WHO की अंतरराष्ट्रीय हर्बल फार्माकोपिया बैठक में भारत की मजबूत उपस्थिति, वैश्विक मानकों के निर्माण में निभा रहा अहम भूमिका

India's strong presence at WHO's International Herbal Pharmacopoeia meeting

पारंपरिक चिकित्सा और हर्बल औषधियों के क्षेत्र में भारत की बढ़ती वैश्विक प्रतिष्ठा को एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि मिली है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा आयोजित अंतरराष्ट्रीय हर्बल फार्माकोपिया (International Herbal Pharmacopoeia) के विकास संबंधी पांचवीं विशेषज्ञ बैठक में भारत सक्रिय रूप से भाग ले रहा है। यह महत्वपूर्ण बैठक 16 से 18 जून 2026 तक हांगकांग विशेष प्रशासनिक क्षेत्र (Hong Kong SAR), चीन में आयोजित की जा रही है, जिसमें विभिन्न देशों के विशेषज्ञ हर्बल औषधियों के वैश्विक मानकों पर विचार-विमर्श कर रहे हैं।

भारत सरकार के आयुष मंत्रालय के अंतर्गत कार्यरत भारतीय चिकित्सा एवं होम्योपैथी फार्माकोपिया आयोग (PCIM&H) इस बैठक में देश का प्रतिनिधित्व कर रहा है। बैठक का उद्देश्य विश्वभर में उपयोग होने वाली हर्बल औषधियों की गुणवत्ता, सुरक्षा, शुद्धता और प्रभावशीलता के लिए एक समान अंतरराष्ट्रीय मानक विकसित करना है, जिससे पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों को वैज्ञानिक और वैश्विक मान्यता मिल सके।

बैठक में भारत की ओर से पीसीआईएम एंड एच के निदेशक डॉ. रमन मोहन सिंह विशेषज्ञ सदस्य के रूप में भाग ले रहे हैं। उनके नेतृत्व में आयोग की एक तकनीकी टीम भी इस महत्वपूर्ण प्रक्रिया में योगदान दे रही है। इस टीम में डॉ. जयंती ए., डॉ. विजय गुप्ता, डॉ. अनुपम मौर्य, डॉ. वी. विजयकुमार तथा डॉ. निखिल जिरंकालगीकर शामिल हैं, जो वर्चुअल माध्यम से बैठक में भागीदारी कर रहे हैं।

बैठक के दौरान पीसीआईएम एंड एच द्वारा विकसित विभिन्न हर्बल मोनोग्राफ्स और तकनीकी दस्तावेजों को WHO विशेषज्ञों के समक्ष प्रस्तुत किया जा रहा है। इन दस्तावेजों का निर्माण विश्व स्वास्थ्य संगठन के विशेषज्ञों के साथ व्यापक परामर्श और वैज्ञानिक समीक्षा के बाद किया गया है। इन पर विस्तार से चर्चा कर उन्हें अंतरराष्ट्रीय हर्बल फार्माकोपिया का हिस्सा बनाने पर विचार किया जा रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह पहल आयुर्वेद, सिद्ध, यूनानी और अन्य पारंपरिक भारतीय चिकित्सा प्रणालियों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और अधिक मजबूत पहचान दिलाने में सहायक सिद्ध होगी। भारत लंबे समय से औषधीय पौधों और पारंपरिक चिकित्सा ज्ञान का वैश्विक केंद्र रहा है। ऐसे में WHO की इस पहल में भारतीय विशेषज्ञों की भागीदारी यह दर्शाती है कि दुनिया अब भारतीय चिकित्सा पद्धतियों की वैज्ञानिक विश्वसनीयता और उपयोगिता को गंभीरता से स्वीकार कर रही है।

हर्बल फार्माकोपिया किसी भी औषधीय पौधे या उससे तैयार दवा की गुणवत्ता, पहचान, शुद्धता और परीक्षण से संबंधित मानकों का आधिकारिक संकलन होता है। जब किसी औषधि के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृत मानक उपलब्ध होते हैं, तो उसका उत्पादन, निर्यात और चिकित्सीय उपयोग अधिक सुरक्षित और विश्वसनीय बन जाता है। इसी दिशा में WHO अंतरराष्ट्रीय हर्बल फार्माकोपिया विकसित कर रहा है, ताकि विभिन्न देशों में प्रचलित हर्बल औषधियों के लिए एक समान मानक स्थापित किए जा सकें।

भारत की भागीदारी विशेष रूप से इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि देश विश्व की सबसे प्राचीन और समृद्ध पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों में से एक आयुर्वेद का केंद्र है। आयुर्वेदिक औषधियों में उपयोग होने वाले हजारों औषधीय पौधों और उनके वैज्ञानिक मानकीकरण पर भारत ने पिछले कुछ वर्षों में उल्लेखनीय कार्य किया है। पीसीआईएम एंड एच द्वारा तैयार किए गए मोनोग्राफ्स इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि वैश्विक स्तर पर हर्बल औषधियों की मांग लगातार बढ़ रही है। कोविड-19 महामारी के बाद लोगों का रुझान प्राकृतिक और पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों की ओर और अधिक बढ़ा है। ऐसे में गुणवत्ता और सुरक्षा के अंतरराष्ट्रीय मानकों की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। WHO की यह पहल न केवल उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा करेगी बल्कि हर्बल उत्पादों के अंतरराष्ट्रीय व्यापार को भी बढ़ावा देगी।

आयुष मंत्रालय ने कहा है कि इस बैठक में भारत की सक्रिय भूमिका देश की उस प्रतिबद्धता को दर्शाती है, जिसके तहत पारंपरिक चिकित्सा को वैज्ञानिक आधार पर सशक्त बनाते हुए वैश्विक स्वास्थ्य व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया जा रहा है। भारत लगातार साक्ष्य-आधारित (Evidence-Based) चिकित्सा अनुसंधान को बढ़ावा दे रहा है ताकि पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों को आधुनिक वैज्ञानिक मानकों के अनुरूप स्थापित किया जा सके।

WHO विशेषज्ञ बैठक में भारतीय प्रतिनिधिमंडल द्वारा प्रस्तुत सुझाव और तकनीकी दस्तावेज भविष्य में अंतरराष्ट्रीय हर्बल फार्माकोपिया के स्वरूप को निर्धारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। इससे भारतीय औषधीय पौधों और आयुष आधारित उत्पादों को वैश्विक बाजार में अधिक स्वीकार्यता मिलने की संभावना भी बढ़ेगी।

कुल मिलाकर, हांगकांग में आयोजित यह बैठक भारत के लिए केवल एक अंतरराष्ट्रीय मंच पर भागीदारी भर नहीं है, बल्कि पारंपरिक चिकित्सा के क्षेत्र में वैश्विक नेतृत्व स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण अवसर भी है। भारत की सक्रिय उपस्थिति यह संदेश देती है कि देश न केवल अपनी समृद्ध चिकित्सा विरासत को संरक्षित कर रहा है, बल्कि उसे वैश्विक स्वास्थ्य प्रणाली के साथ जोड़कर मानव कल्याण के लिए नई संभावनाओं का मार्ग भी प्रशस्त कर रहा है।

 

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