भारत सरकार की राजभाषा नीति के प्रभावी क्रियान्वयन तथा कार्यालयीन कार्यों में हिंदी के अधिकाधिक प्रयोग को बढ़ावा देने के उद्देश्य से भाकृअनुप-केन्द्रीय बारानी कृषि अनुसंधान संस्थान (भाकृअनुप-क्रिडा), हैदराबाद में एक दिवसीय राजभाषा कार्यशाला का सफल आयोजन किया गया। संस्थान के निदेशक डॉ. विनोद कुमार सिंह के मार्गदर्शन में आयोजित इस कार्यशाला का उद्देश्य अधिकारियों एवं कर्मचारियों को राजभाषा से संबंधित नवीन पहल, डिजिटल संसाधनों तथा कार्यालयीन हिंदी के प्रभावी उपयोग के प्रति जागरूक करना था।
कार्यशाला में संस्थान के वैज्ञानिकों, अधिकारियों और कर्मचारियों ने बड़ी संख्या में भाग लिया। कार्यक्रम के दौरान हिंदी के प्रयोग को केवल औपचारिकता तक सीमित न रखते हुए उसे प्रशासनिक कार्यों की नियमित कार्यशैली का हिस्सा बनाने पर विशेष बल दिया गया। वक्ताओं ने कहा कि हिंदी का प्रभावी उपयोग न केवल राजभाषा नीति के अनुरूप है, बल्कि इससे कार्यालयीन कार्यों में पारदर्शिता, सहजता और बेहतर संवाद भी स्थापित होता है।
कार्यशाला की मुख्य वक्ता डॉ. अर्चना पाण्डेय, सहायक निदेशक (राजभाषा), रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ), रक्षा मंत्रालय रहीं। उन्होंने अपने विस्तृत व्याख्यान में भारत सरकार की राजभाषा नीति, उसके उद्देश्यों तथा विभिन्न सरकारी संस्थानों में हिंदी के बढ़ते उपयोग पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि हिंदी केवल संवैधानिक दायित्व ही नहीं, बल्कि प्रशासनिक कार्यों को अधिक सरल, प्रभावी और जनसुलभ बनाने का एक सशक्त माध्यम भी है।
डॉ. पाण्डेय ने अधिकारियों एवं कर्मचारियों को संबोधित करते हुए कहा कि आज डिजिटल युग में हिंदी के प्रयोग को बढ़ावा देने के लिए अनेक तकनीकी संसाधन उपलब्ध हैं, जिनका अधिक से अधिक उपयोग किया जाना चाहिए। उन्होंने विशेष रूप से गृह मंत्रालय द्वारा विकसित ‘लीला (LILA) ऐप’ तथा ‘राजभाषा सारथी’ पोर्टल की उपयोगिता पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने बताया कि लीला ऐप हिंदी सीखने और भाषा कौशल को विकसित करने के लिए एक प्रभावी डिजिटल मंच है, जबकि राजभाषा सारथी पोर्टल सरकारी कार्यालयों में राजभाषा नीति के प्रभावी क्रियान्वयन, प्रशिक्षण सामग्री और आवश्यक दिशा-निर्देश उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।
उन्होंने कहा कि डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से कर्मचारी अपनी हिंदी लेखन क्षमता को बेहतर बना सकते हैं तथा कार्यालयीन पत्राचार, नोटशीट, प्रतिवेदन और अन्य दस्तावेजों को अधिक प्रभावी ढंग से हिंदी में तैयार कर सकते हैं। इससे सरकारी कार्यालयों में हिंदी के प्रयोग को नई गति मिलेगी और राजभाषा नीति के उद्देश्यों को सफलतापूर्वक पूरा किया जा सकेगा।
कार्यशाला के दौरान प्रतिभागियों ने राजभाषा कार्यान्वयन से जुड़े अनेक व्यावहारिक प्रश्न भी पूछे। इनमें कार्यालयीन पत्राचार, तकनीकी शब्दावली, डिजिटल माध्यमों में हिंदी का उपयोग तथा राजभाषा नियमों के पालन से संबंधित विषय प्रमुख रहे। डॉ. अर्चना पाण्डेय ने सभी प्रश्नों का विस्तारपूर्वक उत्तर देते हुए प्रतिभागियों की जिज्ञासाओं का समाधान किया। उन्होंने विभिन्न उदाहरणों के माध्यम से बताया कि दैनिक कार्यालयीन कार्यों में हिंदी का प्रयोग किस प्रकार सहज और प्रभावी बनाया जा सकता है।
कार्यक्रम का संचालन श्री एस.के. आनंद, सहायक निदेशक (राजभाषा) ने किया। उन्होंने मुख्य अतिथि एवं सभी प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए कहा कि इस प्रकार की प्रशिक्षण कार्यशालाएं कर्मचारियों के भाषा कौशल को विकसित करने के साथ-साथ राजभाषा नीति के प्रभावी क्रियान्वयन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। उन्होंने कहा कि नियमित प्रशिक्षण और व्यवहारिक अभ्यास के माध्यम से हिंदी के प्रयोग को संस्थागत संस्कृति का अभिन्न हिस्सा बनाया जा सकता है।
कार्यशाला के दौरान प्रतिभागियों ने भी अपने अनुभव साझा किए और इस प्रकार के प्रशिक्षण कार्यक्रमों को समय-समय पर आयोजित किए जाने की आवश्यकता पर बल दिया। उनका मानना था कि बदलते तकनीकी परिवेश में हिंदी के डिजिटल उपयोग, कार्यालयीन लेखन शैली तथा नवीन राजभाषा संसाधनों की जानकारी कर्मचारियों के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध होती है।
समापन सत्र में संस्थान के निदेशक डॉ. विनोद कुमार सिंह ने सभी अधिकारियों एवं कर्मचारियों को संबोधित करते हुए कहा कि हिंदी का अधिकाधिक प्रयोग केवल सरकारी निर्देशों का पालन नहीं, बल्कि प्रशासनिक दक्षता और भारतीय भाषाई विरासत के सम्मान का भी प्रतीक है। उन्होंने सभी कर्मचारियों से आग्रह किया कि वे अपने दैनिक कार्यालयीन कार्यों, पत्राचार, रिपोर्ट लेखन और अन्य प्रशासनिक गतिविधियों में हिंदी का अधिक से अधिक प्रयोग करें।
डॉ. सिंह ने कहा कि राजभाषा नीति का प्रभावी क्रियान्वयन संस्थान की सामूहिक जिम्मेदारी है और इसमें प्रत्येक अधिकारी एवं कर्मचारी की सक्रिय भागीदारी आवश्यक है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि इस प्रकार की कार्यशालाएं कर्मचारियों के ज्ञान और कौशल में वृद्धि करने के साथ-साथ संस्थान में हिंदी के प्रयोग को और अधिक सुदृढ़ बनाएंगी।
कार्यशाला के अंत में सभी प्रतिभागियों ने इसे अत्यंत ज्ञानवर्धक, उपयोगी और प्रेरणादायक बताया। उन्होंने भविष्य में भी ऐसे प्रशिक्षण कार्यक्रमों के नियमित आयोजन की आवश्यकता व्यक्त की ताकि राजभाषा हिंदी के प्रभावी उपयोग को और अधिक बढ़ावा मिल सके तथा सरकारी कार्यालयों में हिंदी का प्रयोग व्यवहारिक और सशक्त रूप में स्थापित हो सके।
इस सफल आयोजन ने यह स्पष्ट किया कि तकनीक और प्रशिक्षण के समन्वय के माध्यम से हिंदी को प्रशासनिक कार्यों में और अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है। भाकृअनुप-केन्द्रीय बारानी कृषि अनुसंधान संस्थान द्वारा आयोजित यह कार्यशाला राजभाषा नीति के उद्देश्यों को साकार करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल साबित हुई।

