिक थी। अधिकारियों के अनुसार, मार्च 2026 से उर्वरक कीमतों में हुई वृद्धि ने सरकारी खर्च को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
लगातार दो वित्त वर्षों में सब्सिडी पर बढ़ता खर्च केंद्र सरकार के लिए चुनौती बन रहा है। यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें ऊंची बनी रहती हैं और आयात पर निर्भरता कम नहीं होती, तो आगामी महीनों में बजट पर दबाव और बढ़ सकता है।
LNG की कीमतों का घरेलू उत्पादन पर असर
भारत में यूरिया उत्पादन काफी हद तक प्राकृतिक गैस पर निर्भर करता है। घरेलू यूरिया संयंत्रों में गैस का इस्तेमाल उत्पादन प्रक्रिया में किया जाता है। ऐसे में LNG यानी तरलीकृत प्राकृतिक गैस की कीमतों में बढ़ोतरी से यूरिया उत्पादन की लागत प्रभावित होती है।
खाड़ी क्षेत्र में संकट के बाद गैस की कीमतों में वृद्धि ने इस चुनौती को और गंभीर बनाया है। भारत ने पिछले वित्त वर्ष में लगभग एक करोड़ टन यूरिया आयात किया था। इससे घरेलू उत्पादन के बावजूद आयात की महत्वपूर्ण भूमिका स्पष्ट होती है।
वित्त वर्ष 2025-26 में देश में कुल उर्वरक खपत लगभग 7 करोड़ टन रही, जिसमें यूरिया की खपत करीब 4 करोड़ टन थी। इतनी बड़ी मांग को पूरा करने के लिए घरेलू उत्पादन और विदेशी आपूर्ति दोनों जरूरी हैं। यदि गैस महंगी रहती है, तो घरेलू उत्पादन की लागत पर दबाव बना रह सकता है। वहीं, वैश्विक बाजार में तैयार उर्वरकों की कीमतें बढ़ने से आयात बिल भी बढ़ सकता है।
किसानों के लिए कीमतें स्थिर, सरकार पर बोझ ज्यादा
वैश्विक बाजार में उर्वरकों की कीमतों में उतार-चढ़ाव के बावजूद सरकार ने किसानों के लिए यूरिया और डीएपी की खुदरा कीमतें नियंत्रित रखी हैं। यूरिया का 45 किलोग्राम का बैग मार्च 2018 में तय 266.50 रुपये की कीमत पर बेचा जा रहा है। दूसरी ओर, डीएपी के 50 किलोग्राम के बैग की खुदरा कीमत 1,350 रुपये बनी हुई है।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में उर्वरकों की कीमतें इन घरेलू दरों से काफी अधिक हो सकती हैं। ऐसे में किसानों को अपेक्षाकृत कम कीमत पर उर्वरक उपलब्ध कराने और आयात तथा उत्पादन की लागत के बीच अंतर को पूरा करने में सरकारी सब्सिडी की महत्वपूर्ण भूमिका है।
भारत अपनी उर्वरक जरूरतों और कच्चे माल का लगभग 70 प्रतिशत आयात करता है। डीएपी और एनपीके जैसे उर्वरकों की आपूर्ति के लिए रूस, मोरक्को, मिस्र, अमेरिका, जॉर्डन, दक्षिण कोरिया, ट्यूनीशिया और सऊदी अरब जैसे देशों से खरीद की जाती है। लाल सागर के रास्ते होने वाला परिवहन भी अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति व्यवस्था का हिस्सा है।
आगे क्या होगी चुनौती?
उर्वरक सब्सिडी का बढ़ता खर्च सरकार के लिए दोहरी चुनौती पेश करता है। एक ओर किसानों को सस्ती खाद उपलब्ध कराना जरूरी है, वहीं दूसरी ओर अंतरराष्ट्रीय कीमतों, गैस की लागत और आयात पर निर्भरता के कारण सरकारी व्यय लगातार बढ़ रहा है।
यूरिया की कीमतों में आई गिरावट से कुछ राहत जरूर मिल सकती है, लेकिन डीएपी, पोटाश और सल्फर की महंगाई के साथ घरेलू उत्पादन में इस्तेमाल होने वाली गैस की लागत पर भी नजर रखनी होगी। यदि कीमतों में स्थायी राहत नहीं मिलती, तो वित्त वर्ष 2026-27 में सब्सिडी खर्च पिछले रिकॉर्ड को पार कर सकता है।
आने वाले समय में उर्वरक आपूर्ति के विविध स्रोत विकसित करना, घरेलू उत्पादन की क्षमता मजबूत करना और पोषक तत्वों का संतुलित इस्तेमाल बढ़ाना महत्वपूर्ण होगा। किसानों को समय पर उचित मात्रा में खाद उपलब्ध कराना कृषि उत्पादन के लिए जरूरी है। इसके साथ ही उर्वरक सब्सिडी को वित्तीय रूप से टिकाऊ बनाए रखना भी सरकार के सामने बड़ी प्राथमिकता बनी रहेगी।
