ग्राम सभाओं में कम भागीदारी पर राष्ट्रीय अध्ययन रिपोर्ट जारी, जमीनी लोकतंत्र को मजबूत बनाने के लिए दिए गए अहम सुझाव

ग्राम सभाओं में कम भागीदारी पर राष्ट्रीय रिपोर्ट जारी, नागरिकों की भागीदारी बढ़ाने पर जोर

देश में ग्राम सभाओं में लोगों की कम भागीदारी को लेकर तैयार की गई एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय अध्ययन रिपोर्ट मंगलवार को नई दिल्ली में जारी की गई। “राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में ग्राम सभा में कम भागीदारी” विषय पर तैयार इस रिपोर्ट का विमोचन नीति आयोग के सदस्य डॉ. आर. बालासुब्रमण्यम ने किया। इस अवसर पर पंचायती राज मंत्रालय के सचिव विवेक भारद्वाज, मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी, राष्ट्रीय ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज संस्थान (NIRD&PR) के विशेषज्ञ, शिक्षाविद, शोधकर्ता और पंचायती राज से जुड़े विभिन्न हितधारक भी मौजूद रहे।

यह अध्ययन राष्ट्रीय ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज संस्थान (NIRD&PR) ने पंचायती राज मंत्रालय के लिए तैयार किया है। इसका उद्देश्य देशभर में ग्राम सभाओं में लोगों की कम भागीदारी के कारणों का पता लगाना और जमीनी स्तर पर लोकतंत्र को अधिक प्रभावी एवं सहभागी बनाने के लिए व्यावहारिक सुझाव देना है।

जमीनी लोकतंत्र की सबसे मजबूत कड़ी है ग्राम सभा

रिपोर्ट जारी करते हुए डॉ. आर. बालासुब्रमण्यम ने कहा कि ग्राम सभा भारत में जमीनी लोकतंत्र की सबसे सशक्त अभिव्यक्ति है। उन्होंने कहा कि यदि ग्राम सभाएं सक्रिय और मजबूत होंगी तो सरकारी योजनाओं का लाभ अंतिम व्यक्ति तक अधिक प्रभावी तरीके से पहुंच सकेगा।

उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार नागरिकों को शासन व्यवस्था के केंद्र में रखने के लिए लगातार कार्य कर रही है। इसी सोच के तहत ऐसी नीतियां और संस्थागत व्यवस्थाएं विकसित की जा रही हैं, जिनमें आम नागरिकों की भागीदारी सुनिश्चित हो।

उन्होंने कहा कि यह रिपोर्ट केवल समस्याओं की पहचान नहीं करती, बल्कि प्रमाण आधारित समाधान भी प्रस्तुत करती है, जिन्हें देशभर में अपनाया जा सकता है।

केवल कम उपस्थिति ही नहीं, संस्थागत चुनौतियां भी बड़ी वजह

डॉ. बालासुब्रमण्यम ने कहा कि ग्राम सभाओं में कम भागीदारी केवल लोगों की रुचि का विषय नहीं है, बल्कि इसके पीछे कई संस्थागत और प्रशासनिक चुनौतियां भी जिम्मेदार हैं।

उन्होंने कहा कि नागरिकों को केवल ग्राम सभा में बुलाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें गांव के विकास कार्यों की जिम्मेदारी का सहभागी भी बनाना होगा। जब लोगों को यह महसूस होगा कि उनकी राय से गांव के विकास पर वास्तविक असर पड़ता है, तभी उनकी भागीदारी स्वतः बढ़ेगी।

उन्होंने जोर देकर कहा कि सरकार और राज्य संस्थानों को ऐसे अनुकूल वातावरण का निर्माण करना होगा, जहां लोग स्वेच्छा से ग्राम सभाओं में शामिल हों और अपने सुझाव दें।

जागरूकता से शुरू होकर सशक्तिकरण तक पहुंचती है भागीदारी

डॉ. बालासुब्रमण्यम ने कहा कि नागरिकों की सार्थक भागीदारी एक लंबी प्रक्रिया है।

उन्होंने बताया कि इसकी शुरुआत जागरूकता से होती है, इसके बाद लोग सक्रिय रूप से ग्राम सभाओं में शामिल होते हैं और अंततः जब उनकी बातों को सरकारी निर्णयों में महत्व मिलता है, तभी वास्तविक सशक्तिकरण संभव होता है।

उन्होंने कहा कि ऐसे अध्ययन नीति निर्माण को मजबूत आधार प्रदान करते हैं और सरकार को जमीनी अनुभवों के आधार पर बेहतर योजनाएं बनाने में मदद करते हैं।

ग्रामीण भारत में तेजी से हुआ है बदलाव

पंचायती राज मंत्रालय के सचिव विवेक भारद्वाज ने कहा कि पिछले एक दशक में ग्रामीण भारत में उल्लेखनीय परिवर्तन देखने को मिला है। गांवों में मूलभूत सुविधाओं का विस्तार हुआ है और स्थानीय स्वशासन संस्थाओं को मजबूत बनाने की दिशा में लगातार प्रयास किए गए हैं।

उन्होंने कहा कि यह अध्ययन महिलाओं, युवाओं और समाज के वंचित वर्गों की ग्राम सभाओं में भागीदारी बढ़ाने के लिए प्रभावी रणनीति तैयार करने में बेहद उपयोगी साबित होगा।

उन्होंने भरोसा दिलाया कि पंचायती राज मंत्रालय राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के साथ मिलकर इस रिपोर्ट की सिफारिशों को लागू करेगा, ताकि ग्राम सभाओं को अधिक समावेशी, प्रभावी और परिणामोन्मुख बनाया जा सके।

देश के सबसे बड़े फील्ड अध्ययन में शामिल हुए 7,800 से अधिक लोग

अध्ययन की प्रमुख बातें प्रस्तुत करते हुए NIRD&PR के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. अंजन कुमार भांजा ने बताया कि यह देश में ग्राम सभा सहभागिता पर किए गए सबसे बड़े फील्ड अध्ययनों में से एक है।

इस अध्ययन के दौरान—

इस व्यापक सर्वेक्षण के आधार पर रिपोर्ट तैयार की गई है, जिससे ग्राम सभाओं में भागीदारी बढ़ाने के लिए सटीक नीति सुझाव सामने आए हैं।

रिपोर्ट में सामने आए प्रमुख मुद्दे

रिपोर्ट में बताया गया है कि कई राज्यों में ग्राम सभाओं में लोगों की उपस्थिति अपेक्षा से काफी कम रहती है। इसके पीछे अनेक कारण सामने आए हैं, जिनमें—

रिपोर्ट का मानना है कि यदि इन चुनौतियों का समाधान किया जाए तो ग्राम सभाएं ग्रामीण विकास का सबसे प्रभावी मंच बन सकती हैं।

राज्यों की सफल पहल भी बनी रिपोर्ट का हिस्सा

रिपोर्ट में देश के 10 राज्यों की उन सफल पहलों का भी उल्लेख किया गया है, जहां ग्राम सभाओं में लोगों की भागीदारी बढ़ाने के लिए नवाचार किए गए।

इन राज्यों में अपनाए गए सफल मॉडलों के आधार पर अन्य राज्यों के लिए भी सुझाव दिए गए हैं, ताकि पूरे देश में ग्राम सभाओं की कार्यप्रणाली को और अधिक प्रभावी बनाया जा सके।

रिपोर्ट में प्रत्येक राज्य और केंद्र शासित प्रदेश के लिए अलग-अलग विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है तथा स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार आगे की रणनीति सुझाई गई है।

महिलाओं और युवाओं की भागीदारी बढ़ाने पर विशेष जोर

रिपोर्ट में महिलाओं, युवाओं और समाज के कमजोर वर्गों की भागीदारी बढ़ाने को सबसे महत्वपूर्ण प्राथमिकता बताया गया है।

विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक इन वर्गों की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित नहीं होगी, तब तक ग्राम सभा वास्तविक अर्थों में लोकतांत्रिक मंच नहीं बन पाएगी।

इसीलिए रिपोर्ट में जनजागरूकता अभियान, प्रशिक्षण कार्यक्रम, डिजिटल सूचना प्रणाली और सामुदायिक सहभागिता बढ़ाने जैसे कई सुझाव दिए गए हैं।

क्यों महत्वपूर्ण है ग्राम सभा?

ग्राम सभा पंचायती राज व्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण इकाई मानी जाती है। गांव के विकास कार्यों, सरकारी योजनाओं, सामाजिक निगरानी, बजट अनुमोदन और स्थानीय समस्याओं के समाधान में ग्राम सभा की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

यदि ग्राम सभाओं में अधिक से अधिक लोग भाग लेते हैं तो विकास योजनाओं में पारदर्शिता बढ़ती है, स्थानीय जरूरतों के अनुसार निर्णय लिए जाते हैं और सरकारी योजनाओं का लाभ सही लोगों तक पहुंचता है।

ग्राम सभाओं में कम भागीदारी पर जारी यह राष्ट्रीय अध्ययन रिपोर्ट जमीनी लोकतंत्र को मजबूत बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण दस्तावेज मानी जा रही है। रिपोर्ट में प्रमाण आधारित सुझावों के माध्यम से यह स्पष्ट किया गया है कि केवल प्रशासनिक प्रयास पर्याप्त नहीं होंगे, बल्कि नागरिकों की जागरूकता, विश्वास और सक्रिय भागीदारी भी उतनी ही आवश्यक है।

यदि रिपोर्ट में दिए गए सुझावों को राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों द्वारा प्रभावी ढंग से लागू किया जाता है, तो ग्राम सभाएं ग्रामीण विकास की सबसे सशक्त संस्था बन सकती हैं। इससे न केवल लोकतांत्रिक व्यवस्था मजबूत होगी, बल्कि गांवों में पारदर्शी, जवाबदेह और जनभागीदारी आधारित विकास को भी नई गति मिलेगी।

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