उर्वरकों की कीमत बढ़ने से खेती की लागत सीधे प्रभावित होती है। यूरिया, डीएपी और एनपीके जैसे उर्वरक फसल उत्पादन के लिए जरूरी हैं, इसलिए इनके महंगे होने का असर किसानों की आय पर भी पड़ सकता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे माल की कीमत, आयात लागत, समुद्री भाड़ा और आपूर्ति में व्यवधान जैसे कारणों से उर्वरकों की लागत बढ़ सकती है। ऐसे में सरकार के सामने किसानों को उचित कीमत पर खाद उपलब्ध कराने की चुनौती होती है।
सरकार इस स्थिति से निपटने के लिए सब्सिडी बढ़ाने, आयात सुनिश्चित करने, घरेलू उत्पादन बढ़ाने और कालाबाजारी रोकने जैसे कदम उठा सकती है।
सब्सिडी बढ़ाकर किसानों को राहत
खाद महंगी होने पर सरकार का सबसे तत्काल उपाय सब्सिडी बढ़ाना हो सकता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत बढ़ने पर अतिरिक्त सहायता देकर किसानों पर उसका पूरा बोझ पड़ने से रोका जा सकता है।
खासकर डीएपी और अन्य फॉस्फेटिक-पोटाशिक उर्वरकों की कीमतें वैश्विक बाजार से काफी प्रभावित होती हैं। ऐसे में सरकार को लागत और किसानों के लिए तय कीमत के बीच संतुलन बनाने के लिए सब्सिडी व्यवस्था में बदलाव करना पड़ सकता है।
हालांकि, लंबे समय तक अधिक सब्सिडी देने से सरकारी खर्च बढ़ता है। इसलिए यह तत्काल राहत का उपाय तो हो सकता है, लेकिन स्थायी समाधान नहीं।
समय पर आयात जरूरी
भारत अपनी उर्वरक जरूरतों के एक हिस्से के लिए आयात पर निर्भर है। इसलिए घरेलू उत्पादन कम पड़ने पर समय पर आयात करना जरूरी हो जाता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत बढ़ने की आशंका हो तो सरकार कंपनियों को पहले से खरीद और दीर्घकालिक आपूर्ति समझौते करने के लिए प्रोत्साहित कर सकती है।
इससे अचानक पैदा होने वाली कमी से बचने और घरेलू बाजार में आपूर्ति बनाए रखने में मदद मिल सकती है।
घरेलू उत्पादन बढ़ाना
उर्वरकों की कीमत और आपूर्ति को स्थिर रखने का दीर्घकालीन उपाय घरेलू उत्पादन बढ़ाना है। यूरिया के उत्पादन में क्षमता विस्तार के साथ डीएपी और एनपीके जैसे उर्वरकों के घरेलू उत्पादन पर भी जोर देना होगा।
इसके लिए पुराने संयंत्रों का आधुनिकीकरण, नई उत्पादन इकाइयों में निवेश और आवश्यक कच्चे माल की उपलब्धता सुनिश्चित करना जरूरी है। घरेलू क्षमता बढ़ने से आयात पर निर्भरता घटेगी और वैश्विक बाजार में संकट आने पर देश के पास बेहतर विकल्प होंगे।
कच्चे माल की आपूर्ति सुरक्षित करना
उर्वरकों की कीमत केवल तैयार उत्पाद पर निर्भर नहीं होती। अमोनिया, सल्फर और फॉस्फेट जैसे कच्चे माल की कीमत बढ़ने से भी उत्पादन लागत बढ़ती है।
इसलिए सरकार को प्रमुख उत्पादक देशों के साथ दीर्घकालिक समझौते करने और आपूर्ति के स्रोतों में विविधता लाने पर ध्यान देना चाहिए। इससे किसी एक देश या बाजार पर अत्यधिक निर्भरता का जोखिम कम होगा।
जमाखोरी और कालाबाजारी पर कार्रवाई
खाद की कीमत बढ़ने के साथ यदि बाजार में कमी की धारणा बनती है तो जमाखोरी और कालाबाजारी की आशंका भी बढ़ सकती है। ऐसे में राज्यों को बिक्री केंद्रों पर स्टॉक और कीमतों की निगरानी बढ़ानी चाहिए।
डिजिटल रिकॉर्ड के जरिए यह पता लगाया जा सकता है कि किस जिले में कितनी खाद पहुंची और कितनी बिक चुकी है। निर्धारित कीमत से अधिक वसूली या अनधिकृत बिक्री की स्थिति में कार्रवाई की जा सकती है।
सीजन से पहले पर्याप्त स्टॉक
किसानों की मांग फसल सीजन के दौरान अचानक बढ़ जाती है। इसलिए सरकार को खरीफ और रबी सीजन से पहले मांग का आकलन कर पर्याप्त स्टॉक तैयार रखना चाहिए।
रेल और सड़क परिवहन के जरिए खाद को उन राज्यों और जिलों तक पहले पहुंचाना भी जरूरी है, जहां इसकी मांग अधिक रहने की संभावना हो। इससे किसी एक क्षेत्र में अचानक पैदा हुई कमी का असर कम किया जा सकता है।
संतुलित उर्वरक इस्तेमाल को बढ़ावा
महंगी खाद की समस्या का एक हिस्सा किसानों द्वारा उर्वरकों के असंतुलित इस्तेमाल से भी जुड़ा है। केवल अधिक मात्रा में एक ही उर्वरक का इस्तेमाल करने के बजाय फसल और मिट्टी की जरूरत के अनुसार पोषक तत्व देना अधिक प्रभावी हो सकता है।
मृदा परीक्षण, मृदा स्वास्थ्य कार्ड और कृषि विशेषज्ञों की सलाह के आधार पर उर्वरक इस्तेमाल को बढ़ावा देने से किसानों की लागत घटाने में मदद मिल सकती है। इससे उर्वरकों की अनावश्यक खपत पर भी नियंत्रण होगा।
किसानों को लक्षित सहायता
यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं, तो सरकार किसानों को लक्षित वित्तीय सहायता देने के विकल्प पर भी विचार कर सकती है। हालांकि इसके लिए लाभार्थियों की सही पहचान और पारदर्शी भुगतान व्यवस्था जरूरी होगी।
इस तरह की सहायता का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होना चाहिए कि बढ़ी हुई लागत का असर छोटे और सीमांत किसानों की खेती पर अधिक न पड़े।
राहत और आत्मनिर्भरता के बीच संतुलन
खाद महंगी होने पर सरकार के सामने दो स्तर की चुनौती होती है। एक ओर किसानों को तत्काल राहत देनी होती है, दूसरी ओर ऐसा तंत्र विकसित करना होता है जिससे भविष्य में अंतरराष्ट्रीय कीमतों का असर कम हो।
तत्काल राहत के लिए सब्सिडी, आयात और पर्याप्त स्टॉक महत्वपूर्ण हैं। वहीं दीर्घकालीन समाधान के लिए घरेलू उत्पादन, कच्चे माल की सुरक्षित आपूर्ति और संतुलित उर्वरक उपयोग पर ध्यान देना होगा।
निष्कर्षतः, खाद की कीमत बढ़ने पर सरकार के पास कई विकल्प हैं, लेकिन किसी एक उपाय से समस्या का स्थायी समाधान नहीं होगा। किसानों को राहत देने के साथ उत्पादन क्षमता बढ़ाना, आपूर्ति श्रृंखला मजबूत करना और बाजार में पारदर्शिता बनाए रखना जरूरी है। इससे न केवल खाद की उपलब्धता बेहतर होगी, बल्कि खेती की बढ़ती लागत को नियंत्रित करने में भी मदद मिलेगी।
