NITI Aayog Bioeconomy Roadmap: बायो-फर्टिलाइजर और उर्वरक उद्योग को मिलेगी नई रफ्तार

नीति आयोग के नए Bioeconomy Roadmap से बायो-फर्टिलाइजर, बायो-इनपुट्स और उर्वरक उद्योग को बड़ा प्रोत्साहन मिलेगा। जानिए AgriBio 2.0 और ₹50,000 करोड़ ग्रोथ फंड का कृषि पर प्रभाव।

नीति आयोग के नए Bioeconomy Roadmap

नीति आयोग (NITI Aayog) ने भारत में टिकाऊ कृषि (Sustainable Agriculture) और रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाते हुए नया राष्ट्रीय बायोइकोनॉमी रोडमैप जारी किया है। इस रोडमैप में वर्ष 2035 तक 691 अरब अमेरिकी डॉलर (USD 691 Billion) की बायोइकोनॉमी विकसित करने का लक्ष्य रखा गया है। हालांकि यह रोडमैप स्वास्थ्य, जैव प्रौद्योगिकी, समुद्री संसाधन और औद्योगिक बायोटेक जैसे कई क्षेत्रों को कवर करता है, लेकिन इसका सबसे महत्वपूर्ण प्रभाव उर्वरक उद्योग और कृषि इनपुट सेक्टर पर पड़ने की संभावना है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि रोडमैप के तहत प्रस्तावित मिशनों को प्रभावी ढंग से लागू किया जाता है, तो भारत में बायो-फर्टिलाइजर (Biofertilizers), बायो-स्टिमुलेंट्स, माइक्रोबियल इनपुट्स, जैव उर्वरकों और टिकाऊ पोषक तत्व प्रबंधन को नई गति मिलेगी। इससे न केवल किसानों को अधिक टिकाऊ विकल्प मिलेंगे, बल्कि उर्वरक उद्योग भी पारंपरिक रासायनिक उत्पादों के साथ जैव-आधारित उत्पादों की ओर तेजी से बढ़ेगा।

उर्वरक उद्योग के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह रोडमैप?

भारत दुनिया के सबसे बड़े उर्वरक उपभोक्ता देशों में शामिल है। यूरिया, डीएपी और पोटाश जैसे पारंपरिक उर्वरकों की मांग लगातार बढ़ रही है। दूसरी ओर, मिट्टी की उर्वरता में गिरावट, जैविक कार्बन की कमी और जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियों ने खेती के लिए नए समाधान खोजने की आवश्यकता बढ़ा दी है।

ऐसे समय में नीति आयोग का यह रोडमैप रासायनिक उर्वरकों के पूरक के रूप में जैव उर्वरकों और बायोलॉजिकल एग्री-इनपुट्स के विकास पर विशेष बल देता है। इसका उद्देश्य संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन (Balanced Nutrient Management) को बढ़ावा देना और कृषि उत्पादन को अधिक टिकाऊ बनाना है।

AgriBio 2.0 से मिलेगा बायो-इनपुट उद्योग को बढ़ावा

रोडमैप में प्रस्तावित AgriBio 2.0 मिशन विशेष रूप से कृषि क्षेत्र के लिए तैयार किया गया है। इसके तहत जलवायु-लचीली (Climate-Resilient) फसल किस्मों के साथ-साथ गुणवत्ता-प्रमाणित बायो-इनपुट्स विकसित किए जाएंगे।

इस पहल से निम्नलिखित क्षेत्रों को लाभ मिलने की संभावना है—

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि गुणवत्ता मानकों को मजबूत किया गया तो बाजार में निम्न गुणवत्ता वाले बायो-इनपुट्स की समस्या भी काफी हद तक कम हो सकती है।

रासायनिक और जैव उर्वरकों का संतुलित उपयोग होगा प्रोत्साहित

भारत सरकार लंबे समय से Balanced Fertilization और Integrated Nutrient Management (INM) को बढ़ावा दे रही है। नया रोडमैप इसी दिशा को और मजबूत करता है।

बायोफर्टिलाइजर, माइकोराइजा, फॉस्फेट सॉल्युबिलाइजिंग बैक्टीरिया (PSB), नाइट्रोजन फिक्सिंग माइक्रोऑर्गेनिज्म तथा अन्य जैव उत्पाद रासायनिक उर्वरकों की दक्षता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

यदि इनका वैज्ञानिक उपयोग बढ़ता है, तो किसानों को कम लागत में बेहतर पोषण प्रबंधन का विकल्प मिल सकता है।

सिंथेटिक बायोलॉजी से बदल सकता है उर्वरक उद्योग

रोडमैप में प्रस्तावित BioX Foundry मिशन सिंथेटिक बायोलॉजी और जैव प्रौद्योगिकी नवाचारों को व्यावसायिक स्तर तक पहुंचाने पर केंद्रित होगा।

उर्वरक उद्योग के लिए इसका महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि भविष्य में—

यह भारत को जैव-आधारित कृषि इनपुट निर्माण में वैश्विक प्रतिस्पर्धा देने में मदद कर सकता है।

अनुसंधान से बाजार तक का सफर होगा आसान

भारत में कई उत्कृष्ट कृषि एवं जैव प्रौद्योगिकी संस्थान नई तकनीकों पर शोध करते हैं, लेकिन इनका व्यावसायिक उपयोग सीमित रह जाता है।

इसी चुनौती को दूर करने के लिए रोडमैप में 2026-2035 के लिए 50,000 करोड़ रुपये का Bioeconomy Growth Fund प्रस्तावित किया गया है।

यह फंड निम्न क्षेत्रों में मदद करेगा—

इससे जैव उर्वरक उद्योग में निवेश बढ़ने की संभावना है।

नियामकीय सुधारों से बढ़ेगा उद्योग का विश्वास

रोडमैप में बायोटेक्नोलॉजी नवाचारों को तेजी से बाजार तक पहुंचाने के लिए कई संस्थागत सुधारों की सिफारिश की गई है।

इनमें शामिल हैं—

यदि इन सुधारों को लागू किया जाता है, तो नए बायो-फर्टिलाइजर और जैव कृषि उत्पादों को नियामकीय स्वीकृति मिलने की प्रक्रिया तेज हो सकती है। इससे उद्योग का विश्वास बढ़ेगा और नवाचारों को प्रोत्साहन मिलेगा।

आयात निर्भरता कम करने में मिलेगी मदद

भारत फॉस्फेट और पोटाश जैसे कई उर्वरक कच्चे माल के लिए आयात पर निर्भर है। बायो-आधारित कृषि इनपुट्स का अधिक उपयोग इन पारंपरिक उर्वरकों की दक्षता बढ़ा सकता है और कुछ हद तक उनकी आवश्यकता को अनुकूलित कर सकता है।

हालांकि बायोफर्टिलाइजर रासायनिक उर्वरकों का पूर्ण विकल्प नहीं हैं, लेकिन इनके पूरक उपयोग से उर्वरकों की उपयोग क्षमता बेहतर हो सकती है। इससे आयातित संसाधनों पर दबाव कम करने में सहायता मिल सकती है।

किसानों और उद्योग दोनों को होगा लाभ

यदि रोडमैप सफलतापूर्वक लागू होता है तो इसका लाभ केवल उद्योग तक सीमित नहीं रहेगा।

संभावित लाभ—

2035 तक बड़ा लक्ष्य

नीति आयोग के अनुसार भारत की बायोइकोनॉमी पिछले एक दशक में लगभग 16 गुना बढ़कर 195.3 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुंच चुकी है और यह देश की जीडीपी में महत्वपूर्ण योगदान दे रही है।

रोडमैप का लक्ष्य वर्ष 2035 तक 691 अरब अमेरिकी डॉलर की बायोइकोनॉमी विकसित करना है। इसके साथ ही 3 करोड़ (30 मिलियन) से अधिक उच्च मूल्य वाले रोजगार सृजित करने तथा भारत को वैश्विक जैव प्रौद्योगिकी एवं बायोमैन्युफैक्चरिंग हब के रूप में स्थापित करने की योजना है।

उर्वरक क्षेत्र के संदर्भ में यह लक्ष्य विशेष महत्व रखता है क्योंकि भविष्य की कृषि में रासायनिक उर्वरकों के साथ बायोफर्टिलाइजर, बायो-स्टिमुलेंट्स और अन्य जैव कृषि इनपुट्स की भूमिका लगातार बढ़ने की संभावना है।

निष्कर्ष

नीति आयोग का नया बायोइकोनॉमी रोडमैप केवल जैव प्रौद्योगिकी का विज़न दस्तावेज़ नहीं, बल्कि भारत के उर्वरक क्षेत्र को अधिक टिकाऊ, नवाचार आधारित और आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में भी महत्वपूर्ण पहल है। विशेष रूप से AgriBio 2.0, Bioeconomy Growth Fund और बायो-इनपुट्स के व्यावसायीकरण पर दिया गया जोर जैव उर्वरक उद्योग के लिए नए अवसर लेकर आ सकता है।

यदि अनुसंधान, उद्योग और किसानों के बीच मजबूत समन्वय स्थापित किया जाता है, तो आने वाले वर्षों में भारत का उर्वरक क्षेत्र केवल रासायनिक उर्वरकों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि जैव उर्वरकों और आधुनिक कृषि जैव प्रौद्योगिकी के माध्यम से अधिक टिकाऊ और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बन सकता है।

 

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