देश में यूरिया उत्पादन की बढ़ती लागत और उर्वरक उद्योग की बदलती परिस्थितियों को देखते हुए केंद्र सरकार मौजूदा सब्सिडी व्यवस्था की समीक्षा करने की तैयारी में है। सरकार यूरिया उत्पादकों को दिए जाने वाले फिक्स्ड-कॉस्ट भुगतान की समीक्षा के लिए एक उप-समिति गठित करने जा रही है। इस कदम का उद्देश्य उत्पादन लागत में हुए बदलाव का आकलन करना और मौजूदा व्यवस्था को वर्तमान परिस्थितियों के अनुरूप बनाने की संभावनाओं पर विचार करना है।
मौजूदा फॉर्मूला लंबे समय से लागू
यूरिया उत्पादन से जुड़ी मौजूदा लागत व्यवस्था में फिक्स्ड कॉस्ट का महत्वपूर्ण स्थान है। यह वह लागत है जो उत्पादन की मात्रा के साथ सीधे तौर पर नहीं बदलती। इसमें संयंत्र के रखरखाव, कर्मचारियों से जुड़े खर्च, प्रशासनिक लागत और उत्पादन इकाइयों के संचालन से जुड़े कुछ अन्य खर्च शामिल होते हैं।
सरकार के सामने मुख्य मुद्दा यह है कि मौजूदा फिक्स्ड-कॉस्ट भुगतान का फॉर्मूला वर्ष 2002-03 से बड़े बदलाव के बिना लागू है। इस दौरान उत्पादन इकाइयों की लागत, रखरखाव खर्च, मजदूरी, तकनीकी जरूरतों और अन्य परिचालन खर्चों में काफी बदलाव आया है। ऐसे में उर्वरक कंपनियों की ओर से लंबे समय से यह सवाल उठाया जाता रहा है कि मौजूदा भुगतान व्यवस्था आज की वास्तविक लागत को पूरी तरह प्रतिबिंबित नहीं करती।
इसी पृष्ठभूमि में सरकार अब इस व्यवस्था की समीक्षा के लिए उप-समिति बनाने जा रही है। समिति मौजूदा फॉर्मूले का अध्ययन करेगी और यह देखेगी कि वर्तमान लागत परिस्थितियों में इसमें किसी तरह के बदलाव की आवश्यकता है या नहीं।
उत्पादन लागत बढ़ना बड़ी चुनौती
यूरिया देश के कृषि क्षेत्र के लिए सबसे महत्वपूर्ण उर्वरकों में शामिल है। किसानों को यूरिया नियंत्रित कीमत पर उपलब्ध कराया जाता है और इसकी वास्तविक लागत तथा किसानों से वसूली जाने वाली कीमत के बीच के अंतर को सरकार सब्सिडी के माध्यम से पूरा करती है।
ऐसे में यूरिया की उत्पादन लागत में बढ़ोतरी का सीधा असर सरकार के उर्वरक सब्सिडी बिल पर पड़ सकता है। उत्पादन लागत बढ़ने पर यदि किसानों के लिए यूरिया की कीमत में बढ़ोतरी नहीं की जाती है, तो सरकार को लागत और बिक्री मूल्य के बीच का अधिक अंतर वहन करना पड़ता है।
यही वजह है कि उत्पादन लागत की समीक्षा केवल कंपनियों और उर्वरक उद्योग का मामला नहीं है, बल्कि इसका संबंध सरकारी खजाने और किसानों दोनों से है। सरकार को एक तरफ किसानों को उचित कीमत पर यूरिया उपलब्ध कराना है, वहीं दूसरी तरफ उत्पादकों को ऐसी व्यवस्था देनी है जिससे मौजूदा लागत परिस्थितियों में उत्पादन जारी रखना संभव हो।
पुराने फॉर्मूले की समीक्षा क्यों जरूरी
2002-03 में निर्धारित व्यवस्था के बाद से उर्वरक उद्योग में कई बदलाव हो चुके हैं। उत्पादन संयंत्रों की तकनीक, रखरखाव की जरूरत, श्रम लागत और अन्य परिचालन खर्चों में बदलाव आया है। पुराने फॉर्मूले में इन बदलावों का कितना समुचित प्रतिबिंब है, यह अब समीक्षा का प्रमुख विषय हो सकता है।
फिक्स्ड कॉस्ट भुगतान का उद्देश्य उत्पादकों की उन लागतों को ध्यान में रखना है जो यूरिया उत्पादन के दौरान लगातार बनी रहती हैं। यदि यह भुगतान वास्तविक लागत की तुलना में कम रह जाता है, तो उत्पादन इकाइयों पर वित्तीय दबाव बढ़ सकता है।
वहीं, यदि फिक्स्ड कॉस्ट को बढ़ाया जाता है तो सरकार के उर्वरक सब्सिडी खर्च में भी वृद्धि हो सकती है। इसलिए सरकार के सामने संतुलन बनाने की चुनौती होगी।
किसानों पर सीधे कीमत बढ़ाने का विकल्प नहीं
यूरिया की कीमत किसानों के लिए लंबे समय से सरकार की उर्वरक नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है। उत्पादन लागत में बढ़ोतरी के बावजूद किसानों पर इसका पूरा बोझ डालना आसान विकल्प नहीं है। खेती की लागत पहले ही कई कारणों से बढ़ रही है और यूरिया की कीमत बढ़ने से किसानों की लागत और बढ़ सकती है।
इसी कारण सरकार उत्पादन लागत और सब्सिडी व्यवस्था के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रही है। यदि उत्पादकों की लागत को मौजूदा परिस्थितियों के अनुरूप मान्यता मिलती है, तो इससे उत्पादन इकाइयों की वित्तीय स्थिति मजबूत करने में मदद मिल सकती है। दूसरी ओर, सरकार को यह भी देखना होगा कि अतिरिक्त लागत का बोझ सब्सिडी बजट पर कितना पड़ेगा।
सब्सिडी व्यवस्था पर पड़ेगा असर
यूरिया क्षेत्र में सब्सिडी सरकार के उर्वरक बजट का एक बड़ा हिस्सा है। यूरिया की कीमत किसानों के लिए नियंत्रित रखने की स्थिति में उत्पादन लागत और किसान से मिलने वाली कीमत के बीच का अंतर सरकार को वहन करना पड़ता है।
इसलिए फिक्स्ड कॉस्ट में बदलाव का असर सब्सिडी व्यवस्था पर पड़ना स्वाभाविक है। यदि समिति उत्पादन लागत के आधार पर फिक्स्ड कॉस्ट बढ़ाने की सिफारिश करती है, तो सरकार को इसके वित्तीय प्रभाव का भी आकलन करना होगा।
वहीं, यदि समीक्षा के बाद मौजूदा व्यवस्था में सीमित बदलाव किए जाते हैं, तो सरकार सब्सिडी खर्च को नियंत्रित रखने की कोशिश कर सकती है। अंतिम फैसला समिति की समीक्षा और सरकार के वित्तीय आकलन के बाद ही स्पष्ट होगा।
उर्वरक उद्योग को मिल सकती है राहत
उर्वरक कंपनियों के लिए फिक्स्ड कॉस्ट की समीक्षा महत्वपूर्ण मानी जा रही है। लंबे समय से लागू व्यवस्था में यदि वास्तविक लागत और निर्धारित भुगतान के बीच अंतर बढ़ गया है, तो संशोधन से कंपनियों को राहत मिल सकती है।
खासकर पुराने यूरिया संयंत्रों के लिए रखरखाव और संचालन लागत में बदलाव एक महत्वपूर्ण मुद्दा हो सकता है। उत्पादन इकाइयों को लगातार चलाए रखने के लिए नियमित रखरखाव और तकनीकी निवेश आवश्यक होता है। इसलिए लागत संरचना की समय-समय पर समीक्षा उत्पादन व्यवस्था की स्थिरता के लिए जरूरी हो सकती है।
हालांकि, सरकार के सामने यह भी चुनौती होगी कि लागत की समीक्षा करते समय केवल कंपनियों की मांग को आधार न बनाया जाए, बल्कि वास्तविक और उचित लागत का आकलन किया जाए।
सरकार के सामने तीन प्रमुख लक्ष्य
इस पूरी समीक्षा में सरकार के सामने तीन प्रमुख लक्ष्य दिखाई देते हैं। पहला, किसानों को यूरिया उचित कीमत पर उपलब्ध कराना। दूसरा, देश में यूरिया का पर्याप्त उत्पादन बनाए रखना। तीसरा, सब्सिडी पर पड़ने वाले वित्तीय बोझ को नियंत्रित रखना।
यदि उत्पादन लागत लगातार बढ़ती है और भुगतान व्यवस्था उसी पुराने आधार पर बनी रहती है, तो उत्पादन कंपनियों पर दबाव बढ़ सकता है। दूसरी ओर, यदि सरकार लागत की पूरी वृद्धि को सब्सिडी के रूप में स्वीकार करती है, तो सरकारी खर्च बढ़ सकता है।
इसलिए प्रस्तावित उप-समिति की भूमिका महत्वपूर्ण होगी। समिति को पुराने फॉर्मूले, वर्तमान लागत और उत्पादन इकाइयों की वास्तविक जरूरतों के बीच तुलना करनी होगी।
आत्मनिर्भरता के लिए भी महत्वपूर्ण कदम
भारत ने यूरिया के घरेलू उत्पादन को बढ़ाने और आयात पर निर्भरता कम करने की दिशा में लगातार प्रयास किए हैं। ऐसे में घरेलू यूरिया संयंत्रों की आर्थिक स्थिति भी महत्वपूर्ण हो जाती है।
यदि उत्पादन इकाइयों को उनकी उचित लागत के अनुरूप भुगतान नहीं मिलता है, तो भविष्य में नए निवेश और मौजूदा संयंत्रों के आधुनिकीकरण पर असर पड़ सकता है। वहीं, लागत आधारित और पारदर्शी भुगतान व्यवस्था से घरेलू उत्पादन को बनाए रखने में मदद मिल सकती है।
सरकार की प्रस्तावित समीक्षा इसी व्यापक लक्ष्य से भी जुड़ी है। घरेलू उत्पादन मजबूत रहने पर किसानों के लिए उर्वरक की उपलब्धता सुनिश्चित करने में मदद मिल सकती है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में बदलाव का असर कुछ हद तक कम किया जा सकता है।
आगे क्या होगा
अब सबकी नजर सरकार की ओर से गठित की जाने वाली उप-समिति पर होगी। समिति मौजूदा फिक्स्ड-कॉस्ट फॉर्मूले की समीक्षा करेगी और उत्पादन लागत में आए बदलावों का आकलन कर सकती है। इसके बाद उसकी सिफारिशों के आधार पर सरकार आगे की नीति पर फैसला ले सकती है।
फिलहाल यह स्पष्ट है कि 2002-03 से चले आ रहे फॉर्मूले की समीक्षा का मुद्दा केवल उर्वरक कंपनियों की लागत तक सीमित नहीं है। इसका सीधा संबंध किसानों को मिलने वाले यूरिया के दाम, सरकार के सब्सिडी खर्च और देश की उर्वरक उपलब्धता से है।
यदि समीक्षा के बाद व्यवस्था में बदलाव होता है तो इसका असर यूरिया क्षेत्र की पूरी लागत संरचना पर पड़ सकता है। हालांकि, किसानों पर अतिरिक्त बोझ न पड़े और सरकारी सब्सिडी व्यवस्था भी टिकाऊ बनी रहे, इसके लिए सरकार को दोनों पक्षों के बीच संतुलन बनाना होगा।
यूरिया भारतीय कृषि के लिए आवश्यक इनपुट है। इसलिए इसकी कीमत, उपलब्धता और घरेलू उत्पादन तीनों को एक साथ देखना जरूरी है। प्रस्तावित समीक्षा से यह तय करने में मदद मिल सकती है कि आने वाले वर्षों में यूरिया उत्पादन और सब्सिडी व्यवस्था को किस तरह अधिक व्यावहारिक और टिकाऊ बनाया जाए।
