मात्र 0.4 हेक्टेयर जमीन से शुरू हुआ सफर, मधुमक्खी पालन से खड़ा किया 3 करोड़ रुपये सालाना का ग्रामीण उद्यम

Starting with just 0.4 hectares of land, beekeeping has created a rural enterprise worth ₹3 crore annually.

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Starting with just 0.4 hectares of land, beekeeping has created a rural enterprise worth ₹3 crore annually.

सीमित कृषि भूमि और आर्थिक चुनौतियां किसी किसान की सफलता की राह में बाधा जरूर बन सकती हैं, लेकिन मेहनत, सही तकनीक और नए अवसरों की पहचान से इन्हें पार किया जा सकता है। उत्तर प्रदेश के लखनऊ जिले के गोसाईंगंज ब्लॉक स्थित मदरपुर केवली गांव के किसान श्री बृजेश कुमार वर्मा की सफलता की कहानी इसका उदाहरण है। महज 0.4 हेक्टेयर पैतृक जमीन से खेती की शुरुआत करने वाले बृजेश कुमार ने मधुमक्खी पालन को अपनी आजीविका का प्रमुख आधार बनाया और इसे एक ऐसे ग्रामीण उद्यम में विकसित किया, जिससे बड़ी संख्या में किसान और ग्रामीण युवा जुड़े हैं।

आज बृजेश कुमार वर्मा उत्तर प्रदेश के मध्य क्षेत्र में एक जाने-माने मधुमक्खी पालक के रूप में पहचाने जाते हैं। उनके संगठन से लखनऊ जिले के लगभग 1,120 मधुमक्खी पालक सीधे जुड़े हुए हैं। संगठन के माध्यम से प्रतिवर्ष करीब 350 टन शहद, 150 किलोग्राम पराग और 100 किलोग्राम प्रोपोलिस का उत्पादन होता है। इस ग्रामीण उद्यम से हर साल लगभग 3 करोड़ रुपये की कमाई होती है। बृजेश कुमार अब तक करीब 6,000 किसानों को मधुमक्खी पालन का प्रशिक्षण दे चुके हैं और अन्य ग्रामीण युवाओं को भी इस व्यवसाय से जुड़ने के लिए प्रेरित कर रहे हैं।

इस सफलता में कृषि विज्ञान केंद्र (KVK), भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान (ICAR-IISR), लखनऊ की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। संस्थान के प्रशिक्षण कार्यक्रमों, तकनीकी मार्गदर्शन और खेत पर किए गए परीक्षणों से बृजेश कुमार को मधुमक्खी पालन की बेहतर तकनीकों, शहद के गुणवत्तापूर्ण निष्कर्षण, ब्रांडिंग और विपणन की जानकारी मिली।

आर्थिक चुनौतियों के बीच शुरू किया मधुमक्खी पालन

बृजेश कुमार वर्मा का शुरुआती सफर आसान नहीं था। परिवार की आर्थिक स्थिति सीमित होने के कारण उनके पास खेती के लिए केवल 0.4 हेक्टेयर पैतृक भूमि थी। इतनी कम जमीन से परिवार की जरूरतों को पूरा करना चुनौतीपूर्ण था। उन्होंने अपने गांव के अन्य लोगों से जमीन पट्टे पर लेकर खेती करने की भी कोशिश की, लेकिन बेहतर आजीविका की तलाश जारी रही।

इसी दौरान वर्ष 1990 में उन्हें उत्तर प्रदेश सरकार के उद्यान विभाग की ओर से प्रोत्साहित किए जा रहे मधुमक्खी पालन के बारे में जानकारी मिली। उन्होंने इस गतिविधि को आय का नया स्रोत बनाने की संभावना के रूप में देखा और इसके बारे में जानकारी जुटानी शुरू की।

बृजेश कुमार ने मधुमक्खी पालन से संबंधित साहित्य पढ़ा और अपने गांव के कुछ साथियों के साथ लखनऊ स्थित उद्यान विभाग का दौरा किया। वहां उन्हें शुरुआती शुरुआत के लिए एक मधुमक्खी बॉक्स निःशुल्क उपलब्ध कराया गया। सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने इस अवसर का पूरा लाभ उठाया और मधुमक्खी पालन की प्रक्रिया को सीखने के साथ-साथ अपने काम को आगे बढ़ाने पर ध्यान दिया।

पहले बॉक्स से प्राप्त शहद को बेचकर उन्होंने आमदनी अर्जित की। इस कमाई को खर्च करने के बजाय उन्होंने व्यवसाय को बढ़ाने में लगाया। मेहनत और निरंतर प्रयासों के परिणामस्वरूप केवल दो वर्षों के भीतर वे 10 अतिरिक्त मधुमक्खी बॉक्स खरीदने में सफल रहे। एक बॉक्स से शुरू हुआ यह प्रयास धीरे-धीरे व्यवस्थित उद्यम में बदलने लगा।

उनके शुरुआती अनुभव ने यह साबित किया कि छोटे स्तर पर शुरुआत करके भी किसी कृषि आधारित गतिविधि को आगे बढ़ाया जा सकता है। इसके लिए जरूरी है कि किसान उपलब्ध संसाधनों का सही उपयोग करे, नई तकनीक सीखने के लिए तैयार रहे और शुरुआती लाभ को व्यवसाय के विस्तार में लगाए।

व्यक्तिगत प्रयास से संगठन तक पहुंचा कारोबार

मधुमक्खी पालन में सफलता मिलने के बाद बृजेश कुमार ने इस काम को केवल अपने तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने अन्य मधुमक्खी पालकों को जोड़ने के उद्देश्य से एक समूह बनाया। बाद में इस समूह को उत्तर प्रदेश सरकार के सहकारी समिति पंजीयक के यहां ‘अभिषेक ग्रामोद्योग संस्थान’ नाम से पंजीकृत कराया गया।

संगठन बनने से शहद उत्पादन और संग्रहण को व्यवस्थित रूप देने में मदद मिली। समूह के कार्यकर्ता अलग-अलग गांवों से कच्चा शहद एकत्र करते हैं। इसके बाद शहद का प्रसंस्करण किया जाता है, ताकि बेहतर गुणवत्ता वाला उत्पाद तैयार करके बाजार में बेचा जा सके।

लखनऊ जिले के गोसाईंगंज क्षेत्र में संगठन ने राज्य सरकार के ग्राम्य विकास विभाग के सहयोग से शहद प्रसंस्करण इकाई भी स्थापित की। इस सुविधा ने कच्चे शहद को प्रसंस्कृत उत्पाद में बदलने और उसकी बिक्री को व्यवस्थित बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

संगठन के कार्यकर्ता विभिन्न गांवों से शहद एकत्र करने से लेकर उसके प्रसंस्करण और विपणन तक की गतिविधियों में शामिल हैं। तैयार शहद को राज्य के अलग-अलग बिक्री केंद्रों के माध्यम से बाजार तक पहुंचाया जाता है। इस व्यवस्था से उत्पादन, संग्रहण और विपणन के बीच बेहतर तालमेल बनाने में सहायता मिलती है।

बृजेश कुमार की पहल से मधुमक्खी पालन एक व्यक्तिगत व्यवसाय से आगे बढ़कर सामूहिक ग्रामीण उद्यम का रूप लेने लगा। इससे अन्य मधुमक्खी पालकों को भी उत्पादन और बिक्री से जुड़ने का अवसर मिला।

KVK, ICAR-IISR के प्रशिक्षण से मिली नई दिशा

बृजेश कुमार वर्मा की सफलता में वैज्ञानिक प्रशिक्षण और तकनीकी मार्गदर्शन का विशेष योगदान रहा। उन्होंने कृषि विज्ञान केंद्र, ICAR-भारतीय गन्ना अनुसंधान संस्थान, लखनऊ में आयोजित व्यवस्थित प्रशिक्षण कार्यक्रमों और पाठ्यक्रमों में भाग लिया।

इन प्रशिक्षणों से उन्हें मधुमक्खी के छत्तों से अच्छी गुणवत्ता वाला शहद निकालने के प्रभावी तरीकों की जानकारी मिली। इसके साथ ही उत्पाद की ब्रांडिंग और राज्य के विभिन्न स्थानों पर बिक्री केंद्र स्थापित करके विपणन करने की समझ भी विकसित हुई।

शहद उत्पादन में केवल मधुमक्खियों के बॉक्स रखना ही पर्याप्त नहीं होता। उत्पादन की गुणवत्ता, शहद निकालने की प्रक्रिया, संग्रहण, प्रसंस्करण और बाजार तक पहुंच जैसे पहलू भी व्यवसाय की सफलता को प्रभावित करते हैं। KVK के प्रशिक्षण ने बृजेश कुमार को इन पहलुओं पर व्यवस्थित ढंग से काम करने में मदद की।

संस्थान द्वारा किए गए खेत-स्तरीय परीक्षणों से उत्साहजनक परिणाम मिलने के बाद उन्होंने वर्ष 2011 से मधुमक्खी पालन के सह-उत्पादों के संग्रहण की गतिविधि भी शुरू की। इससे उनका उद्यम शहद उत्पादन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि मधुमक्खी पालन से प्राप्त अन्य उपयोगी उत्पादों को भी शामिल करने लगा।

धीरे-धीरे उनके द्वारा अपनाई गई तकनीकों और कार्यप्रणाली को दूसरे किसानों ने भी अपनाना शुरू किया। आज यह पहल बृजेश कुमार और उनकी टीम के अलावा लखनऊ तथा आसपास के जिलों और अन्य राज्यों के कई मधुमक्खी पालकों तक पहुंच चुकी है।

600 मधुमक्खी बॉक्स के साथ अलग-अलग राज्यों में करते हैं प्रवास

मधुमक्खी पालन में उत्पादन बढ़ाने के लिए मधुमक्खियों को पर्याप्त मात्रा में पराग और मकरंद उपलब्ध होना जरूरी है। फूलों की उपलब्धता फसलों और मौसम के अनुसार बदलती रहती है। इसी को ध्यान में रखते हुए बृजेश कुमार वर्मा अपने लगभग 600 मधुमक्खी बॉक्स को पूरे वर्ष अलग-अलग राज्यों और क्षेत्रों में स्थानांतरित करते हैं।

इस प्रक्रिया को मधुमक्खी बॉक्स का प्रवास या माइग्रेशन कहा जाता है। इसका उद्देश्य उन स्थानों पर मधुमक्खियों को रखना है, जहां संबंधित मौसम में फूलों वाली फसलें उपलब्ध हों और मधुमक्खियों को पर्याप्त भोजन मिल सके।

बृजेश कुमार नवंबर से फरवरी के बीच लखनऊ जिले के किसानों के खेतों में सरसों की फसल के दौरान मधुमक्खी बॉक्स स्थापित करते हैं। सरसों की फसल के फूल मधुमक्खियों के लिए पराग और मकरंद का स्रोत उपलब्ध कराते हैं।

इसके बाद मार्च से सितंबर के बीच वे बिहार के मुजफ्फरपुर, समस्तीपुर, दरभंगा और बेगूसराय जिलों की ओर अपने मधुमक्खी बॉक्स स्थानांतरित करते हैं। इन क्षेत्रों में लीची, मक्का और बाजरा जैसी फसलों के मौसम के अनुसार मधुमक्खी पालन की गतिविधियां संचालित की जाती हैं।

उन्होंने उत्तर प्रदेश के कासगंज, मैनपुरी, फिरोजाबाद, उन्नाव और सीतापुर जिलों में भी छोटे स्तर पर मधुमक्खी बॉक्स स्थानांतरित करने के लिए नए क्षेत्र चिह्नित किए हैं। लखनऊ जिले में सरसों की कटाई के बाद कुछ छोटी टीमें मक्का, बाजरा और यूकेलिप्टस के उपलब्ध फूलों के अनुसार बॉक्स स्थानांतरित करने का काम करती हैं।

इस तरह फसल और फूलों की उपलब्धता के अनुसार मधुमक्खियों का स्थान बदलने से पूरे वर्ष उत्पादन गतिविधियों को जारी रखने में मदद मिलती है। यह कार्य स्थानीय किसानों के साथ संपर्क और अलग-अलग क्षेत्रों में कृषि मौसम की जानकारी के आधार पर किया जाता है।

6,000 किसानों को दिया प्रशिक्षण, ग्रामीण युवाओं को भी कर रहे प्रेरित

बृजेश कुमार वर्मा की सफलता का प्रभाव उनके व्यक्तिगत व्यवसाय से आगे बढ़कर आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में भी दिखाई देता है। मधुमक्खी पालन के माध्यम से आय और उद्यमिता के अवसरों को देखते हुए उत्तर प्रदेश के साथ-साथ बिहार के किसानों ने भी उनसे संपर्क स्थापित किया है।

अब तक वे लगभग 6,000 किसानों को मधुमक्खी पालन का प्रशिक्षण दे चुके हैं। इसके अलावा वे विभिन्न जिलों के ग्रामीण युवाओं को लगातार प्रोत्साहित करते हैं और उन्हें निःशुल्क प्रशिक्षण भी देते हैं। उनका उद्देश्य अधिक से अधिक लोगों को मधुमक्खी पालन की तकनीक समझाना और इस गतिविधि को आजीविका के विकल्प के रूप में अपनाने के लिए प्रेरित करना है।

उनसे जुड़े किसान शहद उत्पादन, आय बढ़ाने और उद्यमिता विकास के लिए मधुमक्खी पालन की संभावनाओं का लाभ उठा रहे हैं। संगठन के माध्यम से किसानों को एक साझा नेटवर्क भी मिलता है, जिससे वे उत्पादन और बाजार से जुड़ी गतिविधियों में भाग ले सकते हैं।

कृषि आधारित उद्यमों में प्रशिक्षण और अनुभव का प्रसार महत्वपूर्ण है। जब कोई किसान स्वयं सफल होकर दूसरे किसानों को तकनीक सिखाता है, तो स्थानीय स्तर पर ज्ञान और कौशल का विस्तार होता है। बृजेश कुमार की पहल इसी दिशा में एक उदाहरण प्रस्तुत करती है।

हर साल करीब 3 करोड़ रुपये का ग्रामीण उद्यम

अभिषेक ग्रामोद्योग संस्थान से जुड़े मधुमक्खी पालकों का नेटवर्क इस उद्यम का महत्वपूर्ण आधार है। लखनऊ जिले के लगभग 1,120 मधुमक्खी पालक संगठन से सीधे जुड़े हुए हैं। इनके माध्यम से प्रतिवर्ष करीब 350 टन शहद, 150 किलोग्राम पराग और 100 किलोग्राम प्रोपोलिस का उत्पादन किया जाता है।

स्रोत के अनुसार, इस ग्रामीण उद्यम से हर साल लगभग 3 करोड़ रुपये की कमाई होती है। यह आंकड़ा दर्शाता है कि मधुमक्खी पालन को व्यवस्थित उत्पादन, समूह आधारित काम और विपणन से जोड़कर बड़े स्तर पर आर्थिक गतिविधि के रूप में विकसित किया जा सकता है।

संगठन अपने उत्पादों की बिक्री ‘किरण एंटरप्राइजेज’ नामक ट्रेडिंग कंपनी के माध्यम से करता है, जिसके पास भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) का प्रमाणन है। इस व्यवस्था से उत्पादों को बाजार में पहुंचाने के लिए एक व्यावसायिक माध्यम उपलब्ध होता है।

शहद की गुणवत्ता, प्रसंस्करण और ब्रांडिंग पर ध्यान देने से उत्पाद को बेहतर तरीके से बाजार में प्रस्तुत करने में मदद मिलती है। बृजेश कुमार ने प्रशिक्षण के दौरान प्राप्त जानकारी का उपयोग करके शहद के उत्पादन के साथ उसकी बिक्री और वितरण व्यवस्था को भी मजबूत करने का प्रयास किया।

अब मधुमक्खी पालन के उपकरण भी बना रहे हैं

अपने उद्यम को आगे बढ़ाने के लिए बृजेश कुमार वर्मा ने मधुमक्खी पालन से जुड़े उपकरणों का निर्माण भी शुरू किया है। वे मधुमक्खी बॉक्स, फ्रेम, मोम की शीट तथा अंदरूनी और ऊपरी कवर जैसे उपकरण तैयार कर रहे हैं।

इस पहल का उद्देश्य किसानों और ग्रामीण युवाओं को मधुमक्खी पालन के लिए आवश्यक उपकरण आसानी से उपलब्ध कराना है। मधुमक्खी पालन शुरू करने वाले लोगों के लिए बॉक्स और अन्य सामग्री की उपलब्धता एक महत्वपूर्ण जरूरत होती है। स्थानीय स्तर पर इन उपकरणों का निर्माण इस जरूरत को पूरा करने में मदद कर सकता है।

इस प्रकार बृजेश कुमार का काम अब शहद उत्पादन, सह-उत्पादों के संग्रहण, प्रसंस्करण, ब्रांडिंग और बिक्री के साथ-साथ उपकरण निर्माण तक विस्तारित हो रहा है। इससे उनके उद्यम में गतिविधियों का दायरा बढ़ा है और मधुमक्खी पालन से जुड़े अन्य लोगों को भी उपकरणों तक पहुंच का विकल्प मिल सकता है।

राष्ट्रीय स्तर पर मिली पहचान

बृजेश कुमार वर्मा मधुमक्खी पालन के क्षेत्र में अपने कार्यों के लिए राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर कई बार सम्मानित हो चुके हैं। वे भारत सरकार के कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के कृषि एवं किसान कल्याण विभाग के अंतर्गत राष्ट्रीय मधुमक्खी बोर्ड (National Bee Board) के आजीवन सदस्य भी हैं।

किसानों की समृद्धि और ग्रामीण समुदाय के समग्र विकास के लिए किए गए उनके प्रयासों को विभिन्न स्तरों पर सराहना मिली है। उनकी यात्रा इस बात को रेखांकित करती है कि सीमित भूमि वाले किसान भी कृषि से जुड़ी वैकल्पिक गतिविधियों को अपनाकर अपने काम का विस्तार कर सकते हैं।

इस सफलता में व्यक्तिगत मेहनत के साथ सरकारी विभागों, वैज्ञानिक संस्थानों, प्रशिक्षण कार्यक्रमों और सामूहिक संगठन की भूमिका भी रही है। शुरुआती दौर में उद्यान विभाग से मिला एक मधुमक्खी बॉक्स उनके लिए नई शुरुआत का अवसर बना। बाद में प्रशिक्षण, तकनीकी जानकारी, प्रसंस्करण इकाई, विपणन और किसानों के नेटवर्क ने इस पहल को व्यापक रूप दिया।

छोटे किसान से ग्रामीण उद्यमी बनने की प्रेरक कहानी

बृजेश कुमार वर्मा की कहानी बताती है कि सीमित कृषि भूमि होने के बावजूद किसान अपनी आय बढ़ाने के लिए खेती से जुड़ी दूसरी गतिविधियों को अपना सकते हैं। मधुमक्खी पालन ने उन्हें अपनी आजीविका को मजबूत करने का अवसर दिया और आगे चलकर वे अन्य किसानों तथा ग्रामीण युवाओं को प्रशिक्षित करने वाले उद्यमी के रूप में उभरे।

उनके अनुभव से यह भी स्पष्ट होता है कि किसी कृषि आधारित उद्यम को आगे बढ़ाने के लिए उत्पादन के साथ-साथ प्रसंस्करण, गुणवत्ता, ब्रांडिंग, विपणन और प्रशिक्षण पर ध्यान देना जरूरी है। वैज्ञानिक संस्थानों से मिलने वाला मार्गदर्शन किसानों को नई तकनीकों को समझने और उन्हें व्यावहारिक रूप से अपनाने में मदद कर सकता है।

ICAR-IISR, लखनऊ के कृषि विज्ञान केंद्र के प्रशिक्षण और खेत-स्तरीय परीक्षणों से मिली दिशा ने बृजेश कुमार के प्रयासों को आगे बढ़ाने में योगदान दिया। आज उनके संगठन से जुड़े मधुमक्खी पालकों का नेटवर्क और ग्रामीण युवाओं को दिया जा रहा प्रशिक्षण इस उद्यम के व्यापक प्रभाव को दर्शाता है।

एक मधुमक्खी बॉक्स से शुरू हुई यह यात्रा अब करीब 3 करोड़ रुपये सालाना की कमाई वाले ग्रामीण उद्यम तक पहुंच चुकी है। बृजेश कुमार वर्मा का उदाहरण उन किसानों के लिए प्रेरणा है, जो कम जमीन और सीमित संसाधनों के बावजूद मेहनत, प्रशिक्षण और उद्यमशीलता के माध्यम से अपने लिए नए अवसर तलाशना चाहते हैं।

 

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