उत्तर भारत में अक्टूबर और नवंबर का समय आते ही पराली जलाने यानी Stubble Burning की चर्चा तेज हो जाती है। खास तौर पर पंजाब और हरियाणा के खेतों में धान की कटाई के बाद बचे फसल अवशेष को जलाने की घटनाएं लंबे समय से पर्यावरण और सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़ी बड़ी चुनौती रही हैं। खेतों में लगने वाली आग केवल स्थानीय समस्या नहीं रहती। धुआं हवा के साथ दूसरे क्षेत्रों तक पहुंच सकता है और प्रतिकूल मौसम की स्थिति में दिल्ली-NCR सहित उत्तर भारत में प्रदूषण की समस्या को और जटिल बना सकता है।
हालांकि बीते कुछ वर्षों के आंकड़े यह भी बताते हैं कि तस्वीर पूरी तरह निराशाजनक नहीं है। पंजाब और हरियाणा दोनों में धान की पराली जलाने की दर्ज घटनाओं में बड़ी गिरावट आई है। 2025 का पडी हार्वेस्ट सीजन इस मामले में विशेष रूप से महत्वपूर्ण रहा। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार पंजाब में 5,114 और हरियाणा में 662 farm fire incidents दर्ज किए गए। पंजाब में यह संख्या 2024 के मुकाबले लगभग 53 प्रतिशत कम थी, जबकि हरियाणा में भी लगभग 53 प्रतिशत की कमी दर्ज हुई।
अब 2026 का धान कटाई सीजन शुरू हो चुका है। सितंबर के आखिरी दिनों तक शुरुआती घटनाएं सामने आई हैं, लेकिन मुख्य harvesting period अभी आगे है। इसलिए Punjab Haryana Stubble Burning की वास्तविक स्थिति समझने के लिए पुराने आंकड़ों, मौजूदा तैयारियों और किसानों के सामने मौजूद व्यावहारिक चुनौतियों को एक साथ देखना जरूरी है।
Stubble Burning क्या है?
धान या गेहूं जैसी फसल काटने के बाद खेत में तने और अन्य अवशेष रह जाते हैं। इन्हें सामान्य भाषा में पराली कहा जाता है। जब किसान अगली फसल की बुवाई के लिए खेत जल्दी खाली करने के उद्देश्य से इन अवशेषों में आग लगा देते हैं, तो इसे Stubble Burning या Crop Residue Burning कहा जाता है।
धान की कटाई के बाद यह समस्या ज्यादा दिखाई देती है क्योंकि पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों में किसानों के पास धान की कटाई और गेहूं की बुवाई के बीच बहुत कम समय होता है। ऐसे में पराली को इकट्ठा करना, खेत से बाहर ले जाना या मशीनों के जरिए मिट्टी में मिलाना समय और लागत दोनों मांगता है। आग लगाने से खेत कुछ समय में साफ हो जाता है। इसी कारण तमाम कानूनी प्रतिबंधों, जागरूकता अभियानों और तकनीकी विकल्पों के बावजूद कुछ किसान अभी भी इसे सबसे आसान विकल्प मानते हैं।
पंजाब-हरियाणा में Stubble Burning की मौजूदा स्थिति क्या है?
2026 के धान कटाई सीजन की शुरुआत सितंबर के मध्य से हो चुकी है। 30 सितंबर 2026 को केंद्र सरकार द्वारा जारी जानकारी के मुताबिक Commission for Air Quality Management यानी CAQM ने पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश की तैयारियों की समीक्षा की। इसमें 2026 के paddy stubble burning को रोकने के लिए राज्य स्तरीय action plans और enforcement व्यवस्था पर चर्चा की गई। लक्ष्य पराली जलाने की घटनाओं को समाप्त करना रखा गया है।
15 से 30 सितंबर के बीच छह राज्यों में कुल 114 crop residue burning incidents का पता चला था। इनमें पंजाब में 59 घटनाएं दर्ज होने की खबर सामने आई। यह अभी शुरुआती अवधि के आंकड़े हैं क्योंकि पंजाब में धान की कटाई आमतौर पर अक्टूबर में ज्यादा रफ्तार पकड़ती है।
पंजाब में 2026 सीजन के लिए drone surveillance को भी बढ़ाया जा रहा है। सितंबर में ही राज्य में शुरुआती farm fire cases दर्ज किए जाने लगे थे। प्रशासन का ध्यान पिछले वर्षों के hotspots पर ज्यादा है।
हरियाणा में भी जिला स्तर पर monitoring शुरू हो चुकी है। सोनीपत के कई ऐसे गांवों में कृषि विभाग खेतों पर जाकर किसानों को फसल अवशेष न जलाने और मशीनों से उसका प्रबंधन करने के लिए जागरूक कर रहा है, जहां पिछले सीजन में अधिक घटनाएं दर्ज हुई थीं।
इसलिए अक्टूबर 2026 की शुरुआत में स्थिति को अभी अंतिम परिणाम के रूप में नहीं देखा जा सकता। मुख्य चुनौती अक्टूबर के दूसरे हिस्से और नवंबर में सामने आती है, जब बड़े पैमाने पर धान की कटाई पूरी होती है।
पिछले वर्षों में कितनी कम हुईं पराली जलाने की घटनाएं?
पिछले पांच वर्षों के आंकड़े पंजाब में काफी बड़ा बदलाव दिखाते हैं। CAQM के अनुसार पंजाब में paddy harvesting season के दौरान 2021 में 71,304 farm fires दर्ज किए गए थे। 2022 में यह आंकड़ा घटकर 49,922, 2023 में 36,663 और 2024 में 10,909 रह गया। 2025 में केवल 5,114 घटनाएं दर्ज हुईं। यानी 2021 से 2025 के बीच आधिकारिक fire count में लगभग 93 प्रतिशत की गिरावट दर्ज हुई।
हरियाणा में भी इसी तरह गिरावट आई। राज्य में 2021 के दौरान 6,987 incidents दर्ज हुए थे। 2022 में 3,661, 2023 में 2,303, 2024 में 1,406 और 2025 में केवल 662 farm fires दर्ज किए गए। यह 2021 के मुकाबले लगभग 91 प्रतिशत की कमी है।
इन आंकड़ों से पता चलता है कि Stubble Burning में कमी आई है। फिर भी समस्या समाप्त नहीं हुई है। कुछ जिलों और सीमित अवधि में बड़ी संख्या में घटनाएं होने पर स्थानीय और क्षेत्रीय प्रदूषण पर प्रभाव पड़ सकता है।
पंजाब में पराली की समस्या ज्यादा क्यों दिखाई देती है?
पंजाब देश के प्रमुख धान उत्पादक क्षेत्रों में से एक है। धान की बड़े पैमाने पर खेती के कारण हर वर्ष बड़ी मात्रा में crop residue पैदा होता है। समस्या का दूसरा पहलू कृषि कैलेंडर है। किसान को धान की कटाई के तुरंत बाद गेहूं की बुवाई करनी होती है। दोनों फसलों के बीच कुछ ही सप्ताह का अंतर मिलने के कारण खेत जल्दी तैयार करना जरूरी हो जाता है।
मान लीजिए किसी किसान के पास कई एकड़ जमीन है और धान की कटाई हो चुकी है। यदि पराली को मशीन से काटकर मिट्टी में मिलाना है तो मशीन उपलब्ध होनी चाहिए। उसे किराए पर लेने की लागत भी होगी। यदि पराली की गांठ बनानी है तो baler और transportation चाहिए। इसके बाद खरीदार या processing unit तक residue पहुंचाना पड़ेगा।इसके मुकाबले खेत में आग लगाने पर लागत बहुत कम दिखाई देती है और खेत तेजी से साफ हो जाता है। यही आर्थिक और समय संबंधी अंतर समस्या की जड़ में है।
इसलिए पराली जलाने की समस्या को केवल किसान की आदत या जागरूकता की कमी से जोड़ना पर्याप्त नहीं है। इसमें खेती की संरचना, मशीन उपलब्धता, बाजार, परिवहन और फसल चक्र भी शामिल हैं।
हरियाणा ने पराली जलाने में कमी कैसे हासिल की?
हरियाणा में पिछले वर्षों के दौरान stubble burning incidents तेजी से कम हुए हैं। इसके पीछे monitoring, incentives, enforcement और crop residue management के संयुक्त प्रयास बताए गए हैं। 2025 में हरियाणा ने केवल 662 paddy farm fires दर्ज किए थे, जो 2024 के 1,406 मामलों से लगभग आधे थे। राज्य में hotspot गांवों की पहचान, किसानों तक कृषि मशीनरी पहुंचाने, crop residue के industrial use और field-level monitoring जैसी रणनीतियों का इस्तेमाल किया गया है।
2026 में भी ऐसे गांवों पर विशेष निगरानी की जा रही है जहां पहले पराली जलाने के ज्यादा मामले सामने आए थे। किसानों को बताया जा रहा है कि crop residue को मशीनों से काटकर मिट्टी में मिलाया जा सकता है या गांठों के रूप में उद्योगों को दिया जा सकता है। फिर भी हरियाणा में समस्या पूरी तरह खत्म नहीं हुई। खासकर कुछ कृषि प्रधान जिलों में harvesting peak के दौरान प्रशासन को लगातार निगरानी की जरूरत पड़ती है।
गेहूं की पराली भी बनी नई चुनौती
आमतौर पर stubble burning की चर्चा अक्टूबर-नवंबर में धान की पराली के संदर्भ में होती है, लेकिन अब गेहूं के crop residue पर भी ज्यादा ध्यान दिया जा रहा है।CAQM ने फरवरी 2026 में गेहूं की पराली जलाने पर नियंत्रण के लिए पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश को लेकर विशेष निर्देश जारी किए थे। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार 2025 के wheat harvesting season, यानी 1 अप्रैल से 31 मई के बीच पंजाब में 10,207 और हरियाणा में 1,832 fire events दर्ज हुए थे। 2026 में भी अप्रैल से 6 मई के बीच पंजाब में 3,729 और हरियाणा में 2,683 wheat residue fire counts दर्ज किए गए।
इससे स्पष्ट है कि Crop Residue Burning India की समस्या केवल धान तक सीमित नहीं है। यदि प्रदूषण नियंत्रण की दीर्घकालीन रणनीति बनानी है तो गेहूं और दूसरी फसलों के अवशेषों का भी आर्थिक उपयोग तलाशना होगा।
Stubble Burning से वायु प्रदूषण कैसे बढ़ता है?
फसल अवशेष जलाने पर धुएं के साथ particulate matter और कई प्रकार की गैसें वातावरण में पहुंचती हैं। इनमें सूक्ष्म कणों का स्वास्थ्य और air quality पर प्रभाव महत्वपूर्ण होता है। समस्या तब और बढ़ती है जब अक्टूबर और नवंबर में उत्तर भारत में हवा की गति कम हो जाती है और atmospheric mixing कमजोर पड़ती है। प्रदूषक आसानी से फैलने के बजाय वातावरण की निचली परतों में जमा होने लगते हैं।
इसलिए किसी दिन खेतों में आग की संख्या और शहरों में AQI के बीच सीधा एक-से-एक संबंध मानना सही नहीं है। हवा की दिशा, गति, तापमान, स्थानीय वाहनों का प्रदूषण, उद्योग, सड़क की धूल और अन्य स्रोत भी air quality को प्रभावित करते हैं।
CAQM ने भी 2025 के आंकड़ों पर कहा था कि मौसम की परिस्थितियां दिल्ली-NCR की air quality में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, हालांकि farm fires में कमी से stubble burning से होने वाले episodic pollution के जोखिम को कम करने में मदद मिली।
किसानों के लिए सबसे बड़ी समस्या लागत और समय
पराली जलाने की चर्चा में कई बार किसानों को केवल नियम तोड़ने वाले व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत कर दिया जाता है। लेकिन ground reality इससे अधिक जटिल है।एक छोटे या मध्यम किसान के लिए महंगी crop residue management machinery खरीदना आसान नहीं होता। Custom Hiring Centres और cooperative machinery उपलब्ध होने के बावजूद peak harvesting season में एक ही समय पर हजारों किसानों को मशीनों की जरूरत पड़ सकती है।
कई बार मशीन गांव में मौजूद होती है लेकिन जरूरत के समय उपलब्ध नहीं होती। कुछ मशीनें maintenance या spare parts की समस्या के कारण इस्तेमाल नहीं हो पातीं। पंजाब ने 2026 की शुरुआत में CAQM को बताया था कि उसके crop residue management machinery stock का एक हिस्सा काम करने की स्थिति में नहीं था।दूसरी चुनौती पराली की transportation cost है। यदि उद्योग या biomass plant खेत से काफी दूर है तो residue को वहां पहुंचाने का खर्च उसकी कीमत से ज्यादा हो सकता है।
इसी वजह से stubble burning का स्थायी समाधान केवल जुर्माने में तलाशना मुश्किल है। किसान के लिए वैकल्पिक तरीका आर्थिक रूप से व्यवहारिक और समय पर उपलब्ध होना जरूरी है।
पराली जलाए बिना खेत कैसे तैयार हो सकता है?
पराली को खत्म करने के कई विकल्प उपलब्ध हैं। इन्हें मुख्य रूप से in-situ management और ex-situ management में बांटा जाता है। In-situ management का अर्थ है फसल अवशेष को खेत में ही संभालना। Happy Seeder, Super Seeder, Mulcher और अन्य मशीनों की मदद से पराली को काटकर मिट्टी में मिलाया जा सकता है या उसी के बीच अगली फसल बोई जा सकती है।
इसका फायदा यह है कि पराली को खेत से बाहर ले जाने की जरूरत कम होती है। फसल अवशेष मिट्टी में जैविक पदार्थ बढ़ाने में भी योगदान कर सकते हैं।Ex-situ management में पराली को खेत से बाहर निकालकर अन्य उपयोगों में लगाया जाता है। उदाहरण के लिए इसे biomass fuel, pellets, compressed biogas, paper industry या कुछ प्रकार के industrial fuel के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। CAQM ने पंजाब और हरियाणा के कुछ क्षेत्रों में brick kilns में paddy straw based biomass pellets के इस्तेमाल को बढ़ाने के लिए भी निर्देश जारी किए हैं।
यही वह क्षेत्र है जहां solutions for stubble burning को लंबे समय तक प्रभावी बनाया जा सकता है। यदि किसान की पराली खरीदने वाला बाजार तैयार हो जाए तो वही residue जिसे अभी समस्या माना जाता है, आय का साधन बन सकता है।
क्या मशीनें अकेले समस्या हल कर देंगी?
मशीनरी जरूरी है, लेकिन केवल मशीनें उपलब्ध करा देना पर्याप्त नहीं है।पहला सवाल है कि मशीन सही समय पर किसान तक पहुंच रही है या नहीं। दूसरा सवाल है मशीन चलाने की लागत। तीसरा मुद्दा maintenance का है। चौथा सवाल यह है कि अलग-अलग खेतों और फसल स्थितियों में कौन-सी तकनीक सबसे उपयोगी है।
इसके अलावा छोटे किसान के लिए अपनी मशीन खरीदना आर्थिक रूप से संभव नहीं हो सकता। इसलिए गांव या cluster level पर machine sharing model को मजबूत करने की जरूरत है। Custom Hiring Centres को केवल कागज पर मशीन रखने वाली व्यवस्था के बजाय real-time booking system से जोड़ना उपयोगी हो सकता है। किसान मोबाइल या स्थानीय कृषि केंद्र के जरिए देख सके कि कौन-सी मशीन किस समय उपलब्ध है। यह व्यवस्था harvesting season में मशीनों की कमी और देरी को कम कर सकती है।
Drone Surveillance और Satellite Monitoring की अहम भूमिका
Stubble Burning में तकनीक की भूमिका पहले से ज्यादा महत्वपूर्ण दिखाई दे रही है।पराली की आग की पहचान लंबे समय से satellite data के जरिए की जाती रही है। ISRO, IARI और संबंधित एजेंसियों की standard protocol आधारित प्रणाली fire events को रिकॉर्ड करती है।
लेकिन satellite monitoring की अपनी सीमाएं हैं। Satellite किसी क्षेत्र के ऊपर सीमित समय पर गुजरता है। यदि आग satellite overpass के बाद लगाई और जल्दी बुझा दी गई तो हर घटना का पता लगना कठिन हो सकता है।
इसी कारण 2026 में Punjab और Haryana में drones के जरिए real-time monitoring पर ज्यादा ध्यान दिया जा रहा है। CAQM ने राज्यों को drone-based surveillance बढ़ाने के लिए कहा है। Drone monitoring से hotspot क्षेत्रों में अधिक नियमित निगरानी संभव हो सकती है। हालांकि तकनीक के साथ field verification और स्थानीय अधिकारियों की कार्रवाई भी जरूरी होगी।
क्या जुर्माना Stubble Burning रोकने का सही तरीका है?
पराली जलाना पर्यावरण और सार्वजनिक स्वास्थ्य की दृष्टि से गंभीर समस्या है, इसलिए enforcement जरूरी है। लेकिन enforcement और आर्थिक समाधान के बीच संतुलन भी उतना ही जरूरी है। यदि किसान के पास residue management का व्यावहारिक विकल्प मौजूद है और इसके बावजूद वह खेत में आग लगाता है तो नियम लागू करना उचित प्रशासनिक कदम है।
लेकिन जहां मशीन उपलब्ध नहीं, baler समय पर नहीं पहुंच रहा या crop residue खरीदने वाला कोई बाजार नहीं है, वहां केवल जुर्माने पर निर्भर नीति स्थायी समाधान नहीं बन सकती। बेहतर तरीका यह है कि incentive और enforcement दोनों साथ चलें। किसान को पराली नहीं जलाने पर आर्थिक फायदा दिखना चाहिए, जबकि लगातार नियम तोड़ने पर कार्रवाई भी हो।
पराली को Waste नहीं, Resource बनाने की जरूरत
Stubble burning समस्या के समाधान का सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत शायद यही है कि पराली को कचरा समझना बंद करना होगा। यदि paddy straw की स्थायी मांग पैदा हो जाए तो किसान उसे जलाने के बजाय बेचने में रुचि दिखाएगा।
Biomass power plants, compressed biogas plants, ethanol production, packaging material, paper manufacturing और biomass pellets जैसे क्षेत्रों में crop residue की मांग बढ़ाई जा सकती है। लेकिन इसके लिए केवल plant स्थापित करना पर्याप्त नहीं है। खेत से processing facility तक पूरी supply chain तैयार करनी होगी। गांव स्तर पर collection centre, baling facility, transport network और transparent purchasing price जैसी व्यवस्थाएं जरूरी होंगी।
मान लीजिए किसान को यह भरोसा हो कि खेत से निकली पराली निर्धारित कीमत पर निश्चित तारीख में खरीद ली जाएगी। ऐसी स्थिति में पराली जलाने की आर्थिक वजह खुद कमजोर होने लगेगी।
Crop Diversification भी क्यों जरूरी है?
Punjab Haryana Stubble Burning समस्या खेती की उस संरचना से भी जुड़ी हुई है जिसमें धान और गेहूं का चक्र बहुत मजबूत है।धान पानी की अधिक मांग वाली फसल भी है। पंजाब और हरियाणा के कई क्षेत्रों में groundwater depletion पहले से चिंता का विषय रहा है।इसलिए crop diversification को stubble burning के दीर्घकालीन समाधान के रूप में भी देखा जाता है।यदि कुछ क्षेत्रों में किसान बाजरा, मक्का, दालें, तिलहन या अन्य उपयुक्त फसलों की ओर बढ़ते हैं तो धान से पैदा होने वाले crop residue का कुल दबाव कम किया जा सकता है।लेकिन यहां भी केवल किसान से फसल बदलने को कहना पर्याप्त नहीं होगा। नई फसल की assured market demand, उचित मूल्य, procurement और processing infrastructure जरूरी है।किसान वही फसल उगाता है जिसमें उसे आय की पर्याप्त सुरक्षा दिखाई देती है।
2026 में किन बातों पर नजर रहेगी?
2026 के paddy harvesting season का सबसे महत्वपूर्ण दौर अक्टूबर और नवंबर में होगा।पहला संकेत यह होगा कि पंजाब 2025 के 5,114 fire counts से कितनी और कमी हासिल कर पाता है। हरियाणा के लिए 662 incidents का आंकड़ा एक महत्वपूर्ण benchmark रहेगा।दूसरा, drone surveillance और expanded monitoring से दर्ज मामलों की तुलना पिछले वर्षों से करते समय सावधानी जरूरी होगी। Monitoring technology बेहतर होने पर detection pattern भी बदल सकता है।तीसरा मुद्दा crop residue machinery की वास्तविक उपलब्धता है। केवल मशीनों की कुल संख्या से ज्यादा महत्वपूर्ण यह होगा कि harvesting peak में कितनी मशीनें functional और accessible हैं।
चौथा पहलू paddy straw की industrial demand है। यदि biomass, CBG और pellet projects ज्यादा residue खरीदते हैं तो किसानों को burning से हटाने में आर्थिक मदद मिल सकती है।
और अंत में मौसम की भूमिका रहेगी। हवा की दिशा और atmospheric conditions तय करेंगी कि farm fires से निकलने वाला smoke किन क्षेत्रों तक और किस मात्रा में पहुंचेगा।
पंजाब और हरियाणा में आगे क्या किया जाना चाहिए?
पराली जलाने की समस्या को रोकने के लिए कई स्तरों पर काम करना होगा। सबसे पहले किसानों को affordable और समय पर crop residue management machinery मिलनी चाहिए। इसके साथ हर जिले में functional machines का real-time database बनाया जा सकता है।
- दूसरा, गांवों में crop residue collection centres का नेटवर्क बढ़ाया जाना चाहिए। इससे छोटे किसानों को पराली खुद लंबी दूरी तक पहुंचाने की जरूरत कम होगी।
- तीसरा, उद्योगों में paddy straw की मांग बढ़ानी होगी। Biomass pellets, CBG plants और energy units को किसानों से जोड़ने के लिए organized supply chain जरूरी है।
- चौथा, crop diversification को बाजार की गारंटी के साथ लागू करना होगा।
- पांचवां, enforcement को hotspot आधारित और पारदर्शी बनाया जाना चाहिए। Satellite, drone और field teams से मिलने वाली जानकारी को जोड़ा जा सकता है।
- छठा, किसानों को केवल पर्यावरण के नाम पर समझाने के बजाय आर्थिक लाभ की भाषा में समाधान देना ज्यादा प्रभावी होगा।
- निष्कर्ष: समस्या कम हुई है, लेकिन खत्म नहीं
Punjab Haryana Stubble Burning की स्थिति पिछले कुछ वर्षों के मुकाबले निश्चित रूप से बदली है। आंकड़ों में बड़ी गिरावट इसका सबसे स्पष्ट प्रमाण है। पंजाब में paddy stubble fire counts 2021 के 71 हजार से ज्यादा मामलों से घटकर 2025 में 5,114 रह गए, जबकि हरियाणा में इसी अवधि में संख्या 6,987 से घटकर 662 हो गई। यह बदलाव बताता है कि machinery, monitoring, incentives, enforcement और crop residue के वैकल्पिक इस्तेमाल से परिणाम हासिल किए जा सकते हैं।
लेकिन 2026 की शुरुआत में ही यह कहना जल्दबाजी होगी कि समस्या हल हो गई है। सितंबर के अंत तक शुरुआती stubble burning incidents दर्ज हो चुके हैं और मुख्य धान कटाई का दौर अक्टूबर-नवंबर में है।
सबसे बड़ी जरूरत यह है कि पराली प्रबंधन को किसान पर डाला गया अतिरिक्त खर्च न रहने दिया जाए। जब फसल अवशेष से किसान को आर्थिक मूल्य मिलने लगेगा, machinery जरूरत के समय उपलब्ध होगी और biomass तथा CBG industries खेत से सीधे जुड़ेंगी, तभी burning के लिए मौजूद आर्थिक प्रोत्साहन वास्तव में कम होगा।
पंजाब और हरियाणा के अनुभव से एक महत्वपूर्ण बात सामने आती है: stubble burning को केवल प्रदूषण नियंत्रण की समस्या मानकर नहीं देखा जा सकता। यह कृषि अर्थव्यवस्था, फसल चक्र, तकनीक, बाजार, जल संकट और ग्रामीण infrastructure से जुड़ा विषय है।
इसलिए इसका स्थायी समाधान भी खेत में आग बुझाने से आगे जाकर खेत से बाजार तक पूरी व्यवस्था बदलने में छिपा है।
Frequently Asked Questions (FAQ)
1. Stubble Burning क्या होती है?
फसल की कटाई के बाद खेत में बचे तने और अन्य अवशेषों को जल्दी हटाने के लिए उनमें आग लगाने की प्रक्रिया को Stubble Burning या पराली जलाना कहा जाता है।
2. पंजाब में 2025 में कितनी Stubble Burning घटनाएं दर्ज हुई थीं?
आधिकारिक CAQM आंकड़ों के अनुसार 2025 paddy harvesting season में पंजाब में 5,114 farm fire incidents दर्ज हुए थे।
3. हरियाणा में 2025 में कितनी पराली जलाने की घटनाएं हुई थीं?
हरियाणा में 2025 के paddy season में 662 incidents दर्ज किए गए थे, जो 2024 से लगभग 53 प्रतिशत कम थे।
4. क्या Stubble Burning ही Delhi Air Pollution का मुख्य कारण है?
Stubble burning दिल्ली-NCR में autumn और early winter के दौरान pollution को प्रभावित करने वाला एक मौसमी स्रोत है, लेकिन यह अकेला कारण नहीं है। Vehicles, industries, road dust, construction, local biomass burning और मौसम की परिस्थितियां भी air quality को प्रभावित करती हैं।
5. पराली जलाने का सबसे अच्छा विकल्प क्या है?
परिस्थिति के अनुसार Happy Seeder, Super Seeder, Mulcher जैसी मशीनों से residue management, biomass pellets, CBG production और अन्य industrial uses विकल्प हो सकते हैं। सबसे प्रभावी व्यवस्था वह होगी जिसमें किसान को residue management की लागत से अधिक आर्थिक फायदा मिले।
6. Punjab Haryana Stubble Burning 2026 की स्थिति क्या है?
अक्टूबर 2026 की शुरुआत तक paddy harvesting season शुरुआती चरण में है। सितंबर के दूसरे हिस्से में farm fires दर्ज हुए हैं और CAQM ने Punjab और Haryana की तैयारियों तथा enforcement plans की समीक्षा की है। मुख्य तस्वीर अक्टूबर और नवंबर में harvesting peak के बाद स्पष्ट होगी।
7. क्या Drone से Stubble Burning की निगरानी की जा रही है?
हां। 2026 में Punjab और Haryana में traditional satellite monitoring के साथ drone-based real-time surveillance बढ़ाने की दिशा में काम किया जा रहा है, खास तौर पर चिन्हित hotspots में।
