महंगा DAP डालने के बाद भी फसल क्यों रहती है कमजोर? समझिए फॉस्फोरस लॉक की पूरी कहानी

फॉस्फोरस पौधों के लिए नाइट्रोजन और पोटाश के बाद तीसरा सबसे महत्वपूर्ण पोषक तत्व माना जाता है। यह जड़ों के विकास, फूल और फल बनने, ऊर्जा हस्तांतरण तथा बीज निर्माण में अहम भूमिका निभाता है।

DAP डालने के बाद भी फसल को फॉस्फोरस क्यों नहीं मिलता? यह सवाल अक्सर किसानों को परेशान करता है। किसान महंगा DAP खरीदकर खेत में डालते हैं, फिर भी कई बार फसल में फॉस्फोरस की कमी के लक्षण दिखाई देते हैं। पौधों की बढ़वार धीमी हो जाती है, जड़ें कमजोर रहती हैं और उत्पादन अपेक्षा से कम मिलता है। इसका कारण केवल खाद की मात्रा नहीं, बल्कि मिट्टी के अंदर होने वाली कई रासायनिक और जैविक प्रक्रियाएं हैं, जो फॉस्फोरस को पौधों की पहुंच से दूर कर देती हैं।

फॉस्फोरस क्यों जरूरी है?

फॉस्फोरस पौधों के लिए नाइट्रोजन और पोटाश के बाद तीसरा सबसे महत्वपूर्ण पोषक तत्व माना जाता है। यह जड़ों के विकास, फूल और फल बनने, ऊर्जा हस्तांतरण तथा बीज निर्माण में अहम भूमिका निभाता है। फसल की शुरुआती वृद्धि के दौरान इसकी पर्याप्त उपलब्धता बहुत जरूरी होती है।

DAP (डाय-अमोनियम फॉस्फेट) में लगभग 46 प्रतिशत फॉस्फोरस और 18 प्रतिशत नाइट्रोजन होती है। इसलिए इसे फॉस्फोरस का प्रमुख स्रोत माना जाता है। लेकिन खेत में डालने के बाद इसका पूरा फॉस्फोरस पौधों को उपलब्ध नहीं हो पाता।

मिट्टी में फॉस्फोरस लॉक क्यों हो जाता है?

कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार DAP से मिलने वाला फॉस्फोरस मिट्टी में पहुंचने के बाद विभिन्न तत्वों के साथ प्रतिक्रिया कर अघुलनशील यौगिक बना लेता है। इस प्रक्रिया को “फॉस्फोरस फिक्सेशन” या “फॉस्फोरस लॉक” कहा जाता है।

जब ऐसा होता है तो मिट्टी में फॉस्फोरस मौजूद होने के बावजूद पौधे उसे अवशोषित नहीं कर पाते।

  1. क्षारीय मिट्टी में कैल्शियम से बंध जाता है फॉस्फोरस

भारत के कई राज्यों, विशेषकर उत्तर प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, पंजाब और मध्य प्रदेश की मिट्टियां क्षारीय (Alkaline) प्रकृति की हैं। ऐसी मिट्टी में कैल्शियम की मात्रा अधिक होती है।

DAP डालने के बाद फॉस्फोरस कैल्शियम के साथ मिलकर कैल्शियम फॉस्फेट बना लेता है। यह यौगिक पानी में कम घुलनशील होता है, इसलिए पौधों की जड़ों तक नहीं पहुंच पाता।

यही कारण है कि मिट्टी परीक्षण में फॉस्फोरस की मात्रा पर्याप्त दिखने के बावजूद फसल में इसकी कमी दिखाई देती है।

  1. अम्लीय मिट्टी में आयरन और एल्युमिनियम बनते हैं समस्या

पूर्वोत्तर भारत, झारखंड, ओडिशा, पश्चिम बंगाल और दक्षिण भारत के कुछ क्षेत्रों में अम्लीय मिट्टियां अधिक पाई जाती हैं।

ऐसी मिट्टी में फॉस्फोरस आयरन और एल्युमिनियम के साथ प्रतिक्रिया कर आयरन फॉस्फेट और एल्युमिनियम फॉस्फेट बना लेता है। ये भी पौधों के लिए लगभग अनुपलब्ध हो जाते हैं।

इसलिए अम्लीय मिट्टी में DAP डालने के बावजूद फसल को पर्याप्त फॉस्फोरस नहीं मिल पाता।

मिट्टी का pH सबसे बड़ा कारक

फॉस्फोरस की उपलब्धता मिट्टी के pH पर बहुत अधिक निर्भर करती है।

वैज्ञानिकों के अनुसार pH 6.5 से 7.5 के बीच फॉस्फोरस की उपलब्धता सबसे अच्छी रहती है। जैसे-जैसे मिट्टी अधिक अम्लीय या अधिक क्षारीय होती जाती है, फॉस्फोरस का फिक्सेशन बढ़ता जाता है।

इसलिए केवल DAP की मात्रा बढ़ा देने से समस्या का समाधान नहीं होता। मिट्टी का pH संतुलित रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

DAP का गलत प्रयोग भी बनता है कारण

कई किसान DAP को बुवाई के काफी समय बाद या सतह पर छिड़ककर डाल देते हैं।

फॉस्फोरस मिट्टी में बहुत कम गतिशील (Immobile) तत्व है। यह नाइट्रोजन की तरह आसानी से मिट्टी में इधर-उधर नहीं जाता। यदि DAP बीज या जड़ों के पास नहीं पहुंचता, तो पौधे इसका लाभ नहीं उठा पाते।

इसलिए वैज्ञानिक DAP को बुवाई के समय या बुवाई से पहले मिट्टी में उचित गहराई पर डालने की सलाह देते हैं।

मिट्टी में जैविक कार्बन की कमी

आज अधिकांश कृषि भूमि में ऑर्गेनिक कार्बन का स्तर लगातार घट रहा है।

जैविक पदार्थ मिट्टी में फॉस्फोरस को उपलब्ध बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। गोबर की खाद, कम्पोस्ट, वर्मी कम्पोस्ट और हरी खाद मिट्टी में ऐसे कार्बनिक अम्ल बनाते हैं जो फॉस्फोरस को घुलनशील बनाए रखने में मदद करते हैं।

जहां जैविक पदार्थ कम होते हैं, वहां फॉस्फोरस का फिक्सेशन अधिक हो सकता है।

ठंडा मौसम भी कम कर देता है फॉस्फोरस अवशोषण

सर्दियों में गेहूं और अन्य रबी फसलों में अक्सर फॉस्फोरस की कमी दिखाई देती है।

कम तापमान पर पौधों की जड़ें धीमी गति से बढ़ती हैं और फॉस्फोरस का अवशोषण घट जाता है। कई बार खेत में पर्याप्त फॉस्फोरस मौजूद होता है, लेकिन ठंड के कारण पौधे उसे उपयोग नहीं कर पाते।

इसे “टेम्परेरी फॉस्फोरस डेफिशिएंसी” भी कहा जाता है।

अत्यधिक नमी या जलभराव

जलभराव वाली मिट्टियों में जड़ों का विकास प्रभावित होता है। कमजोर जड़ प्रणाली फॉस्फोरस सहित अन्य पोषक तत्वों का अवशोषण कम कर देती है।

धान या अन्य फसलों में लंबे समय तक पानी भरा रहने पर यह समस्या अधिक देखने को मिल सकती है।

जड़ों का कमजोर विकास

फॉस्फोरस का अवशोषण मुख्य रूप से नई और सक्रिय जड़ों द्वारा किया जाता है।

यदि फसल में कीट, रोग, निमेटोड या अन्य कारणों से जड़ें कमजोर हो जाएं तो DAP डालने के बावजूद पौधे पर्याप्त फॉस्फोरस नहीं ले पाते।

इसलिए स्वस्थ जड़ प्रणाली फॉस्फोरस उपयोग दक्षता के लिए आवश्यक है।

समाधान क्या है?

मिट्टी परीक्षण कराएं

हर 2-3 साल में मिट्टी की जांच कराना सबसे पहला कदम होना चाहिए। इससे pH, उपलब्ध फॉस्फोरस और अन्य पोषक तत्वों की सही स्थिति का पता चलता है।

संतुलित उर्वरक प्रबंधन अपनाएं

केवल DAP पर निर्भर रहने के बजाय NPK, SSP और अन्य फॉस्फोरस स्रोतों का उपयोग मिट्टी की स्थिति के अनुसार करें।

जैव उर्वरकों का उपयोग बढ़ाएं

फॉस्फेट सॉल्युबिलाइजिंग बैक्टीरिया (PSB) और माइकोराइजा जैसे जैव उर्वरक मिट्टी में लॉक फॉस्फोरस को घुलनशील बनाकर पौधों तक पहुंचाने में मदद करते हैं।

जैविक खाद का प्रयोग करें

गोबर की सड़ी खाद, कम्पोस्ट, वर्मी कम्पोस्ट और हरी खाद का नियमित उपयोग फॉस्फोरस की उपलब्धता बढ़ाता है तथा मिट्टी के स्वास्थ्य में सुधार करता है।

सही स्थान पर DAP डालें

DAP को बीज के पास लेकिन सीधे संपर्क में नहीं, बल्कि उचित दूरी और गहराई पर डालना चाहिए ताकि जड़ें आसानी से फॉस्फोरस प्राप्त कर सकें।

नैनो और विशेष फॉस्फोरस तकनीकों पर ध्यान दें

वर्तमान में नैनो DAP, कोटेड फॉस्फेट उर्वरक और उन्नत फॉस्फोरस प्रबंधन तकनीकों पर काम हो रहा है, जिनका उद्देश्य फॉस्फोरस उपयोग दक्षता बढ़ाना है।

निष्कर्ष

DAP डालना ही पर्याप्त नहीं है। फसल को वास्तव में फॉस्फोरस तभी मिलेगा जब मिट्टी की रासायनिक स्थिति, pH, जैविक कार्बन, जड़ों का स्वास्थ्य और उर्वरक प्रबंधन सही होगा। भारत में कई खेतों में फॉस्फोरस की कमी का मुख्य कारण उर्वरक की कमी नहीं बल्कि “फॉस्फोरस लॉक” की समस्या है। इसलिए किसानों को केवल अधिक DAP डालने के बजाय वैज्ञानिक पोषक तत्व प्रबंधन अपनाना चाहिए। मिट्टी परीक्षण, जैविक खाद, PSB कल्चर और संतुलित उर्वरक उपयोग के माध्यम से फॉस्फोरस की उपलब्धता बढ़ाई जा सकती है, जिससे उत्पादन लागत कम होगी और फसल की पैदावार में सुधार होगा।

 

Exit mobile version