महंगी खाद की क्यों बढ़ी चिंता? DAP, सल्फर की कीमत और बढ़ता सब्सिडी बोझ समझिए

महंगी खाद की चिंता क्यों बढ़ रही है? जानिए DAP और सल्फर की बढ़ती कीमत, आयात निर्भरता और उर्वरक सब्सिडी पर बढ़ते सरकारी बोझ का पूरा कारण।

महंगी खाद की चिंता के बीच DAP और उर्वरक का स्टॉक

रबी सीजन 2026-27 की शुरुआत देश में अपेक्षाकृत बेहतर उर्वरक स्टॉक के साथ हुई है। यूरिया, DAP और दूसरे उर्वरकों की उपलब्धता पिछले साल की तुलना में बेहतर बताई जा रही है। इसके बावजूद उर्वरक क्षेत्र में महंगी खाद को लेकर चिंता बनी हुई है। इसकी वजह तत्काल खाद की कमी नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में उर्वरकों और उनके कच्चे माल की बढ़ती कीमत, आयात पर निर्भरता और सरकार पर बढ़ता सब्सिडी बोझ है।

भारत में किसानों को यूरिया और DAP जैसे प्रमुख उर्वरक नियंत्रित कीमत पर उपलब्ध कराए जाते हैं। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत बढ़ने का पूरा असर किसान तक नहीं पहुंचता। बढ़ी हुई लागत का बड़ा हिस्सा सरकार सब्सिडी के जरिए वहन करती है। यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में लगातार तेजी आने पर सरकार के उर्वरक सब्सिडी खर्च को लेकर चिंता बढ़ जाती है।

DAP की कीमतों ने बढ़ाई चिंता

रबी सीजन में DAP सबसे महत्वपूर्ण फॉस्फेट उर्वरकों में से एक है। गेहूं, सरसों, चना, मसूर और अन्य रबी फसलों की बुवाई के दौरान इसकी मांग बढ़ती है। 30 सितंबर 2026 तक देश में DAP का स्टॉक करीब 23.5 लाख टन बताया गया, जो पिछले साल की समान अवधि से लगभग 17 प्रतिशत ज्यादा है। इसका मतलब है कि सीजन की शुरुआत में उपलब्धता का आधार कमजोर नहीं है।

लेकिन DAP की उपलब्धता और उसकी लागत दो अलग-अलग मुद्दे हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में DAP की कीमत ऊंची रहने से भारत के लिए आयात महंगा होता है। भारत अपनी जरूरत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत बढ़ने पर घरेलू उर्वरक कंपनियों की लागत भी प्रभावित होती है।

यही वजह है कि पर्याप्त स्टॉक होने के बावजूद आगे की खरीद और आयात लागत को लेकर चिंता बनी हुई है।

सल्फर महंगा होने का असर

DAP और दूसरे फॉस्फेट आधारित उर्वरकों की लागत में कच्चे माल की कीमत की बड़ी भूमिका होती है। इनमें सल्फर महत्वपूर्ण कच्चा माल है। हाल के महीनों में अंतरराष्ट्रीय बाजार में सल्फर की कीमतों में तेज वृद्धि देखी गई है।

सल्फर महंगा होने का सीधा असर फॉस्फेट उर्वरकों के उत्पादन पर पड़ता है। भारत में DAP का उत्पादन करने वाली कंपनियों को कच्चे माल की ऊंची लागत का सामना करना पड़ता है। दूसरी तरफ तैयार DAP का आयात भी महंगा हो जाता है।

इस स्थिति में कंपनियों के सामने उत्पादन लागत और बिक्री मूल्य के बीच अंतर बढ़ने की संभावना रहती है। यदि घरेलू बाजार में कीमत को किसान के लिए सीमित रखा जाता है, तो इस अंतर को किसी न किसी रूप में सरकार की सहायता से पूरा करना पड़ता है।

किसान को नहीं दिखती पूरी अंतरराष्ट्रीय कीमत

उर्वरक बाजार में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अंतरराष्ट्रीय कीमत और किसान द्वारा चुकाई जाने वाली कीमत एक जैसी नहीं होती। सरकार किसानों को सस्ती खाद उपलब्ध कराने के लिए सब्सिडी देती है।

DAP के 50 किलोग्राम बैग का खुदरा मूल्य करीब 1,350 रुपये रखा गया है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में DAP और उसके कच्चे माल की कीमत बढ़ने के बावजूद किसानों पर पूरी बढ़ी हुई लागत डालना आसान नहीं है। इसलिए सरकार को कंपनियों की लागत और नियंत्रित बिक्री मूल्य के बीच अंतर को सब्सिडी के जरिए संभालना पड़ता है।

यही व्यवस्था किसानों को तत्काल महंगी खाद से बचाती है, लेकिन सरकार के वित्तीय बोझ को बढ़ाती है।

यूरिया में भी आयात लागत महत्वपूर्ण

महंगी खाद की चिंता सिर्फ DAP तक सीमित नहीं है। यूरिया के मामले में भी अंतरराष्ट्रीय बाजार की कीमत और गैस की लागत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। हालांकि हाल में यूरिया की अंतरराष्ट्रीय कीमत अपने ऊंचे स्तर से नीचे आई है, लेकिन वैश्विक बाजार में कीमतों का उतार-चढ़ाव जारी है।

भारत में यूरिया की कीमत किसानों के लिए लंबे समय से नियंत्रित है। उत्पादन और आयात की वास्तविक लागत इससे काफी अलग हो सकती है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत बढ़ने पर सरकार का सब्सिडी खर्च बढ़ता है।

यूरिया की कीमत में बदलाव का असर इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि देश में इसकी खपत बहुत अधिक है। थोड़ी सी अंतरराष्ट्रीय कीमत वृद्धि भी बड़ी मात्रा में खरीद होने के कारण सरकारी खर्च पर बड़ा असर डाल सकती है।

सब्सिडी का बोझ बढ़ने की आशंका

उर्वरक क्षेत्र में मौजूदा चिंता का सबसे बड़ा कारण बढ़ता सब्सिडी बिल है। वित्त वर्ष 2026-27 की पहली छमाही में ही उर्वरक सब्सिडी पर 1.14 लाख करोड़ रुपये से अधिक खर्च होने की जानकारी सामने आई है।

इसमें यूरिया सब्सिडी का हिस्सा सबसे बड़ा रहा है। DAP, MOP और NPK जैसे गैर-यूरिया उर्वरकों पर भी सरकार को बड़ी राशि खर्च करनी पड़ती है।

यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में DAP, सल्फर और दूसरे कच्चे माल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहती हैं, तो पूरे वित्त वर्ष का सब्सिडी खर्च शुरुआती बजट अनुमान से काफी ऊपर जा सकता है। कुछ आकलनों में चालू वित्त वर्ष में उर्वरक सब्सिडी का बिल 3 लाख करोड़ रुपये से अधिक पहुंचने की आशंका जताई गई है।

इसका अर्थ यह नहीं है कि किसानों के लिए खाद का खुदरा मूल्य तुरंत बढ़ जाएगा। इसका मुख्य असर सरकार के वित्तीय बोझ पर पड़ता है।

आयात पर निर्भरता बनी बड़ी चुनौती

भारत ने पिछले कुछ वर्षों में घरेलू उर्वरक उत्पादन बढ़ाने की दिशा में कदम उठाए हैं, लेकिन कई महत्वपूर्ण कच्चे माल और तैयार उर्वरकों के लिए आयात पर निर्भरता बनी हुई है।

DAP जैसे फॉस्फेट उर्वरकों के लिए फॉस्फोरिक एसिड, अमोनिया और सल्फर जैसे कच्चे माल की उपलब्धता और कीमत महत्वपूर्ण है। इनमें से किसी एक की कीमत बढ़ने पर पूरी उत्पादन लागत प्रभावित हो सकती है।

इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय बाजार में जहाजों की उपलब्धता, माल ढुलाई की लागत और किसी क्षेत्र में आपूर्ति बाधित होने जैसी परिस्थितियां भी भारत की आयात लागत को प्रभावित करती हैं।

वैश्विक घटनाओं का सीधा असर

उर्वरक बाजार अब केवल घरेलू उत्पादन और मांग से निर्धारित नहीं होता। रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया में तनाव, व्यापार प्रतिबंध, निर्यात नीतियों में बदलाव और समुद्री परिवहन से जुड़ी समस्याएं वैश्विक उर्वरक बाजार को प्रभावित कर सकती हैं।

किसी बड़े उर्वरक उत्पादक देश द्वारा निर्यात सीमित करने से अंतरराष्ट्रीय कीमत बढ़ सकती है। इसी तरह किसी महत्वपूर्ण कच्चे माल की आपूर्ति बाधित होने पर कीमतों में अचानक तेजी आ सकती है।

भारत जैसे बड़े कृषि देश के लिए ऐसी परिस्थितियां इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि रबी और खरीफ दोनों सीजन में उर्वरकों की मांग बहुत बड़ी होती है।

घरेलू उत्पादन बढ़ाना इसलिए जरूरी

महंगी खाद की समस्या का स्थायी समाधान केवल सब्सिडी बढ़ाना नहीं है। सरकार के सामने घरेलू उत्पादन और कच्चे माल की उपलब्धता बढ़ाने की चुनौती भी है।

घरेलू यूरिया उत्पादन बढ़ने से आयात पर निर्भरता कम की जा सकती है। इसी तरह DAP और NPK उत्पादन क्षमता बढ़ाने तथा फॉस्फेट और सल्फर जैसे कच्चे माल की सुरक्षित आपूर्ति सुनिश्चित करने से अंतरराष्ट्रीय बाजार के झटकों का असर कम किया जा सकता है।

सरकार की नीतियों में घरेलू उत्पादन क्षमता बढ़ाने और उर्वरक क्षेत्र में निवेश को प्रोत्साहन देने पर लगातार जोर दिया जा रहा है।

फिलहाल किसान के लिए क्या तस्वीर है

रबी 2026-27 की शुरुआत में उर्वरक स्टॉक पिछले साल के मुकाबले बेहतर है। इसलिए तत्काल उपलब्धता के स्तर पर स्थिति को केवल स्टॉक के आधार पर संकटपूर्ण नहीं कहा जा सकता। लेकिन आने वाले महीनों में मांग बढ़ने के साथ नई खरीद और आयात की जरूरत होगी।

यहीं अंतरराष्ट्रीय कीमतों का महत्व बढ़ जाता है। अगर DAP, सल्फर और अन्य कच्चे माल की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं, तो कंपनियों की लागत बढ़ेगी और सरकार को सब्सिडी के जरिए अधिक राशि खर्च करनी पड़ सकती है।

इसलिए महंगी खाद की चिंता का मूल कारण किसान के लिए आज की कीमत से ज्यादा आने वाले महीनों की लागत है। एक तरफ सरकार किसान को नियंत्रित कीमत पर खाद उपलब्ध रखना चाहती है, दूसरी तरफ अंतरराष्ट्रीय बाजार की बढ़ती लागत सब्सिडी का बोझ बढ़ा रही है।

कुल मिलाकर, रबी सीजन की शुरुआत में खाद का स्टॉक मजबूत होने से तत्काल उपलब्धता को लेकर राहत है, लेकिन वैश्विक कीमतों, कच्चे माल की लागत और आयात निर्भरता ने उर्वरक क्षेत्र के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है। आने वाले महीनों में अंतरराष्ट्रीय बाजार की स्थिति यह तय करेगी कि सरकार को किसानों को सस्ती खाद उपलब्ध कराने के लिए कितना अतिरिक्त वित्तीय बोझ उठाना पड़ता है।

 

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